
प्रश्नकर्ता: जैसे मैं यहाँ पर हूँ, अभी आया था काफ़ी सवाल घूम रहे थे। अब दो घंटे सवाल नहीं रहेंगे, क्योंकि मैं पूरा मग्न हो गया इसमें। वापस जाऊँगा तो मुझे ऐसा लगता है कि अगर मैंने उन सवालों का उत्तर नहीं पाया तो कुछ इम्पॉर्टेंट मिस कर रहा हूँ, मैं अपने आप को किसी और चीज़ में व्यस्त करके कुछ खो रहा हूँ। तो फिर मन वापस वहीं जाता है सवालों में। जब भी अकेला होता हूँ तो ऐसा होता है, फिर कहीं मग्न हो जाऊँगा, फिर हट जाएँगे। जैसे अकेला होता हूँ, जैसे सो रहा हूँ, तब आ जाएगा फिर से।
आचार्य प्रशांत: तुम होशियार हो, बताओ, क्या समाधान है?
प्रश्नकर्ता: वैसे जितना मैंने ऑब्ज़र्व किया है, मुझे पता है कि सब व्यर्थ है, क्योंकि एक सवाल का उत्तर मैंने फ़ाइंड कर लिया, फिर से वो सवाल आएगा किसी और पर्सपेक्टिव से, जिसमें वो उत्तर सूट नहीं करेगा। तो घूमने को तो एक ही सवाल जीवन भर घूम सकता है। तो कुछ अंत तो है नहीं इसका। लेकिन वो फ़ीलिंग फिर भी आती है अब भी, जबकि पता है मुझे कि कुछ काम का नहीं है, लेकिन वो मन पर चढ़ जाती है फ़ीलिंग कि सोचो इसके बारे में। तो उसको कैसे ख़त्म करें?
आचार्य प्रशांत: कोई तरीका नहीं है। वो मात्र भावना नहीं है जो तुम्हें परेशान करती है, वो तुम्हारी भावना है। वो मात्र भावना नहीं है। भावना भर होती तो उसकी क्या हैसियत कि वो तुम्हें परेशान कर पाती। वो परेशान कर पाती है क्योंकि वो तुम्हारी भावना है।
तो कह रहा हूँ, पड़ा रहने दो। पड़ा रहने दोगे तो वो मात्र भावना रह जाएगी। उसके साथ छेड़खानी करते हो, उसके साथ कुछ करने की कोशिश करते हो, उसका रूप बदलना चाहते हो, दमन करना चाहते हो, हटाना चाहते हो, मिटाना चाहते हो, उसके ऊपर प्रयोग करना चाहते हो, तो उससे रिश्ता बना लेते हो।
अभी यहाँ बैठे हो, तुम्हारा पीछे के उन पर्दों से कोई रिश्ता है क्या? पर तुम उन्हें छेड़ने लगो, कि रंगने लगो, हटाने लगो, बाँधने लगो, खींचने लगो, कुछ भी करो तो तुमने उनसे क्या कर लिया? रिश्ता बना लिया। अब वो तुम्हारे पर्दे हो गए, किसी भी अर्थ में। इसी अर्थ में नहीं कि तुम उनके मालिक हो, पर अब चूँकि तुम उनसे संबंधित हो गए, इसलिए वो तुम्हारे पर्दे हो गए। जो तुमसे संबंधित होता है, उसी को कहते हो न, मेरा बच्चा, मेरा दोस्त। संबंधी है वो तुम्हारा, संबंधित है। तब तो हुआ तुम्हारा बच्चा, तुम्हारा दोस्त, तुम्हारा पिता, तुम्हारा घर।
पड़ी रहने दो। किसी भावना में दम नहीं कि अपने हाथों से तुम्हारा गला पकड़ सके और अपने पैरों से तुम तक आ सके। उसके पास न हाथ हैं, न पैर हैं; उसके पास बस छल है।
और छल करके वो तुम्हें क्या बताती है? “मैं तुम्हारी भावना हूँ।” और जैसे ही उसने कहा, “तुम्हारी भावना है” और तुमने माना, वैसे ही तुम्हारे हाथ उसके हाथ हो गए और तुम्हारे पैर उसके पैर हो गए। अब वो तुम्हारे हाथों से तुम्हारा गला दबाएगी, अब वो तुम्हारे पैरों से चलकर तुम तक आएगी। अब वो तुम्हारी ऊर्जा का प्रयोग करके तुम पर हावी हो जाएगी।
भावना तो कुछ नहीं है, रसायन है। हर भावना रासायनिक है। तुम्हारे शरीर के भीतर कुछ रसों का उत्सर्जन होता है, कुछ विद्युतीय संवेग उठते हैं, ये सब जानते ही हो न? उसको तुम भावना का नाम दे देते हो। किसी ग्रंथि से ज़रा-सा कुछ रस चुआ, ये जो दिमाग़ में, पूरे शरीर में नसों का तानाबाना है, उनमें कोई संदेश प्रसारित हुआ, ये सब भौतिक बातें हैं। वो जो संदेश है वो और थोड़ी कुछ है, वो विद्युतिय प्रवाह है बस। ये भावना है।
इस भावना में क्या दम होगा? कुछ नहीं। रस की क्या हैसियत कि तुम पर छा जाए? रस माने क्या? रसायन, द्रव्य। इतना सा, कभी मिलीग्राम में, कभी उससे भी कम। पर छा तो जाता है तुम पर। कामोत्तेजित होते हो तुम, उसके लिए जानते हो, काम-ग्रंथियाँ कुल कितना रस उत्सर्जित करती हैं? जैसे पानी की एक बूँद के हज़ार हिस्से कर दो, उतना, और उतने भर में तुम बौरा जाते हो। ज़ाहिर-सी बात है कि उतने-से द्रव्य की क्या मजाल कि इस हट्टे-कट्टे आदमी पर हावी हो जाए? इसने कह दिया कि ये तो मेरा संवेग है, मेरा रस है, मेरी भावना है। इतना मत करो, बचे रहोगे।
जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।
साक्षी तो अकेला संबंध है, जिसमें वास्तव में जोड़ बनता ही नहीं। साक्षी तो अकेला संबंध है, जिसमें आप संबंधित होकर भी अनछुए, अकेले, मौलिक रह जाते हो।
बाक़ी सब संबंध ऐसे होते हैं कि छुआ नहीं कि गंदे हो गए, छुआ नहीं कि जिसको छुआ वही हो गए। जिस दिन माँ बच्चे को जन्म देती है वो कुछ और हो जाती है, संबंध ने बदल दिया उसको। बच्चा ही नहीं पैदा हुआ, जैसे एक नई स्त्री पैदा हो गई है। जिस दिन तुम विवाह करते हो, तुम बदल जाते हो; तुम वही नहीं रहे। विवाह से पहले कुछ और थे, विवाह के बाद कुछ और हो जाते हो। जिससे संबंधित होते हो, वही बदल देता है तुमको। साक्षी तो अकेला संबंध है, जिसमें संबंधित तो हो गए बदले फिर भी नहीं। क्योंकि साक्षी होने का रिश्ता भर है; उलझे नहीं हो, निहार भर रहे हो, सहभागी नहीं हो, साक्षी हो। अब जो कुछ हो रहा होगा, वो तुम पर छाया नहीं डालेगा अपनी।
ऐसा बिल्कुल हो सकता है, कि रहे आओ कोयले की खान में, और ज़रा भी कालिमा तुम्हें छुए न। बाहर संगीत बज रहा है कहीं, उसका काम है बजना और तुम्हारा काम है सुनना। उसे बजने दो, तुम सुनते जाओ। संगीत को नहीं, मुझे। जब तक संगीत सिर्फ़ संगीत है वो कोई असर नहीं डालेगा तुम्हें, रिश्ता मत बनाओ उससे; पड़ा रहने दो। उपद्रवी भावनाओं को प्रोत्साहन मत दो, उन्हें पड़ा रहने दो। और इतने पगले तुम नहीं हो कि नहीं जानते कि भावनाएँ उपद्रवी हैं। हाँ, वो उपद्रवी हैं तुम जानते हो, वो अपना सिर उठाती हैं; तुम उनके साथ मत लग लेना। एक आता है भावना का झोंका, तुम उसके साथ मत बह जाना। तुम्हें पता होना चाहिए कि सच्चाई कहाँ है, तुम उसके साथ रहो।
संबंधित होने लायक एक ही है, उसको सत्य कहते हैं। निराकार देखो तो सत्य है वो; जो संबंधित होने लायक है, एक ही है; निराकार तो सत्य, और साकार तो संत। इनके अलावा और किसी से संबंधित होने की ज़रूरत ही नहीं है। अगर दम है इतना कि निराकार से सीधे संबंध बना सकते हो, तो बस उसी से जुड़ो, शून्य समाधि। और निराकार में उतरने में मन ज़रा हिचकिचाता हो, साकार की माँग करता हो, तो संत से संबंध बना लो। भावना से, उपद्रव से, तमाम तरह के रसायनों और बहाव से जोड़ बनाने की कोई आवश्यकता नहीं।
प्रश्नकर्ता: ऐसा लगता है, जो झूठ में जी रहा है उसके लिए तो सच भी उपद्रव होगा। तो पता कैसे करें कौन-सी भावना सच्ची है और कौन-सी मतलब उसे छोड़ना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: उपद्रव के आदी हो जाओ अगर, अभ्यस्त हो जाओ, तो जब वो छूटने लगता है तो मन विरोध करता है। जब ऐसा विरोध उठे तो अपने आप से पूछना, “किसके विरुद्ध है ये विद्रोह? किसके ख़िलाफ़ मन खड़ा हो रहा है?” और ये जानना हो कि किसके ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है, तो ये देख लो कि किसके साथ खड़ा रहता है। जिसके साथ खड़ा है, उसके विरोधी के ही ख़िलाफ़ खड़ा होगा।
अगर तुम पाओ कि मन ऐसा है जो तमाम तरह की उत्तेजनाओं में, व्यर्थताओं में, चिंताओं में रस पाता है, तो ऐसा मन अगर किसी चीज़ की ख़िलाफ़त कर रहा है, तो जान लेना कि वो चीज़ बड़ी संभावना है कि तुम्हारे लिए शुभ है। मन तुम्हारा ऐसा है यदि, कि अशांति का समर्थन करता है, तो वो किसका विरोध करेगा? तो मन जब भी विरोध करे, तुम कहना, “रुक! तू विरोध कर रहा है, इसी से साबित होता है कि चीज़ ठीक होगी।”
और अगर तुमने अपने मन को शांति के समर्थन में पाया है; मन का जब भी अवलोकन किया है, मन के साक्षी हुए हो, तो पाया है कि मन मेरा शांति को पूजता है, कीमत देता है, तो तुम्हारा मन फिर विरोध करेगा अशांति का। यदि मन में ऐसी गुणवत्ता है कि वो शांति का पुजारी है, मात्र तभी। तो मन को देख करके निर्णय कर लेना कि मन की दिशा क्या होगी। सच बोलता है तो बहुत सारे झूठे उत्तेजित हो जाते हैं, कंपित हो जाते हैं; और झूठ जब बोलता है तो सच्चे वहाँ रुकना नहीं चाहते। इन दोनों स्थितियों को एक मत मान लेना। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि सुन कौन रहा है। और जो सुन रहा है, तुम यदि उसके दृष्टा हो तो तुम्हें पता होगा कि उसकी संरचना कैसी है।
कोई झूठा आए तुम्हारी ओर और बड़ी भर्त्सना करे किसी की, जिसकी भर्त्सना करता हो, उसी की ओर भागना। ज़रूर कोई सच्चा आ गया है शहर में। और अगर झूठों का पूरा एक समूह जो अन्यथा तो आपस में लड़ता रहता है, पर अब गुटबंदी करके तुम्हारी ओर आता हो और कहे कि, “देखिए साहब, एक बड़ा ख़तरनाक आदमी आ गया है शहर में,” तो जान लेना कि कोई ज़रूर बड़ा सच्चा है, कि उसकी सच्चाई ने झूठों में एकता डाल दी है। कोई इतना सच्चा है कि उसके सामने आकर सब झूठे एकजुट हो गए हैं।
विरोध करने वाले की गुणवत्ता से जान लो कि किसका विरोध हो रहा है। अपने मन पर चलते हो, देख तो लो कि मन तुम्हारा ऐसा है क्या कि उसकी सलाह पर चला जा सके, हो तो ज़रूर चलो। पाओ कि मन तुम्हारा ऐसा है जो बात-बात में धोखा देता रहा है, जाना चाहते हो बाएँ और पहुँचाता दाएँ रहा है। तुम उससे कहते हो, “रोटी खाओ” वो कहता है, “नहीं, पूरी खानी है।” तुम उससे कहते हो, “पाँच बजे उठ जाओ,” वो कहता है, “नहीं उठूँगा, आठ बजे उठना है।”
मन तुम्हारा यदि ऐसा है मंचला, उपद्रवी, अशृंखल, तो तुम ऐसे मन की बात पर भरोसा करते क्यों हो, जिसका इतिहास यही रहा है कि वो कभी तुम्हारे काम आया नहीं; उस पर तुम अभी भी भरोसा किए जा रहे हो, उसकी सलाह माने जा रहे हो। तुम कितने अंधे हो! तुम नहीं जानते किसकी बात सुननी है और किसकी नहीं सुननी। तुम मन की सुनना चाहते हो और सत्य को ठुकराना चाहते हो, ऐसा पागलपन!
और ये साबित हो चुका है कि मन हर प्रयोग में असफल है तुम्हारा ख़ुद तुम्हें साबित हो चुका है। तुमने ही जब-जब मन को कसौटी पर कसा है, उसे असफल ही पाया है। कितनी बार तो ये प्रयोग करता हूँ, अभी अपने मन से बोलो कि ये नहीं सोचना है; मन वही-वही सोचेगा। ऐसा तो मन है तुम्हारा, ये हितैषी है? ये दोस्त है तुम्हारा? ये कैसा दोस्त है, जिसको तुम कह रहे हो कि “न कर,” और वो वही कर रहा है!
अपने मन से बोलो कि आम और अमरूद के विषय में बिल्कुल नहीं सोचना, और फिर देखो क्या होता है। कोई तुम्हारा अगर दोस्त होता है, तो हमेशा तुम्हारी ख़िलाफ़त करता है क्या? कोई तुम्हारा दोस्त होता है, तो हमेशा तुमसे विपरीत चलता है? ऐसा तो नहीं होता। पर मन को ज़रा अपने साथ तुम चला के देखो। मन से बोल के देखो कि आम और अमरूद नहीं सोचना है, फिर देखो।
ज़ाहिर-सी बात है कि ये मन तुम्हारा मित्र नहीं। और अगर तुम्हारा मित्र नहीं, तो तुम क्यों हो मनचले? क्यों तुम बार-बार कहते हो, मन नहीं कर रहा इसलिए नहीं सुनेंगे; मन नहीं कर रहा इसलिए नहीं आएँगे; मन नहीं कर रहा इसलिए नहीं खाएँगे? क्यों इस तरह की बातें करते हो कि हम वही करेंगे जो हमारा मन कर रहा है? मन तो हमेशा तुम्हारी ख़िलाफ़त में लगा है। मन तो हमेशा तुम्हारा नुकसान करने के लिए उद्यत है, और तुम अपना नुकसान करवाना चाहते हो?
ज़रा परख के तो देख लो कि तुम्हारा मन तुम्हारा है भी! न वो तुम्हारा है, न वो तुम्हारा शुभचिंतक है। हालत तुम्हारी ऐसी है कि जैसे अपने ही दुश्मन के पीछे-पीछे चले जाते हो। जैसे कोई ज़हर की पोटली रख के घूमता हो जेब में, और उसको कुछ भी दिया जाए, कहेगा, न”हीं, जब तक ये न मिला लूँ, तब तक ग्रहण नहीं करूँगा; मेरी हर गतिविधि में मन शामिल होना चाहिए; मेरे हर भोजन में ज़हर शामिल होना चाहिए।” एक ही बात है दोनों।
कोई तुमसे पूछे, पढ़ा क्यों नहीं? और कोई जवाब होता है तुम्हारे पास? एक ही, क्या? “मन नहीं कर रहा था।” लाओ, थोड़ा ज़हर और दूँ तुम्हें, ख़त्म ही क्यों नहीं हो जाते? मनचलों। आए क्यों नहीं? मन नहीं कर रहा था। जा क्यों रहे हो? मन कर रहा है। आ क्यों रहे हो? मन कर रहा है। तुम जो कर रहे हो, मन के कहने पर कर रहे हो। ठीक? बड़े आज्ञाकारी हो!
अब एक-दो बार तुम्हारा कहा भी ज़रा मन करके दिखा दे। तुमने तो वो सब कुछ करा जो मन ने कहा, अब ये भी तो प्रदर्शित करके दिखा दो कि मन भी कभी वो करता है जो तुम कहते हो। ये तो बड़ी विसंगत रिश्तेदारी है, जहाँ पर एक मालिक है, दूसरा ग़ुलाम है क्योंकि हमेशा चल एक की रही है। किसकी? मन की। दो लोगों का रिश्ता है, जिसमें सिर्फ़ एक की चल रही है। इस रिश्ते को दोस्ती कहोगे या ग़ुलामी कहोगे? ये तो ग़ुलामी है।
तुम्हारे और मन के रिश्ते में सदा मन की ही चल रही है। तुम्हारे कहने पर मन कभी चल रहा है क्या? कभी ऐसा भी तो हो कि कोई चीज़ लुभाए मन को, और तुम मन को कहो, अब इसके बारे में एक विचार भी नहीं आना चाहिए और मन कहे, “जी हुज़ूर,” और ऐसा हो भी जाए। ऐसा हुआ है कभी?
तो ये कैसा रिश्ता है तुम्हारे और मन के बीच में? बेमेल। आदमी हो, ग़ुलाम हो? और बड़े भोले ग़ुलाम हो, इतने भोले हो कि भोंदू हो। दुनिया भर से लड़ जाओगे, मन से नहीं लड़ोगे। उसको बोलोगे, “जी हुज़ूर।” दुनिया भर से संघर्षरत हो, देखो न, लड़ाई चल रही है, किसी से भी तुम लड़ सकते हो; अपने पगले मन से नहीं लड़ोगे, जो बहका ही रहता है। उससे नहीं लड़ोगे, उसकी आज्ञा तो शिरोधार्य है। परमात्मा को नमन हो या न हो, मन प्रणम्य है।