जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।
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प्रश्नकर्ता: जैसे मैं यहाँ पर हूँ, अभी आया था काफ़ी सवाल घूम रहे थे। अब दो घंटे सवाल नहीं रहेंगे, क्योंकि मैं पूरा मग्न हो गया इसमें। वापस जाऊँगा तो मुझे ऐसा लगता है कि अगर मैंने उन सवालों का उत्तर नहीं पाया तो कुछ इम्पॉर्टेंट मिस कर रहा हूँ, मैं अपने आप को किसी और चीज़ में व्यस्त करके कुछ खो रहा हूँ। तो फिर मन वापस वहीं जाता है सवालों में। जब भी अकेला होता हूँ तो ऐसा होता है, फिर कहीं मग्न हो जाऊँगा, फिर हट जाएँगे। जैसे अकेला होता हूँ, जैसे सो रहा हूँ, तब आ जाएगा फिर से।
आचार्य प्रशांत: तुम होशियार हो, बताओ, क्या समाधान है?
प्रश्नकर्ता: वैसे जितना मैंने ऑब्ज़र्व किया है, मुझे पता है कि सब व्यर्थ है, क्योंकि एक सवाल का उत्तर मैंने फ़ाइंड कर लिया, फिर से वो सवाल आएगा किसी और पर्सपेक्टिव से, जिसमें वो उत्तर सूट नहीं करेगा। तो घूमने को तो एक ही सवाल जीवन भर घूम सकता है। तो कुछ अंत तो है नहीं इसका। लेकिन वो फ़ीलिंग फिर भी आती है अब भी, जबकि पता है मुझे कि कुछ काम का नहीं है, लेकिन वो मन पर चढ़ जाती है फ़ीलिंग कि सोचो इसके बारे में। तो उसको कैसे ख़त्म करें?




