लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज तक हमें भी यही पढ़ाया गया है और दुनिया यही जानती है कि जब संविधान बना, तो दूसरे देशों की प्रथाएँ और उनकी रूल्स-रेगुलेशंस को जोड़कर संविधान बनाओ। लेकिन जब आप बात करते हैं, जब आप उसे परिभाषित करते हैं, वेदांत, जिसके आप बहुत सुंदर तरीके से उसका वर्णन करते हैं, तो ऐसा लगता है कि ये दरअसल हमारी आध्यात्मिक जड़ों से और उसकी ख़ुशबू से ओतप्रोत बुना हुआ। जब आप संविधान को इस तरीके से परिभाषित करें कि दुनिया तो बहुत दूर है, वहाँ के देशों से जो हमने प्रथाएँ लीं, वो तो बहुत दूर की चीज़ें हैं। इस देश के जो ऋषि-मुनि कह गए और जिस वेदांत की व्याख्या आप करते हैं, दरअसल उसी की ख़ुशबू है। उसी के फूलों से बुना हुआ एक सुंदर गुलदस्ता है।
आचार्य प्रशांत: देखिए, सबसे पहले तो जो तर्क दिया जाता है, उसमें जो वैधता है, हमें उसे स्वीकार करना चाहिए कि जहाँ तक ढाँचे की बात आती है, फ़ॉर्म की बात आती है, स्ट्रक्चर की, उसमें हमारे संविधान ने निश्चित रूप से उस समय की जो विकसित डेमोक्रेसीज़ थीं, उनकी शब्दावली उधार ली है। बिल्कुल ऐसा हुआ है कि हमने जाकर के यूके से लिया। हमने वेस्टमिन्स्टर मॉडल देखा। हमने अमेरिका से कुछ बातें ली हैं। जब संविधान की तैयारी चल रही थी, तो सब काम कोई महीने-दो महीने में नहीं निपट गया था। ये जो कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली की प्रक्रिया थी, ये सालों तक चली थी। इसमें दुनिया भर के सभी श्रेष्ठ संविधानों का अध्ययन किया गया। तो ज़ाहिर-सी बात है कि शब्द, भाषा, ढाँचा हमने लिया है और वह आयातित है और हमें यह मानना भी पड़ेगा। लेकिन जो उसका केंद्र है, वह बिल्कुल आयातित नहीं है। बिल्कुल नहीं।




