क्या AI सचमुच इंसानों से आगे निकल जाएगा?

क्या AI सचमुच इंसानों से आगे निकल जाएगा?
AI की गणना और विश्लेषण क्षमता मानव मस्तिष्क से आगे निकल सकती है, लेकिन इससे वह मनुष्य की बुद्धिमत्ता से आगे नहीं निकल जाता। मनुष्य को केवल उसके मस्तिष्क की प्रोसेसिंग क्षमता मानना ही मूल भूल है। जब हमें स्वयं ‘मैं’, प्रेम, बुद्धिमत्ता, जीवन और इच्छाओं का अर्थ नहीं पता, तब AI और मनुष्य की तुलना एक कैटेगरी एरर बन जाती है। तकनीकी विशेषज्ञता आत्मज्ञान का विकल्प नहीं हो सकती। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आपसे मेरी लास्ट मुलाकात यूके, कैम्ब्रिज में हुई थी, मेरा नाम ताहिर अली। मेरा क्वेश्चन यह है कि इलॉन मस्क ने अभी एक बयान दिया हुआ है द इकॉनमिस्ट मैगज़ीन को कि AI पाँच साल में ह्यूमन इंटेलिजेंस को सुपरसीड कर देगा और इन टेन इयर्स इट विल बिकम अ मास्टर एंड ह्यूमंस स्लेव हो जाएँगे और जो भी ह्यूमन फोर्स है, वो सब विदाउट वर्क रहेगी और AI सब उनका काम करेगा, मगर उसमें अच्छी चीज़ यह हो जाएगी कि अबंडेंस हो जाएगा। सब जगह अबंडेंस होगा और मनी की रेलेवेंस ख़त्म हो जाएगी।

और जो कल हमारी बातें हो रही थी कि इंडियन यूथ पहले से ही काफ़ी नाराज़ है कि अनइंप्लॉयमेंट रेट बढ़ रहा है, एग्ज़ाम्स ठीक से हो नहीं रही। तो ये कंडीशन में प्रॉबब्ली आगे जाके सिविल वॉर हो सकती है। बिकॉज़ लोगों के पास नौकरी नहीं रहेगी। और कहा जाता है कि ब्रिटेन में भी उन्होंने बताया कि आफ्टर टेन टू फिफ्टीन इयर्स वहाँ पर भी सिविल वॉर हो सकता है, क्योंकि उनके जो अभी पॉलिसीज़ हैं, वो माइग्रेशन को लेकर इतनी स्ट्रिक्ट नहीं है काफ़ी दूसरे वेस्टर्न कंट्रीज़ को लेकर। तो इस पर आपकी राय जानना चाहता था?

आचार्य प्रशांत: इन भाई साहब की ज़्यादातर बातों को मैं गंभीरता से लेता नहीं। वो मुद्दे पर बोल सकता हूँ, पर इनकी टिप्पणी पर क्या टिप्पणी करूँ? इंसान कोई मशीन नहीं है, ठीक है? तो मशीन आगे बढ़ रही है, एक सिस्टम आगे बढ़ रहा है, वो एक बात है और सिस्टम किस गति से आगे बढ़ेगा, किस दिशा में आगे बढ़ेगा, हम उसका पूर्वानुमान कुछ हद तक लगा सकते हैं, क्योंकि हम ही तो बढ़ा रहे हैं उसको, हमें दिख रहा है। उसकी ट्रेजेक्टरी हमें पता है। पर दो की तुलना करने के लिए आपको दोनों का पता होना चाहिए न। आप बोले A = B या A > B, इसके लिए दो शर्तें हैं। एक तो A पता होना चाहिए और दूसरा B पता होना चाहिए।

"AI विल एक्सीड ऑल कलेक्टिव ह्यूमन इंटेलिजेंस।" इसके लिए दो बातें पता होनी चाहिए। पहला, AI क्या है? और दूसरा, व्हाट इज़ इट टू बी ह्यूमन? ये सज्जन जो बातें कर रहे हैं, AI इन्हें बेशक पता होगी। क्या ये ह्यूमैननेस को जानते हैं? और अगर नहीं जानते, तो जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं, व्हाट्स द पॉइंट इन कम्पेयरिंग एपल्स ऐंड ऑरेंजेज़? आप किस चीज़ की तुलना किस चीज़ से कर रहे हो?

यह शायद AI की कंप्यूटिंग एबिलिटी की तुलना ह्यूमन पॉपुलेशन के ब्रेन की प्रोसेसिंग पावर से कर रहे हैं। वो आप कर सकते हो। आप ब्रेन नहीं हो, आप अहंकार हो। ब्रेन तो आपका एक उपकरण है। ब्रेन तो आपका उपकरण है। और यहाँ तुलना किसकी करके दिखा दी गई है? कि AI कितनी इंफॉर्मेशन, कितनी गहराई से, कितने एनालिसिस के साथ प्रोसेस कर सकता है? किसकी तुलना में? यह मान लो दस अरब ह्यूमन बीइंग्स हैं या नौ अरब ह्यूमन बीइंग्स हैं। उनके पास ब्रेन्स हैं और हमें ब्रेन्स की प्रोसेसिंग पावर पता है। तो आपने उसको लिया, मल्टीप्लाई कर दिया और उससे एक नतीजा आ गया और उसको आपने ट्वीट कर दिया और उससे सनसनी मच गई।

और आप यह देख भी नहीं रहे हो कि आप दो ऐसी चीज़ों की तुलना कर रहे हो, जो अलग-अलग कैटेगरीज की हैं। इस तुलना में कैटेगरी एरर है। आप एक इंसान को उसके मस्तिष्क के इक्विवेलेंट, समतुल्य, रख रहे हो। इंसान उसके ब्रेन की प्रोसेसिंग पावर नहीं होता।

आप किसी से मिलो। वो आपको ऐसे देखे और बोले, *"हाय, एक्स जीबी पर सेकंड।" तो अब कैसा लगेगा? कैसा लगेगा? इसी तरह से ऐसे वैसे ही लगेगा जैसे कि आप जाकर के अपनी गर्लफ्रेंड से मिलो और, "आ गई पचास किलो।" वो नाराज़ हो जाएगी, क्योंकि आपने उसको क्या घोषित कर दिया? बॉडी। वैसे ही जब आप ह्यूमन बीइंग को उसके ब्रेन की प्रोसेसिंग पावर की इक्विवेलेंट घोषित करते हो, तो वही एरर कर रहे हो। बिल्कुल वही एरर कर रहे हो। और यह एरर क्यों कर रहे हो? क्योंकि आप कहते होंगे कि मैं ऐसा हूँ, वैसा हूँ, इनोवेटर हूँ। पर हू ऐम आई? तो आपने कभी पढ़ा ही नहीं।

होगा आपको इधर-उधर का दुनिया भर का ज्ञान, पर आत्मज्ञान तो आपको धेले भर का नहीं। तो आप मशीनों को जानते होओगे, इंसान को नहीं जानते हो। और तुलना कर रहे हो आप मशीनों और इंसानों की। यह तुलना करने की आपकी काबिलियत ही नहीं, क्वालिफिकेशन ही नहीं। बात समझ रहे हो?

देखो, हम जो भी कुछ कर रहे होते हैं, वो किसके लिए कर रहे होते हैं? अहंकार के लिए ही तो कर रहे होते हैं न। यह तुलना भी उसी के लिए की जा रही है, पर बिना उसको समझे की जा रही है। AI-ह्यूमन इंटरेक्शन, इस इंटरेक्शन को लेकर के लगभग रोज़ ही कहीं न कहीं से कोई सनसनीखेज़ वक्तव्य आ ही जाता है। AI ऐसा कर देगा, AI वैसा कर देगा, AI विल रिप्लेस दिस। कोई बोल रहा है, इंटिमेसी भी अब AI से होगी। जेन ज़ी वाले, उन्होंने अपने AI से अपने पार्टनर्स बना लिए हैं। तो इसको लेकर के कुछ न कुछ उछालते रहते हो। बिना यह समझे कि यह इंसान नाम की शय होती क्या है?

अगर तुम यह जानते ही नहीं, तो उसकी तुलना AI से कैसे कर रहे हो? हम हमारा ब्रेन भर नहीं हैं, ब्रेन तो प्रकृति है। ठीक वैसे जैसे हम हमारी हड्डी नहीं हैं। हम हमारी खाल नहीं हैं, वैसे ही हम हमारा ब्रेन भी नहीं हैं। और यही न जानने के कारण देखो, जो इसमें वाक्य संरचना है, वो कितनी पुअर है।

जब यह कह रहे हैं कि "AI* विल एक्सीड ह्यूमन इंटेलिजेंस",* तो यह इंटेलिजेंस की डेफिनेशन भी नहीं जानते। "AI कैन एक्सीड ह्यूमन इंटेलेक्ट।" यस, इंटेलेक्ट परटेंस टू द ब्रेन। और ब्रेन हमें पता है। बहुत अच्छे से जानते हैं कि ब्रेन कितनी ऊर्जा खाता है। ब्रेन प्रॉपर एक मशीन है, हमें पता है कितनी ऊर्जा खाता है। उसकी एफिशिएंसी कितनी होती है। उसके किस हिस्से में क्या काम होता है। यह सब हमें पता है। बहुत अच्छे से हम जान चुके हैं। कितना आउटपुट दे देता है। वह आउटपुट बढ़ाने की भी विधियाँ क्या होती हैं, हमें यह भी पता चल चुकी हैं। और रिसर्च हो रही है और जान जाएँगे ब्रेन के बारे में।

पर कितना भी ब्रेन के बारे में जानो, इंसान के बारे में थोड़ी जान रहे हो। ब्रेन तो एक मशीन है प्रकृति की, तुम जान लो उसके बारे में। तुम कौन हो? तुम तड़पता हुआ अहंकार हो, और क्योंकि तुम तड़प रहे हो, इसीलिए तुम रोज़ ही इस तरह की फ़िज़ूल ट्वीट्स करके औरों को भी तड़पा रहे हो। तुम्हें ख़ुद ही नहीं पता कि तुम्हारे भीतर चल क्या रहा है। उसके लिए क्या चाहिए? आत्मज्ञान। वो तुम्हें फ़िज़ूल लगता है। तुम्हें ख़ुद ही नहीं पता, तुम क्यों बार-बार पॉपुलेशन कोलैप्स की बात करते रहते हो। तुम्हें ख़ुद ही नहीं पता। तुम क्यों बार-बार बोलते रहते हो, क्लाइमेट चेंज कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।

तुम्हें अपना कुछ भी नहीं पता। तुम्हें ख़ुद ही नहीं पता कि तुम क्यों कभी पॉलिटिक्स में घुस जाते हो, कभी किसी को सपोर्ट करते हो, फिर मुँह की खाते हो, फिर एक शादी और कर लेते हो, फिर एक बच्चा और कर लेते हो। तुम ये कर क्या रहे हो ज़िंदगी में? और मैं किसी एक व्यक्ति की बात नहीं कर रहा, ये हर अज्ञानी की कहानी है। इधर भागना, उधर भागना।

अब प्रकृति ने ब्रेन तुम्हें अच्छा दे दिया है। ब्रेन तुम्हें अच्छा दे दिया है, तुमने कई क्षेत्रों में फिर सफलताएँ हासिल कर ली। ठीक है?

तुम्हारे पास ब्रेन अच्छा है, वह एक बात है। तुम इंसान अच्छे हो, यह बिल्कुल दूसरी बात है।

न जाने कितने ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ ब्रेन बहुत अच्छा होता है, इंसान बहुत गड़बड़ होता है। और यह अंतर करना आपको आना चाहिए। और यही अंतर है इंटेलिजेंस और इंटेलेक्ट के बीच में। इंटेलिजेंस अहंकार की नीयत पर निर्भर करती है। इंटेलेक्ट एक गिवन है। इंटेलेक्ट एक ऑब्जेक्ट है, जो प्रकृति ने आपको दे रखा है ब्रेन के रूप में। उसमें नीयत जैसी कोई चीज़ नहीं। इंटेलेक्ट में आपकी कोई चॉइस शामिल नहीं है। कोई हाई आईक्यू का है तो है, पर इंटेलिजेंस है कि नहीं, यह बात मोहब्बत की होती है। प्रेम एक निर्णय होता है।

अब न जाने कितने हैं, जो इस बिंदु पर एकदम उचक जाएँगे और बिदक जाएँगे। बल्कि वो कहेंगे, यह इंटेलिजेंस का इन्होंने प्रेम से नाता कैसे जोड़ दिया? अब ये समझना चाहते हो, तो मेरे पास आओ। तुम्हारे देखे तो इंटेलिजेंस और प्रेम बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं, एक का संबंध शरीर के ऊपरी तल्ले से है और दूसरे का शरीर के निचले तल्ले से है। तुम्हारे लिए प्रेम माने हॉर्मोंस। प्रेम माने बस वही, अब सेक्स शुरू होने वाला है, तो बोलते हो, लव हो गया। और *इंटेलिजेंस माने ब्रेन की एक्टिविटी।

न इंटेलिजेंस माने सेरेब्रल एक्टिविटी होता, न लव माने हार्मोनल एक्टिविटी होता। और इंटेलिजेंस और प्रेम बहुत निकट का रिश्ता रखते हैं। और रिश्ता समझना है, तो आओ बात करते हैं।

समझ रहे हो?

बड़े नामों के पीछे भागना बंद करो, जिस क्षेत्र में जिसकी श्रेष्ठता हो उससे उसी क्षेत्र की बातें सुनो। कोई जानता है रॉकेट साइंस? हाँ, ठीक है। हम आपको सम्मान देते हैं। आपको रॉकेट साइंस पता है। हम आपसे रॉकेट साइंस के बारे में बात कर लेंगे। आप ईवीज़ बनाना जानते हैं। अच्छी बात है, हम ईवीज़ के बारे में आपसे बात कर लेंगे। पर कृपा करके कैटेगरी एरर मत करिए। ईवी कैसे बनते हैं या कैसे बेचे जाते हैं? इसमें आपकी विशेषज्ञता है। इसमें आप ज़रूर टिप्पणी करें, हम सुनने को तैयार हैं, हम आग्रह करेंगे कि आप कुछ बोलिए।

आप बोलिए ईवीज़ के बारे में, हम सुनेंगे। लेकिन कृपा करके इंसानों के बारे में कुछ मत बोलिए, क्योंकि वहाँ आपको कुछ भी नहीं पता है। एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ आपकी हुई नहीं है, आप अशिक्षित आदमी हैं और जिस क्षेत्र में आपकी कोई एजुकेशन नहीं, वहाँ टिप्पणी करना आपको शोभा नहीं देता।

बात आ रही है समझ में?

जो जिस क्षेत्र का है, उससे वहीं का लो। लेकिन जीवन को ऐसा हमने सस्ता क्षेत्र बना दिया है कि वहाँ कोई भी आकर टिप्पणी कर जाता है। हमें लगता है, कोई भी बोल सकता है न, लाइफ़ ही तो है। भाई साहब, आप डॉक्टर हो सकते हैं। इसका मतलब ये थोड़ी आप लाइफ़ जानते हैं। आप बहुत अच्छे एक्टर, सेलिब्रिटी, प्लेयर कुछ भी हो सकते हैं। पॉलिटिशियन हो सकते हैं। इसका मतलब ये थोड़ी है कि आप लाइफ़ जानते हैं। एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ को तो हमने बिल्कुल अनाथ बना रखा है कि वह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सब विशेषज्ञ हैं, सब एक्सपर्ट्स हैं। झुन्नू, धनिया, ताऊ सब आकर बता रहे हैं, "बेटा, हम तुमको बताते हैं ज़िंदगी क्या है।" अबे, ज़िंदगी क्या है? इतनी सस्ती बात हो गई कि अब तू भी बता देगा।

वैसे ही, क्योंकि यह शब्द आम प्रचलन के हैं, खूब सर्कुलेट होते हैं, तो सबको लगता है कि लव, इंटेलिजेंस, इंटेलेक्ट, लाइफ़, ये हम जानते ही हैं। तुम कुछ नहीं जानते। और तुम्हारी ज़िंदगी पर सबसे बड़ी तोहमत यह है कि जिन शब्दों का तुम सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हो, तुम्हें उन्हीं शब्दों में कुछ नहीं पता। जिनमें पहला शब्द है, एक बहुत छोटा-सा। कौन-सा? आई, ‘I’। इतना ज़्यादा इस्तेमाल करते हो इसका। ढाई आखर भी नहीं है, यह एक आखर है। पता है, इसका तुम्हें कुछ नहीं है, लेकिन इस्तेमाल इसका रोज़ करते हो। "आई दिस, आई दैट, आई ऐम कमिंग, आई बैक टू से, आई ऐम हर्ट, आई ऐम प्लीज़्ड।" हर समय आई-आई करते रहते हो, पता तुम्हें कुछ नहीं है। यह कितनी बेइज़्ज़ती की बात है कि नहीं?

इसी तरीके से, "वॉन्ट, लाइक, आई वुड वॉन्ट टू से दैट, आई लाइक हैमबर्गर।" तुम्हें न वांट का पता, न लाइक का पता, पर इस शब्द का इस्तेमाल तुम रोज़ करते रहते हो। पर तुम्हें भ्रम हो गया है। तुमने इन शब्दों का सबको इतना ज़्यादा इस्तेमाल करते देखा है कि तुम्हें भ्रम हो गया है कि तुम इनका अर्थ जानते हो। तुम इनका अर्थ नहीं जानते। तुम इनसे सिर्फ़ फ़ैमिलियर हो, परिचित हो। और ये जो ओवर-फ़ैमिलियारिटी है, इसने तुमको ये डिल्यूज़न दे दिया है कि तुम समझते भी हो। फ़ैमिलियर होना और जानना दो अलग बात हैं। फमिलिऐरिटी इज़ नॉट अंडरस्टैंडिंग।

एक एच. आई. डी. पी. एक्टिविटी थी, जो कहती थी कि चलिए, आइए, कुछ बोलिए। आप बोल रहे होते थे और उसमें हम काउंट कर लेते थे कि कौन-से शब्द हैं, जो आप दोहरा रहे हैं, खूब देर तक बुलवाओ। और फिर कहो, ये-ये शब्द हैं, जिनको आपने इतनी-इतनी बार बोला। यह फ़्रीक्वेंसी है। अब ज़रा बताइए, इनके अर्थ क्या हैं? और आप भौचक्के रह जाते थे कि आपको तो पता ही नहीं है। उन्हीं शब्दों पर आपकी ज़िंदगी चल रही है, वही शब्द आपकी ज़िंदगी का आधार हैं और उनके बारे में आपको कुछ नहीं पता।

कोई पूछे, मनी? आप, "मनी तो ऐसे सोचते हो, मनी तो पता ही है। मनी, मनी, मनी माने मनी, मनी।" और जब इस तरह के सर्कुलर आंसर्स आने लग जाएँ न, या टॉटोलॉजीज़ आने लग जाएँ कि "मनी माने पैसा", तो समझ लीजिए कि आदमी अनभिज्ञ भी है और बेईमान भी है। बताओ न, करियर। करियर माने क्या होता है? बताओ। इस्तेमाल तो रोज़ करते हो, मैरिज। मैरिज माने क्या होता है? बताओ। बताओ न, मदरहुड माने क्या? बताओ। तो बर्थ माने क्या?

"नहीं दीदी को न अभी बर्थ हुई है।" माने क्या? माने क्या? न तुम्हें बर्थ पता, न तुम्हें डेथ पता। पर कहते हो लाइफ़ पता है। यह कैसे? पता कुछ नहीं है, शब्दों से खेल रहे हैं बस। शब्दों से खेल रहे हैं। शब्दों से खेलते-खेलते यह भ्रम पाल लिया है कि हमें कुछ…?

श्रोता: पता है।

आचार्य प्रशांत: अभी उस दिन था, मैं वो सुन रहा था क़व्वाली, तो वो बोल रहे हैं, "शोला शोला कहते-कहते लब पर आँच ना आए और एक चिंगारी लब पर रख ले, लब फ़ौरन जल जाए।" तुम्हारे पास शब्द हैं, उनको खिलौनों की तरह खेल रहे हो। पता कुछ नहीं है। "आई लव यू" न आई पता, न लव पता, न यू पता, पर आई लव यू पर पूरी ज़िंदगी चल रही है और ज़िंदगी दी भी जा रही है। बहुत हैं जो फंदे से लटक जाते हैं आई लव यू बोल के। उन्होंने जान दे दी। ये तो बता दे, जान पता भी थी क्या चीज़ है?

श्रोता: उसी क़व्वाली में आगे आता है, "शब्दों से तुम बहल रहे हो।”

प्रश्नकर्ता: माना माने मतलब, “शब्दों से तुम बहल रहे हो, और माना हाथ न आए।" उसका जो मान है, अर्थ है, तुम्हें कुछ नहीं पता।

एक काम ज़रूर करिए, जिसने जीवन की शिक्षा ली नहीं उससे जीवन के बारे में कुछ भी मत सुनिए। चाहे वह दोस्त हो, परिवार हो और चाहे ट्रिलियनेयर हो।

और सोचो, जिसने जीवन की शिक्षा ली नहीं अगर वो ट्रिलियनेयर बन सकता है, तो इससे ट्रिलियन डॉलर के बारे में क्या पता चलता है? कि एकदम मूर्ख हो के भी तुम कमा सकते हो। इससे अब पैसे के प्रति तुम्हारी आसक्ति घटेगी, तुम कहोगे, "अगर यह भी कमा सकता है, तो मुझे नहीं कमाना।" हाँ, उस व्यक्ति के पास कुछ भौतिक उपलब्धियाँ हैं, जिसका हमें सम्मान करना चाहिए, करना होगा। एक नहीं, तीन-चार क्षेत्र हैं, जिसमें उसने कुछ नया करा है। बौद्धिक क्षमता है उसके पास। वहाँ पर अगर वो कुछ बोलने आएगा, तो मैं भी सुनने जाऊँगा।

पर कृपा करें और जीवन के बारे में, अस्तित्व के बारे में, पृथ्वी के बारे में कुछ न बोले, क्योंकि आपको पता ही नहीं है कि आपके भीतर का अँधेरा बोल रहा है। आप अपनी ही नीयत से वाक़िफ़ नहीं हैं। आप एक भटकता हुआ अहंकार हैं, जो पूरी पृथ्वी को और भटका रहे हैं, कम बोलें। और आप प्रभावित भी हो जाते हो, कोट-अनकोट लेकर मेरे पास आ जाते हो। अब मैं क्या करूँ? इतना ही होने वाला है कि मेरा एक्स अकाउंट अब होगा सस्पेंड।

प्रश्नकर्ता: 240 मिलियन उसके सब्सक्राइबर्स हैं एक्स पे।

आचार्य प्रशांत: तो इससे सब्सक्राइबर्स की मूर्खता के बारे में पता चलता है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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