
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज तक हमें भी यही पढ़ाया गया है और दुनिया यही जानती है कि जब संविधान बना, तो दूसरे देशों की प्रथाएँ और उनकी रूल्स-रेगुलेशंस को जोड़कर संविधान बनाओ। लेकिन जब आप बात करते हैं, जब आप उसे परिभाषित करते हैं, वेदांत, जिसके आप बहुत सुंदर तरीके से उसका वर्णन करते हैं, तो ऐसा लगता है कि ये दरअसल हमारी आध्यात्मिक जड़ों से और उसकी ख़ुशबू से ओतप्रोत बुना हुआ। जब आप संविधान को इस तरीके से परिभाषित करें कि दुनिया तो बहुत दूर है, वहाँ के देशों से जो हमने प्रथाएँ लीं, वो तो बहुत दूर की चीज़ें हैं। इस देश के जो ऋषि-मुनि कह गए और जिस वेदांत की व्याख्या आप करते हैं, दरअसल उसी की ख़ुशबू है। उसी के फूलों से बुना हुआ एक सुंदर गुलदस्ता है।
आचार्य प्रशांत: देखिए, सबसे पहले तो जो तर्क दिया जाता है, उसमें जो वैधता है, हमें उसे स्वीकार करना चाहिए कि जहाँ तक ढाँचे की बात आती है, फ़ॉर्म की बात आती है, स्ट्रक्चर की, उसमें हमारे संविधान ने निश्चित रूप से उस समय की जो विकसित डेमोक्रेसीज़ थीं, उनकी शब्दावली उधार ली है। बिल्कुल ऐसा हुआ है कि हमने जाकर के यूके से लिया। हमने वेस्टमिन्स्टर मॉडल देखा। हमने अमेरिका से कुछ बातें ली हैं। जब संविधान की तैयारी चल रही थी, तो सब काम कोई महीने-दो महीने में नहीं निपट गया था। ये जो कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली की प्रक्रिया थी, ये सालों तक चली थी। इसमें दुनिया भर के सभी श्रेष्ठ संविधानों का अध्ययन किया गया। तो ज़ाहिर-सी बात है कि शब्द, भाषा, ढाँचा हमने लिया है और वह आयातित है और हमें यह मानना भी पड़ेगा। लेकिन जो उसका केंद्र है, वह बिल्कुल आयातित नहीं है। बिल्कुल नहीं।
वो बिल्कुल भी आयातित नहीं है। क्यों? क्योंकि आप कहीं इसे ले भी रहे हो, तो लेने वाले तो आप हो न। दुनिया में इतनी व्यवस्थाएँ चल रही थीं। हम 1946 के आसपास से शुरू करें, जब संविधान सभा बैठी थी, तो दुनिया में इतनी व्यवस्थाएँ चल रही थीं। अब कहाँ से क्या लेना है, वो तो हमने ही तय करा न, वो विवेक तो हमारा ही था न। वो विवेक पूरी तरह से भारत-भूमि का ही है।
देखिए, हमको जब लगता है न कि हमारा संविधान बाहरी जगहों से आयातित है और कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, इधर-उधर से लेकर के हमने सिलाई करके अपना एक संविधान निर्मित कर दिया। ये सब जब हम कहते हैं न, हम कहते हैं, दूर से आया है, दूर से आया है, तो उसका एक बड़ा कारण यह है कि हम अपनी ही दर्शन-धारा से बहुत दूर हो गए हैं। हमारा ही दर्शन जब हमारे सामने लाया जाता है, तो हमें ऐसा लगता है कि कहीं दूर से आ रहा है।
प्रश्नकर्ता: इतनी अनविज्ञता क्यों है? आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: क्योंकि भारत में धर्म का जो केंद्रीय अर्थ है न, वही विकृत हो गया। देखिए, सनातन का संबंध श्रुति से है। अगर हम सनातन धर्म को लें अभी, और जब मैं धर्म कह रहा हूँ तो मेरा आशय पंथ से नहीं है। धर्म माने एसेंशियल रिलिजिसिटी, कोई एक कटी-छँटी सेक्टेरियन धारा नहीं। तो वह श्रुति का है वैदिक धर्म, वही केंद्रीय ग्रंथ है और श्रुति के आधार में दर्शन बैठा हुआ है। ठीक है न? श्रुति माने वेद, वेदांत। वेदांत वेदों का दर्शन है।
लेकिन जब हम कहते हैं कि हमने बाहर से ले लिया है, तो बाहरी हमें इसलिए लगता है, क्योंकि हमें ही हमारा दर्शन नहीं पता। हमें ही हमारा वेदांत नहीं पता। हमने ही हमारे श्रुति ग्रंथ नहीं पढ़े। लोगों से पूछिए, षड्दर्शन क्या? वो न बता पाएँ। लोगों से पूछिए, उपनिषद् कितने हैं? वो ना बता पाएँ। प्रमुख उपनिषदों के नाम पूछ लो, वो न बता पाएँ।
तो उपनिषदों का ही भाव जब हमारे सामने एक आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक भाषा लेकर संविधान बनकर आता है, तो हमें ऐसा लगता है जैसे बड़ा अपरिचित है, बड़ा दूर का है, जैसे विदेशी है। जबकि जो श्रुति का ही मर्म है, वो आध्यात्मिक लिबास छोड़ के राजनीतिक और सामाजिक कपड़े पहन करके और आधुनिक भाषा में हमारे सामने आया है और संविधान बन गया है। उसमें आप श्लोक नहीं पाएँगे। उसमें आप आत्मा, परमात्मा, बंधन और कामनाओं के प्रकार और माया की चाल, इस तरह की कोई बात नहीं पाएँगे, क्योंकि संविधान का जो क्षेत्र है वह सामाजिक है, राजनीतिक है। देश कैसे चलाना है? लेकिन कैसे चलाना है, यह बात अगर आप पारखी हों तो साफ़ देखेंगे कि संविधान श्रुति से ही उठा रहा है।
भले ही बिल्कुल ऐसा न हुआ हो कि किसी भी संविधान-निर्माता ने श्रुति को पढ़कर के कहा हो कि साहब, हमें संविधान बनाना है। बिल्कुल हो सकता है ऐसा। मैं ऐसा कोई दावा नहीं कर रहा हूँ कि श्रुति को लिया गया और फिर उसको एक सामाजिक-राजनीतिक कलेवर देकर के संविधान बना दिया गया। मैं यह नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि जब जो हमारे संविधान का मर्म है, वो श्रुति से बिल्कुल मेल खाता है। लेकिन हमने धर्म का अर्थ ही स्मृति बना दिया है। ठीक है? तो श्रुति हमें बड़ी पराई लगने लगी है। श्रुति चूँकि हमें पराई लगने लगी है इसीलिए श्रुति की सुगंध और श्रुति का मर्म जिस वक्तव्य में है, भारतीय संविधान, वो भी कई बार हमें पराया-सा लगने लग जाता है। बस यह है।
प्रश्नकर्ता: बहुत सुंदर परिभाषित किया आपने। धर्म दरअसल एक ऐसा सब्जेक्ट है कि उस पर बहुत डिबेट होती है और मैं चाहूँगी, इसको भी हम लाएँ, समझें। लेकिन लिबर्टी आपने कहा, बड़ा ख़ूबसूरत प्रिएम्बल में लिबर्टी की बात की गई है, लेकिन लिबर्टी किसको और किससे? मैं चाहूँगी, आप लिबर्टी को थोड़ा-सा अच्छे से परिभाषित किए कि संविधान की जो मूल आत्मा है, वो लिबर्टी को कैसे परिभाषित कर रही है? क्योंकि कहीं-न-कहीं आज के सिनेरियो में हम बात करें, तो आपको पता है कि लिबर्टी को कितने ग़लत तरीके से लिया जा रहा है और लिबर्टी मतलब कुछ नहीं।
आचार्य प्रशांत: बहुत सुंदर प्रश्न है। देखिए, हम संविधान के साथ और स्वतंत्रता शब्द के साथ अन्याय करेंगे, अगर हम सोचेंगे कि लिबर्टी का अर्थ है मनमर्ज़ी करने की छूट। लिबर्टी माने यह नहीं होता। लिबर्टी का वास्तविक अर्थ है, भीतर तुम्हारे जो बैठा है, जो तुम्हें ही बंधन में जकड़ करके रखता है, उससे मुक्ति। लिबरेशन फ़्रॉम द सेल्फ़। अध्यात्म में इसको बड़े रोचक तरीके से कहते हैं और एकदम समझ में आ जाए कि आम आदमी समझता है, फ़्रीडम का मतलब फ़्रीडम ऑफ़ द ईगो, कि मैं जो करना चाहूँ मुझे उसकी खुली-खुली आज़ादी होनी चाहिए। यह है फ़्रीडम या लिबर्टी। है ना?
हम कहते हैं कई बार, आज़ाद देश है और लोकतंत्र है। मैं जो चाहूँगा, करूँगा। है न? और कई बार अपने व्यक्तिगत जीवन में भी हम इस तरह की बातें करते हैं। मेरी मर्ज़ी है, मैं ऐसे करना चाहता हूँ। तुम कौन होते हो रोकने वाले? ये लिबर्टी का बड़ा उथला अर्थ है, यह विकृत अर्थ है। वास्तविक बात फ़्रीडम ऑफ़ द ईगो नहीं होती। फ़्रीडम फ़्रॉम द ईगो होती है। ठीक है? वो लिबर्टी है। कैन आई बी लिबरेटेड फ़्रॉम मायसेल्फ़, द इनर टरंट?
बाहर कोई मेरे ऊपर चढ़ जाए, मुझसे किसी तरह की ज़बरदस्ती करे, मुझे खुलकर जीने ना दे, तो उसका तो विरोध मैं करने चला जाता हूँ। पर वही जो बाहरी ताक़तें हैं, जो समय में बहती हुई आ रही हैं, जो संयोगवश हम पर छा जाते हैं, जो सामाजिक प्रभाव हैं, जो आर्थिक लालच हैं, जो स्वार्थ से जुड़े डर हैं, वही जो बाहर के हैं, जब भीतर मेरे घुस जाते हैं और मैं बन जाते हैं, तब मैं नहीं कहता कि मुझे इनसे आज़ादी चाहिए।
कोई बाहर से आकर के मुझ पर हुक्म चलाने की कोशिश करे, मैं तुरंत विरोध कर दूँगा कि नहीं, मैं स्वतंत्र हूँ और एक आज़ाद देश का नागरिक हूँ। तुम मेरे ऊपर नहीं चढ़ सकते। लेकिन वो बाहर वाला ही जब चुपचाप बड़ी चालाकी के साथ मेरे भीतर ही घुस जाता है, मान्यता बनके, प्रभाव बनके, डर बनके, लालच बनके, तब मैं उसको नाम बाहर ही नहीं देता। तब मैं उसको कहता हूँ, मैं। वो जो विचार कोई बाहर वाला लेकर के आए, तो मैं कहूँगा, बाहरी विचार है, विरोध करो। पर बाहर वाला अपना विचार, अपनी मान्यता, अपनी धारणा, अपना अंधविश्वास, अपना पूर्वाग्रह जब मेरे भीतर प्रविष्ट करा दे, इंप्लांट कर दे, चुपचाप। तो मैं कहूँगा, यह बाहरी नहीं विचार है। ये तो मेरा विचार है। अब मैं कहूँगा, मुझे मेरे विचार के अनुसार चलने की छूट दो। यही लिबर्टी है। ये कैसी लिबर्टी है?
प्रश्नकर्ता: हम हैं उसके दास।
आचार्य प्रशांत: और ये ज़्यादा गहरी दासता हो गई। क्योंकि आपका शोषक जब आपसे बाहर है, तब तो फिर भी संभावना है कि आप उसका विरोध कर लोगे।
प्रश्नकर्ता: लेकिन जो अंदर बैठा है और जिसको हम मैं मान रहे हैं, ख़ुद ही मान चुके हैं।
आचार्य प्रशांत: उसका कैसे, उसका तो समर्थन करोगे आप। ऐसे समझिए कि अंग्रेज़ बाहर थे। जो आप पर शासक बनकर चढ़ बैठे थे, वो बाहर थे। तो देश में विरोध की लहर उठती थी, क्रांति होती थी। इतने युवा आते थे, कहते थे यह बाहर वाला है, यह किसी दूसरे द्वीप से आकर के यहाँ पे क्यों चढ़ रहा है? इसका ख़ाल का रंग अलग है। तुम्हारा यहाँ क्या लेना-देना? तुम शोषण करने आए हो। और हमने बड़ा भारी विरोध किया।
आज स्थिति ज़्यादा विकट है। क्योंकि आज जो आपका शोषक है, वो जान गया है कि भाई, दुनिया भर में अब लिबर्टी है और इक्वलिटी है और डेमोक्रेसी है और रिपब्लिक्स हैं सब, तो किसी को बंदूक दिखा के तो अब नहीं दबा सकते। तो अब क्या करा जाता है कि अब भीतर घुसा जाता है, आइडियोलॉजी बनके या लालच बनकर या परंपरा बनकर या भ्रम बनकर या मिसइन्फ़ॉर्मेशन बनकर, अब आपके भीतर घुसा जाता है और भीतर घुस करके आपको भीतर से ही नियंत्रित, संचालित किया जाता है। और आप यह कहते भी नहीं कि कोई बाहर वाला मुझको काबू में रख रहा है। आप कहते हो, यह तो मेरी मर्ज़ी है।
अब यह लिबर्टी बड़ी गड़बड़ है। यह लिबर्टी नहीं चाहिए हमें। यह लिबर्टी नहीं है। यह तो लिबर्टी का बिल्कुल घातक विपरीत है। हमें लिबर्टी चाहिए उन सब बाहरी प्रभावों से, जो भीतर घुस आए हैं। भीतर के कचरे से लिबर्टी चाहिए। हमें अपनी मान्यताओं से ही अब स्वतंत्रता चाहिए। हमने हमारी जो धारणाएँ पकड़ रखी हैं, बिना परखे, बिना जाँचे।
कभी विचार नहीं करते, कभी उन पर रोशनी नहीं डालते। कभी स्वयं से नहीं पूछते कि यह जो मैं मान रहा हूँ, ये जो मैं सोच रहा हूँ, या जो भविष्य की मेरी आशाएँ हैं या अतीत की मेरी स्मृतियाँ हैं, तमाम तरह के मेरे डर हैं, तमाम जो मैंने विभाजन रेखाएँ खींची हैं, ये अच्छा, ये बुरा, ये पसंद, ये नापसंद, ये बात मेरे भीतर आई कहाँ से? मैं कहता हूँ कि ये मेरे विचार हैं, पर वो विचार मेरे भीतर प्रविष्ट किसने कराया? हम ये नहीं पूछते। ये जो मेरे भीतर नक़ली मैं बैठ गया है, हमें आज इससे लिबर्टी चाहिए।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, तो चूँकि हम इस भीतर की ग़ुलामी से जकड़े हुए हैं, तो ऐसे में यह भीतर की ग़ुलामी रिपब्लिक की आत्मा को कैसे कमज़ोर करती है?
आचार्य प्रशांत: पूरे तरीके से। बचा क्या? रिपब्लिक काग़ज़ पर छपा कोई शब्द तो नहीं। रिपब्लिक ज़मीन का कोई टुकड़ा तो नहीं। रिपब्लिक हवा में तैरती कोई व्यवस्था तो नहीं? हम रिपब्लिक चले, गणतंत्र चले, इसके लिए जो गण है माने जो व्यक्ति है, जो नागरिक है, जो इकाई है, जो चेतना की फ़ंडामेंटल यूनिट है, हम उसको चैतन्य तो होना पड़ेगा न। अगर मैं भीतर से बेहोश हूँ, तो कौन-सी फिर डेमोक्रेसी, कौन-सी लिबर्टी, कौन-सा सोशलिज़्म? कुछ नहीं बचता है, क्योंकि करना तो सब मुझे ही है न? बाक़ी सब तो अक्षर हैं, शब्द हैं, सिद्धांत हैं, बातें हैं। उनसे कुछ नहीं होता। उन सबको जीने वाला, उन सबको कार्यान्वित करने वाला तो मनुष्य ही है न। और अगर मनुष्य की ही चेतना बेहोश हो गई, तो उसके बाद शब्द धरे के धरे रह जाते हैं।
हम जिसको लोकतंत्र कहते हैं, आप जानते ही हैं, वो भीड़तंत्र बन जाता है। भले ही फिर हम नाम के रिपब्लिक रह जाएँ और सोशलिस्ट रह जाएँ और सेक्युलर रह जाएँ, ये वो, सॉवरेन रह जाएँ। लेकिन आप सॉवरेन कैसे रह जाएँगे? हम कहते हैं कि हम संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न हैं। पर अगर इतना लालच छा जाए, सोचिए कोई देश ऐसा हो, कोई छोटा देश है। छोटे देश का उदाहरण ले लेते हैं। कोई द्वीप है, उसमें बहुत लोग नहीं रहते हैं। घोषित उसने भी कर रखा है कि वो सॉवरेन है। पर कोई बड़ा देश उस पर चढ़ बैठे और वह जो छोटा-सा द्वीप है, वो बिकने को ही तैयार हो जाए। अब?
संप्रभु तो आप तब होंगे न, जब पहले भीतर संप्रभुता हो। जो आम नागरिक है, अगर वही स्वार्थवश झुकने को तैयार हो, थोड़ा कड़वा शब्द है, लेकिन बिकने को तैयार हो, तो फिर राष्ट्र में कैसे संप्रभु रह पाएगा?
**राष्ट्र ऊँचा रह पाए, आज़ाद रह पाए, रीढ़ सीधी रख पाए, इसके लिए ज़रूरी है कि पहले नागरिक ऐसा हो जो भीतर से जगा हो, जिसके भीतर प्रकाश हो, जो जानता हो कि अपने और पराए में अंतर क्या है। क्या मैंने स्वयं जाना है और क्या मुझे बस परंपरा से और अंधविश्वास से और समाज से और मीडिया से और इधर-उधर की बातों से मिल गया है। जिसको ये सार-असार का विवेक ही नहीं है, उसके लिए कौन-सा सोशलिज़्म, कौन-सी डेमोक्रेसी? उसके लिए कुछ भी नहीं है।
प्रश्नकर्ता: यानी कि आचार्य जी, आप ये कह रहे हैं कि जो लोकतंत्र की चेतना है, उस चेतना का चैतन्य होना बहुत ज़रूरी है। और मैंने आपको सुना भी था, आपने कोट किया था कि जो लोकतंत्र है या डेमोक्रेसी है, वो डेंजरस बन जा रही है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, बिल्कुल। क्योंकि फिर तो बहुमतवाद चलेगा न। हम बहुमत में हैं, तो हम अपनी चलाएँगे। एक सामूहिक बेहोशी बन जाएगी डेमोक्रेसी।
प्रश्नकर्ता: बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ा, आचार्य जी। आज, आज बहुमत ही सर्वमान्य है। बहुमत है तो यह सही है, बहुमत है तो यह बिल पास…।
आचार्य प्रशांत: बहुमत में कोई बुराई नहीं है। बुराई है उन लोगों में जो बहुमत में हैं, अल्पमत में हैं। जब हम कहते हैं कि बहुमत में बुराई है, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम कह रहे हो कि अल्पमत में अच्छाई है। अरे, सब सोए हुए हैं। जो बहुमत में है, वो भी सोए हुए हैं। जो अल्पमत में है, वो भी बेहोश हैं। तो देखिए, यह सब कर्म है। यह सब बाहरी ढाँचे हैं। यह सब गिनतियाँ हैं, यह बाहर की बात है। इनके केंद्र में इंसान बैठा हुआ है।
डेमोक्रेसी बहुत अच्छी व्यवस्था है। लेकिन वह माँगती है एक जगा हुआ इंसान। और अगर वह ज़मीन नहीं दी जा रही है लोकतंत्र को, तो लोकतंत्र की फ़सल बड़ी आधी-अधूरी उगेगी और यह भी हो सकता है कि उसमें कुछ विषाक्त भी हो।