समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल ये है कि मैं हमेशा ही भावनाओं में बह जाती हूँ और उससे निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। तो मतलब यही है मेरा क्वेश्चन सर।
आचार्य प्रशांत: हम इतना कुछ देख कर के भी अपनी भावनाओं की हक़ीक़त नहीं जान पाते क्या? और मैं कह रहा हूँ कि जो अभी छह साल का है उसकी माफी है। 26 साल वाला…।
मजबूरी नहीं है, मौज है। मौज को मजबूरी बता रही हैं, आँखें बंद करके। क्या कर रही हो? भावना, महसूस कर रही हूँ, महसूस। अब देखो मुझसे पूछा है तो मैं उल्टा-पुल्टा तो बोलूँगा। मेरा काम है। इसी नाते मुझे आचार्य वग़ैरह बोल करके तुम जलील करते हो। और मुझसे कोई सवाल पूछने क्यों आता है? जिसका भेजा आउट होता है। जैसे पीठ में खुजली हो रही होती है कि कोई दो-चार लगा दे। मैं उनकी सेवा हेतु उपलब्ध रहता हूँ। कोई भी सुलझे हुए मन का आदमी तो आएगा नहीं मुझसे सवाल पूछने। आज तक हुआ है? एड़े, खिसके, उल्टे, ऐसे ही आते हैं।
ये आपकी तारीफ़ करी है मैंने। आप हँस क्यों रहे हो इतना? समझ में आ रही है बात?




