रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए

Acharya Prashant

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रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। रक्षाबंधन आने वाला है, तो मैं आपसे इसके बारे में कुछ पूछना चाहती थी। आख़िर रक्षाबंधन जैसे त्योहार की सांस्कृतिक या मनोवैज्ञानिक ज़रूरत क्यों रही होगी? और ये विशेष भाई-बहन का रिश्ता इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है कि पूरे भारत में, यहाँ तक कि हिंदू समुदाय से परे भी, एक त्योहार मनाया जाता है? क्योंकि अगर हम देखें, उदाहरण के लिए, अमेरिका में मदर्स डे, फादर्स डे काफ़ी लोकप्रिय हैं। वो भाई-बहन के रिश्ते से संबंधित नहीं है। तो भारत में ये रिश्ता इतना महत्त्वपूर्ण कैसे हो गया? यही मैं समझना चाहती थी।

आचार्य प्रशांत: देखिए, आप त्योहार का इतिहास देख सकती हैं, आपको सारे तथ्य मिल जाएँगे। वो सब तो काफ़ी जाना-पहचाना है। तो इतिहास को छोड़कर सीधे मनोविज्ञान में आइए। ठीक है? आप ये तो नहीं कहेंगे कि, उदाहरण के लिए, करोड़ या अरबपतियों को सुरक्षा की ज़रूरत है। या कहेंगे? आप ये नहीं कहेंगे कि, उदाहरण के लिए, अमेरिकी सेना को सुरक्षा की आवश्यकता है। विशेष सुरक्षा की ज़रूरत उसी को होती है, जो कमज़ोर है। और अगर बहनों के लिए, महिलाओं के लिए कोई रक्षा दिवस, कोई रक्षाबंधन आवश्यक रहा है, तो इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इतना सशक्त नहीं था और इसलिए उसे सुरक्षा की ज़रूरत थी बस।

बाक़ी ऐतिहासिक विवरण, वे तो बहुत आसानी से उपलब्ध हैं। कोई कहेगा कि इसकी जड़ें पौराणिक कथाओं में हैं। कोई मुग़ल काल के अपेक्षाकृत हाल के घटनाक्रमों की बात करेगा। बहुत-सी लोककथाएँ हैं, क़िस्से हैं, मिथक हैं, इतिहास है। और ये सब एक-दूसरे में मिला हुआ है। लेकिन एक बात निश्चित है, अगर बहनों को ज़रूरत थी अपने भाइयों के पास जाकर ये छोटी-सी रक्षा की डोर बाँधनी पड़ती है, तो ये हमें बताता है कि बहनों को वास्तव में सुरक्षा की आवश्यकता थी। और जो मज़बूत होते हैं, उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती। कमज़ोर लोगों को ही सुरक्षा की ज़रूरत होती है। ठीक है, ये बात समझ में आती है।

इतिहास के हर दौर में और हर जगह ऐसे लोग रहे हैं, जो कमज़ोर स्थिति में रखे गए हैं और उन्हें उचित सुरक्षा देना न केवल ठीक है, बल्कि सही भी है। लेकिन सवाल ये नहीं है कि इतिहास में ये त्योहार कैसे शुरू हुआ। असली सवाल ये है कि इसे आज के समय के लिए अधिक प्रासंगिक, उपयोगी और सार्थक कैसे बनाया जाए? अगर इस त्योहार की व्यापक भावना सुरक्षा देने की है, तो क्या आज महिलाएँ वास्तव में कमज़ोर हैं?

मैं इस चर्चा को पूरी तरह ऐतिहासिक दिशा में ले जा सकता हूँ। ये बता सकता हूँ कि भारतीय समाज में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग परंपरागत रूप से कमज़ोर स्थिति में क्यों रहा और बहुत-सी ऐतिहासिक बातें कर सकता हूँ। हम इतिहास में जा सकते हैं। तथ्य और अंतर्दृष्टियाँ ला सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि ये देखना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि आज चीज़ें कैसे स्थित हैं, बजाय इसके कि वे इतिहास में कैसी थीं।

आज मुझे नहीं लगता कि भारतीय महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा बहुत अधिक सुरक्षा की आवश्यकता रखता है। हमने बहुत अच्छा काम नहीं किया है, लेकिन फिर भी हमने काफ़ी प्रगति की है। हाँ, हम सारे आँकड़े जानते हैं। महिलाओं की श्रम-बल में भागीदारी, शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात, ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो, स्त्री-पुरुषों के बीच संपत्ति के वितरण की असमानता, सब जानते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बहुत बड़ा अंतर है, हम जानते हैं। कॉरपोरेट बोर्डरूम में प्रतिनिधित्व का अंतर है, धार्मिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अंतर है। लेकिन फिर भी हम आगे बढ़ रहे हैं और महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा ऊपर की ओर है।

ख़ैर, कम-से-कम उनमें से अधिकांश इतनी ख़राब स्थिति में नहीं हैं कि आज उन्हें आवश्यकता हो कि उन्हें अपने तीन साल के छोटे भाई के पास जाकर राखी बाँधनी पड़े, इस उम्मीद में कि एक दिन वो उन्हें सुरक्षा और आश्रय देगा। ऐसा होता है, है न? और ये अधिक बार होता है, जितना हम कल्पना कर सकते हैं। क्योंकि भारतीय परिवेश में आमतौर पर परिवार का सबसे छोटा सदस्य एक लड़का होता है। परिवार लड़का होने तक रुकता ही नहीं। लड़का ही परिवार के लिए पूर्णविराम होता है। लड़का होने से पहले या तो परिवार लड़के की उम्मीद में लड़कियाँ पैदा करता रहता है या लड़के की चाह में लड़कियों को मारता और उनका गर्भपात करवाता रहता है।

इसलिए संभावना यही रहती है कि बहन भाई से बड़ी होगी। अक्सर बहन भाई से बड़ी होती है। हमेशा ये संभावना अधिक होती है कि बहन भाई से बड़ी होगी। और कभी-कभी बहन दस साल बड़ी होती है, और कभी-कभी भाई छह महीने का बच्चा होता है और बहन बारह या चौदह साल की, और फिर कहा जाता है, “भैया, मेरी रक्षा करना।”

हाँ, हो सकता है कि कभी इस रस्म का अर्थ रहा हो, आज भी रस्म के तौर पर ये प्यारा लग सकता है। अगर आप इसे जारी रखना चाहते हैं, तो कोई समस्या नहीं है। एक परंपरा के रूप में, स्मृति के रूप में। ठीक है, अच्छी चीज़ें हैं। और फिर, आप जानते हैं, भाई को भी बहन को उपहार देने होते हैं। तो बहनों का भी हिस्सा होता है। तो कृपया इसे जारी रखें, बहनों।

लेकिन इसे हमें मुख्य प्रश्न से विचलित नहीं करना चाहिए। मुख्य प्रश्न ये है: अगर सुरक्षा प्रदान की जानी है तो वो है एक असहाय इकाई। आज असहाय कौन है? कौन है वो, जिसे सच में सहायता और सुरक्षा की आवश्यकता है? कौन है वो? महिलाएँ नहीं, वास्तव में महिलाएँ नहीं। आपकी पीढ़ी की महिलाएँ नहीं। आपके बाद आने वाली पीढ़ी की भी महिलाएँ नहीं। हम बारह-चौदह साल की लड़कियाँ, जिन्हें हम जेन अल्फ़ा कहते हैं, वे लड़कों के लगभग बराबर मज़बूत हैं। उन्हें पता है कि जीवन के साथ क्या करना है। वे मज़बूत हैं, सख़्त हैं, या कम-से-कम मैं उम्मीद करता हूँ कि वे ऐसी ही होंगी।

लेकिन गौरैया ग़ायब हो गई है! गौरैया ग़ायब हो गई है! मुझे नहीं पता कि अभी अचानक गौरैया मेरे दिमाग़ में क्यों आई। लेकिन मेरे लिए गौरैया कमज़ोर स्त्री, शोषित प्रकृति का एक बहुत मार्मिक प्रतीक है और गौरैया ग़ायब हो गई है। आप जैसी महिला को किसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। लेकिन गौरैया को सुरक्षा की ज़रूरत है, आज गौरैया बहन है। और पुरुष और महिलाएँ दोनों को इस बहन के लिए भाई होना होगा। आपको भी भाई होना चाहिए आपके शारीरिक लिंग की परवाह किए बिना, आपको भी गौरैया, जो विलुप्त हो रही है उसका भाई होना होगा।

और रक्षाबंधन तब एक सुंदर अवसर बन जाता है, हमें उन लोगों की याद दिलाने का, जो आज वास्तव में हमारे समर्थन की आवश्यकता रखते हैं। जैसे कि गौरैया करती है।

मैं एक रिपोर्ट पढ़ रहा था और आप इसे ज़रूर जाँच लीजिए, हो सकता है मैं ग़लत हूँ। कहा गया था कि आज शहरी केंद्रों से 97% गौरैया ग़ायब हैं। वास्तव में, जितना अधिक शहरीकरण होता है, उतनी ही अधिक गौरैया वहाँ से ग़ायब हो जाती है। दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों पर शायद केवल 3% ही बची है, क्योंकि उन्हें घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती और सब कुछ सीमेंट और कंक्रीट से ढका हुआ है। इसीलिए वहाँ कीड़े नहीं हैं और वे अपने-अपने छोटे बच्चों को खिला नहीं सकते।

वे उड़ नहीं सकते। राइट? जो छोटे अभी-अभी निकले हैं। तो माँ को कोई कीड़ा लाकर उन्हें देना पड़ता है और वहाँ कोई कीड़े नहीं हैं, क्योंकि वहाँ घास नहीं है, क्योंकि वहाँ हरियाली नहीं है, क्योंकि वहाँ पेड़ नहीं हैं। इसके अलावा, जब आपके पास ये सारी दीवारें हैं, तो गौरैया अपना घोंसला कहाँ बनाएगी?

मैं किसी विशेष पक्षी प्रजाति की बात नहीं कर रहा हूँ। आशा है कि मुझे ग़लत नहीं समझा जा रहा है। मेरे लिए गौरैया, ये इस पृथ्वी पर आज जो कुछ बेहद दुखद हो रहा है, उसका एक बहुत ही भावुक प्रतिनिधि है। हम प्रजातियाँ खो रहे हैं, सामान्य विलुप्ति दर से दस से सौ गुना अधिक दर पर। ये विनाश पूरी तरह से मानव-निर्मित है। जलवायु परिवर्तन, ये निश्चित रूप से मानव-जनित है, हमने ऐसा किया है। नदियों को संरक्षण की आवश्यकता है। पर्वतों को सुरक्षा की आवश्यकता है। इस समय मैं गोवा से बोल रहा हूँ और गोवा को सुरक्षा की आवश्यकता है।

कोई मुझे बता रहा था कि हर गुज़रते साल धीरे-धीरे बारिश थोड़ी और कम होती जा रही है। मैंने उस आँकड़े की पुष्टि नहीं की है, लेकिन वो व्यक्ति वास्तव में चिंतित लग रहा था। और गोवा अपनी हरियाली और पहाड़ियों को खो रहा है। वे बेच दिए जा रहे हैं। इसीलिए रक्षाबंधन आज भी बेहद प्रासंगिक है, बहुत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन आपको इसके मूल अर्थ तक जाना होगा कि सुरक्षा देना क्या है और वास्तव में सुरक्षा का हक़दार कौन है।

अब तक मैंने भौतिक वस्तुओं की बात की है, गौरैया, पहाड़, नदी, पेड़, प्रजातियाँ। सोचिए, उन सभी चीज़ों के बारे में जो इंसान के भीतर से ग़ायब हो रही हैं। उन्हें भी रक्षाबंधन पर याद किया जाना चाहिए, वो बहुत अधिक रक्षा के योग्य है। साझा आदर्श, साझा दर्शन, जो पूरे विश्व में तेज़ी से विस्तार ले रहा है: कंज्यूम एंड बी हैप्पी। आप कंज्यूम करने के लिए जीते हैं।

साधारण ईमानदारी, अपने आप को देखने की सरल प्रवृत्ति, लुप्त हो रही है, विलुप्त हो रही है। वो रक्षा के योग्य है, उसकी सुरक्षा की जानी चाहिए।

धर्म का सार हमने बेच दिया है। उसकी जगह जो हमारे पास है वो है या तो सस्ती भावुकता, भक्ति-भाव बनाए रखना, या मूर्खता, मिस्टिसिज़्म और गूढ़वाद की। वास्तविक आध्यात्मिकता, जो आत्मज्ञान है उसको रक्षा की ज़रूरत है। पवित्र धागा आज भी बहुत प्रासंगिक है। लेकिन आपको इसे बाँधने के लिए सही कलाई खोजनी होगी। आपकी बहन अच्छी है, क्यूट है। स्पष्ट रूप से आपको उसकी मदद करनी चाहिए और बहन को भाई की मदद करनी चाहिए, वो रिश्ता अच्छा और प्यारा है। और भाई-बहन की जोड़ी, इन्हें एक-दूसरे के लिए खड़ा होना चाहिए और एक-दूसरे का समर्थन करना चाहिए और ये सब बहुत अच्छा है।

लेकिन अब सुरक्षा की भावना को भाई बहन के रिश्ते से परे बढ़ाना होगा, करुणा का दायरा बढ़ाना होगा। आप ये नहीं कह सकते कि वो मेरी बहन है, इसलिए मैं उसकी रक्षा करूँगा। बिल्कुल अपनी बहन का ध्यान रखिए, इसमें कोई दिक़्क़त नहीं है। लेकिन गौरैया का ध्यान क्यों नहीं रखते? नदी का ध्यान क्यों नहीं रखते और उन श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों का ध्यान क्यों नहीं रखते, जिनके बिना हम इंसान कहलाने के भी योग्य नहीं हैं?

क्या आपको पता है कि इस समय हम इंसान के रूप में, एक प्रजाति के रूप में, इस पृथ्वी पर हर दिन कितनी चीज़ें खो रहे हैं, भौतिक भी और अभौतिक भी?

वास्तव में धरती माता को रक्षाबंधन के दिन पुकार कर हर जीवित इंसान के पास आना चाहिए और उसके हाथ में राखी बाँधकर कहना चाहिए, “मेरी रक्षा करो, मैं दिव्य स्त्री हूँ, मैं माँ हूँ।”

पिछले कुछ दशकों में दुनिया के लगभग सभी देशों में जिसे हम विकास कहते हैं, उसका 70 से 80% हिस्सा वास्तव में पृथ्वी के विनाश की क़ीमत पर हुआ है। पृथ्वी की संपत्तियाँ नष्ट की गई हैं और उस विनाश को देशों की आय के रूप में गिना गया है। अब ये ईमानदार अकाउंटिंग कैसे है? कृपया मुझे बताएँ।

आप अपनी विरासत में मिली संपत्तियाँ नष्ट कर रहे हैं। उन्हें बेच रहे हैं और उसे कैश फ़्लो में बदल रहे हैं। क्या इसे मुनाफ़ा कहा जाना चाहिए?

पूरी पृथ्वी आज सुरक्षा की हक़दार है। महासागरों को सुरक्षा चाहिए। लेकिन हम इस बारे में बात नहीं करेंगे, क्योंकि हमारी चिंता सिर्फ़ हमारे छोटे से दायरे तक सीमित है। हमें लगता है कि हमारी ज़िम्मेदारी अपने परिवार के दो-चार लोगों तक ही है। हमारे दायरे में…, समझ रहे हैं आप?

ये एक विशेष त्योहार है, जहाँ जिसके पास क्षमता है, जिसके पास शक्ति है, वो ज़िम्मेदारी लेने की भावना व्यक्त करता है। मेरे पास शक्ति है। और जैसा कि स्पाइडरमैन कहता है, “विद ग्रेट पावर कम्स ग्रेट रिस्पॉन्सिबिलिटी।” आज मानवता को यही कहना चाहिए। मेरे पास शक्ति है और शक्ति के साथ ज़िम्मेदारी आती है। और आज हमारी ज़िम्मेदारी है पृथ्वी की रक्षा करना। पृथ्वी को बहन के रूप में देखना होगा। स्त्री के रूप में, माँ के रूप में, उस रूप में जो संकट में है।

लेकिन जो मैं कह रहा हूँ, वो किसी तरह का यूटोपिया बनकर ही रह जाएगा। दिन बीत जाएगा और ये एक और धार्मिक-सांस्कृतिक त्योहार बनकर रह जाएगा। लड़के अपनी बाँहों पर ढेर सारी राखियाँ बाँधे घूम रहे होंगे, और बहनें मिले हुए उपहारों से ख़ुश होंगी। हम धर्म को समझते ही नहीं हैं। है न? हमें पता ही नहीं है कि धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है। हमें लगता है कि धर्म का संबंध कर्मकांडों, रीति-रिवाज़ों, परंपराओं, विशेष दिनों, त्योहारों और पकवानों से है।

जानते हैं, हर घर में रक्षाबंधन पर कुछ विशेष पकाया जाएगा। हम सोचते हैं कि धर्म का संबंध इन सब चीज़ों से है। नहीं। वास्तविक धर्म ये देखने से है कि आप कौन हैं और इसीलिए आपकी ज़िम्मेदारी क्या है? सच्ची ज़िम्मेदारी के बिना धर्म हो ही नहीं सकता। और जब बात सच्ची ज़िम्मेदारी की आती है, तो आप उसे अपने परिवार के दो-चार लोगों तक सीमित नहीं कर सकते।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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