विचारों को देखो, वृत्तियाँ पकड़ में आ जाएँगी || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता::आर्टिकल (लेख) इंग्लिश में पढ़ रहे हैं और सवाल हिन्दी में रखना चाहूँगा 'क्रिएटिंग अ न्यू ह्यूमैनिटी थ्रू इंटेलिजेंस स्प्रिचुअलिटी' ( बौद्धिक आध्यात्मिकता के माध्यम से मानवता का निर्माण) पढ़ा था। और बहुत अच्छी वार्तालाप हुई; सभी सदस्यों के साथ। उसमें मैं पढ़ता हूँ कि कहाँ पर थोड़ी सी इंटेसिव डिस्कशन (गहन चर्चा) हुई, लेकिन क्लैरिटी (स्पष्टता) थोड़ी चाहिए और मार्गदर्शन चाहिए आपसे।
"द की टू द डिज़ोल्युशन ऑफ़ द सबकॉन्शियस लाइज़ इन द ऑब्ज़र्वेशन ऑफ़ द कॉन्शियस। विल यू रिमेंबर दिस? द वन हू ऑब्ज़र्व्स द कॉन्शियस माइंड, इज़ साइमल्टेनियस्ली , पैरलली , डिज़ाॅल्विंग द सब्कॉन्शियस। द कॉन्शियस गॉन, द सब्कॉन्शियस डिज़ाॅल्व्ड, व्हाट रिमेंस इज़ 'यू'। एंड दैट इज़ ‘अंडरस्टैंडिंग’।" - आचार्य प्रशांत (अवचेतन के विघटन का उपाय चेतना के अवलोकन में निहित है। जो चेतन मन का अवलोकन करता है, वह एक साथ, समानांतर रूप से, अवचेतन को विघटित कर रहा है। चेतन चला गया, अवचेतन विलीन हो गया, जो बचा है वह 'आप' है। और वह है 'बोध’।)
आचार्य जी अभी तक तो मेरी यही सोच थी कि चेतन मन का अवलोकन ज़रूरी है लेकिन वृत्तियाँ कभी नहीं मिट सकती। तो मेरा सवाल ये है कि चेतन मन का अवलोकन करने से वृत्तियाँ कैसे मिट जाती है?
आचार्य प्रशांत: और कैसे पता चलेगा कि मन के गहरे तहखानों में क्या बैठा हुआ है। जब आप कहते हैं, कॉन्शियस (चैतन्य )। जब आप कहते हैं कॉन्शियस माइंड (चैतन्य मन), तो उससे आशय क्या होता है। उससे आशय होता है मन का वो छोटा सा हिस्सा जो मन की ही पकड़ में आता है, माने इन्द्रियों की पकड़ में आता है।
जिसको आप जान गये , जो आपके ज्ञान के क्षेत्र में आ गया—मन का उतना सा हिस्सा कहलाता है, कॉन्शियस माइंड।



