बाल गणेश अहंकार का प्रतीक है, जो प्रकृति (पार्वती) से जन्मा पर अभी सत्य (शिव) से अस्पर्शित है—इसलिए द्वार पर सत्य को रोकता है। सिर काटना और नया सिर लगाना अहंकार के क्षीण होने और उसे नया केंद्र यानी बोध मिलने का संकेत है। मूषक कामना का प्रतीक है, जो क्षैतिज अक्ष पर भागती इंद्रियों को दर्शाता है। शिव की परिक्रमा सूक्ष्म दृष्टि और ऊर्ध्व अक्ष पर होने वाली गति को इंगित करती है—स्थूल दौड़ यानी क्षैतिज गति कभी ऊँचाई नहीं देती। मूर्ति-विसर्जन नाम-रूप के त्याग और निर्गुण की ओर संकेत का प्रतीक है। विघ्नहर्ता नाम एक भ्रम को उजागर करता है: असली विघ्न अहंकार स्वयं है; उसका विगलन केवल स्वयं की नीयत यानी सक्रिय चुनाव से संभव है—कोई बाहरी सत्ता उसकी संप्रभुता नहीं छीन सकती।
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Originally published in Navbharat Times on 20 September '26
गणेश उत्सव आते ही घर-घर में वे कथाएं फिर दोहराई जाने लगती हैं जो बचपन से सुनी हैं। एक बालक है, जिसे माता पार्वती ने द्वार पर बिठाया है। शिवजी आते हैं और बालक उन्हें भीतर जाने से रोक देता है। लोग सोचते हैं कि इसने पिता की अवज्ञा की, पिता के आदेश का पालन नहीं किया, तो पिता ने कुपित होकर बालक का सिर काट दिया। और फिर जब माता ने कहा कि मेरे बालक का सिर आपने कैसे काट दिया, तो जाकर एक हाथी का सिर ले आए और बालक को वह सिर लगा दिया।
लोग कहानी को इसी तरह सुनते हैं, और कहानी ऐसी ही है। लेकिन उस कहानी के भीतर गहरे अर्थों के कई तल हैं। इसको अगर ऐसे सोचेंगे कि जैसे आम परिवार होते हैं और उनमें कोई घटना घटती है, तो यह बात अचंभे की लगेगी ही, समझ में नहीं आएगी। पर जब इस बात को गहराई से और वेदांत की दृष्टि से देखेंगे, तो बात एकदम साफ होकर उभरती है। उन अर्थों को जब समझा जाता है, तभी वह कथा हमारे जीवन को समृद्ध कर पाती है, हमें कुछ बोध दे पाती है। नहीं तो हम करते क्या हैं? इतनी सारी बोध-कथाएँ हैं, उनको हम लगभग मनोरंजन जैसा बना लेते हैं। फिर उनसे लाभ नहीं हो पाता।




