आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!

Acharya Prashant

16 min
1.1k reads
आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल ये है कि मैं हमेशा ही भावनाओं में बह जाती हूँ और उससे निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। तो मतलब यही है मेरा क्वेश्चन सर।

आचार्य प्रशांत: हम इतना कुछ देख कर के भी अपनी भावनाओं की हक़ीक़त नहीं जान पाते क्या? और मैं कह रहा हूँ कि जो अभी छह साल का है उसकी माफी है। 26 साल वाला…।

मजबूरी नहीं है, मौज है। मौज को मजबूरी बता रही हैं, आँखें बंद करके। क्या कर रही हो? भावना, महसूस कर रही हूँ, महसूस। अब देखो मुझसे पूछा है तो मैं उल्टा-पुल्टा तो बोलूँगा। मेरा काम है। इसी नाते मुझे आचार्य वग़ैरह बोल करके तुम जलील करते हो। और मुझसे कोई सवाल पूछने क्यों आता है? जिसका भेजा आउट होता है। जैसे पीठ में खुजली हो रही होती है कि कोई दो-चार लगा दे। मैं उनकी सेवा हेतु उपलब्ध रहता हूँ। कोई भी सुलझे हुए मन का आदमी तो आएगा नहीं मुझसे सवाल पूछने। आज तक हुआ है? एड़े, खिसके, उल्टे, ऐसे ही आते हैं।

ये आपकी तारीफ़ करी है मैंने। आप हँस क्यों रहे हो इतना? समझ में आ रही है बात?

तुम्हारे बारे में जब कुछ मौलिक है ही नहीं, नया, यूनिक, ओरिजिनल, नूतन है ही नहीं, तो तुम उलझे किस चीज़ में हुए हो? "इसमें करंट आ रहा है," बताया था उसने, "इधर छू मत देना।" अरे सही बता रहा हूँ। और ये उसको ज्ञान दिया और ख़ुद जाकर के धीरे से…, वो भी उतार के (जूते उतार कर)। पूरा आनंद नहीं आएगा न, बीच में इंसुलेटर आ गया तो, तो उतार के ऐसे ऑर्गैज़्मिक प्लेजर। एक बार कर लिया, उसके बाद जब हिल-हुला गए पूरा, तो कह रहे, "अरे रा... आचार्य जी!"

उसके बाद फिर धीरे से वापस जाकर के जूता भी उतार दिया, कपड़े भी उतार दिए, और फिर (करंट लगने का अभिनय करते हैं)। अब इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? ये मजबूरी है कि मौज है?

श्रोता: मौज है।

आचार्य प्रशांत: ये मौज है। तुम किसी अनुभव को दोहराना चाह रहे हो, इसी को प्लेजर बोलते हैं। जॉय में और प्लेजर में यही मूलभूत अंतर होता है भाई। आनंद सर्वथा नया होता है और किसी अनुभव का नाम नहीं होता। और जिसको आप प्लेजर बोलते हो वो सदा पुराना होता है। वरना आप उसकी कल्पना ही नहीं कर पाते। जब आप भावना में बहते हो तो कोई कल्पना रहती है न दिमाग में?

क्या कल्पना स्मृति के बिना हो भी सकती है? सोच के बताओ। हम कई बार कहते हैं, "मैं नई चीज़ की कल्पना कर रहा हूँ।" नहीं हो सकता। आप जिसको नई चीज़ की कल्पना कहते हो, वो भी कहीं न कहीं पुरानी स्मृतियों या अनुभवों पर आश्रित होती है। और वो जो अनुभव है, आप बहुत बार ले चुके हो, ये हूला-लाला। बार-बार क्यों लेना है? क्यों? इसलिए लेना है क्योंकि झटके के साथ-साथ मौज भी तो आती है। आके मुझे झटका बता देते हो, मौज छुपा जाते हो। मुझे बड़ी तकलीफ़ रहती है। मैं कहता हूँ, "मुझे बिल्कुल गटर बना रखा है।" सारा अपना मैला आकर मुझमें उड़ेल देते हो और जब मौज कर रहे होते हो, तब कहीं आचार्य जी नहीं होते। और वही मौज आपको बार-बार दोहरानी है। बार-बार दोहरानी है।

उपनिषद् बार-बार बोल रहे हैं: “कृतं स्मर,” अपने करे को याद कर यार। इसलिए नहीं बोल रहे हैं कि तुझे ग्लानी भाव उठे या पाप उठे। इसलिए बोल रहे हैं ताकि दोहराओ नहीं। जो बात उपनिषद् बोल रहे हैं, उसी उद्देश्य से शिक्षण व्यवस्था में मैंने कहा आपको इतिहास भी पढ़ाया जाता है ताकि दोहराओ नहीं। अन्यथा प्रकृति मात्र क्या है एक? दोहराव। हम बोल देते हैं नदी है, वो भी पूरी बात नहीं होती। वो नदी नहीं है, वो जो पूरा वाटर साइकिल है, वो है, जिसमें नदी भी बस एक हिस्सा है छोटा।

अगर आपको प्रकृति को नदी भी बोलना है न तो ऐसे बोलो कि ऐसे नदी बहती है, सागर में जाता है पानी, भाप, बादल, वर्षा, बर्फ़, नदी। प्रकृति मात्र एक दोहराव है। कुछ नया तो कर ही नहीं रहे न। एक बार उस साइकिल से आप गुजर लिए। अब दोबारा क्यों गुजर रहे हो? क्यों गुजर रहे हो? क्योंकि अब बात मूल्य की आ जाती है। ये यहाँ पर आकर के जो प्लेजर मिलता है, हम उसको इतना महत्त्व दे देते हैं कि फिर उससे जो आगे जाकर के पूरा जोड़-जोड़ हाड़-हाड़ काँपेगा, उस वक़्त हम उसको…।

वही जैसे पानी पूरी जब खाते हो, "भैया थोड़ा सा और सोंठ वाला देना, भैया सोंठ वाली, भैया थोड़ा सा मिर्च डाल के देना भैया।" उसके बाद जाके रॉकेट बन गई, “हाय हाय हाय हाय!” समस्या ये नहीं है कि भैया ने सोंठ ज़्यादा डाल दी। समस्या ये भी नहीं है कि एक बार रॉकेट बने। समस्या ये है कि अगले दिन जाके फिर वही करना। अब इसका कोई इलाज नहीं होता, इसका कोई इलाज नहीं होता।

प्लेजर के नाम पर अनुभवों को दोहराने के अलावा हम और क्या करते हैं? कभी कोई अनुभव हुआ था, वही हमारे लिए आगत सुख की कल्पना बन जाता है। या कभी कुछ देख लिया, सुन लिया, वही हमारे लिए भविष्य का सपना बन जाता है। आप भावनाओं में नहीं बह रहे हो, आप कामनाओं में बह रहे हो। भावना नहीं बहा सकती, भावना को तो ऐसे मानो जैसे डकार, शारीरिक प्रक्रिया भर है। भावना कहाँ से आती है? डकार की तरह शरीर से आती है। हमने तो नहीं सुना कि कोई सवाल पूछे और अगला सवाल यही होगा शायद उदित आज का, "आचार्य जी, मैं डकार में बह जाती हूँ।" हमने तो किसी को डकार में, या साँस मारने में, या पाद मारने में बहते नहीं सुना। ऐसा होता है? कोई बहता है कभी? या ये भी हो कि दस्त लगे हुए हैं तो मैं बह गई? वो भी नहीं होता।

ये भी बिल्कुल वैसे ही है जैसे हम बाक़ी द्रव्यों की बात कर रहे हैं न, फ्लूइड्स की; तो वैसे ये भी हार्मोन्स, ये भी फ्लूइड्स ही होते हैं भीतर और वही भावना बनते हैं। वो आपको कैसे बहा सकते हैं।

बहाती आपको कामना है और कामना के पीछे क्या होता है? ज्ञान का अभाव या झूठा ज्ञान। झूठा ज्ञान अपने पैरों पर नहीं खड़ा रहता; झूठा ज्ञान खड़ा रहता है कामना के भरोसे पर।

"मुझे कुछ मिलेगा, मुझे कुछ मिलेगा, मुझे कुछ मिलेगा।" तो अर्थ इतना भारी हो जाता है कि वो आपको सच्चाई देखने नहीं देता। आप अपने में रहते हो? नहीं। "मैं तो, मैं जानता हूँ, मेरा ऐसा है, मेरा वैसा नहीं है। आई नो, आई नो।" तथ्य आपके सामने खड़े होते हैं मुँह फाड़ करके, "देखो हमें!" देखने से इंकार कर देते हो।

बात समझ रहे हो?

कोई न कहे कि "मैं इमोशनल ज़्यादा हूँ, मेरा तो नेचर है न इमोशनल। 'नेचर' माने प्रकृति नहीं होता, 'नेचर' माने क्या होता है? स्वभाव, और स्वभाव आत्मा है। "नहीं, मैं न नेचर से थोड़ी सेंटी हूँ।" क्या? "नहीं वो है न, वो नन्नू के पापा वो नेचर से ही थोड़े कमीने हैं।" नेचर नहीं होता किसी का कमीना। या तो प्रकृति होगी या संस्कार होंगे, स्वभाव में और प्रकृति में अंतर करना सीखना पड़ेगा।

प्रकृति से कोई क्रोधी हो सकता है, स्वभाव से कोई क्रोधी नहीं हो सकता। संस्कार से कोई अमीर हो सकता है, हिंदू हो सकता है, मुसलमान हो सकता है, अंधविश्वासी हो सकता है; स्वभाव से कोई अंधविश्वासी नहीं होता। "उनका न नेचर ही थोड़ा सुपरस्टीशियस है, वो पाँच लाख का वो टैरो करा के लाए थे।" कुछ समझ में आ रही है बात?

ये कहना भी एक तरह की सफ़ाई बन जाती है, डिफेंस बन जाता है कि "मैं क्या करूँ, मेरा तो नेचर ही ऐसा है। मैं क्या करूँ, बीइंग अ वूमन, यू नो, आई एम इमोशनल।" और इसी बात को फिर महिलाओं के ख़िलाफ़ देखो कितना इस्तेमाल किया जाता है, "ये बड़े काम नहीं कर सकती, ये तो इमोशनल ज़्यादा होती है ना। और बड़े कामों में निर्ममता चाहिए होती है, औरत कैसे करेगी?”

प्रकृति हो सकती है, स्वभाव नहीं। प्रकृति नहीं चढ़ सकती आपके ऊपर बिना आपकी आज्ञा के। आज्ञा भी नहीं, स्वार्थ के, जब आपका स्वार्थ होता है न, तो आप प्रकृति के बहावों के साथ जुड़ जाते हो। भावना में आप नहीं बह रहे हो, भावना में आप स्वार्थ देख रहे हो, इसलिए भावना को अनुमति दे रहे हो सिर पर चढ़ जाने की। क्रोध नहीं आ रहा आपको। लोग कहें, “मुझे क्रोध बहुत आता है, क्रोध बहुत आता है।" अच्छा? क्रोध बहुत आता है? जाकर के रिक्शे वाले को मार दिया गाड़ी से? या आपकी गाड़ी खड़ी थी, पीछे से आकर रिक्शे वाले ने ज़रा बंपर छुआ दिया अपने टायर से, " हुलूलू…मार दूँगा! कत्ल कर दूँगा! गर्क कर दूँगा!" करते हो न? करते हो न? भाई, क्रोधी हो।

कोई पूछे क्यों किया? "यू नो, वो तो नेचर से ही एंग्री हैं।" अच्छा! बैठे हुए थे खड़ी गाड़ी में, पीछे से धड़ाम से पड़ा। हाय-हाय! पूरा उछल गए। उतरे तो देखा पीछे नेताजी की गाड़ी है और पाँच एस्कॉर्ट व्हीकल्स हैं उनके साथ, और वाई क्लास सिक्योरिटी है, काले कपड़ों वाले कमांडो हैं। रिक्शे वाले ने तो बस बंपर छू दिया था तुम्हारा, नेताजी ने बंपर उड़ा ही दिया है। दिखाओ गुस्सा। तुम्हारा तो नेचर ही है न, एंग्री नेचर के हो न तुम। तुम्हारी फीलिंग्स बहुत जल्दी एक्साइट हो जाती हैं न। अब फीलिंग्स एक्साइट क्यों नहीं हो रही हैं? जाओ नेताजी को वैसे ही गाली दो जैसे रिक्शे वाले को दी थी। जाओ!

बात फीलिंग्स की थी या स्वार्थ की? एंगर था या कैलकुलेटेड एंगर था? यही बात है। कुछ नहीं होता। जहाँ स्वार्थ होता है, वहाँ सारी फीलिंग्स आ जाती हैं। फीलिंग्स का बहाना मत लो, स्वार्थ है। नेताजी पर किसी को गुस्सा नहीं आता। "मैं कह रहा हूँ थप्पड़ मार दूँगा तुझे," ये तभी कहते हो न जब रिश्ता थोड़ा जम जाता है? जब पता होता है कि सामने वाला अब रिश्ता तोड़ के भाग नहीं सकता। जब रिश्ते की शुरुआत कर रहे होते हो, पहली डेट पर किसने बोला है, "बोल रहा हूँ थप्पड़ मार दूँगा तुझे"? बोला है?

अरे भैया, आप लोग तो टिंडर-बंबल वाले लोग हो। बताओ न? कौन अपनी प्रोफाइल में ही लिखता है, "मैं पहली डेट पर थप्पड़ मारता हूँ"? किसने लिखा है? लेकिन यही जब रिश्ता दो महीने, आठ महीने या पाँच साल पुराना हो जाता है, तो थप्पड़ की धमकी नहीं दी जाती, थप्पड़ भी दिया जाता है। बात नेचर की है, या…

तो महिलाएँ इमोशनल होती हैं, ये नेचर है या स्वार्थ है? स्वार्थ है। कोई नहीं इमोशनल है, कोई फीलिंग्स की बात नहीं है, कोई भावनाओं में नहीं बह रहा। जितनी बार ये हो ना कि भावनाओं में बह रही है, अपने फिर वही मेरा सड़ा हुआ एक चुटकुला याद रखिएगा, जब मैं पाद में नहीं बहती तो भावनाओं में क्यों बह रही हूँ? हैं तो दोनों शारीरिक प्रवाह ही, और अगर भावनाओं में बहना ही है तो जितने तरह के प्रवाह होते हैं, मैं सब में बहूँगी। बहिएगा, और वीडियो बना के डाल भी दीजिएगा। हमारा भी कुछ शिक्षण हो जाएगा, नई चीज़ सीखेंगे कि कैसे भावनाएँ या कोई भी और चीज़ ख़ुद-ब-ख़ुद बहा सकती है।

कुछ आपको बहा नहीं सकता। आपकी अनुमति रहती है, आपका पूरा सहयोग रहता है। बल्कि आपका आग्रह रहता है। आप चाहते हो, इसलिए होता है। आप चाहते हो, इसलिए गुस्सा चढ़ता है।

कामवासना को सबसे बड़ी अंधी ताकत माना जाता है। “चढ़ जाती है, कामवासना; चढ़ जाती है, कामवासना; चढ़ जाती है।” देश के प्रधानमंत्री हो कोई महिला, कामवासना चढ़ा के दिखाओ। कोई बॉस हो आपकी, वो भी तेज़-तर्रार, और वो आपकी ख़बर ले रही है। वो कुर्सी पर बैठी हुई है, सामने चौड़ी अथॉरिटी वाली मेज़ है और उसके सामने खड़े हो, काम नहीं किया है और वो आपकी इज़्ज़त उतार रही है। दिखाओ कामवासना? दिखाओ न!

कामवासना भी चुनाव होता है, कुछ भी नेचुरली अपने आप नहीं हो रहा। इसको स्वभाव या नेचर तो बोल ही मत देना। वेदान्त किसी भी तरह की मजबूरी में बिल्कुल नहीं मानेगा। आप कहोगे भावनात्मक मजबूरी है, माना ही नहीं जाएगा, कोई भावनात्मक मजबूरी नहीं है। "मैं क्या करूँ? मेरे आँसू निकल जाते हैं।" तो मैं बोलता हूँ, "आँसुओं के साथ सही काम करो।" मजबूरी अभी भी नहीं है। हाँ, आँसू मैं मान सकता हूँ, मेरे भी निकल जाते हैं। बताया तो था, अभी वो पिक्चर देखने गया था, बिना बात के मैं रोने लगा। बीस मिनट तक रोता ही गया। तो? ऐसा थोड़ी है कि रो रहा हूँ तो काम नहीं करूँगा, काम कर रहा हूँ। बात इसमें नहीं है कि भावना उठी। बात इसमें है कि आपने भावना को समर्थन दे दिया क्या? समर्थन नहीं देना है। याद रखना है, “कृतं स्मर।” याद रखना है कि ये मेरे साथ नहीं हो रहा।

“पहला नशा, पहला खुमार।” न पहला नशा है, न पहला खुमार है, मुझसे पहले न जाने कितनों को हो चुका था। मैं ही हूँ, इसी से प्रमाण मिलता है कि कम से कम मेरे माँ-बाप को तो हुआ ही था। इनको न हुआ होता तो मैं कहाँ से आती? तो फिर मैं "पहला नशा, पहला खुमार" कैसे बोल सकती हूँ? मेरी हस्ती ही प्रमाण है इस बात का कि मामला पहला नहीं है। पर सबको यही लगता है कि हमारा तो पहला है। और जैसा हमारा है, वैसा किसी और का नहीं है। जैसा हमारा है, बिल्कुल वो नहीं है।

हर माँ को अपना लल्ला ऐसा ही लगता है, बस हो गया। हमने सुना है? “ज़ू ज़ू ज़ू ज़ू।” वो क्या बोलती है उसमें? "जग से न्यारा, जग से न्यारा है; यशोदा का नंदलाला, तो बस बृज का दुलारा है।" उन्होंने श्रीकृष्ण को भी पीछे छोड़ दिया, ये मम्मियों के काम हैं। और पता नहीं कैसे वो साँप “ज़ू ज़ू ज़ू ज़ू” ऐसे कर रही है। अरे, मैं गायिका को पहले ही माफी माँग रहा हूँ। बहुत सुंदर गाना है, मेरे घर में भी खूब चला करता था। मैंने भी खूब उसका रस लिया है, पर अभी कुछ समझाने के लिए बोल रहा हूँ। बोलों पर ध्यान दीजिए। क्या बोले? "यशोदा का नंदलाला, बृज का उजाला है। मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए। मेरा लाल श्रीकृष्ण से भी ऊपर का है। स्वार्थ है तुम्हारा तुम्हारे लाल से।”

श्रीकृष्ण के साथ जो मिलेगा, वो आप देख नहीं पा रहे हो, तो अपने लाल पे लगे हुए हो। “मेरा लाल, मेरा लाल, मेरा लाल!” अरे, तुम्हारा क्या लाल, सबका लाल होता है। फिर लाल-पीले हो जाते हो। आप दुस्साहस देखिए न, "यशोदा का नंदलाला, मेरे लाल से तो..." तुम्हारा तो लोकलाइज्ड है मामला, बृज! मेरा इंटरनेशनल है, ग्लोबल है, ग्रीन कार्ड वाला है। तुम्हारे नंदलाले ने यशोदा कोई भी लीला अमेरिका में करी थी? मेरा वाला सिलिकॉन वैली जाएगा, मैं अभी से इसे प्रोग्रामिंग की क्लास कराएगी। ये भावना नहीं है। क्या है? स्वार्थ है। कोई न कहे कि भावनाओं में बह जाती हूँ, स्वार्थ में बह जाते हो।

और स्वार्थ से बचना है तो ये देख लो कि ऐसी स्वार्थ-पूर्ति का यत्न आपने पिछले एक लाख साल में दस लाख बार करा है, और हर बार मुँह की खाई है। अपनी भावनाओं को समझना है तो किसी पशु को देख लो। अपनी भावनाओं को समझना है तो पड़ोसी को देख लो। वो भी वही कर रहा है जो तुमने किया, तुमसे दस साल आगे है। तुम्हारा भी वही होना है जो उसका हुआ है। उसको देख के अपनी ज़िंदगी नहीं समझ में आती? तुम उसी राह पर चल रहे हो जिसपे न जाने कितने मुसाफिर जा चुके हैं। तो देखो वो कहाँ पहुँचे, तुम भी वहीं पहुँचोगे। तुम उनकी ही राह पर चलना चाहते हो, पर तुम्हारी आशा ये है कि तुम्हारी मंज़िल दूसरी हो जाए। कभी होगा ऐसा? कभी होगा?

देखो उन सबको, जिन्होंने शरीर के रास्ते स्वीकार करे और उनका हश्र देखो; वही हश्र तुम्हारा होगा। पर तुम चाह रहे हो कि नहीं, शरीर के रास्तों के जो मज़े मिलते हैं, ये वाला हूला-लाला, ये भी ले लूँ और फिर जो जीवन की उच्चतम प्राप्तियाँ हो सकती हैं वो भी हो जाएँ। होगा कभी ऐसा? आज तक किसी के साथ हुआ? तुम अपवाद हो? तुम कौन हो?

जो भी अपने साथ हो रहा हो, देखो कि सबके साथ हुआ और सबने मुँह की खाई। बड़ी दीदी की हो चुकी है और रोज़ पिटती है, और पापा शादी के पाँच साल बाद भी अभी दहेज दिए ही जा रहे हैं। पर छुट्टियाँ मचली जा रही हैं, "न! मेरा वाला ऐसा नहीं है। मेरा तो उस पर आएगा, सफेद घोड़े पर सवार हो कर के वो।" घोड़े को तो छोड़ो सबसे पहले, मामला एनिमल राइट्स का है। और जो तेरा वाला है न, सड़े रिक्शे पर भी नहीं आएगा, और चाहे पर आए वो, व्हाइट मर्सिडीज़ में भी आ जाए, तू भी पिटेगी वैसे जैसे दीदी पिट रही है। क्योंकि तू उसी राह पर चल रही है जिस पर वो चली।

होशियार होने का मतलब ये होता है कि क्यों अपनी ज़िंदगी तबाह करनी है, दूसरों के अनुभव से सीख लो न। और अगर दूसरों के अनुभव नहीं दिख रहे, तो पूरा इतिहास और समष्टि उपलब्ध है, उससे सीख लो न।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories