प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी।
मेरे दिमाग में जब कोई विचार आता है, आई फाइंड इट मोर डिफिकल्ट टू शेक इट ऑफ (मुझे उसे हटाना अधिक कठिन लगता है), इट्स वेरी स्टिकी (यह बहुत चिपचिपा है)। और कभी-कभी वह इतनी इंपॉर्टेंट (ज़रूरी) हो जाता है कि आई स्टार्ट थिंकिंग थाट इफ आई गेट एन आंसर टू थाट क्वेश्चन, इट्स लाइक ट्रुथ (मैं आइसे सोचने लगती हूँ कि अगर मुझे इस सवाल का जवाब मिल जाए, तो वो सत्य के समान है)। जैसे मैं अगर इस प्रॉब्लम से निकल पाए, कि मैं लाइफ में क्या वर्क (जीवन में क्या काम) करूँ। व्हिच इज अ क्वेश्चन इन माय माइंड (जो मेरे मन का सवाल है), व्हिच इज आल्सो अ थॉट (जो एक विचार भी है)। तो शायद आई विल गेट नियर टू थ ट्रुथ (मैं सत्य के निकट पहुँच पाऊँगी)। तो यह जो गार्ब (परिधान) पहन लेता है, द मेंटल (मानसिक) विचार ऑफ ट्रुथ (सत्य का)। हाउ टू लीव इट (इसे कैसे छोड़ें)?
आचार्य प्रशांत: अपने-आप को साफ़ बता दिजिए कि विचार तो ट्रुथ है ही नहीं। जैसे बहुत सारी बातें हैं न जिस पे हम दृढ हो जाते हैं बिलकुल। बहुत सारी बातें हैं जिनको हम ट्रुथ ही मान लेते हैं।
मान लेते हैं कि नहीं? ऐसी कोई बात आपकी जिंदगी में नहीं है? आप है कि नहीं है? तो इतना तो ट्रुथ माना हुआ है न? है तो यही भी सिर्फ़ विचार ही। पर इसको ट्रुथ माना हुआ है कि नहीं कि 'मैं हूँ।' तो जैसे इस धारणा को सत्य मान रखा है कि मैं हूँ। इससे बेहतर एक धरना बता देता हूँ, उसको सत्य मान लीजिए। "मुझे जो कुछ भी लगता है वह सच नहीं हो सकता।" सोच सच नहीं हो सकती।




