प्रश्नकर्ता: मैं अपने अतीत से बहुत परेशान हूँ, मैं इससे बाहर कैसे निकलूॅं?
आचार्य प्रशांत: असल में हम अपने ऑल्टरनेट फ्यूचर्स (वैकल्पिक भविष्यों) को लेकर के ईमानदार नहीं होते हैं। हमारी गाड़ी किस दिशा जा रही थी, हम ये देखते ही नहीं हैं कि अगर वो उसी दिशा जाती रहती तो गाड़ी अब तक किस गड्ढे में गिर गयी होती। आपकी गाड़ी किस गड्ढे में, किस खाई की ओर जा रही थी, वो काफ़ी खौफ़नाक हो सकता था। तो सबसे पहले तो हम ऊपरवाले को सप्रेम धन्यवाद देंगे कि तुमने बहुत दिया और हमें बहुत आफ़तों से बचाया।
अपने करने पर तो हम न जाने कहाँ गिरे जा रहे थे, तुमने हमारी गाड़ी को बिलकुल खाई में जाने से बचा दिया। देखिए, ग्रैटीट्यूड (कृतज्ञता) के लिए जो एक मानसिक विधि होती है वो यही होती है कि एक रियलिस्टिक ऑल्टरनेट फ्यूचर (वास्तविक वैकल्पिक भविष्य) की कल्पना कर लो। वो मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कल्पना में हमारा बड़ा यक़ीन है जो कल्पना न करते हों, उन्हें मैं ये विधि नहीं देता, पर जो लोग खूब ख़्वाबों-ख़यालों और कल्पनाओं में जीते हैं, जिन्हें इमैजिन (कल्पना) करने में बड़ा सुख रहता है, मैं उनसे कहता हूँ इमैजिन अगर कर ही रहे हो तो ये इमैजिन कर लो कि तुम्हारा होने क्या वाला था, अगर ईश्वर ने तुम्हारा साथ न दिया होता! इमैजिन द ऑल्टरनेट फ्यूचर (किसी वैकल्पिक भविष्य की कल्पना कर लो)।
आप मैनेजमेंट (प्रबन्धन) में पोस्टग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) हैं तो इसको मैं कह रहा हूँ कि गेट होल्ड ऑफ़ द अपॉर्च्युनिटी कॉस्ट (अवसर लागत पर नियन्त्रण रखें) । ठीक है? ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट (अवसर लागत) वो होती है जो दिखायी नहीं देती है पर पीछे-पीछे से वो लग रही होती है। तो इसी तरीक़े से आप ये देख लीजिए कि आपको जो ऑपर्च्युनिटी बेनिफिट (अवसर लाभ) हुआ है वो कितना हुआ है? अभी आप बस यही देख रहे हो कि आपको कितना मिला है, आप ये नहीं देख रहे हैं कि अगर ये न होता तो क्या होता? एक बात साफ़-साफ़ समझिएगा, ये सूत्र की तरह बता रहा हूँ। हम जिनकी उदासी में थम जाते हैं और आगे बढ़ने से इनकार कर देते हैं, हमसे कोई बिछुड़ गया हो, हमें किसी की तलाश हो, हम जिनकी उदासी में थम जाते हैं और आगे बढ़ने से इनकार कर देते हैं वो हमसे बिछुड़े ही इसीलिए होते हैं क्योंकि हम आगे बढ़ने से इनकार कर देते हैं और उनको वापस पाने का भी सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है कि आगे बढ़ जाओ। आगे बढ़ जाओ, वो दोबारा वापस मिल जाऍंगे। आप समझ रहे हो? आप आगे बढ़िए, जो खोया है वो दोबारा आपको वापस मिल जाएगा। लेकिन आप आगे नहीं बढ़े, तो वापस नहीं मिलेगा। मैं उस बात को फिर दोहरा रहा हूँ। भावनाएँ सुन्दर होती है, लेकिन मन की शान्ति और स्पष्टता भावनाओं से भी सुन्दर बात है। हम जिनकी उदासी में थमकर खड़े हो जाते हैं, वो वापस तभी मिलेंगे जब आप आगे बढ़ेंगे और वो आपसे बिछुड़े ही इसीलिए कि आप थमकर खड़े हो गये। आप आगे बढ़िए, आगे वो आपको दोबारा मिल जाऍंगे, अगर आप वहीं खड़े रह गए जहाँ आप खड़े हो, तो वो आपको नहीं मिलेंगे। ट्रेन एक स्टेशन से छूट चुकी है, अब आप उसी प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर रोऍंगी, तो क्या आपको ट्रेन मिलेगी? ट्रेन पाने का तरीक़ा क्या है? तेज़ी से जाओ, अगले स्टेशन पर वही ट्रेन तुम्हें मिल जाएगी। ज़िन्दगी चाहती है कि आप तेज़ी दिखाओ, ज़िन्दगी चाहती है कि आप आगे बढ़ो।




