प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि ये मन क्या होता है, किसी भी अज्ञात परिस्थिति को मन नकारात्मक दृष्टि से क्यों देख लेता है? उदाहरण के तौर पर किसी ने मुझ से कुछ पैसे उधार लिये और जब मैं पैसे माँगने के लिए उससे सम्पर्क करने की कोशिश करता हूँ और आख़िरकार सम्पर्क नहीं हो पाता है, तो मन में नकारात्मक विचार स्वाभाविक रूप से ही उठ जाता है। मन मेरा अक्सर नकारात्मकता की ओर ही झुकाव रखता है और मन की इस वृत्ति को मैं समझने के लिए तत्पर हूँ। कृपया मदद करें।
आचार्य प्रशांत: जो ये सवाल पूछ रहा है उसको ही मन कहते हैं। जो इस उत्तर को सुन रहा है उसको ही मन कहते हैं। पूछा है कि मन किसको कहते हैं। जो जगता है, जो सोता है, जो हँसता है, जो रोता है, जिसमें चीज़ें आती हैं, जिसमें चीज़ें चली जाती है, जो अतीत को सोचता है, जो भविष्य को बुनता है, उसको मन कहते हैं। जो यहाँ और वहाँ का अन्तर जानता है, जो सारे दृश्य देखता है, जिसमें सारे दृश्य उठते हैं, सब दृश्यों के उठने को ही, सब दृश्यों के गिरने को ही मन कहते हैं।
तुम्हारी चेतना का पूरा जो फैलाव और संकुचन भी है, उठना, गिरना, चढ़ना, उतरना ये सब मन कहलाता है। मन-ही-मन है। मन मात्र है। तो ये मत पूछो कि मन क्या है। मन क्या है में ‘मन’ भी मन है, ‘क्या’ भी मन है, ‘है’ भी मन है और वो जो ‘प्रश्नचिह्न’ लगा हुआ है वो भी मन है, सबकुछ मन है। जो कुछ सीमित है, जो कुछ भी देखा-सुना, जाना जा सकता है, सब मन है।
अब दूसरी बात तुमने पूछी कि मन नकारात्मकता से क्यों भरा रहता है। किसी से तुम कह रहे हो कि तुम्हें पैसे कुछ वापस लेने हैं, तुमने उसे कर्ज़ दिया था, तुम उसे फोन करते हो, फोन नहीं उठाता तो तुम्हारे मन में नकारात्मक विचार आ जाते हैं। सोचते होंगे कि कहीं ये इंसान बेईमानी तो नहीं कर रहा, कहीं पैसे हड़प तो नहीं जाएगा, वगैरह-वगैरह।
ग़ौर से समझो! चाहो तो इसे इवॉल्यूशनरी थ्योरी से समझ लो, प्रकृति और विकासवाद से और चाहो तो इसे




