प्रश्नकर्ता: जैसे मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और हाॅस्पिटल, कुछ मेडिकल और कुछ सेवाएँ हैं जहाँ सेवा चलते रहती है और लाभ उठाने वाले जो लोग हैं, क्या उन सेवाओं से उन पर दुष्परिणाम हो रहा है? जहाँ से फ्री (मुफ़्त) में जो उठा रहे हैं सेवा का लाभ और क्या इन बातों से समाज में कुछ गलत धारणाएँ भी जा रही हैं?
आचार्य प्रशांत: वो तो डिपैंड (निर्भर) करता है देने वाले पर लेने वाले दोनों पर निर्भर करता है।
प्र १: तो जैसे लेने वाले होते हैं तो फिर वो तो उनको आदत लग जाती है, लत लग जाती है फिर।
आचार्य: देने वाला इस पर बन्दिश नहीं लगा सकता। गुरुद्वारों में अगर लंगर का आयोजन है तो वो कैसे नापें और कैसे रोकें कि सिर्फ़ जो वास्तविक सुपात्र लोग होंगे, ज़रूरतमन्द होंगे, सिर्फ़ वो आएँगे, बाकियों को हम नहीं देंगे? वो कैसे इस पर रोक लगाएँ, बताओ?
प्र १: नहीं, रोक तो नहीं लगाएंगे, पर क्या इस से गलत भी कुछ जा रहा है समाज में?
आचार्य: गलत तो हर चीज़ से जा सकता है। अमृत भी ज़हर बन सकता है। गलत तो सब कुछ हो सकता है। वो तो हमारी नीयत पर है कि हम किस चीज़ का क्या इस्तेमाल करना चाहते हैं। ये जो है, ये तो लिखने के लिए है न (कलम उठाते हुए)। मैं इसी को ऐसे लूँ और ऐसे अपने मार लूँ (अपनी गर्दन पर खोंपने का इशारा करते हुए), तो ये मरने के लिए भी हो जाएगा।




