प्रश्न: जो कुछ भी बाहरी है उसको हम व्यर्थ, कचड़ा, धूल क्यों कहते हैं?
आचार्य प्रशांत: जो कुछ भी बाहरी है जब वो आपके सम्पर्क में आता है तो आप में क्या बदलाव आता है? बाहर से ज्ञान आया, अनुभव आया, कोई संवेग आया। ज्योंही ये आपके सम्पर्क में आये, आपके साथ क्या हुआ?
प्र: मुझमें विचार आ गये।
आचार्य: तुममें विचार आ गये, तुममें विचार आ गये। तुममें कुछ जुड़ गया, तुममें कुछ बढ़ गया। बाहरी तुमसे जब भी मिलेगा तुममें कुछ जोड़ देगा, बढ़ा देगा। और जो कुछ भी जुड़ा और बढ़ा वो कहाँ बैठ गया?
प्र: मन में।
आचार्य: मन में बैठ गया। और मन में जब कुछ जुड़ जाता है, बढ़ जाता है तो क्या हालत होती है?
प्र: व्यथित।
आचार्य: अच्छा, एक बात बताओ, सोना अच्छा क्यों लगता है?




