ये Gen Z प्रोटेस्ट थी ही नहीं

ये Gen Z प्रोटेस्ट थी ही नहीं
वर्तमान प्रोटेस्ट "जेन ज़ी" का आंदोलन नहीं था, यह एक आइडियोलॉजिकल मामला था, जिसमें हर उम्र के लोग शामिल थे, न कि किसी ख़ास पीढ़ी के। असली संकट टेक्नोलॉजी, नीति या नेतृत्व का नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर के अंधेरे — डर, बेईमानी और अनजाने में जी रही इच्छाओं का है। गाली-गलौज, भीड़ का नशा और अंधा वोट, ये सब उसी भीतरी डर के लक्षण हैं। असली साहस बाहर शोर मचाने में नहीं, अपने भीतर की सच्चाई स्वीकारने में है। जब तक जनसाधारण की "सेल्फ एजुकेशन" न हो, सतही क्रांतियाँ कुछ नहीं बदलेंगी। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी प्रोटेस्ट का जो पूरा नेचर ही है, कुछ उस टाइप का उसका इमोशनल एक रजिस्टर है। इसमें एक यह भी हो रहा है कि यह वायरल इसीलिए है क्योंकि इट इज़ अ कॉम्बिनेशन ऑफ़ गाली प्लस ह्यूमर। तो जो मीम का फ़ॉर्मेट है, वो थोड़ा मॉकरी का, मिमिक्री का और सर्किकल है। *एंड दैट कॉम्बिनेशन सीम्स टू वर्क फ़ॉर द जेन ज़ी एंड दैट हैज़ काइंड ऑफ़ बिकम देयर पर्सनालिटी ऑल्सो।

आचार्य प्रशांत: कॉम्बिनेशन वर्क्स फ़ॉर एवरीबडी। इसमें जेन ज़ी जैसा कुछ ख़ास नहीं है। हम जेन ज़ी वैसे बोल रहे हैं जैसे कि कोई एलियन स्पीशीज़ अचानक से उतर आई है। जेन ज़ी माने क्या होता है? तीस साल से कोई भी कम है तो जेन ज़ी है। मोटे तौर पर अगर कोई तीस साल से नीचे का है आज तो वो जेन ज़ी हो गया। आधे तो यहाँ बैठे होंगे, हाथ उठाओ भाई, जेन ज़ी। ये लो, यही है जेन ज़ी। पर हम जेन ज़ी ऐसे बोल रहे हैं जैसे पता नहीं कि एक एलियन स्पेसशिप आया। और उसमें से एकदम ऐसे निकले नए ख़ून के, नए अंदाज़ के, नई पीढ़ी के सिकंदर। कुछ नहीं है जेन ज़ी ही तो थे, ये देखो खड़े तो थे। जेन ज़ी क्या होता है? इंसान है, जैसे हर कोई होता है, इंसान है। उसमें कुछ ख़ास थोड़ी है, ज़िंदगी भर मेरा इन्हीं जेन ज़ी से ही तो पाला पड़ा है। कोई मुझे आ करके बोलेगा, नहीं-नहीं, ये डरते नहीं हैं। ये डरते नहीं हैं? पूरी ज़िंदगी बीत गई मेरी इनसे डर निकालने में। मुझसे ज़्यादा ख़ुशी किसी को न हो अगर पता चले ये डरते नहीं हैं।

कितनी भी कोशिश कर लो कि न डरो, पर तब भी ये डरते रहते हैं। इतना समझाओ, मत डरो, मत डरो भाई, मत डरो, तब भी डरते रहते हैं। हाँ, अब जब भीड़ बहुत सारी इकट्ठी हो जाती है तो भीड़ में ऐसा लगता है कि हम निडर हैं। पर उनकी ज़िंदगी को देखो, ज़िंदगी के फ़ैसलों को देखो, ज़िंदगी में तमाम जहाँ उनको चुनाव करने पड़ते हैं, वो सब देखो। तुम्हें दिखाई देगा कि बहुत डरे हुए लोग हैं। और यह बात मैं बड़े अफ़सोस से बोल रहा हूँ क्योंकि दसियों सालों से मैं इसी पर काम कर रहा हूँ कि इनके भीतर से डर ख़त्म हो जाए। वो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा।

ये जेन ज़ी ऐसे जैसे जेन ज़ी कुछ नया ही निकल करके आ गया है। आसमान से परियाँ उतरी हैं और एक नई नस्ल का घोड़ा उतरा है। कुछ नहीं है भाई, इंसान है। जैसे हर इंसान में पुरानी वृत्तियाँ होती हैं और अहंकार होता है, वैसे इनमें भी है। और यह भी नहीं है कि एक जेन ज़ी प्रोटेस्ट थी। देखो, हर जनरेशन में कुछ होते हैं एक विचारधारा के और कुछ होते हैं दूसरी विचारधारा के। होते हैं न? अभी जो आप देख रहे थे, वह ऐसा कुछ नहीं है कि वह एक ख़ास जनरेशन के रिप्रेजेंटेटिव थे। वो एक ख़ास जनरेशन में भी एक आइडियोलॉजी के रिप्रेजेंटेटिव थे। वो एक आइडियोलॉजी को रिप्रेजेंट कर रहे थे, एक जनरेशन को नहीं। आपने उस आइडियोलॉजिकल रिप्रेजेंटेशन को जनरेशनल समझ लिया।

वो जो आप वहाँ देख रहे थे, जमावड़ा, वो आइडियोलॉजिकल था, जनरेशनल नहीं था। तो आप उस आइडियोलॉजी का नाम लेने की जगह उसको एक जनरेशन का नाम दिए दे रहे हो। “यह जेन ज़ी प्रोटेस्ट है।* अरे, जेन ज़ी प्रोटेस्ट नहीं है भाई। जेन ज़ी तो आपको बहुत सारी मिल जाएगी, हज़ारों-लाखों की तादाद में वो बाबाओं के यहाँ और अंधविश्वास की दुकानों में भी लाइन लगा के खड़े हैं। वो भी तो जेन ज़ी ही हैं। तो आप जेन ज़ी ऐसा क्या दिखा रहे हो कि जेन ज़ी विद्रोही होता है, क्रांतिकारी होता है और पुरानी व्यवस्था को बिल्कुल नहीं मानता है, जेन ज़ी। पुरानी व्यवस्था को बिल्कुल आगे बढ़ाने का काम भी ये जेन ज़ी ही कर रहे हैं।

तो आपने जिनको देखा, वो जेन ज़ी का एक बहुत छोटा सा क्रॉस सेक्शन है, जो एक ख़ास आइडियोलॉजी की तरफ़ झुका हुआ है। और वो क्रॉस सेक्शन आपको मिलेनियल्स में भी मिलेगा, वूमर्स में भी मिलेगा, जेन एक्स में भी मिलेगा, सब में मिलेगा। ये कोई जेन ज़ी प्रोटेस्ट नहीं थी, ये एक आइडियोलॉजिकल प्रोटेस्ट थी। आइडियोलॉजिकल। इसको जनरेशनल नाम मत दो कि ये तो एक जनरेशन थी, जो कि जेन ज़ी वर्सेस द अदर जनरेशंस। ऐसा कुछ भी नहीं है। इट इज़ वन आइडियोलॉजी वर्सेस अदर आइडियोलॉजीज़।

और इसीलिए वो जो आइडियोलॉजी थी, जो वहाँ रिप्रेजेंट हो रही थी, उसमें सिर्फ़ जेन ज़ी शामिल नहीं था। उसमें 35 साल वाले, 40 साल वाले, 50 साल वाले भी घुसे हुए थे, एग्जैक्टली फ़ॉर द सेम रीजन। क्योंकि अगर बात जनरेशनल होती तो उसमें सिर्फ़ उसी जनरेशन के लोग मौजूद होते। वो बात जनरेशन की थी ही नहीं, वो आइडियोलॉजी की बात थी, तो इसीलिए उसमें और जनरेशंस के लोग भी घुसे थे।

वो इतनी सारी आप जो फ़ोटो वग़ैरह देखते थे, ठीक है, वहाँ पर काफ़ी कुछ हो रहा था। ये चल रहा था, वो चल रहा था, पुलिस का लाठी चार्ज हुआ, आपने ये सब देखा। आपको क्या लग रहा था? वो जो फ़ोटोज़ में आते थे, वो दसवीं- बारहवीं के बच्चे थे?

प्रश्नकर्ता: बहुत सारे तो 30-35।

आचार्य प्रशांत: 30-35, 40 साल वाले थे वो सब थे। द ग्लू, द एडेसिव वाज़ आइडियोलॉजिकल, नॉट जनरेशनल। और ये बात लोग समझ नहीं पा रहे हैं, लोगों को लग रहा है एक नई पीढ़ी आ गई है, एकदम नई सोच लेकर के और वो बिल्कुल पुरानी जितनी भी कालिक थी उससे अछूती है और अब वो कल्याण कर देगी। कोई बोल रहा है, ओह नो, यू नो, द सिस्टम मेस्ड विथ द रॉन्ग जनरेशन। कम ऑन, कम ऑन। देयर इज़ नथिंग स्पेशल इन दैट जनरेशन। नथिंग एट ऑल। आई विश दे वर स्पेशल, बट दे आर नॉट। दे आर जस्ट लाइक एनी अदर ह्यूमन बीइंग।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दो क्वेश्चन हैं। एक तो फिर यह इसे जेन ज़ी प्रोटेस्ट लेबल करने में किसका फ़ायदा है? लाइक, व्हाई इज़ इट देन बीइंग लेबल्ड ऐज़ जेन ज़ी प्रोटेस्ट?

आचार्य प्रशांत: आप ये छुपाना चाहते हो कि वो जेन ज़ी नहीं है, वो एक आइडियोलॉजिकली ड्रिवन कुछ यूथ का एग्रीगेशन है। वो लोग जब इकट्ठा हो जाते हैं तो ऐसा लगता है कि बहुत सारे लोग हैं। आप छुपाना चाहते हो कि वो एक आइडियोलॉजिकल कॉन्ग्रिगेशन है, आप दिखाना चाहते हो कि वो एक पूरी पीढ़ी का विद्रोह है। ऐसा कुछ भी नहीं है। काश कि वो एक पूरी पीढ़ी का विद्रोह होता, पर वो है नहीं न। वही पीढ़ी, आप बोल तो रहा हूँ न, अंधविश्वास की दुकानों पर भी देखोगे। उसी पीढ़ी को आप देखोगे कि माँ-बाप ने बोल दिया डॉक्टर बन, तो सर झुका करके चल दिया नीट का एग्जाम देने। उसी पीढ़ी को आप देखोगे, जा शादी कर, तो सर झुका के चल दिया शादी करने। वो पीढ़ी विद्रोही है कहाँ, मैं तो चाहता हूँ वो विद्रोही हो पर वो विद्रोही है नहीं। वो विद्रोही नहीं है।

प्रश्नकर्ता: तो मतलब जो ये ऑनलाइन जेन ज़ीज़ का फिर एक इमेज बना है, मतलब एक सपोज़ एक ये इमेजरी है, एक ये एक ऑनलाइन जेन ज़ी है। उसका एक पर्सोना है। और एटलीस्ट अभी तो जो सोशल मीडिया में वो पर्सोना एक बहुत करेजियस, बहादुर, विद्रोही टाइप का पर्सोना है।

आचार्य प्रशांत: वो जो जानते नहीं हैं, वो उसके बहकावे में आ जाएंगे। और उनके माँ-बाप को पता होगा ख़ुद ही। कहेंगे, वो अपने-अपने बेटे की फ़ोटो देखेंगे सोशल मीडिया में। कहेंगे, इसको तुम करेजियस बता रहे हो, हम जानते हैं ना, ये कैसा है। रात में मम्मी को उठाता है, “मम्मी, डर लग रहा है, अंधेरे में कैसे बाहर निकलूँ।”

प्रश्नकर्ता: पर झूठा ही सही, क्या उसको देख के पूरी जनरेशन इंस्पायर हो सकती है?

आचार्य प्रशांत: ये न हो जाए न, क्योंकि जो इसी जेन ज़ी में जो मेजॉरिटी है, वो तो दूसरे आइडियोलॉजिकल एफिलिएशन की है न। कहीं वो न ऐसा ही धरना-प्रदर्शन करने को इंस्पायर हो जाएँ। ये ख़तरा है कि अगर 10% लोग इतना कर सकते हैं तो अब 90% पता नहीं क्या-क्या कर सकते हैं। कहीं वो न यही राह पकड़ ले, ये ख़तरा और है।

देखो, बोल्डनेस उसमें नहीं होती कि जैसे हमने बोल दिया कि बोल्ड मूवी आई है क्योंकि उसमें सेक्सुअल सीन्स हैं या कि फलाना एक्ट्रेस बोल्ड है क्योंकि एकदम कम कपड़े पहन के आ जाती है। बोल्डनेस की और करेज की ये परिभाषा बड़ी उथली है, बड़ी हास्यास्पद है। कि आप बोल दो, यू नो, दे आर सो करेजियस, दे आर सो बोल्ड, क्योंकि वो गाली दे सकते हैं और वो रिवीलिंग कपड़े पहन सकते हैं। ये ये कौन सी डेफ़िनेशन है?

असली बोल्डनेस चाहिए होती है आईना देखने में। असली बोल्डनेस चाहिए होती है अपनी ज़िंदगी की सच्चाई स्वीकार करने में।

और वो सच्चाई बड़ी कड़वी होती है। उसको कहते हैं बोल्डनेस। आप लोग कहे पड़े हो कि करेजियस हैं और बोल्ड हैं। काश कि होते, मैं उनको नीचा नहीं दिखा रहा। मैं तो चाह रहा हूँ कि करेजियस बने और बोल्ड बने। लेकिन हैं नहीं, हैं नहीं। असली दम चाहिए होता है अपने ही भीतर के अंधेरे का सामना करने में। उस अंधेरे से बचने के लिए, उसका सामना ना करना पड़े, इसके लिए तो हम बहुत सारे काम कर सकते हैं। इसके लिए हम बाहर निकल करके ख़ूब शोर मचा सकते हैं, ये कर सकते हैं, वो कर सकते हैं। वो सब शोर मचाना भी कई बार बस एक विकल्प बन के रह जाता है असली काम के विरुद्ध। असली काम था अपना सामना करना, वो कर नहीं सके क्योंकि उतनी हिम्मत है नहीं। तो निकल पड़े बाहर कि अब यहाँ ये करेंगे, यहाँ वो करेंगे, वहाँ वो करेंगे।

हमें चाहिए बोल्डनेस। हमें करेज चाहिए, पर असली करेज चाहिए।

प्रश्नकर्ता: सर, ये जो यह जो प्रोटेस्ट था, इसकी एक बहुत लिमिटेड डिमांड थी कि हमें इस्तीफ़ा चाहिए शिक्षा मंत्री का। और जब इस्तीफ़ा हमें मिल गया तो उनका प्रोटेस्ट भी ख़त्म हो गया। तो एक तरफ़ से मतलब सरकार भी काफ़ी सस्ते में नहीं निपट गई और जो जनता भी थी वो भी ख़ुश हो गई। पर एक मतलब बहुत बड़ा जन आंदोलन हुआ था इसमें तो काफ़ी कुछ बदला जा सकता था, जैसे स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स थे, वो लाए जा सकते थे। तो सर क्या आपको लगता है कि एक ये अपॉर्चुनिटी मिस्ड है? मतलब सरकार ने उनकी एक छोटी सी डिमांड थी, वो मान ली। इतना बड़ा आंदोलन था तो कुछ।

आचार्य प्रशांत: इतना बड़ा नहीं था।

प्रश्नकर्ता: सोशल मीडिया पर तो काफ़ी था।

आचार्य प्रशांत: तुम सोशल मीडिया पर बैठो तो क्या हो सकता है? तुम क्या सोच रहे थे? आंदोलन से और क्या होता है? बताओ, क्या करना था? ट्रंप को गिराना था?

प्रश्नकर्ता: सर, मतलब शायद सरकार पे अगर प्रेशर बन गया था तो कुछ एजुकेशनल रिफॉर्म्स भी लाए जा सकते थे।

आचार्य प्रशांत: रिफॉर्म का एजेंडा ही नहीं था न। क्योंकि रिफॉर्म लाने के लिए पहले पता होना चाहिए ना कि वास्तविक रूप में क्या ख़राब है। रिएक्शनरी एजेंडा था, मुझे एक इस्तीफ़ा चाहिए, मुझे एक इस्तीफ़ा चाहिए। सिस्टमिक रिफॉर्म का तो एजेंडा ही नहीं था न, मुझे व्यवस्था ही सुधारनी है, ऐसी कोई सोच ही नहीं थी। और व्यवस्था सुधारने निकलोगे तो फिर पूछना पड़ेगा, व्यवस्था बनाई किसने है? वह राह ख़तरनाक हो जाती है अपने लिए भी कि व्यवस्था के स्टेकहोल्डर्स कौन हैं? यह सवाल पूछोगे तो फिर उंगली अपनी ओर मुड़ जाती है। तो इसीलिए सिस्टम को रिफॉर्म करना है या सेल्फ रिफ्लेक्शन करना है, ऐसा तो ऐसा कभी चाहा ही नहीं गया। एक ही चीज़ थी कि एक इस्तीफ़ा मिल जाए, इस्तीफ़ा मिल गया।

प्रश्नकर्ता: मतलब क्या ये फिर टोटल वेस्ट था?

आचार्य प्रशांत: अब यह सब मैं क्या बोलूँगा? वेस्टेज उसकी होती है जो इन्वेस्टेड हो। तुम कितने इन्वेस्टेड थे, ये तुम जानो। हम तो अपना काम कर रहे थे, तो हमारे लिए तो कुछ वेस्ट नहीं हुआ। हमें तो पता है कि सही काम क्या है, हमारे पास तो एक सार्थक मिशन है। हम तो लगातार कर ही रहे हैं। तो हमारे लिए तो कोई वेस्टफुल एक्सपेंस नहीं हुआ, न टाइम ख़राब हुआ, न कुछ और। बाक़ी जिन लोगों ने अपने आप को वहाँ इन्वेस्ट कराया, यह सवाल उन्हें अपने आप से पूछना चाहिए कि वेस्टेज हुई कि नहीं हुई? आई एम नॉट द राइट पर्सन टू आंसर।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल था कि जब यह आंदोलन शुरू हुआ था तो शुरू में बहुत सारे सेलिब्रिटी थे, जो खुल के सपोर्ट नहीं कर रहे थे इस आंदोलन का। पर जब उनको हेट मिलना शुरू हुआ, जब उन पर क्रिटिसिज़्म आने लगे कि ये लोग जब इनकी फ़िल्में आनी होती हैं तो ये अपने टिकटें बिकवाने के लिए कहीं भी जाते हैं, पर जब बात देश की है, एजुकेशन की है, तब ये सामने नहीं आ रहे हैं। तो, यह तब भी उन्होंने कुछ बोला नहीं। पर जब यह आंदोलन अपने लास्ट चरम पर थी, तब इन्होंने बस एक फ़ॉर्मेलिटी के तौर पर बस एक स्टोरी डाल दिया, या पर वो खुल के कभी सामने नहीं आए।

इसमें ऐड ऑन है कि जब हम मतलब हम जब ऐसा देखते हैं तो हम तो इतना समझ लेते हैं कि यह हमारे रोल मॉडल बनने के लायक नहीं है। फिर तब ये होता है कि एक वैक्यूम क्रिएट होता है और हम फिर हम ये देखते हैं जो सिस्टम के विरुद्ध बोल रहे हैं और या फिर जो ऐसे हैं जो मतलब जस्ट अपोज़िट हैं इनके, हम उनको रोल मॉडल मानने लगते हैं। तो यह सिर्फ़ यह बस यह चेहरा बदल जाता है या फिर यह सच में…?

आचार्य प्रशांत: सवाल आप पर है, क्या आप सिर्फ़ अंधेरे को एक नया चेहरा देने से संतुष्ट हो, या आप अंधेरे को मिटा देना चाहते हो? आपको समस्या अंधेरे के एक ख़ास चेहरे से है या अंधेरे से ही समस्या है? ज़्यादातर ऐसा लगता है जैसे हमें अंधेरे के एक ख़ास चेहरे से समस्या है। लाओ नया चेहरा ले आ दो, हम ख़ुश हो जाते हैं। कुछ दिनों के लिए दिल बहल जाता है। फिर वही ढाक के तीन पात।

देखो, जो विरोध कर रहे हैं न, वो ख़ुद उसी सिस्टम में स्टेकहोल्डर्स हैं जिसका वो विरोध कर रहे हैं। समझो इस बात को। उस दिन पूछा था न मैंने, क्या इसी सिस्टम के करप्शन से बहुतों का घर नहीं चल रहा है? अब आप उदाहरण के लिए नीट का एग्जाम देते हो, सबका सिलेक्शन नहीं हो जाता। अब पता नहीं होता है कि नहीं होता है, पहले जब सिलेक्शन नहीं होता था, एक-एक डोनेशन या मैनेजमेंट फ़ीस के नाम से चलता था। अभी होता है? मैनेजमेंट कोटा होता था, उसमें डोनेशन दे देते थे। नहीं है यह ऑप्शन नहीं है, तो एक दूसरा ऑप्शन तो है ना और ज़्यादा पैसे देकर के बाहर से आकर एमबीबीएस कर लो। ये भी तो है न। अभी भी बताओ, कंपटीशन फेयर कहाँ है? कहाँ फेयर है?

किसी के बाप ने ख़ूब करप्शन से, ख़ूब पैसा, काला पैसा, ब्लैक मनी इकट्ठा कर रखा है, वो अपने बेटे को बना देगा डॉक्टर। बहुत तरीक़ों से हम ख़ुद उस अंधेरे में पार्टिसिपेंट्स हैं। और इसीलिए वो अंधेरा कभी हटेगा नहीं, जब तक हम शुरुआत अपने आप से नहीं करते, अपने घर से नहीं शुरुआत करते। आप अपने आप को कंसोल कर रहे हो, सांत्वना दे रहे हो यह सोच करके कि सारी गड़बड़ उधर कहीं है। उधर भी गड़बड़ है, पर सिर्फ़ उधर ही गड़बड़ नहीं है गड़बड़ चारों तरफ़ है। और उस गड़बड़ का केंद्र आम आदमी के दिल में है, सफ़ाई वहाँ से शुरू करनी पड़ेगी।

मुझे कोई परेशानी नहीं है इस्तीफ़े की माँग से, अकाउंटेबिलिटी अच्छी चीज़ है। कोई वहाँ मिनिस्टर बैठा है, उसका काम है कि फेयर, ट्रांसपेरेंट एंट्रेंस एग्जाम हो, होने चाहिए। मैं ख़ुद फेयर और ट्रांसपेरेंट एग्जामिनेशन सिस्टम का बेनिफिशरी हूँ। अभी उन्हीं की बात कर रहा था, अगर फेयर कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन सिस्टम नहीं होता तो मुझे भी चोट पड़ती। मैं उसका बेनिफिशरी रहा हूँ, तो मैं चाहता हूँ कि हो, फेयर हो, सब हो। लेकिन आप जब तक यह नहीं समझोगे कि वो फेयरनेस बार-बार कॉम्प्रोमाइज़ क्यों होती है, वो आगे भी कॉम्प्रोमाइज़ होती रहेगी।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल यह था कि अगर फ़ियर की वजह से अगर चेंज आ रहा है तो जैसे इस गवर्नमेंट के बारे में बहुत मिनिस्टर्स ही उसने कहा था कि ये गवर्नमेंट वो है जिसमें रेजिग्नेशंस नहीं होते हैं। और इसमें फिर ये रेजिग्नेशंस बहुत बड़ा स्टेप माना जा रहा है। बहुत से जो पॉलिटिकल लीडर्स हैं उनके द्वारा भी तो, और जब जो इनके लीडर्स थे, इनसे पूछा गया था कि एक रेजिग्नेशंस से क्या होगा? आपकी डिमांड्स इतनी छोटी हैं। तो उन्होंने बोला था कि एक डर कम से कम उनके पास आएगा जो अभी तक नहीं था, ताकि उनको यह ना लगे कि हमसे कोई सवाल का जवाब माँगने वाला नहीं है। उनको यह दिखेगा कि अगर तुम गड़बड़ करते हो।

आचार्य प्रशांत: आपने प्रॉब्लम की फ्रेमिंग ही ग़लत करी है। आप प्रॉब्लम फ्रेम कर रहे हो, इस बात को सब लोग बहुत ध्यान से समझना। आप प्रॉब्लम फ्रेम कर रहे हो प्रोटेस्टर्स वर्सेस गवर्नमेंट। आपकी यही फ्रेमिंग है न? प्रोटेस्टर्स इधर हैं, ये प्रोटेस्टर्स हैं और यहाँ पर गवर्नमेंट है। ठीक है? आपने इस तरीक़े से नहीं। ये जो एक्चुअल फ्रिक्शन था, दैट वाज़ बिटवीन प्रोटेस्टर्स एंड वोटर्स। प्रोटेस्टर्स हैं 20,000 और वोटर्स हैं 100 करोड़। उन 100 करोड़ में से 40% या 50% उनके साथ हैं, जो गवर्नमेंट में बैठे हैं। उनके साथ हैं।

तुम ऐसे क्या कह रहे हो जैसे कि यह सरकार या कोई भी सरकार कहीं आसमान से उतरती हो, वो आसमान से नहीं उतरी है। इस देश की इलेक्टोरेट ने, वोटर ने, जनता ने जाकर के बाक़ायदा बटन दबा करके उनको गद्दी पर बैठाया है। तो जब आप कह रहे हो कि ये सरकार ठीक नहीं है, तो आप समझ रहे हो न आप किसको बोल रहे हो कि ग़लत है। आप कह रहे हो कि वो जो वोटर है, वो ग़लत है। और मैं हो सकता है, मैं मान रहा हूँ वो वोटर ग़लत हो। और अगर वो वोटर ग़लत है, जा करके उस वोटर को ठीक करो ना। उस वोटर को ठीक नहीं करोगे तो यह सरकार हट जाएगी, कोई दूसरी सरकार आ जाएगी।

आपने पूरी प्रॉब्लम ग़लत फ्रेम कर दी है। आपने एक प्रॉब्लम इस तरीक़े से फ्रेम करी है कि ऐसा लगे कि आपने बहुत हिरोइक काम कर दिया। या आप कह रहे हो प्रोटेस्टर्स वर्सेस दैट गवर्नमेंट। नहीं, दैट गवर्नमेंट वाज़ इंस्टॉल्ड देयर बाय अ ह्यूज मास ऑफ़ वोटर्स। जाके उन वोटर्स से पूछो कि उस गवर्नमेंट को वहाँ क्यों बैठाया? और अगर नहीं पूछ रहे हो उन वोटर्स से, तो यह सरकार गिराओगे, ऐसे ही दूसरी सरकार आ जाएगी। बल्कि जिन वोटर्स ने इस सरकार को यहाँ बैठाया है, उन्हें नाराज़गी हो गई कि तुमने हमारी चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा ले लिया, ये सब कर लिया, तो वो और ज़्यादा अपनी पोज़ीशन को हार्डन कर देंगे। वो और ज़्यादा अपनी पोज़ीशन पर डबल डाउन कर जाएँगे।

ये शब्द समझ रहे हो? वो कहेंगे, अच्छा, तुमने हमारी चुनी हुई सरकार के साथ बदतमीज़ी करी। अब देखो, इस बार हम और ज़्यादा इनको वोट देंगे।

आपकी प्रॉब्लम फ्रेमिंग ही ग़लत है।

आप इस बात को मानना ही नहीं चाह रहे हो कि क्रांति कुछ गिने-चुने बंदों के ख़िलाफ़ नहीं करी जा सकती। क्रांति करनी होती है तो मनुष्यता के सामूहिक अंधेरे के ख़िलाफ़ करनी होती है।

मैं कह रहा हूँ, आओ मेरे साथ। हम हर आम आदमी को जगाने का काम करेंगे न। और हमारा एजेंडा यह नहीं होगा कि यह सरकार ग़लत है और वह सरकार सही है। हम इंसान से पूछेंगे कि तुम यह बताओ, तुम कोई भी चुनाव कैसे करते हो? बात यह नहीं है कि तुमने सरकार कैसे इलेक्ट् करी? तुम मुझे बताओ, तुम करियर कैसे सेलेक्ट करते हो? तुम मुझे बताओ, तुम लाइफ़ में पार्टनर कैसे सेलेक्ट करते हो? तुम्हें कुछ भी तो चुनना नहीं आता क्योंकि तुम ख़ुद को ही नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? मुझे चाहिए क्या? उसके बिना बस आप अपनी पीठ थपथपाते रह जाओगे कि हमने बहुत अच्छा काम कर दिया और आप समझो भी नहीं कि आपकी लड़ाई किससे है। आपकी लड़ाई किसी सरकार से नहीं है, आपकी लड़ाई एक फेसलेस डार्कनेस से है। और वो डार्कनेस क्योंकि आपके भी अंदर है, इसीलिए आप उस डार्कनेस से पंगा नहीं लेना चाहते।

सरकार से पंगा लेना आसान है, सरकार बाहर है। सरकार को जिस डार्कनेस ने वहाँ इंस्टॉल कराया है, वह डार्कनेस आपके भी अंदर है। आप प्रोटेस्टर हो, आपके अंदर भी वही डार्कनेस है। तो इसीलिए आप उस डार्कनेस के विरोध में कुछ नहीं करना चाहते हो। कोई सरकार अच्छी नहीं होती, कोई सरकार बुरी नहीं होती। सब सरकारें, जो आम आदमी है, जो वोटर है, उसका प्रतिबिंब होती हैं। आम आदमी ही अगर बेहोश है तो एक के बाद एक वो उल्टी-पुल्टी सरकारें ही चुनेगा।

प्रश्नकर्ता: प्रोटेस्टर्स का तो यह कहना है कि आज तक जो भी वो लोग उनको अंधभक्त कहते हैं कि वो लोग क्वेश्चन नहीं करते थे। हम तो क्वेश्चन करते हैं। हमने तो क्वेश्चन करा है, इसीलिए।

आचार्य प्रशांत: आप करिए क्वेश्चन। क्वेश्चन करना आपका डेमोक्रेटिक राइट है। पर आप क्वेश्चन करते रहोगे। सरकारें उसी तरह की आती रहेंगी। बात यह नहीं है न कि आपने व्यक्तिगत तौर पर क्या क्वेश्चन करा? बात यह है कि अगर आप चाहते हो कि देश को बेहतर सरकार मिले तो क्या आपने बाहर निकल करके आम आदमी को जागृत किया? क्योंकि वोट तो सब देंगे, डेमोक्रेसी है भाई। तुम किसी का वोट नहीं छीन सकते। तुम चाहते हो कि लोग बेहतर वोट दें तो जाकर के उनसे बात करो, उनको अवेकन करो।

पर फिर उसमें अपना अहंकार भी तो आ जाता है। आम आदमी को अवेकन नहीं किया जा सकता, अवेकनिंग तो कुछ ख़ास लोगों का प्रिरोगेटिव है। आम आदमी क्या है? कुछ भी नहीं है। आम आदमी तो आम आदमी है, यह बेकार है। हम कुछ अवेकेंड लोग हैं, हम जाकर के क्रांति करके सत्ता परिवर्तन कर देंगे। यह सिनिकल एटीट्यूड है आम आदमी के प्रति, यह आम आदमी के प्रति अपमान का भाव है। मैं आम आदमी के प्रति वो अपमान नहीं रखता, मैं आम आदमी से कह रहा हूँ कि तुम जान सकते हो, तुम जग सकते हो, जगो। और जब आम आदमी जगेगा तो बड़ी से बड़ी क्रांतियाँ अपने आप हो जाती हैं, चुपचाप हो जाती हैं। नारे लगाना कोई आवश्यक नहीं रह जाता।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये रिफॉर्म्स के रिलेटेड ही एक और क्वेश्चन था कि अभी टेक्नोलॉजी पर बहुत चल रहा है कि टेक्नोलॉजी माइट सॉल्व द इश्यूज़ दैट हैव बीन ब्रॉट आउट। और एक साइड में तो वो है और जो टीम भी खड़ी की गई है, उसको जो लीड कर रहे हैं वो इंडिया के लीडिंग टेक्नोलॉजिस्ट हैं। और सारी जो चर्चा हो रही है, वो भी यह है कि टेक्नोलॉजी से हम कैसे अकाउंटेबिलिटी ड्राइव करेंगे सिस्टम में। और एक दूसरा जो है वो है यह फास्ट ट्रैक कोर्ट का। अब उसके लिए भी आपको एक जुडिशरी रिफॉर्म चाहिए रहती है।

और अगर आप जुडिशरी भी देखेंगे तो इंडिया इज़ अबाउट 51 मिलियन पेंडिंग केसेस इन इट्स कोर्ट। तो एक एजुकेशन रिफॉर्म है, जुडिशरी रिफॉर्म है और ब्यूरोक्रेसी रिफॉर्म भी है। और उसके साथ-साथ पूरा जो एक कवर है, वो टेक्नोलॉजी का दिया जा रहा है कि टेक्नोलॉजी विल सेव एवरीथिंग। और एक बहुत इंटरेस्टिंग जो मैं पढ़ रही थी, वो यह था कि एक आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर ने कहा है दैट ह्यूमन इंटेग्रिटी एंड नॉट टेक्नोलॉजी इज़ द रियल इशू बिहाइंड द होल थिंग दैट हैज़ हैपेंड। तो उनका ये स्टेटमेंट काफ़ी...।

आचार्य प्रशांत: जब टेक्नोलॉजी नहीं थी जितनी आज अवेलेबल है, उससे भी कम थी, तो और ज़्यादा फिर लीक्स हुई होंगी शायद। माने 50, 60, 70, 80 के दशक में तो लीक्स ही लीक्स होती होंगी क्योंकि तब तो टेक्नोलॉजी अवेलेबल ही नहीं थी न। आज आपको जितनी टेक्नोलॉजी अवेलेबल है इतनी पहले कभी थी? और आज जितनी ज़्यादा लीक्स हो रही हैं, इतनी पहले कभी होती थी? तो समस्या क्या ये है कि टेक्नोलॉजी की कमी है? टास्क फ़ोर्स बनाई गई है कि टेक्नोलॉजी के माध्यम से हम लीक्स रोक देंगे। जबकि टेक्नोलॉजी की कमी रियल रीजन है ही नहीं, वास्तविक समस्या यह है ही नहीं कि लेटेस्ट टेक्नोलॉजी नहीं लगाई जा रही। वो है ही नहीं।

वास्तविक समस्या क्या है वह हम जानना नहीं चाहते, तो हम ख़ुद को ही यह समझा लेते हैं कि अ टेक्निकल सॉल्यूशन, अ टेक्निकल इंटरवेंशन विल सॉल्व इट फ़ॉर अस। व्हेयर ऐज़ द प्रॉब्लम डज़ नॉट लाई मच इन द टेक्निकल डोमेन एट ऑल। और बिल्कुल ठीक कहा, आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर हैं?

प्रश्नकर्ता: प्रोफ़ेसर हैं।

आचार्य प्रशांत: हाँ, उन्होंने बिल्कुल ठीक बोला कि यह मुद्दा टेक्निकल गैप का है ही नहीं। यह मुद्दा ह्यूमन इंटीग्रिटी का है। जहाँ इतने सारे लोग पेपर ख़रीदने को तैयार हों, इतने सारे लोग तैयार हैं कि पेपर मिले, हम ख़रीद लेंगे। इतने सारे लोग बेईमानी करने को तैयार हैं। वहाँ पर पेपर लीक करने वाले को बहुत बड़ा इंसेंटिव मिल जाता है। 24 लाख स्टूडेंट्स, 24 लाख परिवार, 24 लाख उम्मीदें, 24 लाख बैंक अकाउंट्स, जो तैयार हैं किसी के खाते में अमाउंट ट्रांसफ़र करने के लिए। 24 लाख तैयार बैठे हैं, अब बताओ, जो लीक कर सकता है, उसको लीक करने का ज़बरदस्त इंसेंटिव है कि नहीं है?

जब तक इंसान के भीतर की बेईमानी को तुम संबोधित नहीं करोगे, तब तक यह सोचना कि ऐसी टेक्नोलॉजी, वैसी टेक्नोलॉजी... इंसान ही तो बना रहा है टेक्नोलॉजी। दूसरा इंसान उस टेक्नोलॉजी का हैक नहीं निकाल लेगा क्या? या वो इंसान ख़ुद ही अपनी टेक्नोलॉजी का हैक नहीं निकाल लेगा क्या? तुम जो करना चाहते हो भीतर ही भीतर, तुम ख़ुद ही क्या उसके विरुद्ध टेक्नोलॉजी बनाओगे? टेक्नोलॉजी तुम्हारी नीयत की ग़ुलाम होती है। तुम जो करना चाहते हो, उसके लिए तुम टेक्नोलॉजी बनाते हो। तुम्हारी अगर भीतरी नीयत ही बेईमानी करने की है, तो क्या तुम ऐसी टेक्नोलॉजी बनाओगे जो तुम्हें बेईमानी करने से रोक दे? तुम ख़ुद ही बनाओगे टेक्नोलॉजी और ख़ुद ही उस टेक्नोलॉजी का हैक भी निकाल लोगे पीछे-पीछे।

दिन में टेक्नोलॉजी बनाओगे, रात में उसका हैक निकालोगे। दिन में एक तरह की कोडिंग करोगे, रात में दूसरी तरह की कोडिंग करोगे। द प्रॉब्लम इज़ नॉट टेक्निकल। और अभी करेज की बात हो रही थी, रियल करेज लाइज़ इन एडमिटिंग दैट द प्रॉब्लम इज़ नॉट टेक्निकल। आपको यह स्वीकार करना होगा कि वास्तविक समस्या जो है, एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ की है। वास्तविक समस्या यह है कि पेरेंट्स ही एजुकेटेड नहीं हैं। वास्तविक समस्या यह है कि माँ-बाप और बच्चों में असली प्यार है ही नहीं। वास्तविक समस्या यह है कि पूरा समाज अंधा है। इसे यह नहीं पता शादी हम क्यों कर रहे हैं, इसे यह नहीं पता हमने बच्चा क्यों पैदा कर दिया। और जब बच्चा पैदा हो जाता है तो फिर उसको धकेलने लग जाता है कि जा, तू डॉक्टर-इंजीनियर बन, या आईएएस बन, या सीए बन, या कुछ कर, हमारा नाम रोशन कर।

है नहीं गाना? "मेरे बाद भी इस दुनिया में ज़िंदा मेरा नाम रहेगा, जो भी तुझे देखेगा तुझे मेरा लाल कहेगा।"

प्रश्नकर्ता: पापा कहते हैं।

आचार्य प्रशांत: अरे नहीं, वहाँ "पापा कहते हैं, बड़ा नाम करेगा बेटा हमारा ऐसा।" तुम्हें अपना नाम करना है, ख़ुद कर लो। उसके ऊपर काहे चढ़ रहे हो, तुमने उसको इसलिए पैदा करा था, तुमने उससे पूछा था पहले कि तुझे पैदा कर रहा हूँ अब तुझे मेरा नाम करना पड़ेगा? जब बच्चे को पैदा करते हो तो उससे लिखवा लिया करो ना कि तुझे हम पैदा कर रहे हैं और तुझे हम परवरिश इसी शर्त पर देंगे कि तू आगे हमारे कहे अनुसार ग़ुलामों की तरह जिएगा। यह पहले उससे कॉन्ट्रैक्ट कर लिया करो।

बस एहसान जताते रहते हो कि हमने तुझे पैदा कराया, हमने तेरी परवरिश में इतना पैसा ख़र्च कराया। उसने एप्लीकेशन दी थी पैदा करो? अब इतने पैसे ख़र्च करो, अब ये करो, अब वो करो? वो रिक्वेस्ट करने आया था? तुमने अपने सुख के लिए उसको पैदा करा। तुमने अपने हिसाब-किताब, गणित के हिसाब से उसकी परवरिश करी और अब तुम उस पर एहसान चलाते हो।

यह बात, यह बात आदमी के साइकोलॉजिकल डीएनए की है। जब तक वही नहीं बदलेगा, जब तक हमारे लिए रिश्ते का मतलब ही एक्सप्लॉयटेशन होगा, तब तक यह सब चलता रहेगा। और एक्चुअल करेज चाहिए इस समस्या को वहाँ पकड़ने के लिए जहाँ यह शुरू होती है। यह शुरू होती है इंसान के भीतर के अंधेरे में और वो कोई ऐसी इनअक्सेसिबल जगह नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सकता। हमारे पास समाधान करने का तरीक़ा मौजूद है, हम कर भी रहे हैं।

अभी हम आप बात कर रहे हैं, यह उसी अंधेरे का इलाज चल रहा है। दिक़्क़त बस यह है कि यह समाज इस बात को समझना नहीं चाहता, इसीलिए इस काम को स्केल नहीं मिल रही है। पहले मैं बोला करता था एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ। अब बोलता हूँ मास एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ। और मास को बहुत ज़ोर से बोलता हूँ क्योंकि मैं अपने जीवन काल में कुछ लाख लोगों तक इसको पहुँचा चुका हूँ और आगे मान लो कुछ लाख लोगों तक और पहुँचा दूँगा। लेकिन हम 150 करोड़ लोग हैं सिर्फ़ भारत में और दुनिया में 850 करोड़ लोग हैं। उन तक कौन पहुँचाएगा? और उन तक नहीं पहुँचाओगे तो यही अंधेरा कभी पेपर लीक के रूप में सामने आएगा, कभी बलात्कार के रूप में सामने आएगा, कभी दंगों के रूप में सामने आएगा। क्लाइमेट चेंज के भयानक रूप में सामने आ ही रहा है। कभी-कभी न्यूक्लियर वॉर की थ्रेट के रूप में सामने आएगा।

जितनी भी दुनिया की समस्याएँ हैं, इंसान के उसी भीतरी अंधेरे की वजह से हैं। पर हम उसका सामना नहीं करना चाहते। वहाँ लगती है बोल्डनेस, वहाँ लगती है करेज। उसकी जगह हम एडहॉक और सुपरफ़िशियल रिवॉल्यूशंस करना चाहते हैं। और हम ख़ुश हो जाते हैं कि हमारा कोई ऑब्जेक्टिव मीट हो गया। आपकी यह जो ख़ुशी है, यह भारी पड़ेगी क्योंकि आप ख़ुद को ही कांग्रेचुलेट कर लोगे कि वी सक्सीडेड, व्हेन एक्चुअली यू हैवेंट। द रूट ऑफ़ द प्रॉब्लम स्टैंड्स ऐट इट्स प्लेस। लेकिन आप ख़ुश हो रहे हो कि हमने तो तीर मार लिया और वो जो प्रॉब्लम है वो इतनी घनी है कि उसी प्रॉब्लम की वजह से अब हम सिक्स्थ मास एक्सटिंशन फेज में घुस चुके हैं। बहुत लोगों को यह बात बड़ी अजीब लगी।

कहेंगे, सो फ़ार फेज। आप पेपर लीक को और क्लाइमेट कैटस्ट्रोफी को कनेक्ट कर रहे हो? हाँ, मैं कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पता है इन दोनों का ओरिजिन एक ही है। रिलीजियस फंडामेंटलिज़्म और जियोपॉलिटिकल फ्रैक्चर्स, क्या डिस्कनेक्टेड है? नहीं, उनका ओरिजिन एक ही है। हर बीमारी का जो ओरिजिन है, वो है आदमी के भीतर का अंधेरा। और आप उसको एड्रेस नहीं करना चाहते हो। आप कभी टेक्नोलॉजी में शरण लेते हो। आप कभी प्रोस्पेरिटी में शरण लेते हो। आप कभी पॉलिसी में शरण लेते हो। लेकिन जहाँ आपको काम करना चाहिए, आप वहाँ काम नहीं कर रहे हो। उस एक काम से आप इतना डर रहे हो, इतना बच रहे हो। बताओ, मैं आपको बोल्ड बोलूँ, करेजियस बोलूँ या डरपोक बोलूँ? और यह मैं सिर्फ़ युवाओं से नहीं पूछ रहा हूँ, यह मैं पूरे संसार से पूछ रहा हूँ। एक-एक इंसान से पूछ रहा हूँ कि बताओ, तुमको करेजियस बोलूँ कि डरपोक बोलूँ?

ऐसा नहीं है कि तुम समझते नहीं हो कि समस्या की जड़ कहाँ है, उसके बाद भी तुम वहाँ जाना नहीं चाहते। यह डर का लक्षण है या साहस का?

प्रश्नकर्ता: जैसे आचार्य जी, वो जो बहुत सारे कमेंट्स आ रहे हैं इंस्टा में, उसमें लोग बहुत ज़्यादा यह बोल रहे हैं कि आप क्यों बोल रहे हो कि इसके पीछे क्यों दौड़ रहे हो? मतलब रैट रेस में क्यों लगे हुए हो? खाली किसी ने बोल दिया कि नीट की परीक्षा में बैठना है तो बैठ रहे हो। तो बहुत सारे कमेंट्स ऐसे हैं जो यह बोल रहे हैं कि बट ऑप्शन क्या है? चार ही तो एग्ज़ामिनेशन होते हैं इंडिया में। सीट्स इतने ही हैं।

आचार्य प्रशांत: देखो कि उन्होंने तुमको साइकोलॉजिकली इतना कैप्चर कर लिया है। कितना एनस्लेव कर लिया है कि अतीत ने, समाज ने तुमको जो चार ऑप्शन दिखा दिए, तुम चार के आगे कुछ देख ही नहीं पा रहे। यह कितने गहरे साइकोलॉजिकल हैंडीकैप है, बॉन्डेज है कि चार ही तो होते हैं। चार होते हैं, तुम्हें कैसे पता चार होते हैं? बताओ, कैसे पता तुम्हें कि चार होते हैं? क्योंकि चार हैं, जो तुमको पीयर्स ने बता दिए, पापा ने बता दिए, स्कूल ने बता दिए। किसी ने बताया नहीं तुम्हें कि एक अलग ज़िंदगी कैसी हो सकती है? तो वो तुम्हारे दिमाग़ में भी नहीं आ पा रही। तुम कह रहे हो हमें वही तो रिपीट करना है जो हमारे पेरेंट्स ने करा था। वास्तविक फ़्रीडम कुछ होती है, यह तुम समझ ही नहीं पा रहे।

मैं चाहता हूँ कि सिर्फ़ युवा नहीं, हम सब वास्तविक फ़्रीडम, वो स्वतंत्रता, हम सबका हक़ है। वो हमें मिले। पर उससे बचने के लिए हम कोई भी तर्क इजाद करेंगे। कि साहब, अब मुझे तो एग्ज़ाम तो देना ही है ना, क्योंकि चार ही तो एग्ज़ाम होते हैं। और उन चार एग्ज़ाम्स के अलावा तो कोई ऑप्शन ही नहीं होता। चार तो पता नहीं, पर मेरे समय में तीन हुआ करते थे, जिनको कहते थे कि इन तीन में से कोई एक भी निकाल ले तो अरे, ज़िंदगी बन गई उसकी। ज़िंदगी बन गई, इन तीन में से कोई एक भी निकाल ले: आईआईटी, आईआईएम, आईएएस, यूपीएससी एग्ज़ाम।

आपके सामने जो बंदा खड़ा है, उसने तीनों ही निकाले थे और तीनों को छोड़ करके आपके सामने खड़ा हुआ है। तो तुम कैसे कह रहे हो कि इन चार एग्ज़ाम्स के अलावा ज़िंदगी में और होता क्या है? खड़ा हूँ तुम्हारे सामने सबूत बन के कि कुछ होता है। मैं नहीं कह रहा, मैं जो कर रहा हूँ वही तुम भी करो। तुम देखो कि तुम कुछ और कर सकते हो, किसी ने तुम्हें बाँध नहीं रखा है उन्हीं चार एग्ज़ाम्स के रास्ते पर चलने के लिए। खोजो अपने लिए कोई पाँचवाँ रास्ता, छठा रास्ता, सातवाँ रास्ता खोजो।

प्रश्नकर्ता: पर उनको, आचार्य जी, जेनुइनली लगता है कि जैसे आप कोई एग्ज़ाम्पल ले लीजिए, जैसे आर्ट्स ले लीजिए या डिफेंस ले लीजिए या कॉमर्स ले लीजिए कि उसमें पैसे नहीं मिलते हैं। मतलब एक बेसिक जो सैलरी होती है, जॉब होती है, वो भी नहीं मिलते हैं। तो वो बहुत, मतलब मैं कैसे बताऊँ, सारे कमेंट्स वही हैं कि बोलना बहुत आसान है, बट।

आचार्य प्रशांत: पैसा तुम्हें कोई नहीं दे देगा, तुम अगर इंजीनियर या डॉक्टर बन के भी बैठ गए हो तो। पैसा कोई भी तुम्हें तब देता है जब तुम उसे एक जेन्युइन वैल्यू डिलीवर करते हो। नहीं तो हम भारत में जानते हैं कि इंजीनियर्स का अनइंप्लॉयमेंट रेट कितना है। हम अच्छे से जानते हैं। और यहाँ पर हर कोटि के बेरोज़गार घूम रहे हैं, वकील भी घूम रहे हैं, जिनके कुछ नहीं है। डॉक्टर भी घूम रहे हैं, जो कह रहे हैं कि ये इतना सब कुछ कर लिया, एमबीबीएस कर लिया, एमडी कर लिया, इतने पैसे भी लगा दिए, सब कर लिया। उसके बाद भी इसमें रिटर्न्स क्या आ रहे हैं? बहुत पीनट्स हैं।

आपको क्यों लग रहा है कि आप कोई ऐसा काम नहीं कर पाओगे जो दूसरों की नज़र में उपयोगी हो। आपको क्यों लग रहा है कि आप दूसरे की ज़िंदगी में कोई वैल्यू एडिशन नहीं कर सकते और दूसरे की ज़िंदगी में वैल्यू एडिशन करोगे तो ख़ुद ही आपको इतना दे देगा कि आपकी भी अपनी ज़िंदगी, आपकी जो भी फ़ाइनेंशियल रिक्वायरमेंट्स हैं, वो चल जाएँगी।

अब देखो, ये सवाल क्या डर का सूचक नहीं है कि मेरा क्या होगा, मेरी रोटी नहीं चलेगी, मेरी रोटी नहीं चलेगी। ये तो गहरे फ़ियर से आ रही है ना बात। फिर आप बोलते हो कि हम करेजियस हैं। आप करेजियस कहाँ हो? आप तो डरे हुए हो। यह वो करेज है जो फ़ियर को ढकने के लिए इस्तेमाल की जाती है। यह वह कॉन्फिडेंस है जो फ़ियर को सप्रेस करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें फ़ियर कहीं चला नहीं जाता, बस फ़ियर छुपा दिया जाता है। मैं कह रहा हूँ, हमें फ़ियर छुपाना नहीं है। हमें फ़ियर की जड़ तक जाना है और फ़ियर मिटा देना है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक इंटरेस्टिंग, इस प्रोटेस्ट के बारे में एक ज़इंटरेस्टिंग ऑब्ज़र्वेशनज़ यही था कि प्रोटेस्ट के सॉन्ग्स से काफ़ी, एक बोल सकते हैं कि इनटॉक्सिकेटिंग सा एक इफ़ेक्ट आ रहा था इंस्टाग्राम पर। यह मैंने ख़ुद पर ही ऑब्ज़र्व किया कि रंग दे बसंती, फ़ॉर एग्ज़ाम्पल, के गाने चला दिए गए। कुछ हम देखेंगे, ये वाले गाने। कुछ इंडि बैंड्स हैं उनके भी इस तरीके के गाने, जो आज़ादी के बारे में बात कर रहे हैं।

तो जैसे आपने उस दिन तामसिक पोएट्री के बारे में बात किया था, जो सुला देती है तुम्हें, वैसे ही मुझे यह लगा कि यह ऑपोज़िट डायरेक्शन में लेकर जाने वाली ये पोएट्री है। यह राजसिक दे देती है।

आचार्य प्रशांत: देयर इज़ प्लेज़र इन बिलॉन्गिंग एंड द मोर लोनली यू आर, द डीपर इज़ द क्रेविंग टू बिलॉन्ग, एंड देयर इज़ सिक्योरिटी इन बिलॉन्गिंग टू अ क्राउड। करेज चाहिए होती है उन लड़ाइयों में जो इंसान को अपने साथ, अपने अकेलेपन में लड़नी होती हैं। कहीं तो आ रहा था, किसने तो पूछा था कि मेरे कई दोस्त वहाँ गए, अगर मैं नहीं जाऊँगा तो मुझे फोमो हो रहा है। आई फील लेफ्ट आउट, आई डू नीड टू बिलॉन्ग। तो मैं भी चलो चला जाऊँगा।

प्रश्नकर्ता: इवन इफ इट इज़ अ टेंपरेरी क्राउड। क्योंकि आपने जैसे बताया कि ये लोग रैंडम लोग थे, जो वहाँ पहुँच गए।

आचार्य प्रशांत: अच्छा तो लगता ही है। आप अभी जाओ डिस्कोथीक जाओ। ठीक है? और वहाँ पर वही म्यूज़िक है, वही डीजे है और आपको अकेले नाचना है। ख़ुशी की बात होनी चाहिए। पूरा फ्लोर मेरा है, पर हालत टाइट हो जाएगी। जो लोग डिस्क वग़ैरह गए हैं, वो इमेजिन करें। पूरा ख़ाली पड़ा हुआ है, सब कुछ अवेलेबल है। आप जो कुछ भी खाना-पीना, जो भी आपका फ़ूड-ड्रिंक, सब अवेलेबल है। वही स्पीकर्स हैं। वही सब कुछ है। सेम पर्सन, सेम मिक्स, एवरीथिंग। फ्लोर आपका है सिर्फ़। आप नहीं नाचोगे। आप हो, आपका पार्टनर है, दो लोग हो, तो भी मुश्किल पड़ेगा। वन नीड्स अ क्राउड, दैट थ्रिल, एंड देन दैट म्यूज़िक इनटॉक्सिकेट्स।

प्रश्नकर्ता: इसमें एक और इंटरेस्टिंग चीज़ मैंने भी ऑब्ज़र्व की। जैसे बहुत सारे पब्लिक फ़िगर्स होते हैं, जो डायरेक्टली मतलब एंटी-एस्टैब्लिशमेंट कुछ भी व्यूज़ एक्सप्रेस करने से डरते हैं। बट जब उन्होंने देखा कि यहाँ पर क्राउड है, तो दे ऑल्सो केम आउट ऑफ़ देयर लिटिल-लिटिल केव्स एंड स्टार्टेड सपोर्टिंग द मूवमेंट।

आचार्य प्रशांत: मैंने बहुत प्यार से जेन ज़ी से, जो प्रोटेस्टिंग पूरा तबका था, उससे आग्रह करा था कि ये सब जो लोग तुम्हें सपोर्ट करने निकल आए थे, इनको लेकर के बहुत सावधान रहना। ये ऑपर्च्युनिस्ट्स हैं, ये तुम्हारे वेलविशर्स नहीं हैं। नहीं हैं। पर वो आपको प्यारे लगेंगे, क्योंकि वो बड़े मीठे-मीठे तरीके से आपके सपोर्ट में कुछ बातें कर रहे हैं। और उदाहरण के लिए, अभी पिछले 20 मिनट मैंने जो बातें बोलीं, वो बड़ी कड़वी लगेंगी। ऐसा लगेगा कि जैसे अरे, इन्होंने तो हमारी पूरी प्रोटेस्ट का ही अपमान कर दिया। मुझे देखो, सच्चाई बोलनी है क्योंकि मैं सचमुच तुम्हारा भला चाहता हूँ। तुम्हें नीचा दिखा के, तुम्हारा अपमान करके मुझे बिल्कुल कुछ नहीं मिलने वाला।

पिछले पंद्रह साल से मेरा काम ही ज़्यादातर युवाओं के साथ रहा है। 2006 में अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन शुरू हुई थी, दस साल तक तो मेरा पूरा समय उसी में बीता है और वो काम ही करती थी इन्हीं युवाओं के साथ। कई प्रोटेस्टर्स जब पैदा भी नहीं हुए थे, उस समय से मैं यूथ को फ़ियरलेस बनाने के मिशन में लगा हुआ हूँ। तो इसीलिए मैं जानता हूँ कि कहाँ से आ रहे हैं। क्या इनकी ताक़तें हैं? क्या इनकी कमज़ोरियाँ हैं? क्या इनका इनर आर्किटेक्चर है? मैं समझता हूँ इसको। मैंने उनके साथ बहुत नज़दीक से काम करा हुआ है, लगातार काम करा हुआ है।

बहक जल्दी जाते हैं। कोई आ करके सपोर्ट दे दे, कोई दो मीठी बातें बोल दे, जल्दी सोचने लग जाते हैं कि यही तो हमारा अपना है, यही तो हमारा अपना है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। कुछ डेटा पढ़ रही थी अभी मैं, जो मुझे काफ़ी कंसर्निंग लगा। तो 150 करोड़ की आबादी, ऑलमोस्ट अप्रोक्सिमेटली 150 करोड़ की आबादी में लगभग 28% जेन ज़ीज़ हैं। और हमारे पार्लियामेंट में जेन ज़ी का जो रिप्रेजेंटेशन है, वो है 1.3%। पार्लियामेंटेरियंस का जो एवरेज एज है, दैट इज़ 56 इयर्स। ऑलमोस्ट 33% एंड मोर आर मोर देन 60 इयर्स। तो यह जो अभी प्रोटेस्ट हुआ और उसके बाद जो यह स्वीपिंग विक्ट्री मानी जा रही है, इसके पॉलिटिकल रैमिफिकेशंस में यह नहीं आएगा कि जेनजी इज़ काइंड ऑफ़ रिक्लेमिंग द पावर?

आचार्य प्रशांत: पावर फ़ॉर व्हाट?

प्रश्नकर्ता: पावर फ़ॉर एडमिनिस्ट्रेशन।

आचार्य प्रशांत: एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ व्हाट?

प्रश्नकर्ता: द कंट्री।

आचार्य प्रशांत: कंट्री माने क्या? हम सब कंट्री हैं। जेन ज़ी इलेक्ट हो गया, यहाँ आ गया। अब वो क्या करेगा? इन्होंने ही तो इलेक्ट किया है। पहले ये किसी बूढ़े को कर रहे थे, इस बार बिल्कुल मस्त 25 साल वाले को कर दिया। पर इलेक्ट तो इन्होंने ही करा है ना? तो यहाँ आते ही क्या बोलेगा? मैं आपका सेवक, जैसे इस बार वोट दिया, अगली बार भी दीजिएगा। बताइए आपके लिए क्या करूँ? ये बोलेंगे, मेरे घर की नाली ठीक करा दे। जब तक यह नहीं बदले, तब तक इनका प्रतिनिधि कैसे बदल जाएगा? बोलो। अगर इनमें अंधेरा है, तो क्या ये रोशनी को वोट देंगे? अंधेरा तो अंधेरे को ही वोट देगा ना। चाहे वो जवान अंधेरा हो, चाहे बूढ़ा अंधेरा हो। तो आप क्या बूढ़े अंधेरे को जवान अंधेरे से रिप्लेस करना चाहते हो? कर लो। कर लो, मस्त जवान अंधेरा।

अभी भी कुछ सो-कॉल्ड यूथ लीडर्स हैं, वो भी बराबरी के क्रिंज हैं। सब पार्टियों में कुछ-कुछ आपको मिल जाएँगे यूथ लीडर्स। कोई 45 साल का यूथ लीडर है, कोई 55 साल का। कई तो यूथ लीडर्स हैं, उनको मैं देखता हूँ तो मुझे लगता है मैं इनफ़ेंट हूँ। तो ये जो यूथ लीडर्स हैं, इन सब पार्टियों में इन्होंने क्या चमत्कार कर लिया है? कई मामलों में ये बूढ़ों से भी गए-गुज़रे हैं। आप नहीं बच सकते इस बात से, मैं आपको बार-बार घुमा के इसी बात पर ले आऊँगा कि जब तक आप नहीं बदलोगे, आप डेमोक्रेसी हो। आप नहीं बदलोगे, आपका रिप्रेजेंटेटिव कैसे बदल जाएगा? वोट तो आपको ही देना है। वोट तो आपको ही देना है।

प्रश्नकर्ता: पर चुनाव के दिन मेरे पास अगर विकल्प ही नहीं है। ऐसा कोई नाम मुझे वहाँ अगर मैं जाऊँ तो दिख ही नहीं रहा, जिसको जिसका चुनाव करके मुझे शांति हो कि नहीं मैंने बागडोर सही हाथ में दी है। तो नोटा के अलावा कोई ऑप्शन भी नहीं है।

आचार्य प्रशांत: नहीं, बिल्कुल नहीं। आप अभी भी ग़लत जगह से शुरू कर रहे हो। जिसको चुनाव में खड़ा होना होता है, वो पहले यह देखता है न कि यह मैं खड़ा तो हो रहा हूँ, ये मेरा करेंगे क्या? बात यह नहीं है कि आपके पास वोट देने के लिए राइट कैंडिडेट नहीं है। बात यह है कि राइट कैंडिडेट के पास वोटर्स नहीं हैं। तो वो पागल नहीं है कि वो खड़ा होगा और पिटेगा। और भारत में चुनाव में एंट्री बैरियर अच्छा-ख़ासा होता है। साधारण चुनाव, लोकसभा नहीं, विधानसभा वग़ैरह में भी करोड़ों चाहिए होते हैं खड़े होने के लिए। कोई करोड़ों रुपए अपने काहे के लिए लगाए, जब उसको पता है कि यह जो बेस है, ये जो वोटर हैं, ये किसी ढंग की चीज़ को वोट देंगे ही नहीं।

वो अपने घर के पैसे आकर के जला दे, वो कैंपेनिंग करे, वो सड़क पर उतर आए। वो बिल्कुल बैंककरप्ट हो जाए और उसको पता है कि ये वोटर ऐसे हैं ही नहीं कि किसी भी ढंग के एजेंडे पर वोट डालें। ये किस चीज़ पर वोट डाल देंगे? ₹500 फ्री का दे दो। इनसे जाति की बात कर दो, इनसे धर्म की बात कर दो। ये सब बातें कर दो, ये वोट डाल देंगे। तो कोई अच्छा कैंडिडेट पहला काम करेगा अपने लिए वोटर तैयार करने का। और जब वोटर तैयार कर लेगा, फिर वो खड़ा होगा।

आप यह मान रहे हो कि वोटर तो एनलाइटेंड है। उस बेचारे को बस राइट कैंडिडेट नहीं मिलता। हम सब बहुत अच्छे लोग हैं, हम राइट वोटर, हम राइट कैंडिडेट को वोट डालना चाहते हैं। पर ये जो कैंडिडेट्स हैं, ये डरपोक हैं, ये खड़े नहीं होते हैं। जी नहीं, ऐसा नहीं है। अच्छा किसान पहले ज़मीन तैयार करता है, नहीं तो उसको पता है कि उसका बीज भी बर्बाद जाएगा। ज़मीन तैयार करने में मेरी मदद करिए।

प्रश्नकर्ता: अगला सवाल जो प्रोटेस्ट हुआ था, जेंन जी प्रोटेस्ट, उसको लेकर है। तो उसके मैं रील्स देख रहा था। तो कुछ दो तरह के रील्स सामने आ रहे थे। एक थे कि उसके अंदर जो प्रोटेस्ट एरिया है, वहाँ पे जो फीमेल्स हैं, गर्ल्स हैं, वो कह रही थीं कि उनको इतनी भीड़ होने के बाद भी बिल्कुल भी अनसेफ फील नहीं हुआ। लड़कों ने भी उनका साथ दिया। तो एक म्यूचुअल फ्रेंडशिप दिखी, एक तो। और दूसरी तरफ़ उसी जगह से ऐसे रील्स आ रहे थे कि मिनिस्टर्स का मज़ाक उड़ाने के लिए, उनको मॉक करने के लिए।

आचार्य प्रशांत: तुम इतने डरे हुए क्यों हो? क्या हो गया? तुम भी थे? कुछ हुआ है तुम्हारे साथ?

प्रश्नकर्ता: नहीं सर, मैं नहीं था।

आचार्य प्रशांत: फिर क्या हो गया?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो दो तरह के रील्स हैं कि एक में दिखाया जा रहा था कि वहाँ वुमेन एंपावरमेंट हो रहा है। इतनी सारी भीड़ में भी लड़कियाँ खुल के बोल पा रही हैं। और दूसरी तरफ़, उसी जगह से ऐसे भी मीम्स आ रहे हैं। वो लोग पोस्टर्स बना रहे हैं। उसमें मिनिस्टर्स का मज़ाक उड़ाने के लिए उनके सिंदूर लगा दिया है, लड़कियों के कपड़े पहना दिए हैं, कि एज़ इफ़ वुमेन होना कोई इंसल्ट है। तो जेन ज़ी ख़ुद को प्रोग्रेसिव बोलता है। फिर उसी जगह से ऐसे रिग्रेसिव मीम्स क्यों आ रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: तुम दो चीज़ों में कंट्राडिक्शन दिखाना चाहते हो, किन दो चीज़ों में कंट्राडिक्शन दिखा रहे हो? तुम पहली चीज़ यह बोल रहे हो कि लड़कियाँ वहाँ सेफ़ थीं। चलो, ये समझ में आया कि लड़कियों ने कहा, "हम वहाँ सेफ़ थे।" तो अब इसका कंट्राडिक्शन तो तुम इस चीज़ से दिखाओगे न कि लड़कियाँ अनसेफ़ थीं। और अनसेफ़ कहाँ थीं? कंट्राडिक्शन नहीं है, वरना।

प्रश्नकर्ता: अनसेफ़ कि मतलब एक तरह से, पहले मैं ये बोल रहा हूँ कि फेमिनिज़्म है, उनको एंपावरमेंट मिल रहा है, वुमेन को, फीमेल्स को। और दूसरे में लड़कियों का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। ऐसा दिखाया जा रहा है कि वुमेन होना एक इंसल्ट है, कि मिनिस्टर्स को बोल रहे हैं कि "बी अ मैन, उनकी डिमांड्स पूरी करो।"

आचार्य प्रशांत: ये बहुत साधारण बात है। इसमें इतनी गुत्थी क्या है कि ऐसे पूछ रहे हो? ये तो हर जगह ही होता है, इसमें मैं क्या बोलूँगा। यह बहुत रेलेवेंट क्वेश्चन है ही नहीं न, इसमें मैं क्या बोल सकता हूँ। यह तो हर जगह ही हो रहा होता है न, नहीं जानते हो कि जेन ज़ी की बात नहीं है, ये जो, जिसको आप पेट्रियार्की बोलते हो, वो कोई मेल थिंग थोड़ी होती है। वो एक कॉन्ट्रैक्चुअल थिंग होती है, जिसमें आदमी-औरत दोनों शामिल होते हैं। दोनों के मध्य का वो एक कॉन्ट्रैक्ट होता है, करार होता है, अनुबंध होता है, जिसमें दोनों ने ही माना होता है कि स्त्री नीचे की चीज़ है और, खासकर, उसकी जो सेक्सुअलिटी है, वो कोई गिरी हुई चीज़ है।

यह बात सिर्फ़ मेल ने नहीं मानी होती है, ये बात फीमेल ने भी मानी होती है। यही सिस्टम है। तो फीमेल भी जब गाली देगी, तो वो फीमेल्स के ही जेनिटल्स को लेकर देगी। दैट्स द नेचर ऑफ द सिस्टम इटसेल्फ, एंड दैट इज़ नॉट एक्सक्लूसिव टू जेन ज़ी। वह तो तुम कोई साठ साल की भी महिला होगी, तो पाओगे कि वो यही कर रही है। इसमें तो क्या करोगे।

भाई भाषा बदल जाएगी, लेकिन जो भाव है वो तो वही रहता है न। जेन ज़ी होगी, जेन ज़ी की एक लड़की होगी वह किसी लड़की से खुंदक खाएगी तो उसको बोलेगी "स्लट"। और साठ साल वाली होगी पुरानी, जिसको कहोगे, "यह तो बूढ़ी अम्मा है।" वो किसी पर खुंदक खाएगी, तो उसको बोलेगी छिनाल। तो दोनों ही क्या कर रहे हैं? दोनों ही एक ही बात कह रहे हैं न। तो इसमें जेन ज़ी को क्यों लेकर आ रहे हो, दैट्स द एंटायर मूवमेंट ऑफ द कॉन्ट्रैक्ट बिटवीन द टू जेंडर्स।

प्रश्नकर्ता: वो अपने आपको प्रोग्रेसिव बोल रहे हैं न जेन ज़ी, कि हम तो।

आचार्य प्रशांत: नहीं प्रोग्रेसिव, यहाँ पर कौन रिग्रेसिव बैठे हुए हैं? बताओ। तुम भी तो अपने आपको प्रोग्रेसिव ही बोल रहे हो, पर इतना डरे हुए हो। माइक हाथ में देने से पहले बीपी वग़ैरह देखा करिए, कहीं ऐसा न हो कि पूछते-पूछते ही...

चलो, भागो तुम।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसमें एक फॉलो-अप था, इसी प्रोटेस्ट को लेकर। तो एक तो यह चल ही रहा है और, क्योंकि इसके बहुत रील्स हम सबने भी देखे हैं, और अभी दो टाइप के रील्स चल रहे हैं कि एक प्रोटेस्ट का एक साइड दिखाया जा रहा है और एक प्रोटेस्ट का दूसरा साइड दिखाया जा रहा है। और इसे बहुत कंट्रास्ट के साथ दिखाया जा रहा है। तो शायद वो भी पूछना चाह रहा था कि एक ही साइड दोनों चीज़ कैसे कर रहा है? कहाँ गया? ये रहा।

तो एक और चीज़, जो उसी के संपर्क में देखने को मिली, वो है फाउल लैंग्वेज। और इस पर बहुत अभी हीटेड डिबेट चल रहा है कि क्या जो मीम्स के थ्रू, जैसे हम मीम प्रोटेस्ट भी बोल रहे हैं अभी, तो बहुत सारा फाउल लैंग्वेज यूज़ किया गया है। मीम्स में, ऑनलाइन वायरल जो हो रहे हैं, पोस्टर्स में, वहाँ पर भी। और किसी को भी नहीं छोड़ा है।

तो एक क्वेश्चन यह है, कि और जब जेन ज़ी को यह पूछा जा रहा है, तो जवाब कुछ ऐसा आ रहा है कि, "दिक़्क़त क्या है? कि हम, भाई, अच्छा काम कर रहे हैं और उसमें अगर हम अपनी बात रख रहे हैं, तो व्हाट इज़ सो प्रॉब्लमैटिक?" तो इसको कैसे समझा जाए? एंड व्हेयर डज़ वन ड्रॉ द लाइन? क्योंकि उस पे कुछ रिएक्शंस भी अभी आए हैं, जो उस पे भी चल रहा है कि इज़ द गवर्नमेंट रिएक्शन राइट ऑन इट ऑर नॉट?

आचार्य प्रशांत: नहीं, वेयर डज़ वन ड्रॉ द लाइन के साथ आप ये नहीं पूछोगे, व्हेन डज़ वन ड्रॉ द लाइन? क्योंकि ये काम तो कितने सालों से और दशकों से चल रहा है, कब से चल रहा है। और इसमें फिर से कहूँगा कि इसमें कोई जेन ज़ी का ही कोई विशेष रोल नहीं है। जेन ज़ी से आगे वाले क्या कहलाते हैं? मिलेनियल्स। तो

यूट्यूब पर मिलेनियल्स के भी जो फेवरेट स्टार्स थे, ये थे, वो भी तो गाली-गलौज ही कर रहे थे। रोस्टिंग का तो जो पूरा क्षेत्र है, वो बिना गाली के तो चलता ही नहीं है। और मिलेनियल्स ने भी रोस्टिंग खूब एंजॉय करी है अपने समय पर। करी है न? और यही जो फिर मिलेनियल्स होते हैं, या जेन ज़ी के बड़े भाई होते हैं, बहन होते हैं, और हो सकता है वो उसके थोड़ा आगे चलके माँ-बाप भी हों। तो ये तो पता नहीं कब से चल रहा है। पता नहीं कब से चल रहा है। मैंने आज से पाँच-छह साल पहले, किसी ने सवाल पूछा था कि ये जो टॉप के यूट्यूबर्स हैं ये क्यों इतनी गाली देते हैं? क्योंकि तुम्हें सुननी है।

और दूसरी बात, तुमने पूरी एजुकेशन को इतना वोकेशनलाइज़ कर दिया कि उसमें आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज़, लिटरेचर के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी। तो एक बहुत व्यावहारिक बाधा यह है कि इन लोगों के पास वोकैबुलरी ही नहीं है, शब्दकोश नहीं है। वो पुराना एक वीडियो था मेरा, निकालना, मैंने उसमें बड़े सरस तरीके से कहा है कि गधे को अगर चूहा भी दिखेगा, तो क्या बोलेगा? "ढेंचू।" और गधे को अगर शेर भी दिखेगा, तो क्या बोलेगा? "ढेंचू।" उसके पास और कुछ है ही नहीं न। वो कहाँ से लाए रिचनेस अपनी वोकैबुलरी में कहाँ से लाए? नहीं कर सकता न।

तो यह काम तो कब से हो रहा था। आप जितने भी ये जेन ज़ी जिनकी खुराक पर बड़ी हुई है, आप उन सोशल मीडिया स्टार्स को, यूट्यूबर्स को देखो। तो उन्होंने सबने गाली-गलौज ही तो खूब जमकर करी है। और वो जो उनकी पूरी बात होती है, उसमें से आप गाली हटा दो तो कुछ बचेगा ही नहीं, वो बोल ही नहीं पाएँगे। तो यह तो चल ही रहा था, चल ही रहा था और यह समाज द्वारा सैंक्शन ही था। चल रही थी बात। अब आज अचानक वो बात एक क्रिस्टलाइज़्ड रूप में वहाँ जंतर-मंतर पर प्रकट हो गई, तो हमको अजीब लग रहा है कि, "अरे, इतनी गाली-गलौज कैसे हो गई?" तो इसलिए मैंने पूछा, *व्हेन डू यू ड्रॉ द लाइन? शुड यू बी टॉकिंग ऑफ दिस नाउ? शुड यू हैव टॉक्ड ऑफ दिस, लाइक 2010, 2015? तब बात करनी चाहिए थी। तब तो हमने इसको कूलनेस का सिनोनिम बन जाने दिया कि आप कूल हो ही नहीं अगर आप...

और फिर आप पूछो अगर तो आत्मीय संबंधों में एक तरीके की मसालेदार और थोड़ी रंगीन भाषा की कोई जगह हो सकती है। चार दोस्त एक साथ बैठे हैं और उसमें वह गाली-गलौज कर रहे हैं, समझ में आ सकता है। उत्तर भारत में ऐसा भी चला है कि शादी-ब्याह के मौके पर गाली गायी भी जाती है। जानते हो आप यह? हाँ, बाकायदा गाली गायी जाती है। वह एक अलग बात होती है। पर गाली की रोटी खाना बिल्कुल अलग बात होती है, कि मैं यूट्यूबर हूँ मैं गाली देता हूँ, तभी व्यूज़ आते हैं, और उसी की मैं रोटी खाता हूँ। तू गाली की रोटी खा रहा है, तेरी रोटी ही एक गाली है। वो एक अलग बात होती है और हमने उसको अलाउ करा, और अब वो चीज़ अपने पूरे ज़ोर से सामने आ रही है।

एक बहुत पुराना वीडियो था। मैंने उसमें बोला था, एक तो गाली वाली बात बोली थी। उसका नाम था, "कौन बर्बाद कर रहा है मेरे देश की युवा पीढ़ी को," इस नाम से था। वही किसी ने पूछा था कि यह क्या हो रहा है इनके साथ? आज जो यहाँ पर खड़े हुए हैं 22-24 साल के, जब मैं बात कर रहा था तो आठवीं-दसवीं के बच्चे थे। उस वक़्त मैं बोल रहा था तो आपने बात को सुना नहीं, समझा नहीं। और मैं नहीं कह रहा था कि, "अरे, इनको डिसिप्लिन करो," और यह सब करो, वो मेरा तरीका है ही नहीं। मैं तो कह रहा था कि हम समझें कि यह पूरी बात जा किस दिशा में रही है, और हम समझें कि यह जो पूरा सोशल मीडिया एक्सप्लोजन है, इसमें किस-किस्म के लोग बाहर निकलकर आ गए हैं।

जो ये जेन ज़ी है, ये बहुत हद तक सोशल मीडिया की पैदाइश है, चाहे वो लेफ्ट-लीनिंग जेन ज़ी हो या राइट-लीनिंग जेन ज़ी हो। और अभी भी उन्होंने वहाँ जो करा, उसके बेनिफिशरी भी फिर वही सोशल मीडिया वाले हैं।

जेन ज़ी जिन सोशल मीडिया वालों का प्रोडक्ट है, जेन ज़ी की हरकतें उन्हीं सोशल मीडिया वालों का पेचेक हैं।

प्रश्नकर्ता: एक तो यह भी वीडियो आया था कि रील्स बनाकर कोई एक ही दिन में इतना अमीर हो गया कि आईफ़ोन ख़रीद लिया। और वो रील फिर से वायरल हो गया था। कि आईफ़ोन ख़रीद लिया...

आचार्य प्रशांत: वायरल होता क्या अगर गाली न दी होती? मामला वायरल होता क्या अगर गाली न दी होती? तो ये गाली भी इसलिए दी जा रही है क्योंकि उस गाली की ऑडियंस है। क्योंकि लोगों को गाली सुनने में मज़ा आता है। और देखो, भाई, लोकतंत्र है, यहाँ जिस चीज़ में लोगों को मज़ा आ रहा होगा वो चीज़ चलेगी। तुम लोगों को बदले बिना यह नहीं कह सकते कि फलानी चीज़ चलाना बंद कर दो, वह चलेगी क्योंकि लोगों को चाहिए। जिसको जो चाहिए, तुम उससे कैसे रोक सकते हो, डेमोक्रेसी है।

लोगों को एक तरीके के नेता को वोट देना है। तुम उन्हें कैसे रोक सकते हो? देंगे वोट। उन्हें देना है। तुम बाद में नेता के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट करते रहो, कुछ भी करते रहो। भाई, लोगों ने वोट दिया है, तब वो नेता बना है, ऐसे थोड़ी बन गया वो। गाली वाला वीडियो वायरल होता है। तुम कहते रहो, "अरे, अरे, अरे, वीडियो वायरल है, वायरल है।" भाई, लोगों को देखना है, इसलिए वायरल हुआ है न। वायरल माने क्या होता है? तुमने देखा, तुमने लाइक करा, तुमने शेयर करा, तुमने फ़ॉरवर्ड करा, तो वो वायरल हुआ है।

तो यह तो आपको इस समाज से ही पूछना पड़ेगा कि इसमें इतनी गहरी कुंठा क्यों है? इसमें इतना गहरा साइकोलॉजिकल डिस्टॉर्शन क्यों है? इसमें इतना फ्रस्ट्रेशन क्यों है? और इसकी इतनी लिटरेरी दुर्गति क्यों है? इसकी इतनी लिटरेसी क्यों है कि इसके पास एक ढंग का शब्दकोश नहीं, वोकैबुलरी नहीं। इसे कुछ भी बोलना होता है, तो यह, "यू नो, यू नो, यू नो, लाइक, सो...।"

अरे भाई! कारण यह है कि ज़िंदगी में ढंग की चार किताबें भी नहीं पढ़ी हैं, तो "लाइक, लाइक, लाइक" करेंगे, "यू नो..." उसके बिना ये एक वाक्य नहीं पूरा कर सकते। किसी भी भाषा में। बात ये नहीं है कि इनको हिंदी-अंग्रेज़ी नहीं आती। इनको आप बोल दो कि तुम साइन लैंग्वेज में कर दो, वो भी न कर पाएँ। आप इनको कहोगे, "माइम करो।" माइम में भी गाली दे देगा वो। यह जो है, यह उसकी लिटरेरी पावर्टी है, और वो जुड़ जाती है साइकोलॉजिकल फ्रस्ट्रेशन के साथ। तो नतीजा ये आता है कि गाली दे रहे हैं, गाली दे रहे हैं।

फिर जब गाली के प्रकार, गाली के स्वरूप, गाली के स्ट्रक्चर की बात आती है, तो उसमें जो जेंडर कॉन्ट्रैक्ट है, वो एक्टिवेट हो जाता है। ठीक है? कि क्या है? दुनिया में सबसे गिरी हुई चीज़, और जो सबसे फ्रस्ट्रेटिंग चीज़ है, जो हर आदमी को चाहिए और मिल नहीं रही है, वो क्या है? जेनिटल्स हैं। वो भी स्पेशली किसके जेनिटल्स हैं? महिलाओं के। बंदों का भी, ऐसा नहीं है कि उनके जेनिटल्स को लेकर गाली नहीं दी जाती। पर जिस चीज़ को लेकर सबसे ज़्यादा कुंठा है, वो है महिलाओं के यौनांग। तो मुँह खोला और बोला, मुँह खोला और बोला, वही-वही चल रहा है।

और इतनी साइकोलॉजिकल लिटरेसी लड़कियों में नहीं कि उनको समझ में आए कि ये सब क्या हो रहा है। तो वो भी कूल बनने के चक्कर में अपने ही जेंडर को गाली दे रही होती हैं। और ये आज से नहीं चल रहा, यह मुद्दा आज नहीं उठना चाहिए कि जंतर-मंतर पर कुछ ख़ास हो गया। ये चल रहा है दसियों सालों से। और तब हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं हो रही थी, आज जब थोड़ा विस्फोट-सा हो गया है, तो हम कह रहे हैं कि, "अरे, ये क्या हो गया? ये क्या हो गया? ये क्या हो गया?"

भाई, कैसे; कोई उसे फ्रस्ट्रेशन हो रहा है, वह कैसे अपनी बात को ज़ाहिर करे? कैसे? मान लो उसका लव अफेयर था। मान लो उसका लव अफेयर था, वहाँ उसको लात पड़ गई। अब वो इसको कैसे अपने दोस्तों के सामने आकर बताए? कैसे? अब एक तरीका यह है कि उसने साहित्य पढ़ा है तो उसने आकर के ग़ालिब को कोट कर दिया, "इश्क़ में और रोने से बेबाक हो गए, धोए गए कुछ ऐसे कि बस पाक हो गए।" उसने कुछ नहीं पढ़ा। ग़ालिब बोलोगे? हाँ, उसे नहीं पता, तो आकर बोलेगा, "मैम, दैट बिच जस्ट थ्रू मी।" उसके पास यही है। उसके पास ग़ालिब नहीं है, तो बोलेगा, "दैट बिच जस्ट थ्रू मी।" यही है वो। वो कैसे बोले? क्या करे? और आप उससे शब्द भी छीन लोगे, तो फिर वो अपने हाथ-पाँव का इस्तेमाल करके इशारे करेगा। किसी-न-किसी भाषा में तो व्यक्त करेगा न, जो उसके भीतर है। साहित्य की भाषा उसके पास है नहीं। क्यों? क्योंकि हमें बच्चों को डॉक्टर और इंजीनियर बनाना है।

तो वो दसवीं पास करता नहीं है कि आप बोल देते हो, "ये तुम इंग्लिश, हिंदी, इनकी लिटरेचर की किताबें क्यों पढ़ रहे हो?" भले ही वो उसके बोर्ड के सिलेबस में हों, तो भी नहीं पढ़ता। कहते हैं, "अपने तो हिंदी, इंग्लिश, या जो भी तुम्हारे सब्जेक्ट्स हैं, इनमें बस 60 लेकर पास हो जाना। असली चीज़ तो PCMB है।" तो उसके पास लैंग्वेज नहीं है, भाई। और न ही उसके पास साइकोलॉजिकल इनसाइट है। हाँ, उसके पास बहुत सारा फ्रस्ट्रेशन ज़रूर है, तो उस फ्रस्ट्रेशन को यही सब अपना गाली-गलौज करके उछालता रहता है।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। तो मैं सोशल मीडिया पर देख रहा था। कुछ क्रिएटर्स थे सोशल मीडिया पर, तो वह ऐसे दावा कर रहे थे कि यह प्रोटेस्ट हर किसी को अलग-अलग तरीके से दिखाया जा रहा है। कि जेन ज़ी के फ़ीड में अलग जा रहा है, जो मिलेनियल्स हैं उनके फ़ीड्स में अलग जा रहा है। तो एल्गोरिदम जो है, अलग-अलग तरीके से ये प्रोटेस्ट सबको दिखा रहा है। तो मैं इसे ये जानना चाह रहा हूँ कि अगर मैं लेफ्ट का हूँ, तो जो एल्गोरिदम है, मुझे लेफ्ट का दिखा रहा है। मैं राइट का हूँ, तो राइट का दिखा रहा है। तो मुझे यह जानना था कि इस प्रोटेस्ट की सच्चाई क्या है? और क्या यह सच्चाई मुझसे छुपी हुई है? क्योंकि एल्गोरिदम तो वही दिखा रहा है, जो मैं देखना चाह रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: यार, यह बात ज़िंदगी में हर क्षेत्र में लागू होती है, सिर्फ़ प्रोटेस्ट में नहीं लागू होती। यह बात तो आपके रिश्तों में भी लागू होती है। आपके दोस्त हैं, वो आपको वही दिखा रहे हैं जो आप देखना चाहते हो। आपके दोस्त ने जो चेहरा आपको दिखाया है, उसने वह चेहरा अपनी माँ को, अपने बाप को नहीं दिखाया है। तो यह बात सिर्फ़ प्रोटेस्ट पर ही थोड़ी लागू होती है कि एल्गोरिदम ने आपको प्रोटेस्ट का एक चेहरा दिखा दिया और दूसरे व्यक्ति को प्रोटेस्ट का दूसरा चेहरा दिखा दिया। यह बात तो घर में भी लागू होती है। यह बात तो समाज में लागू होती है, हर जगह लागू होती है। पूछना हमें यह चाहिए कि हम ऐसे क्यों हैं कि असली चेहरा देखते हैं, तो डर जाते हैं।

आपका बहुत बार होता है कि आपके बारे में आपके दोस्तों को ज़्यादा पता होता है, माँ-बाप को कम पता होता है। आपने अपना वो चेहरा दोस्तों को दिखाया, माँ-बाप को क्यों नहीं दिखाया? क्यों नहीं दिखाया? क्योंकि माँ-बाप ने एक इमेज बना रखी है और उस इमेज के साथ बहुत सारे अब इंटरेस्ट्स जोड़ दिए हैं। तो माँ-बाप ख़ुद ही चाहते हैं कि हमारी वह इमेज तोड़ो मत। दिस हैपन्स एवरीवेयर। मत कहो कि हमें सच्चाई दिखाई नहीं गई, पूछो कि हमें सच्चाई चाहिए भी है क्या?

वास्तव में आप अगर जाओ, आपका कोई रिश्ता है वहाँ आप सच्चाई बताने लग जाओ तो यह भी हो सकता है बंदा नाराज़ हो जाए। वो कहे, "मुझे बताओ ही मत।" आप कहो, "लेकिन मेरी सच्चाई है बताना ज़रूरी है। मैं शेयर मैं डिस्क्लोज़ करना चाहता हूँ।" वो कहेगा, "मुझे नहीं सुनना है, मुझे ये सब मत बताओ।" जब हमारे रिश्ते ही झूठ पर चल रहे हों, हमारे करियर्स ही झूठ पर चल रहे हों। आप जाते हो, वहाँ पर इंटरव्यू होता है। आप जो एचआर पर्सनल है, उससे कहते हो कि, "नहीं, नहीं, नहीं, मैं तो पैदा ही हुआ हूँ इस कंपनी में काम करने के लिए। यहीं जान दे दूँगा। दिल है, जान है, ईमान है, यह कंपनी मेरे लिए।"

तो क्या वहाँ पर वो इंटरव्यूअर को पता नहीं होता कि आप झूठ बोल रहे हो? और वह जो इंटरव्यूअर है, वह खुद भी यही चाहती है कि तुम यह झूठ बोलो। क्योंकि तुमने अगर सच्चाई बोल दी कि, "दीदी, पैसा बनाने आया हूँ। जिस दिन कोई और ऑफर मिल जाएगा, यहाँ से चल दूँगा।" तुमने यह बोल दिया अगर, तो पूरे सिस्टम का झूठ धराशायी हो जाएगा। सब कुछ तुम्हारा झूठ पर चल रहा है। "पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही।" सब कुछ तो झूठ पर ही है न? फिर?

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें अच्छा नहीं लगता तुम्हारी गर्लफ्रेंड मेकअप करके आती है? और यही वो अपना सच्चा चेहरा दिखा दे तो? तब बोलोगे, "जब सच्चा चेहरा दिखाना हो, तो लाइटें पहले बंद करेंगे हम।" तुम ख़ुद चाहते हो झूठ में जीना। झूठ में एक प्लेज़र होता है और सच में एक चैलेंज होता है। हम इतने हिम्मती लोग नहीं कि सच का चैलेंज स्वीकार करें। ज़्यादातर हम कहते हैं, "झूठ का प्लेज़र चलने दो।"

प्रश्नकर्ता: हेलो सर। इस प्रोटेस्ट से एक और चीज़ हुई थी कि, मतलब, जो पोलराइज़्ड मीडिया है, उनकी दो-चार रीलें वायरल हो गईं, जहाँ पर उनकी धज्जियाँ उड़ाई गईं। तो इससे एक बहुत बड़ा हवा बन गया है कि ये जो ट्रेडिशनल मीडिया है, इनकी पूरी क्रेडिबिलिटी ही ख़त्म हो गई है। बट उनको पता ही नहीं है कि ये कितने बड़े, लार्जली फ़ंडेड हैं। और टियर-2 सिटीज़ या टियर-3 सिटीज़ या गाँवों में अभी भी इन्हीं मीडिया को कंज्यूम किया जा रहा है। तो ये जो मिथ बन गया है कि ट्रेडिशनल मीडिया की क्रेडिबिलिटी ख़त्म हो गई है, इसको ब्रेक कैसे करें? और इनको लगता है कि ये जो नया मीडिया आया है, यही असली सच दिखा रहा है, जबकि इनको भी कंट्रोल किया तो जा सकता है।

आचार्य प्रशांत: पहली बात, उसकी कोई क्रेडिबिलिटी कई सालों से थी ही नहीं। तो "क्रेडिबिलिटी ख़त्म हो गई है" यह ओवरस्टेटमेंट है। कुछ फ़ेंस-सिटर्स रहे होंगे, जो अभी भी उनको देख लेते होंगे, टीवी चैनल वग़ैरह को। वो हट गए होंगे। नहीं तो इनकी कोई क्रेडिबिलिटी कहाँ थी? मनोरंजन था, वो अपना दिखा रहे हैं, कुछ भी।

प्रश्नकर्ता: बट सर, मैं कुछ अंकल्स को देखता हूँ। वो बहुत सीरियसली देखते हैं।

आचार्य प्रशांत: वो अभी भी देखेंगे। जो सीरियसली तब देख रहे थे, वो अभी भी देखेंगे। तुम्हें क्या लग रहा है कि वो अभी कहेंगे, "नहीं, नहीं, ये टीवी चैनल तो झूठ बोलता है"? नहीं, वो अभी भी देखेंगे। उस टीवी चैनल को देखने में उनके साइकोलॉजिकल स्ट्रक्चर्स को प्रोटेक्शन मिलता है। वो अपनी इनर सिक्योरिटी की ख़ातिर उस चैनल को देखते हैं। और वो चैनल बिल्कुल वही दिखाता है, जो अंकल को देखना है, जिनका आपस में कोलैबोरेशन है। वो चैनल यूँ ही कुछ नहीं दिखाता, चैनल ही पहले सोचता है कि मैं ये दिखाऊँगा तो ये अंकल को आएगा न। अंकल के हिसाब का है न, अंकल को पसंद है, तभी दिखाता है वो ये सब कुछ। ठीक है?

अब आते हो इस पर कि तुम कह रहे हो कि हमने उनको रिप्लेस कर दिया है, ट्रेडिशनल मीडिया को सोशल मीडिया से। सोशल मीडिया तो और भी ज़्यादा करप्ट है, ट्रेडिशनल मीडिया में फिर भी कोई ब्रांड अकाउंटेबिलिटी है, सोशल मीडिया में तो कोई कुछ भी दिखा सकता है व्यूज़ के लिए। कुछ भी। सोशल मीडिया की अगर तुम मानो तो मैं सीआईए एजेंट हूँ। और तुम्हारे हिसाब से सोशल मीडिया ज़्यादा क्रेडिबल है मेनस्ट्रीम मीडिया से; एक साँपनाथ, एक नागनाथ। और दोनों ही झूठ इसलिए बोल पाते हैं क्योंकि आम आदमी को झूठ चाहिए। वो डिमांड पहले आ रही है, सप्लाई बाद में आ रही है। आम आदमी झूठ माँग रहा ह, अब यूट्यूबर्स के झूठ को वो अब अपना पी रहा है। पहले टीवी चैनल के झूठ को पीता था, अब यूट्यूबर्स आ गए हैं, वो दनदना करके वही देंगे जो आपको चाहिए।

और यूट्यूबर या ये रील बनाने वाला बंदा, ये तो बड़ा बेसहारा होता है। उसका तो घर चलना है उसी से कि कौन-सी वीडियो के व्यूज़ कितने आए। और वो आपको सच्चाई बता देगा, वो इंस्टाग्राम पर है, उसको ब्रांड एंडोर्समेंट नहीं मिलेगा। कोई भी जो ब्रांड है, वो ऐसे इंस्टाग्राम या यूट्यूबर को थोड़ा अवॉयड ही करेगा, जो ज़्यादा सचमुच बोलता हो। उनको जाकर वहाँ इंस्टाग्राम पर ज़्यादा क्या? कॉस्मेटिक्स चलेगा, ये चलेगा, वो चलेगा, ईयरफ़ोन ख़रीद लो, ये सब कर लो।

अब क्रांतिकारी कोई अगर हो, यूट्यूबर, अपनी क्रांति के बीच में बोले, "अरे, रुको, एक बात तो बताई नहीं। ये हैं नए ईयरफ़ोन्स।" तो अगर जब ईयरफ़ोन बेच के ही काम चलना है, तो आप एक सीमा से आगे की क्रांति कर भी नहीं सकते। और ईयरफ़ोन तो फिर भी ठीक है, और पता नहीं क्या-क्या बेच रहे हैं। सब कुछ ही अब यही बेच रहे हैं, कच्छे बेच रहे हैं। वो अचानक बहुत ऊँची बात करते हुए कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्या हुआ।

ये तो आस हटा दो कि ट्रेडिशनल मीडिया हट गया है और न्यू मीडिया आ गया है। कुछ न्यू हो कहाँ रहा है, मैं तो चाहता हूँ कुछ न्यू हो। एक ही चीज़ है जो नई हो सकती है, "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" रिमूव द डार्कनेस, ब्रिंग ऑन द लाइट। वही नई चीज़ हो सकती है। वो हम होने कहाँ दे रहे हैं, हमें तो बस क्या चाहिए? हंड्रेड शेड्स ऑफ डार्क। डार्क को ही अलग-अलग कलर्स में लाते रहो, ताकि हमें यह लगता रहे कि कुछ बदलाव हो रहा है। हम अपने आप को ही सांत्वना देते रहें कि कुछ तो बदल रहा है न, कुछ तो बदल रहा है न। बदल क्या रहा है?

तुम ये इन्हीं चीज़ों में उलझे हुए हो, सस्ते मनोरंजन में। और क्लाइमेट एक्स्टिंक्शन आ गया सामने खड़ा है। बल्कि जितनी और कोई हेडलाइंस आती हैं सामने, उतना ज़्यादा तुम्हारा ध्यान भटक जाता है असली मुद्दे से। आज जो सबसे बड़ी और इमिनेंट प्लैनेटरी क्राइसिस है, वो है क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी। जितने दिनों ये सब चलेगा, ये प्रोटेस्ट है, या ये मुद्दा है, या वो मुद्दा है, ऐसा है, वैसा है, उतने दिनों क्या तुम क्लाइमेट चेंज सोचोगे भी?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो ये होता है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल ही प्रोटेस्ट से रिलेटेड ही है।

आचार्य प्रशांत: अरे यार, उनसे पूछो न जो गए थे। मैं तो यहाँ खड़ा हूँ, मुझे तो कुछ पता भी नहीं। बोलो।

प्रश्नकर्ता: अभी जो प्रोटेस्ट ख़त्म हुआ है, इससे एक चेन रिएक्शन ऑफ़ प्रोटेस्ट देखने को मिल रहा है कि और भी जो मुद्दे हैं, जैसे रिज़र्वेशन के मुद्दे हैं या और भी जो मुद्दे हैं, तो एक टेंपलेट बन गया है कि एक इंस्टाग्राम चैनल बना के कुछ लोगों को इकट्ठा करके हम इस तरह का रिवॉल्यूशन कर सकते हैं। और मैंने कुछ एग्ज़ाम्पल्स भी देखे थे, जैसे कि "रिज़र्वेशन हटाओ।"

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल बन जाएगा, और जो प्रोटेस्ट करने आ रहे हैं, मान लो कहते हैं, "रिज़र्वेशन हटाओ।" वो अपना अगर इंस्टा चैनल बना सकते हैं, तो जिनको रिज़र्वेशन रखना है, वो भी तो बना सकते हैं न। तो ये इकट्ठा होंगे, वो भी इकट्ठा हो जाएँगे। अब इसमें गवर्नमेंट कहीं नहीं है, अब इन दोनों में आपस में मारामारी होगी, अब ये दोनों आपस में लड़ेंगे। अभी भी जो हुआ, संभावना थी कि कुछ दिन और चलता तो कोई दूसरा भी एक ग्रुप तैयार हो सकता था यंगस्टर्स का ही। और वो यंगस्टर्स भी इसी जनरेशन के होते, और उस ग्रुप के और इस ग्रुप* के बीच में फिर सड़कों पर मारामारी होती।

तुम कह रहे हो, "रिज़र्वेशन हटाओ।" ठीक। वह कह रहा है, "रिज़र्वेशन रखो।" तुम सड़क पर उतरोगे, तो वह नहीं उतरेगा क्या? टेंपलेट क्या है इसमें? ये बातें मारामारी से नहीं हल करी जा सकतीं। जाति क्या है? जाति कहाँ से आई? जाति ने क्या नुकसान किया? और आज हमें जाति के मुद्दे का क्या करना है? यह बात समझने की होती है।

ये पूरा, फिर बोलूँगा, वही अँधेरे का रूपक लेकर के मेटाफर ऑफ़ डार्कनेस, ये पूरी एक्स्ट्रीम ऑफ़ डार्कनेस रही है। उसका सॉल्यूशन यही है कि कम-से-कम आज तो उस पर लाइट डाल दो। कास्ट-बेस्ड एक्स्प्लॉइटेशन, ये सेंचुरीज़ की डार्कनेस का नतीजा है। आज तो उस पर रोशनी डाल दो। तो उससे हो सकता है कोई सॉल्यूशन निकल भी आए।

प्रश्नकर्ता: ये लास्ट है प्रोटेस्ट वाला, आचार्य जी। तो एक, जो ये टेंपलेट की बात इन्होंने की, उसमें एक चीज़ जो बहुत दिख रहा है कि इस प्रोटेस्ट का एक अनप्रेसिडेंटेड स्पीड है। जो जैसे बोला जा रहा है कि द कोऑर्डिनेशन इज़ क्लोज़। सो इट्स क्लोज़्ड कोऑर्डिनेशन पर ओपन एम्प्लीफ़िकेशन। कि जो कोऑर्डिनेशन होता है, वो फटाफट व्हाट्सऐप के ग्रुप्स में हो जाता है। और बाक़ी जो सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स हैं, उनमें और लोगों को इकट्ठा करना बहुत स्पीड से हो जाता है, जो कि पहले दशकों में पॉसिबल नहीं था। और जो एम्प्लीफ़िकेशन होता है, वो भी बहुत मिलियंस में होता है क्योंकि व्यूज़ मिलियंस में चले जाते हैं फटाफट। इसीलिए, जो आई थिंक, एक जो मेरा फ़ॉलो-अप था कि जो चेन रिएक्शन की बात हो रही है, वो उसी इसीलिए हो रही है क्योंकि स्पीड बहुत फटाफट हो जाता है।

आचार्य प्रशांत: तो वो ऑपरेशनल डिटेल है। वो उस समय की टेक्नोलॉजी पर निर्भर करता है। 1857 की क्रांति हुई थी, ठीक है? उसमें जो क्रांति थी, गदर था, वो दबा दिया गया। एक कारण ये भी था क्योंकि अंग्रेज़ों के मीन्स ऑफ़ कम्युनिकेशन बेहतर थे। जो *इंडियंस** थे, वो अलग-अलग जगहों पर छितराए हुए थे। ठीक है? वहाँ पर कानपुर है, वहाँ पर झाँसी है और वहाँ पर वो तात्या है नीचे। ये आपस में इतनी आसानी से कोऑर्डिनेट नहीं कर रहे थे क्योंकि कम्युनिकेशन उनका उतना एफिशिएंट नहीं था। और अंग्रेज़ थे, वो एक टेक्निकली डेवलप्ड जगह से आ रहे थे। उनका फ़ास्ट कोऑर्डिनेशन और कम्युनिकेशन था, तो कर पाए। बट ऑल दिस इज़ ऑपरेशनल। दिस विल नेवर बी कोटेड ऐज़ द फ़ंडामेंटल रीज़न व्हाई थिंग्स हैपन्ड।

अब बिल्कुल हो सकता है कि कल की जो टेक्नोलॉजी हो, उसमें फ़्लो ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन और भी फ़ास्ट हो जाए। बट ऑल दैट इज़ आउटसाइड। ऑल दैट इज़ द कंटेंट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन। नन ऑफ़ दैट पर्टेन्स टू द वेरी ओरिजिन ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन। मैं क्या कह रहा हूँ? टेक्नोलॉजी उसको जल्दी कम्युनिकेट कर सकती है, पर टेक्नोलॉजी मुझे यह थोड़ी सिखा पाएगी कि क्या कहने लायक है। आप अंतर समझ रहे हो? टेक्नोलॉजी ये कर देगी कि अभी ये रिकॉर्डिंग कर रहे हो। ये सब है। ये आप इसको ले जाकर के पब्लिश कर दोगे, कुछ कर दोगे। टेक्नोलॉजी ये सब कर देगी, अब जल्दी से मैंने कुछ बोला, वो बात सब तक पहुँच जाएगी। ठीक है, अच्छी बात है। पर टेक्नोलॉजी ये मुझे थोड़ी सिखा पाएगी कि क्या बोलो, क्या न बोलो। और अगर बताएगी भी, तो एक टेंपलेट से बताएगी।

टेक्नोलॉजी कैन नॉट शेड लाइट ऑन हू आई रियली ऐम। टेक्नोलॉजी मेरा साइकोलॉजिकल स्ट्रक्चर नहीं बदल सकती। टेक्नोलॉजी मेरी इनर डार्कनेस को इल्यूमिनेट, रोशन नहीं कर सकती। तो टेक्नोलॉजी, पॉलिसी, इन सब चीज़ों पर बहुत ज़्यादा, या कि एक नई जनरेशन आएगी वह सब बदल के रख देगी, इन चीज़ों पर इतना ज़्यादा निर्भर करना बेकार की बात है।

प्रश्नकर्ता: पर उससे एक जैसे फ़ियर भी तो, जो जिस कंट्री में हो रहा है वहाँ के जो लोग, जैसे हम हैं, तो उससे क्या एक फ़ियर नहीं होगा कि कभी भी कोई भी प्रोटेस्ट हो सकता है और कोई भी मुद्दा उठा सकता है? मुद्दे बहुत हैं। जैसे एक जो रिज़र्वेशन का है, उसमें बहुत सारे मूवमेंट्स ऑनलाइन हो गए हैं और एक-दो दिन में ही उनके मिलियंस ऑफ़ फ़ॉलोअर्स हो गए हैं। E20 का भी चल रहा है। तो एक मुद्दा पकड़ लिया और उसका बना लिया। तो क्या मतलब? व्हाट डज़ इट मीन फ़ॉर इंडिया? इतना डर नहीं रहेगा फिर कि कभी भी एक प्रोटेस्ट हो सकता है?

आचार्य प्रशांत: ये सब चलता रहेगा। प्रोटेस्ट भी हो जाएँगे, ये सब हो जाएगा। पर अफ़सोस मुझे यह है कि शायद वो सेंट्रल प्रॉब्लम हम देखने से इंकार ही करते रहेंगे, जिसकी वजह से इंसान का सारा दुख-दर्द है। उसके लिए जो समाधान है, वह बार-बार आपसे बोलता हूँ, आप उस पर नहीं चर्चा करना चाहते। उसका छोटा-सा नाम है। क्या नाम है? मास-बेस्ड एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ।

वह समाधान है, पर उस समाधान को आप बोरिंग समझते हो या उस समाधान से आपको डर लगता है। तो इसीलिए आप बाकी सारी चीज़ें आज़माना चाहते हो। पर मैं कह रहा हूँ, आप जो भी कुछ आज़मा रहे हो, यू हैव ट्राइड इट आउट जस्ट सो मेनी टाइम्स बिफ़ोर इन द पास्ट। कान्ट यू फ़ेड अप? गिव द न्यू थिंग अ चांस ऐट लीस्ट।

प्रश्नकर्ता: हमारे सारे क्वेश्चंस भी, सबके ही क्वेश्चंस उसको छोड़ के सब चीज़ पर।

आचार्य प्रशांत: हाँ। आप सवाल कहीं का पूछते हो, ये तो मैं उसे घसीट के ले आता हूँ इधर। सवाल तो आप इधर-उधर, हर तरफ़ के पूछना चाहते हो, बस केंद्र का सवाल नहीं पूछना चाहते, इंसान के दिल का सवाल नहीं पूछना चाहते।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, काफ़ी दिनों से ये चर्चा मैं सुन रहा हूँ। तो मेरा प्रश्न बहुत बेसिक चीज़ पर आ जाता है कि देश में एक नेता को होना कैसे चाहिए?

आचार्य प्रशांत: वो वैसा ही होगा जैसे आप हैं। आप गड़बड़ हैं। तो जब आप पूछोगे, "होना कैसा चाहिए?", तो जब कल्पना करोगे, अभी आपने काल्पनिक प्रश्न पूछा है, कि मैं कल्पना कर देता हूँ कैसा है। जैसे आप हैं, वैसे ही आपकी नेता की कल्पना होगी।

प्रश्नकर्ता: इसीलिए आपसे पूछ रहा हूँ ये प्रश्न।

आचार्य प्रशांत: तो मैं ही तो बता रहा हूँ। बात ये है ही नहीं कि नेता कैसा होना चाहिए। बात यह है कि आप जैसे हो, वैसा ही होगा। वो नियम है। हाँ, जब आप अपनी एक ग़लती से चूक जाओगे, तो आप अपनी दूसरी ग़लती को चांस दोगे। और इसको आप बोलोगे एंटी-इन्कम्बेंसी। एक तरह की ग़लती कर-करके बहुत हो गया। "दायीं तरफ़ बहुत खुजलाया। अब मैं बायीं तरफ़ खुजलाऊँगा।" उसको आप बोलोगे, "देखो, सरकार बदल दी, दुनिया बदल दी, ये कर दिया, तख्ता पलट दिया।" करा क्या है? कुछ नहीं।

आप जो सुनना चाह रहे हो, उसके लिए आपको बदलना पड़ेगा। आप जो सुनना चाह रहे हो, वो आपके बिना संभव नहीं है।

प्रश्नकर्ता: जी, धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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