
आचार्य प्रशांत: हमें कैसे पता चलेगा कि हमारी सोच, हमारी सोच है कि नहीं? हमारे ख़्याल हमारे हैं या समाज के हैं?
तुम जब तक सामाजिक हो, तो तुम्हारे ख़्याल, हाव-भाव, ये सब सामाजिक ही होने हैं, वो और कुछ हो ही नहीं सकते न। जो तुम्हारा पूरा ‘मैं’ का भाव है, कि ‘मैं कौन हूँ?’ वो जब तक बाहर से कहीं से आया है, तो उसकी जितनी गतिविधियाँ होंगी उस ‘मैं’ की, वो भी सब बाहरी ही तो होंगी। वो कुछ भी सोच रहा हो या कुछ भी कर रहा हो, वो कुछ करने की कोशिश कर रहा हो चाहे कुछ रोक रहा हो, वो जो कुछ होगा वो सब सिर्फ़ संस्कारों का प्रभाव होगा, उसमें आत्मिक कुछ होगा नहीं।
जब भी कुछ करो और ये उत्सुकता जगे कि उसमें मौलिकता है या नहीं, तो इतना देख लिया करो कि अगर संस्कारित न किया गया होता, शिक्षित न किया गया होता, तमाम तरीक़े के प्रभाव न पड़े होते मन पर, तो क्या तब भी मैं यही कर रही होती? या कि, क्या दूसरे लोग ऐसी ही परिस्थितियों में यही करते हैं? या कि, मैं ही क्या परिस्थिति बदल जाने पर भी ऐसी ही रह जाऊँगी? या कि, क्या मैं सदा से ऐसी ही थी?
एक आदमी आपकी तरफ़ आता है, आप उसे देखकर मुस्कुरा देते हैं, दिखने में साधारण-सी घटना है पर इसके पीछे संस्कारों की एक लंबी गाथा होती है। हम यूँ ही नहीं मुस्कुरा देते, व्यक्ति बदल जाए नहीं मुस्कुराएँगे, स्थिति बदल जाए नहीं मुस्कुराएँगे, कुछ जानकारी आ जाए नहीं मुस्कुराएँगे। उस व्यक्ति के बारे में कुछ बातें पता चल जाएँ नहीं मुस्कुराएँगे।
कुछ भी क्या हमारे पास ऐसा है जो समय से, संस्कार से, काल से अछूता हो? दूसरे शब्दों में, क्या कुछ भी ऐसा है जिसके पीछे कोई वजह, कोई कारण न हो? जो कहीं से आया न हो? जिसकी उत्पत्ति न हुई हो? क्या कुछ भी ऐसा है जो वैसा ही रहता यदि आपके जीवन में जो घटनाएँ घटी हैं, वो न घटतीं?
आप जिनसे दावा करते हो कि आपको प्रेम है, उनके बारे में आपको यदि कुछ मूलभूत बातें जो पता हैं वो बदल जाएँ, तो क्या तब भी प्रेम कायम रह जाएगा? यही बातें हैं जो देखने योग्य हैं, और देखना मानें देखना। जब मैं कह रहा हूँ ‘देखने योग्य’ है, तो मैं किसी कर्म-विशेष की ओर इशारा नहीं कर रहा। मैं नहीं कह रहा हूँ कि देख करके फिर ऐसा-ऐसा कर्म करना है, कोई एक्शन ले लेना है, उस पर मैं बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, ये बातें देखने योग्य हैं। इतना कुछ है जो हम अन्यथा करते ही रहते हैं, इतना कुछ है जो हमारे मन पर हावी रहता ही है, छाया रहता ही है, उस सबसे ज़्यादा पात्रता इस बात की है। आप गाड़ी में बैठकर कहीं जा रहे हो, और सोचना आपका काम है, सोचते तो आप रहते ही हो, यही सोचो।
आपके बाक़ी सारे विचारों से ज़्यादा पात्रता इस विचार की है — आत्म-विचार।
दो जानवर हैं, एक पेड़ है, एक उसकी ओर आकर्षित होता है, एक नहीं होता। कोई इस घटना को ही यदि समझ ले, तो मन के संस्कारित होने की जो पूरी प्रक्रिया है, वो समझ जाएगा।
और बड़ी साधारण-सी घटना है, आप ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रहे हो, आपने देखा एक तरह की घास जमी हुई है और दो अलग-अलग जानवर हैं, कुत्ता हो सकता है और बकरी हो सकती है, और दोनों का रुख उस घास के प्रति अलग-अलग है। आपने यदि सिर्फ़ इस घटना पर ग़ौर कर लिया, तो आप पूरे संसार को समझ जाएँगे, विविधता माने क्या, संसार माने क्या, रुचियाँ माने क्या, प्रयोजन माने क्या, अहंकार माने क्या। ये सारे भेद खुल जाएँगे, यदि आप बस इस घटना पर ग़ौर कर लो कि घास है, बकरी है और कुत्ता है और बकरी और कुत्ते का रुख अलग-अलग है उस घास के प्रति, सब जान जाएँगे।
घास को भी समझिए, बकरी को भी समझिए, कुत्ते को समझिए, इस पूरी घटना को समझिए, पूरी बात खुल गई। बकरी के पास भी एक ‘मैं’ है, कुत्ते के पास भी है, घास के पास भी है, और सबका ‘मैं’ एक-दूसरे से अलग है। इन तीनों को जब आप देखेंगे, तो ‘मैं’ आदि से अंत तक पूरा समझ में आ जाएगा — कहाँ से उदित होता है, कहाँ को जाता है, सब आ जाएगा समझ में। कोई निष्कर्ष नहीं निकालना होता।
जो आम शिक्षा होती है और जो आध्यात्मिक प्रक्रियाएँ होती हैं, उनमें अंतर यही है कि अध्यात्म में निष्कर्ष की कोई आवश्यकता नहीं होती।
गणित नहीं है कि जिसमें किसी उत्तर तक पहुँचना है, प्रक्रिया ही सब कुछ है क्योंकि आप जैसे हैं, आप स्वयं मात्र एक प्रक्रिया हैं इसी प्रक्रिया को जानना है।
वास्तव में, आध्यात्म में निष्कर्ष अगर कुछ होता है तो ‘आत्मा’ होता है, और ‘आत्मा’ शब्दों में समाने वाला निष्कर्ष है नहीं, तो कोई निष्कर्ष हो नहीं सकता। निष्कर्ष मतलब, जो आख़िरी बात है। निष्कर्ष मतलब, वो बिंदु जहाँ जाकर रुक जाना है। अध्यात्म में रुका तो आत्मा पर जाता है पर वो रुकना उस अर्थ में रुकना नहीं है जिस अर्थ में हमारा सांसारिक रुकना होता है। तो उसे हम रुकना भी नहीं कह सकते, क्योंकि यदि आप रुकना कहेंगे तो कोई और आकर उसको चलना कह सकता है। यदि आप समाप्ति कहेंगे तो कोई आकर उसको उद्गम कह सकता है। आप उसे ख़त्म होना कहेंगे, कोई उसे शुरुआत कह सकता है। आप जो भी कहेंगे, उसका विपरीत भी उतना ही ठीक होगा।
तो इतना ही समझना काफ़ी है कि प्रक्रियाओं पर ग़ौर करना है और ग़ौर करके उसमें से कुछ निकालना नहीं है। ये ग़ौर करना ही काफ़ी है, इस ग़ौर करने को ही आध्यात्मिकता कहते हैं। मैं फिर दोहरा रहा हूँ, ग़ौर करके उसका कोई निचोड़ नहीं निकालना है, ग़ौर करके किसी को बताना नहीं है कि मैंने ध्यान दिया और इससे मुझे ये बात पता चली।
“क्या पता चला आपको?” यदि आप ये बता पा रहे हैं, तो जो पता चला वो फ़िज़ूल था। ये ऐसी दुकान है जहाँ जाकर यदि आपने कुछ ख़रीद लिया, तो आप ठगे गए। जाना है, जाना ही काफ़ी है। जो कोई वापस आकर दिखा पाए कि मैं दुकान तक गया और देखो ये ख़रीद लाया, वो ठगा गया। ख़रीदना नहीं है, जाना है, कुछ लेकर नहीं आना है वहाँ से, कुछ हासिलियत नहीं है। बात आ रही है समझ में?
ये जीने का एक नया तरीक़ा है, क्योंकि हम तो हासिलियत की ही भाषा और ज़िंदगी जानते हैं न। हम कहते हैं, कहीं गए हैं, तो वहाँ से कुछ प्राप्ति हो जाए। यहाँ खेल प्राप्ति का है ही नहीं। यहाँ से भी उठ के जाओ तो ये मत कहना, कि ये प्राप्ति हो गई, ये जान लिया, ये समझ लिया। तुम थे, वो ज़रूरी है, तुम्हारा होना क़ीमती है, वही निष्कर्ष है।
ये बात ज़रा टेढ़ी है, उसके लिए जो यहाँ न मौजूद हो या कि जो यहाँ यदा-कदा आता हो। कोई बाहर बैठा हो, वो आपसे पूछेगा कि क्या पता करके आए? और लोगों को इस तरीक़े के प्रश्न करने में बड़ी रुचि होती है, कि “अच्छा, वहाँ मिला क्या?” वो चाहते हैं कि आप अपनी जेब से कुछ माल निकालें और दिखा दें कि देखो, ये लेकर आए हैं। अगर आपने दिखा दिया, तो आप कुछ लेकर नहीं आए हैं। आपकी जेब खाली होनी चाहिए, कुछ नहीं मिला है।
ग़ौर करते रहो ‘मैं’ पर, उसके बाद अपने-आप ठीक हो जाएगा सब कुछ। ये सवाल मत पूछो कि मैं कैसे पता करूँ कि मेरा कितना असली है? ये ‘मैं’ यदि नकली है, तो ये पता कैसे करेगा कि क्या असली है? पर जिस भाषा में हम दुनिया के दूसरे सवाल पूछते हैं, उसी भाषा में हम आध्यात्मिक सवाल भी पूछ लेते हैं न, कि मैं कैसे पता करूँ कि मेरे विचार कितने असली हैं और कितने संस्कारित हैं? यही सवाल पूछा, न?
ये ‘मैं’ कौन है जो पता करेगा? ये ‘मैं’ वही है जिस पर तुम्हें शक है। ये ऐसी ही बात है कि तुम्हें लगे कि तुम्हारे घर में किसी ने चोरी कर ली है, और जिस पर तुम्हें शक है उसी को तुम भेजो, कि जाओ पता करके आओ चोर कौन है। पहले तो तुम्हें इसी ‘मैं’ पर शक है, फिर तुम इसी ‘मैं’ का इस्तेमाल करके ये जानना चाहती हो कि ये असली कितना है, कैसे हो पाएगा?
ये ‘मैं’ जो कुछ भी है, अपने आप को प्रकट करता ही रहता है, उसको देखते रहो, मात्र देखते रहो उनको सुधारने की कोशिश मत करने लग जाना। आध्यात्मिकता आत्म-सुधार का कार्यक्रम नहीं है, ये व्यक्तित्व-निर्माण की कार्यशाला नहीं है। क्या आध्यात्मिक लोग होते हैं, ज़रा वो किसी तल उन्नति करना शुरू कर देते हैं। ये उन्नति-अवनति वाला खेल ही नहीं है।
अरे, कोई खेल नहीं है, कोई उन्नति नहीं है तो हम ये करें क्यों? अभी आपका समय नहीं है। अगर आप ऐसे सवाल अभी पूछ रहे हैं, तो आपका समय नहीं आया। ये ऐसा खेल है जो निःप्रयोजन खेला जाता है, जिन्हें इतनी-सी बात दिखाई देने लग जाती है कि उनके प्रयोजन उन्हें ही भारी पड़ रहे हैं, उन्हें ही पात्रता है आध्यात्मिकता में प्रवेश की। जो अभी प्रयोजनों से बंधे हुए हैं, वो न आएँ। ये सब बहुत आम भ्रांतियाँ हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है।
मैं अपने दुर्गुणों को दूर करने के लिए आध्यात्मिकता में प्रवेश चाहता हूँ, तो तुम क्या हो? दुर्गुणी। जो दुर्गुणी है, उसे कैसे पता कि दुर्गुण क्या? फिर पूछ रहा हूँ, मैं अपने दुर्गुणों को दूर करने के लिए या कि मैं अपने सद्गुणों का विकास करने के लिए आध्यात्मिकता चाहता हूँ, तो अभी तुम्हारे सद्गुणों में कमी है, तभी विकास चाहते हो। मतलब न समझ हो, पूरी बात समझते नहीं। बुद्धि और बोध अपरिपक्व हैं, तो तुम जानोगे कैसे कि फिर दुर्गुण क्या है?
ये ऐसी ही बात है, कि कोई डॉक्टर के पास जाए, डॉक्टर पूछे, बीमारी क्या तुम्हारी? बोले, भूल जाना। डॉक्टर कह रहा है, अच्छा बताओ, आज तक फिर क्या-क्या इलाज कराया तुमने? और वो बता भी रहा है, पिछले 20 साल में उसने क्या-क्या इलाज कराए थे, किन-किन अस्पतालों में गया था, क्या-क्या गोलियाँ खाई थीं, वो सब बता रहा है। बीमारी क्या उसे? भूल जाना।
अगर तुम्हारी बीमारी है भूल जाना, तो तुम क्यों इतनी गाथा गा रहे हो? पर देखिए, बड़ा आम प्रयोजन रहता है, क्या? मैं अपने दुर्गुणों को दूर करने के लिए गुरु के पास, शास्त्रों के पास, आध्यात्मिकता के पास जा रहा हूँ। तुम बस जाओ, कोई प्रयोजन लेकर मत जाओ। तुम्हारा जो भी प्रयोजन होगा, वो मूर्खतापूर्ण होगा। ठीक उसी तरीक़े से, ध्यान का कोई प्रयोजन नहीं हो सकता। जो कुछ भी जीवन में केंद्रीय है, मूल्यवान है, उसका कोई प्रयोजन नहीं हो सकता। छोटी-मोटी बातों का प्रयोजन होता है, चौराहे तक जा रहे हैं आटा ख़रीदने के लिए, ये प्रयोजन है। ठीक है, बढ़िया प्रयोजन है, चौराहे तक गए आटा ख़रीदने के लिए।
जो कुछ भी असली है, वो तो बस यूँ ही, बेमतलब, अकारण, फ़िज़ूल, हवा जैसे बह रही हो, कभी इधर, कभी उधर, ऐसे हो जाता है।