
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?



अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥




AI की गणना और विश्लेषण क्षमता मानव मस्तिष्क से आगे निकल सकती है, लेकिन इससे वह मनुष्य की बुद्धिमत्ता से आगे नहीं निकल जाता। मनुष्य को केवल उसके मस्तिष्क की प्रोसेसिंग क्षमता मानना ही मूल भूल है। जब हमें स्वयं ‘मैं’, प्रेम, बुद्धिमत्ता, जीवन और इच्छाओं का अर्थ नहीं पता, तब AI और मनुष्य की तुलना एक कैटेगरी एरर बन जाती है। तकनीकी विशेषज्ञता आत्मज्ञान का विकल्प नहीं हो सकती।

वर्तमान प्रोटेस्ट "जेन ज़ी" का आंदोलन नहीं था, यह एक आइडियोलॉजिकल मामला था, जिसमें हर उम्र के लोग शामिल थे, न कि किसी ख़ास पीढ़ी के। असली संकट टेक्नोलॉजी, नीति या नेतृत्व का नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर के अंधेरे — डर, बेईमानी और अनजाने में जी रही इच्छाओं का है। गाली-गलौज, भीड़ का नशा और अंधा वोट, ये सब उसी भीतरी डर के लक्षण हैं। असली साहस बाहर शोर मचाने में नहीं, अपने भीतर की सच्चाई स्वीकारने में है। जब तक जनसाधारण की "सेल्फ एजुकेशन" न हो, सतही क्रांतियाँ कुछ नहीं बदलेंगी।








सुंदरता शरीर, ग्लैमर या सामाजिक स्वीकृति से नहीं आती। अधिकांश लोग आकर्षण, प्रसिद्धि और बाहरी छवि को सुंदरता समझ लेते हैं, जबकि उनके निर्णयों के पीछे अक्सर प्रतिष्ठा, मान्यता और अहंकार की चाह काम कर रही होती है। वास्तविक सुंदरता स्वाभाविकता, सरलता और अहंकार से मुक्त होने में है। जब व्यक्ति स्वयं को किसी आदर्श छवि में ढालने के बजाय अपनी प्रकृति को स्वीकार करता है, तभी वह दूसरों को भी बिना स्वार्थ और अपेक्षा के देख पाता है।






वर्तमान का अर्थ केवल इस क्षण में जीना नहीं है। जो दिखता है वह इंद्रियों पर निर्भर है, इसलिए वह सच्चा वर्तमान नहीं। वर्तमान वह है जो बदलाव के बीच भी अपरिवर्तित रहे। भूत और भविष्य समय की धारा हैं, और उस धारा का साक्षी होना ही वर्तमान है। वर्तमान में जीने का अर्थ है बोध, जागरूकता और होश में जीना।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं, यह दुर्बल की रक्षा का संकल्प है। पौराणिक इतिहास में यह धागा शक्तिशाली को भी बांधा गया। आज असली जरूरत है पर्यावरण, पशु-पक्षी, मातृभाषा और संस्कृति की रक्षा की। भाषा गई तो संस्कृति जाएगी, संस्कृति गई तो अध्यात्म और फिर मानवता। इस रक्षाबंधन पर प्रण लें कि इन अनमोल धरोहरों की रक्षा करेंगे।


शिव स्थिर, अचल और अगम्य सत्य हैं, जबकि शक्ति मन, संसार और जीवन की समस्त अभिव्यक्तियाँ हैं। शिव तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग शक्ति से होकर जाता है। नवरात्र के नौ रूप यही सिखाते हैं कि जीवन के हर अनुभव सुख, दुख, आंसू, मुस्कान सभी पूजनीय हैं। संसार से भागना सत्य से दूर होना है। जीवन में पूरी तरह डूब जाना ही मुक्ति का मार्ग है।












पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।


गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।










दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।
बाल गणेश अहंकार का प्रतीक है, जो प्रकृति (पार्वती) से जन्मा पर अभी सत्य (शिव) से अस्पर्शित है—इसलिए द्वार पर सत्य को रोकता है। सिर काटना और नया सिर लगाना अहंकार के क्षीण होने और उसे नया केंद्र यानी बोध मिलने का संकेत है। मूषक कामना का प्रतीक है, जो क्षैतिज अक्ष पर भागती इंद्रियों को दर्शाता है। शिव की परिक्रमा सूक्ष्म दृष्टि और ऊर्ध्व अक्ष पर होने वाली गति को इंगित करती है—स्थूल दौड़ यानी क्षैतिज गति कभी ऊँचाई नहीं देती। मूर्ति-विसर्जन नाम-रूप के त्याग और निर्गुण की ओर संकेत का प्रतीक है। विघ्नहर्ता नाम एक भ्रम को उजागर करता है: असली विघ्न अहंकार स्वयं है; उसका विगलन केवल स्वयं की नीयत यानी सक्रिय चुनाव से संभव है—कोई बाहरी सत्ता उसकी संप्रभुता नहीं छीन सकती।
एक अरबपति ने चाँद से खरबों छोटे उपग्रह लॉन्च कर उन्हें सूरज और पृथ्वी के बीच तैनात करने और इस तरह सूरज की रोशनी का एक हिस्सा रोककर ग्लोबल वॉर्मिंग सुलझाने का प्रस्ताव रखा, ठीक उसी हफ्ते जब नेपाल में जलवायु-जनित त्रासदी ने हज़ारों लोगों की जान ले ली। संकट तकनीक की कमी से नहीं, उस भोग-वृत्ति से पैदा हुआ है जो अधिक उपभोग, अधिक उत्पादन और अधिक उत्सर्जन छोड़ना नहीं चाहती। जब जीवनशैली पर सवाल उठाना कठिन लगता है, तब मनुष्य समाधान भी ऐसा खोजता है जो उसे बदले बिना दुनिया को बदल दे।
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
जन्माष्टमी केवल बाल-कृष्ण की पूजा, मिठाई और उत्सव का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, मोह, भय और अज्ञान से युद्ध करने का अवसर है। मूर्ति, गुरु और गीता साधन हैं, मंज़िल नहीं—वे हमें अपनी क्षुद्रता दिखाकर सत्य की ओर ले जाने वाले दर्पण हैं। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होता है, जब मन झूठ और आसक्ति से मुक्त होकर सत्य, आत्मबोध और अपनी उच्चतम संभावना की ओर जागता है।
नेपाल की बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानना असली कारण से बचना है। ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का फटना और हिमालय का अस्थिर होना बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट से जुड़ा है। इसके पीछे हमारी अंधी उपभोग-वासना, विकास की गलत समझ और प्रकृति के शोषण की प्रवृत्ति है। हिमालय की तबाही भारत के जल, खेती और भविष्य से भी जुड़ी है। समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संयम और अपनी कामनाओं को समझने में है।
‘जेन ज़ी’ को विद्रोही और क्रांतिकारी मान लेना एक भ्रम है। बाहरी विरोध के साथ यही युवा ज्योतिष, अंधविश्वास, जाति, पारिवारिक दबाव, दिखावे, कर्ज़ और सोशल मीडिया की कंडीशनिंग में फँसा है। असली क्रांति किसी सिस्टम या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, डर, अंधविश्वास और कंडीशनिंग के खिलाफ है। बदलाव पीढ़ी बदलने से नहीं, चेतना का केंद्र बदलने से आएगा।
यह यात्रा केवल प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से संवाद की नहीं थी, बल्कि वेदांत के मूल प्रश्नों को कठोर सार्वजनिक परीक्षा में रखने की थी। केंद्रीय संदेश यह रहा कि मानव संकटों की जड़ बाहरी व्यवस्था नहीं, बल्कि अहंकार और मनोवैज्ञानिक भ्रम है। जब तक इस आंतरिक संरचना की जांच नहीं होती, तब तक कानून, तकनीक, शोध और सुधार सीमित रहेंगे। वास्तविक प्रगति साहसी जिज्ञासा, बौद्धिक ईमानदारी और सार्वजनिक परीक्षण से ही संभव है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
विकसित देशों की चमक अक्सर प्रदूषण मिटाने से नहीं, उसे अपनी सीमाओं से बाहर धकेलने से बनी है। कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय नुकसान का बड़ा हिस्सा गरीब देशों पर डालकर वे स्वयं को "स्वच्छ" कहते हैं। यदि स्वच्छता का पैमाना कम कार्बन है, तो उसी कसौटी पर कई विकासशील देश उनसे अधिक स्वच्छ सिद्ध होते हैं। वास्तविक स्वच्छता तकनीक या दिखावे से नहीं, बल्कि उस चेतना से आती है जो उपभोग, शोषण और पर्यावरण विनाश की जड़ - अहंकार - को समाप्त करे।
शिवलिंग निराकार ब्रह्म और साकार सत्य दोनों का प्रतीक है। यह प्रकृति के मध्य अचल और अकंप चेतना का द्योतक है। इस्लामी आक्रान्ताओं और पाश्चात्य विद्वानों ने इसे अश्लील अर्थों में प्रचारित किया, जिससे हम अपने अध्यात्म से दूर हो गए। शिवलिंग का सन्देश है कि संसार में घिरे रहते हुए भी भीतर की चेतना को अकंप और स्वतंत्र बनाए रखें।
गलत आदत इसलिए नहीं छूटती क्योंकि हम उस पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। जो गलत है उसके दोष देखने के लिए कोई विशेष दार्शनिक दृष्टि नहीं चाहिए, केवल सीधा होश चाहिए। प्रतिपल यह जानना कि हम कहाँ खड़े हैं और कहाँ जा रहे हैं, यही जागरूकता गलत को छुड़ाती है। होश में रहो, बाकी सब अपने आप बन जाता है।
जीवन में हम बाहरी संघर्षों में उलझकर असली युद्ध से चूक जाते हैं। असल संघर्ष वह है जो मन के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकारों को हटाने के लिए लड़ा जाए। जब मन शुद्ध होता है तो बाहरी चुनौतियों का सामना भी सहज हो जाता है। अपने अंदर की नकारात्मकता को दूर करना ही जीवन की सबसे बड़ी और असली लड़ाई है।
सच्चे आँसू दुख के नहीं, भीतर की जकड़ से मुक्ति के प्रतीक हैं। समाज ने रोने को कमजोरी मान लिया है, लेकिन अस्तित्व कभी रोने से नहीं रोकता। आँसू बहाना मनुष्यता की निशानी है, इससे मन और आँखें दोनों साफ होती हैं। जो रो नहीं सकता, वह भीतर से सूख चुका है। भीजापन ही जीवन की असली निशानी है।
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।
जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
कृष्ण सब कुछ में हैं, लेकिन यह सत्य तभी दिखता है जब हम उच्चतम की साधना करें। जगत में सबसे ऊँचे उठने पर ही नीचे का सब स्पष्ट होता है। ब्रह्मविद्या सबसे कठिन है क्योंकि इसमें विरोधाभास है, फिर भी यही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। जो कठिनतम को साध ले, उसके लिए बाकी सब अपने आप सरल हो जाता है।
मन इसलिए भटकता है क्योंकि हम अपने भीतर के दर्द से अनजान हैं। लोग ज्ञान, संबंध, शराब और दौलत को एनेस्थेसिया की तरह इस्तेमाल करते हैं ताकि अपनी पीड़ा न महसूस हो। जब अपनी असली हालत का बोध हो जाए, तो मन अपने आप केंद्रित हो जाता है और एकमात्र पुकार उठती है, आज़ादी की। जीवन में प्रकाश लाओ, हकीकत देखो, मन कभी नहीं भटकेगा।
भीड़-आधारित विद्रोह, ऑनलाइन क्रांतियाँ और व्यवस्था-विरोध तब तक सतही बने रहते हैं जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं समझता। समाज की समस्याएँ केवल नेताओं, संस्थाओं या व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि उसी सामूहिक चेतना से पैदा होती हैं जो उन्हें बनाती है। बाहरी बदलाव स्थायी नहीं होते यदि भीतर का दृष्टिकोण वैसा ही रहे। वास्तविक परिवर्तन आत्म-शिक्षा, जिम्मेदारी और स्वयं को देखने के साहस से शुरू होता है, न कि केवल प्रतिक्रियाओं और नारों से।
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।
आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।
युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।
ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, ग्रह–नक्षत्र, चाँद–तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न कोई प्रमाण है। इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है: अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व भाग्य पर डाल देना। जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और तर्क की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, तो फिर कोई बाहरी ताक़त आकर उसको ग़ुलाम बनाती है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, मान्यता पर चलना शुरू कर दिया, वो भारत की ग़ुलामी बन गया।
अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए।
जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।
समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।
जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।
गाँधी को महात्मा, गाँधी ने स्वयं नहीं बनाया इस देश ने बनाया। लोगों को अच्छा लगता था, एकदम दो हड्डी का आदमी चला आ रहा है, एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहा है, उपदेश-यात्रा करे जा रहा है। दोष देना है तो देशवासियों को दो। एक यदि व्यक्ति थे जिनसे जिन्ना घबराते थे, उसका नाम था गाँधी। अंग्रेज़ों को ज़बरदस्त चोट दी थी गाँधी ने। कौन कह रहा है कि गाँधी को तुम भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो। वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए न, अच्छा लगेगा। आसान नहीं होता गाँधी बनना।
जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।
दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!
हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि मेरा क्या कर्त्तव्य है। जीवन इतना बदलाव वाला है कि कोई आकर कैसे बता सकता है कि इस पल में क्या करना है? जब आँखें दी गई हैं तो सहारे की क्या ज़रूरत है? किसने बता दिया कि ‘यह करने योग्य है’? कर्त्तव्य क्या है? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो।
ऐसा नहीं कि पुनर्जन्म झूठी बात है, लेकिन पुनर्जन्म को जैसे समझा है लोगों ने, वो बिल्कुल झूठी बात है, वो श्रुति-विरुद्ध है। पुनर्जन्म होता है, निश्चित रूप से, पर उसका नहीं जिसका आप सोचते हो। और किसी भी पुराण में या किसी भी और किताब में अगर कोई ऐसी बात लिखी है जो सीधे-सीधे भगवद्गीता, उपनिषदों और अष्टावक्र गीता के विरुद्ध जाती है, तो हम क्यों पूछें कि किसने लिख दी? जिसने भी लिख दी, उससे हमें कोई लेना-देना नहीं।
“क्या राष्ट्रवाद एक बीमारी ही नहीं है?” उस सवाल को अब आप ज़रा दूसरे तरीके से रखिए। वो सवाल ये है, कि क्या आदमी और आदमी के संबंध बीमार नहीं हैं? तो होगा राष्ट्र दस करोड़ लोगों का, चाहे सौ करोड़ लोगों का, लेकिन उसके केंद्र में तो उसके एक-एक सदस्य की, व्यक्ति की आत्म-परिभाषा बैठी हुई है। जो आप अपने बारे में सोचते हैं, उसी आधार पर आप दूसरे संबंध बनाते हैं, और उसी आधार पर फिर आप व्यापक, विस्तृत तौर पर एक राष्ट्र खड़ा कर लेते हैं।
दुनिया में जहाँ भी दक्षिणपंथ है, राइट-विंग मूवमेंट्स जहाँ-जहाँ चल रहे हैं, वहाँ-वहाँ लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है। ईरान में भी अब यही चल रहा है। यह एक तरह से माया का चक्र है। यह सोचा जा रहा है कि लिबरल-सेकुलर होने से हटकर के हम जब कंज़र्वेटिव, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिक हुए, तब समाधान मिल जाएगा; और उससे वापस घूम करके फिर से लिबरल-सेकुलर हो जाएँगे, तब समाधान मिल जाएगा। मनुष्य यह मानने को ही तैयार नहीं है कि व्यवस्था आती रहेगी, जाती रहेगी। उसकी समस्या का मूल कारण उसके भीतर है।
मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।