Navbharat Times
30 Aug '26

नेपाल त्रासदी: सच छुपाने की कोशिश क्यों?

Acharya Prashant

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नेपाल त्रासदी: सच छुपाने की कोशिश क्यों?
नेपाल की बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानना असली कारण से बचना है। ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का फटना और हिमालय का अस्थिर होना बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट से जुड़ा है। इसके पीछे हमारी अंधी उपभोग-वासना, विकास की गलत समझ और प्रकृति के शोषण की प्रवृत्ति है। हिमालय की तबाही भारत के जल, खेती और भविष्य से भी जुड़ी है। समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संयम और अपनी कामनाओं को समझने में है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Navbharat Times on 30 August '26

जरा कल्पना कीजिए। सुबह के नौ बज रहे हैं। त्रिशूली नदी के किनारे दुकानें रोज की तरह खुल रही हैं; तीर्थयात्री कैलाश की ओर निकल रहे हैं; पानी के किनारे बनी पनबिजली परियोजनाओं पर मजदूरों की शिफ्ट शुरू हो चुकी है। साठ साल का कोई तीर्थयात्री जो मैदानी इलाकों के किसी शहर से आया है, उसने एक दिन पहले ही कैलाश की परिक्रमा पूरी की है और आज सुबह सीमा की ओर लौट रहा है। उसके फोन में अभी भी तस्वीरें हैं और वो इसी गुमान में है, जैसा कि कोई भी आम व्यक्ति सोचेगा, कि उसने अपने जीवन में कुछ बड़ा, कुछ सार्थक कर लिया है। नौ बजे वो सड़क पर है। सब कुछ एक आम सुबह जैसा ही लग रही है। और तभी यकायक पर्वत दहाड़ उठता है।

26 अगस्त की सुबह, नेपाल सीमा से करीब बीस किलोमीटर उत्तर में तिब्बत में ल्हेंदे नदी के बहुत ऊपर एक ग्लेशियर से बर्फ और चट्टान का एक विशाल टुकड़ा टूटकर नीचे नदी में गिर गया। पानी का बहाव रुक गया। पानी रुका, इकट्ठा हुआ, ऊपर उठा, और जब वो इतनी मात्रा में जमा हो गया कि उसने अपनी ही बनाई दीवार को तोड़ दिया, तो वो एक साथ नेपाल के रसुवा ज़िले में आ गिरा। वो अपने साथ सब कुछ बहा ले गया। पूरे के पूरे गाँव, पुल, सड़कें, किनारे पर बनी एक दर्जन से अधिक पनबिजली परियोजनाएँ, सब कुछ। गिनती अभी भी जारी है।

सैकड़ों लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है, ये आंकड़ा अभी भी बढ़ रहा है और हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। जैसे-जैसे घंटे बीत रहे हैं, उनके जीवित मिलने की उम्मीदें भी कम होती जा रही हैं। लापता लोगों में सैकड़ों विदेशी नागरिक हैं जिनमें भारतीय, अमेरिकी, ब्रिटिश और ऑस्ट्रेलियाई तीर्थयात्री शामिल हैं जो कैलाश के पवित्र मार्ग पर निकले थे। पहाड़ ने किसी का पासपोर्ट चेक नहीं किया। हमारा वो साठ वर्षीय तीर्थयात्री भी लापता लोगों की सूची में है।

मरने वालों की संख्या का इतना अधिक होना महज़ बाढ़ का ही किया-धरा नहीं है। ये इस बात का भी सबूत है कि पानी के रास्ते में आपके लालच ने कितना कुछ खड़ा कर दिया है। बस्तियां, बाँध और सीमा चौकियां उन नदियों के किनारे बसा दी गई हैं जिनके बारे में लंबे समय से मालूम है कि वे बिल्कुल ऐसा ही करती हैं। और ये कोई मानसूनी बाढ़ नहीं थी। ये वो बारिश नहीं थी जिसे ज़मीन सोख न सके। ये दूसरी तरह की बाढ़ थी, वो बाढ़ जिसे अब बारिश की कोई दरकार नहीं होती और ऐसी बाढ़ जिसके आने का अनुमान शायद ही कोई मौसम विभाग लगा सके।

और यहीं पर वो बात आती है जिसे ये 'बाढ़' शब्द बड़ी चालाकी से छिपा ले जाता है। उस दिन कोई बारिश नहीं हुई थी। कोई बादल नहीं फटा था। ये आपदा आसमान से पानी बनकर नहीं गिरी, बल्कि पहाड़ से बर्फ़ के रूप में नीचे आई। ग्लेशियर टूटा और उसका एक हिस्सा नदी में आ गिरा। और ग्लेशियर क्यों टूटा? क्योंकि हिमालय सुलग रहा है, गर्म हो रहा है।

जब बर्फ के एक विशाल पिंड को गर्मी दी जाती है, तो वो टूटता ही है। बढ़ती गर्मी बर्फ़ को कमज़ोर करती है और उस पर्माफ्रॉस्ट को पिघला देती है जो खड़ी ढलानों को आपस में बांधे रखता है। इसी वजह से हिमस्खलन, भूस्खलन और अचानक झीलों का फटना आम होता जा रहा है। इस खास सुबह गर्मी ने ही ट्रिगर दबाया था या नहीं, ये तय करने में वैज्ञानिकों को महीनों लग जाएंगे। लेकिन जो बात पहले से तय है वो ये है कि गर्मी ने बंदूक को लोड कर दिया था और वो दशकों से इसे लोड कर रही है। असली कारण यही है, ट्रिगर चाहे जो भी हो।

फिर भी, आप खंगाल लें पूरी कवरेज। बहुत देर तक पढ़ते रहें और उस एक शब्द से आपका सामना नहीं होगा जो इस पूरी घटना की असल व्याख्या करता है। उस शब्द के बजाय आपके सामने शब्दों का एक ऐसा मायाजाल फेंका जाएगा जो सच्चाई से बचने के लिए ही गढ़ा गया है। "बादल फटना," "प्राकृतिक आपदा," "अप्रत्याशित घटना," "अभूतपूर्व," "प्रकृति का प्रकोप," "ईश्वर की मर्ज़ी।" और तीर्थयात्रियों के बारे में ये मूर्खतापूर्ण बात लिखी मिलेगी कि ईश्वर को वे इतने प्रिय थे कि उसने उन्हें अपने पास बुला लिया।

ये घिनौना है। हर चीज़ का नाम लिया जाता है, जैसे बुरी किस्मत, खोए हुए तीर्थयात्री, तबाह हुई व्यापारिक चौकियां, पानी का विशाल पैमाना। लेकिन जिस एक शब्द को सिर्फ बोलना नहीं बल्कि चिल्लाकर कहना चाहिए, यानी जलवायु, उसी से कन्नी काटी जा रही है। कुछेक रिपोर्टों ने इसका इस्तेमाल किया भी है तो बस एक लिस्ट में एक आइटम की तरह, एक लेबल की तरह जिसे लगाकर आप भूल जाते हैं। शायद ही किसी ने रुककर पूछा हो कि इस शब्द का असल अर्थ क्या है या ये किसकी ओर इशारा कर रहा है। ये अनदेखी कोई चूक नहीं है।

ये कैसी साज़िश है? और ये किसे धोखा देने के लिए रची गई है? ये सबसे पहली और सबसे गहरी आपदा है, उस सच को देखने से इनकार करना जो पहले ही सामने है और जो सालों से हर चेतावनी सूची में दर्ज़ है। उस एक शब्द की जगह हर चीज का नाटक चल रहा है। राजनेता संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं, मॉडर्न गुरु आशीर्वाद और आंसू बहा रहे हैं, रिपोर्टर मलबे पर चढ़कर इंटरव्यू के लिए किसी बचे हुए इंसान को ढूँढ़ रहे हैं।

दुख सच्चा है और सम्मान का हकदार है, लेकिन इसकी आड़ में असली कारण का नाम तक नहीं लिया जाता, जबकि अगला ग्लेशियर अभी से टूटने की कगार पर है। अगर आज कोई पाठक एक काम करना चाहता है, तो वो उन प्रकाशनों का ऑडिट कर सकता है जिन्हें वो पैसे देता है, और उन लोगों को पैसे देना बंद कर सकता है जिनके पास इस शब्द के लिए कोई जगह नहीं है। अगर हम बस अपना ये व्यर्थ शोर बंद कर दें, तो हमें बर्फ़ के चटकने की आवाज़ साफ़ सुनाई देगी। और सुन लें, वो किसी विदेशी नक्शे पर नहीं चटक रही है। वो उस नक्शे पर चटक रही है जिसकी आप पूजा करते हैं।

एक ही नदी, दो बार और ये कोई पहली बार नहीं हुआ था। ठीक इसी तरह से चौदह महीने पहले 2025 की गर्मियों में यही छोटी सी नदी उफान पर आ गई थी, जब तिब्बत में ऊपर पहाड़ों की भारी गर्मी के कारण एक ग्लेशियल झील उफनी और बिना किसी चेतावनी के बह निकली। उसमें नौ लोग मारे गए और दोनों देशों को जोड़ने वाला पुल बह गया। उससे एक साल पहले अगस्त 2024 में एवरेस्ट क्षेत्र में थामे गाँव के ऊपर दो झीलें फूट पड़ी थीं।

इससे लगभग 4,59,000 घन (क्यूबिक) मीटर पानी खाली हो गया था, जो लगभग एक सौ अस्सी ओलंपिक पूलों के बराबर होता है। उस पानी ने चट्टान और मलबे को घाटी में अस्सी किलोमीटर नीचे तक धकेल दिया था। इससे पच्चीस घर नष्ट हो गए थे और एक सौ पैंतीस लोग विस्थापित हुए थे। सितंबर 2024 में नेपाल ने 1970 के बाद से सबसे भारी बारिश झेली और तीन सौ से अधिक लोग मारे गए। एक छोटी नदी। चौदह महीने। दो भयानक त्रासदियां। ये कोई संयोग नहीं है, ये एक साफ़ पैटर्न है। ये कोई इकलौती घटना नहीं है, ये एक पूरी प्रक्रिया है।

इसमें से कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था और यही वो बात है जिसे माफ़ करना सबसे मुश्किल होना चाहिए। पाँच साल पहले इस क्षेत्र के पर्वतीय अनुसंधान संस्थान ICIMOD ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर उन ग्लेशियल झीलों की एक सूची तैयार की थी जिनके नेपाल की नदियों में फटने की सबसे अधिक आशंका थी। उन्होंने ऐसी सैंतालीस झीलों को खतरनाक पाया था, जिनमें इक्कीस नेपाल के अंदर, पच्चीस सीमा पार तिब्बत में और एक भारत में थी।

जिस कॉरिडोर में इस हफ्ते बाढ़ आई, उसका नाम भी उनमें शामिल था। नेपाल ने 1970 के दशक के अंत से अब तक ऐसे छब्बीस विस्फोट दर्ज किए हैं। ये सिलसिला कम से कम 1985 तक जाता है, जब एक झील ने पनबिजली स्टेशन को नष्ट कर दिया था। अब ये देश प्राकृतिक आपदाओं में हर साल औसतन तीन सौ से ज्यादा जानें और एक करोड़ सत्तर लाख डॉलर (17 मिलियन डॉलर) से अधिक का नुकसान उठाता है, और इसमें बर्फ़ और पानी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।

2016 में एक बेहद खतरनाक झील का पानी निकालकर उसे सुरक्षित स्तर तक लाया गया था, बाकियों को वैसे ही छोड़ दिया गया। इस बाढ़ ने किसी ऐसी जगह पर हमला नहीं किया जिसे कोई देख नहीं रहा था। ये उस जगह पर आई जिसे सालों से एक आधिकारिक सूची में कागज़ पर खतरे के निशान के साथ दर्ज़ किया गया था। हर एक झील का पानी निकाला जाना चाहिए, और उन्हें खाली करने से महज़ कुछ साल मिलेंगे, ये कोई स्थायी इलाज नहीं है। ये झीलें तो बस वो जगहें हैं जहाँ आपकी अंधी कामनाएँ और वासनाएं इकट्ठा हो गई हैं।

ये समझना ज़रूरी है कि गर्मी असल में एक पहाड़ के साथ करती क्या है, क्योंकि रिपोर्टें शायद ही कभी ये बात आपको बताती हैं। एक साथ तीन चीज़ें होती हैं। ग्लेशियर पतले हो रहे हैं और एक पतला होता ग्लेशियर सलीके से नहीं पिघलता, वो दरकता है। कोई ये भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि पर्वत श्रृंखला के साठ हज़ार ग्लेशियरों में से कौन सा ग्लेशियर अगली बार बर्फ़ का एक बड़ा हिस्सा गिराएगा या वो कहाँ गिरेगा। यही कारण है कि ज़्यादा सेंसर और बेहतर भविष्यवाणियां, अपने तमाम उपयोगों के बावजूद सिर्फ कुछ मिनट ही खरीद पाएंगी, दशक नहीं। वे किसी गाँव को भागने के लिए कह सकती हैं, वे बर्फ़ को रुकने के लिए नहीं कह सकतीं।

पर्माफ्रॉस्ट, यानी वो स्थायी रूप से जमा हुआ धरातल जिसने इन युवा और अभी भी ढीले पहाड़ों को सहस्राब्दियों से आपस में बांधे रखा है, वो पिघल रहा है। इसलिए ढलानें अपना गोंद या पकड़ खो रही हैं और चट्टानें खिसकने लगी हैं। और वो बर्फ़ जो कभी गिरती थी और जम जाती थी, जो सूखे महीनों के लिए पानी को सहेज कर रखती थी, वो अब ज़्यादातर बारिश के रूप में गिरती है। वो टिकती नहीं है बल्कि तुरंत एक झटके में बाढ़ बनकर बह निकलती है।

पिघलना कोई आस्था का विषय नहीं है। नेपाल की उसी घाटी में, जिसे इस बाढ़ ने तबाह कर दिया, एक ऐसा ग्लेशियर है जिसने 1970 के दशक के बाद से अपना दो-तिहाई द्रव्यमान खो दिया है और वो लगभग आठ सौ मीटर पीछे खिसक गया है। उम्मीद है कि 2040 के दशक तक ये पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। पिछले साल वैज्ञानिकों, अधिकारियों और बौद्ध भिक्षुओं ने पाँच हज़ार मीटर से ऊपर चढ़कर इस ग्लेशियर का अंतिम संस्कार किया। एशिया में कहीं भी किसी ग्लेशियर के लिए ये अपनी तरह का पहला समारोह था।

वहां उन्होंने चट्टान में एक पट्टिका लगाई जिसमें उस महीने हवा में मौजूद कार्बन का स्तर दर्ज़ किया गया था, जो 426 पार्ट्स पर मिलियन था। विचार करो कि वो पट्टिका क्या है। वो कोई मापन नहीं है। मापन तो हर दिन उन मशीनों द्वारा किया जाता है जो किसी चीज़ के लिए शोक नहीं मनातीं। वो एक स्वीकारोक्ति है जिसे उन लोगों ने मौके पर ही पत्थर पर उकेरा है जो खुद की करतूत को देखने के लिए ऊपर चढ़कर गए थे। इस पूरी कहानी में ये इकलौता क्षण है जहां पहाड़ और इंसान की भीतरी दुनिया का मिलन होने दिया गया, और सोचिए, उसके लिए भी एक दुखद त्रासदी की ज़रूरत पड़ी।

इस त्रासदी के पीछे के आंकड़े कुछ इस तरह हैं। हिमालय अपने नीचे के मैदानों की तुलना में वैश्विक दर से एक-तिहाई से लेकर तीन-चौथाई डिग्री ज़्यादा तेज़ी से गर्म हो रहा है, क्योंकि विरल और ऊंचाई वाली हवा निचली और घनी हवा की तुलना में ज़्यादा आसानी से गर्म होती है। इनकी बर्फ़ अब सदी की शुरुआत के मुकाबले लगभग दोगुनी तेज़ी से गायब हो रही है और पिछले पूरे दशक में उससे पहले वाले दशक की तुलना में लगभग पैंसठ प्रतिशत अधिक तेज़ी से पिघली है। 1970 के दशक से अब तक पहाड़ों ने सत्ताईस मीटर तक बर्फ़ की मोटाई खो दी है, और पिछले साल इस क्षेत्र में दो दशकों से अधिक समय में सबसे पतली बर्फ की चादर देखी गई।

ये तीसरा ध्रुव है जो आर्कटिक और अंटार्कटिक के बाहर बर्फ़ का सबसे बड़ा भंडार है। इसमें साठ हज़ार ग्लेशियर हैं जो लगभग छह हज़ार घन किलोमीटर बर्फ़ रोके हुए हैं और एशिया की दस विशाल नदी घाटियों को सींचते हैं। इनमें से मुट्ठी भर की ही किसी अंतर्राष्ट्रीय मानक पर निगरानी की जाती है और ज्यादातर के इस सदी के अंत तक खत्म हो जाने की आशंका है।

इसके पार लगभग दो सौ ग्लेशियल झीलें अब खतरनाक श्रेणी में हैं, और उनके फटने का जोखिम चरम पर पहुँचने से पहले ही अगली एक चौथाई सदी तक लगातार बढ़ने की उम्मीद है। इस तरह की बाढ़ एक लाइफस्टाइल बीमारी है। दिल का दौरा किसी मंगलवार को अचानक कहीं से नहीं आ जाता, वो उस चीज़ का अचानक और दिखाई देने वाला रूप है जो बिना किसी लक्षण के तीस सालों से आपके भीतर पनप रही थी। बिना बारिश की बाढ़ भी ठीक ऐसी ही बीमारी है, फर्क बस इतना है कि यहां दायरा एक शरीर का नहीं, बल्कि पूरी पर्वत श्रृंखला का है।

और ये बाढ़ें तो उस चीज़ का सिर्फ शोर मचाने वाला हिस्सा हैं जो भविष्य में आने वाली है। इसे ग्लेशियोलॉजिस्ट 'पीक वाटर' कहते हैं। अभी के लिए महान नदियां पूरी तरह से भरी हुई बह रही हैं, जीवित स्मृति में सबसे ज़्यादा भरी हुई, क्योंकि बर्फ़ उसके दोबारा बनने की दर से कहीं अधिक तेज़ी से पिघल रही है। लेकिन ये भराव भविष्य के खाते से लिया गया उधार है। ये ग्लेशियर उपमहाद्वीप के सबसे पुराने फिक्स्ड डिपॉजिट हैं जो दस हज़ार सर्दियों में जमा हुए हैं।

सौ सदियों तक हम इसके ब्याज पर, यानी एक आम गर्मी में होने वाले आम पिघलाव पर जीते आए हैं। अब उस जमा-पूंजी को तोड़ा जा रहा है और उसे करंट अकाउंट में डाला जा रहा है, और पहली बार हम सिर्फ ब्याज नहीं बल्कि मूलधन ही खर्च कर रहे हैं। 2050 के आसपास इन ग्लेशियरों से मिलने वाले बहाव के अपने चरम पर पहुंचने और फिर हर साल थोड़ा कम होने की उम्मीद है। नतीजतन वही नदियां ज़्यादा उग्र मानसूनी बाढ़ और ज़्यादा सूखे व हताश कर देने वाले वसंत के बीच झूलेंगी।

समय के साथ उनका बारहमासी होना ही बंद हो जाएगा, वे सिर्फ उतना ही पानी ले जाएंगी जितना मानसून उन्हें देगा। यहां तक कि उनमें से सबसे पवित्र नदियां भी इसका अपवाद नहीं हैं। वर्तमान रफ्तार से 2100 तक इस क्षेत्र की अस्सी प्रतिशत बर्फ़ खत्म हो जाएगी। यहाँ तक कि अगर दुनिया वार्मिंग को उस सबसे कम सीमा तक भी रोक ले जिसका उसने खुद से वादा किया है, तब भी इसका एक-तिहाई हिस्सा चला जाएगा। नीचे मैदानों में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों और खुद पहाड़ों में रहने वाले चौबीस करोड़ लोगों को अपना जीवन उस पानी के इर्द-गिर्द फिर से रचना होगा जो अब किसी कैलेंडर के हिसाब से नहीं चलता। ऐसा इसलिए क्योंकि ऊंचे गाँवों को सींचने वाले हर पाँच में से चार से अधिक झरने इसी बर्फ़ पर निर्भर हैं।

गंगा की एक भुजा

और भारत में किसी को ये मुगालता नहीं पालना चाहिए कि ये किसी पड़ोसी की त्रासदी है। नक्शा देखो। जो नदी उफनी, वो त्रिशूली का उद्गम है, और त्रिशूली नारायणी को जल देती है जो भारत में गंडक के रूप में प्रवेश करती है, बिहार से होकर बहती है और पटना के थोड़ा ऊपर गंगा में मिल जाती है। ये वही गंडक है जिसकी नहरें सीमा पर वाल्मीकिनगर बैराज से निकाली गई हैं और बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में लाखों एकड़ खेतों की सिंचाई करती हैं। रसुवा में इस हफ्ते जो पानी तबाही बनकर उतरा है, वही पानी थोड़ा नीचे आकर और थोड़े समय बाद हमारे खेतों की सिंचाई और हमारे घाटों की आरती का जल है।

जिन तीर्थयात्रियों की जान गई, वे भारत की जिस पवित्र भूमि पर चल रहे थे, सच ये है कि वो पूरी की पूरी भूमि अब पिघल रही है। कैलाश और गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ, सब उसी पिघलती हुई बर्फ पर खड़े हैं। जिस नक्शे की हम पूजा करते हैं और जो नक्शा ढह रहा है, वे दोनों एक ही हैं। अगर इसमें से कुछ भी आपके लिए अब भी पवित्र है, तो समय की माँग ये नहीं है कि इन पहाड़ों पर चढ़ाई की जाए या उन पर खड़े होने के अहंकार में शेखी बघारी जाए, बल्कि उन्हें बचाया जाए। क्योंकि देवताओं का निवास एक चौंकाने वाली गति से बंजर और ढहती हुई चट्टानों में बदल रहा है। ये बर्फ़ ही है जो इन युवा पहाड़ों को एक साथ जोड़े रखती है। इसे हटा दो तो ये कोई प्राकृतिक नज़ारा नहीं बल्कि धीमी गति से गिरता हुआ मलबा है। तो फिर हिमालय के बिना भारत क्या होगा?

ये नाता सिर्फ नक्शों का नहीं है। जब कोई हिमालयी ग्लेशियर टूटता है तो उसके साथ आने वाली गाद मैदानों की नदियों के तल में बैठ जाती है और उन्हें उथला कर देती है। एक उथली नदी हर मॉनसून के साथ और अधिक भयंकर बाढ़ लाती है। बिहार पहले से ही भारत का सबसे अधिक बाढ़-ग्रस्त राज्य है और इसकी ज़्यादातर बाढ़ नेपाल से इन्हीं नदियों के ज़रिए आती है। सीमा पर बने बैराज खोल दिए जाते हैं और कुछ ही घंटों में पानी चंपारण और सारण के खेतों में पहुँच जाता है। सीमा पार नेपाल के चितवन और उससे सटे भारत के वाल्मीकि रिज़र्व के जंगलों में घड़ियाल और गंगा की डॉल्फ़िन इसी पानी में रहती हैं। दूसरे शब्दों में, त्रिशूली कोई विदेशी नदी नहीं है, ये गंगा की ही एक भुजा है।

हिमालय पर जो घाव लगता है उसका खून नीचे मैदानों में बहकर आता है, सीधे भारतीय मैदानों में। और फिर भी हम इन पहाड़ों के साथ किसी मेले जैसा सुलूक कर रहे हैं। तीर्थयात्रियों के साथ नहीं जो पैदल चलते थे, बल्कि उस मशीनरी के साथ जिसे हमने बाकी लोगों को बिना चले ऊपर ले जाने के लिए बनाया है। हम सड़कों को चौड़ा करते हैं, हेलीपैड बनाते हैं और रेलवे को और ऊपर तक ले जाते हैं। हम धरती के सबसे नाज़ुक भूभाग में अधिकाधिक ट्रैफ़िक को आमंत्रित करते हैं और अपनी मूर्खता में इसे 'विकास' कहते हैं। हर सड़क जो पिघलते हुए पहाड़ की गहराई में धँसती है, वो पहले से खून बह रहे शरीर में एक और घाव है। ये विकास नहीं है। ये आपकी वही वासना है जो अब छुट्टियों का चोला पहन कर आ रही है।

तो इस मांग की कीमत भी चुकाओ, इसका बिल भरो। हिमालय सस्ते पर्यटन की जगह नहीं है और पहला ईमानदार कदम इसे टोल गेट पर ही स्पष्ट करना है। इसमें प्रवेश करने वाली हर सड़क पर एक भारी एंट्री फीस हो और जाने वाले हर वाहन पर एक भारी टैक्स लगे, इतना भारी कि वो आपको महसूस हो, सज़ा के तौर पर नहीं बल्कि न्याय के तौर पर।

जो भी ऊपर जाए उसे जाने की पूरी कीमत चुकानी चाहिए, और उस पूरी कीमत में वो कीमत भी शामिल है जो पहाड़ को चुकानी पड़ती है। लेकिन यहाँ तो उल्टा ही चल रहा है। आमंत्रण इस तरह है कि आओ, अपनी एसयूवी और चार्टर्ड बसों में आओ। और अगर वो भी असुविधाजनक है तो हम हेलीपैड के लिए पहाड़ काट देंगे और रेलवे को चोटी तक ले जाएंगे, क्योंकि यही तो विकास है। नहीं, ये मौत है।

बर्फ़ किसी एक सरहद पर नहीं रुकती, क्योंकि उसे कभी भी उस तरह से नहीं बांटा गया जैसे नक्शे को बांटा गया है। हिमालय और काराकोरम की बर्फ़ का एक अखंड शरीर तिब्बत, नेपाल, भूटान, भारत और पाकिस्तान में फैला हुआ है। ये इन सभी जगहों पर एक ही तंत्र से विफल होता है और हर विफलता के बाद वही बेवक़ूफ़ी दोहराई जाती है। अक्टूबर 2023 में सिक्किम के ऊपर एक झील टूट गई जिसने बारह सौ मेगावाट का एक बांध नष्ट कर दिया और पचास से अधिक लोगों की जान ले ली।

उसके बाद एक जांच हुई, एक रिपोर्ट बनी और झीलों पर सायरन लगाने का वादा किया गया। 2021 में उत्तराखंड के चमोली में एक चोटी से चट्टान और बर्फ़ का एक विशाल हिस्सा टूटकर गिरा और लगभग दो सौ लोग मारे गए। उसके बाद एक जांच हुई, एक रिपोर्ट बनी और एक फंड बनाया गया। भूटान ने 1994 में एक झील के कारण इक्कीस जानें खो दीं और पिछले तीस साल वो उसके बगल वाली झीलों का जल स्तर कम करने में लगा रहा। पाकिस्तान में तीन हज़ार से अधिक ग्लेशियल झीलें हैं जिनमें से तैंतीस खतरनाक हैं और सत्तर लाख लोग उनके रास्ते में आते हैं। उसने दुनिया के किसी भी देश से अधिक आउटबर्स्ट दर्ज किए हैं और वहां की चेतावनी प्रणालियों को इस पूरी पर्वत श्रृंखला में सबसे अच्छी फंडिंग मिलती है। लेकिन अगली आपदा फिर भी आई।

हर बार यही हुआ, क्योंकि सायरन, रिपोर्टें और फ़ंड पानी को पकड़ने के लिए बनाए गए थे और उनमें से कोई भी गर्मी तक पहुँचने के लिए नहीं बना था। दुनिया भर में लगभग डेढ़ करोड़ लोग अब किसी ग्लेशियल झील के कुछ किलोमीटर के दायरे में रहते हैं जिनमें से आधे से ज़्यादा इन्हीं पहाड़ों में हैं। इनमें से कुछ जगहों पर आपदा पहले ही आ चुकी है, बाकी बस इंतज़ार कर रही हैं। पिघले हुए पानी के लिए नक्शे की सरहदों का कोई मतलब नहीं होता।

वो कारण जो पहाड़ में नहीं है

अब वो सवाल पूछो जो कोई नहीं पूछ रहा, वो सवाल जिसने इस बात को ज़ोर से कहना सार्थक बनाया। ग्लेशियर को किसने गर्म किया? मानसून ने नहीं, जो आया ही नहीं। पहाड़ ने नहीं, जिसने सिर्फ बर्फ को संभाल कर रखा था। ये हमने किया है। नेपाल के लोगों ने नहीं जिन्होंने लगभग कुछ नहीं जलाया, बल्कि हम सबने, पूरी मानवता ने, और जीवन जीने के उस तरीके ने जिसे हमने 'सामान्य' कहना स्वीकार कर लिया है। जब बाहरी दुनिया में कुछ टूटता है तो आपकी पहली प्रवृत्ति कारण की तलाश में बाहर की ओर भागने की होती है। आप भागते रहते हैं, बाढ़ का सुराग झील में, झील का ग्लेशियर में और ग्लेशियर का सुराग एक ग्राफ पर उठती हुई रेखा में खोजते हुए। और उस बाहरी यात्रा में किसी भी बिंदु पर ये खोज पलटकर उस इंसान को नहीं देखती जो ये सब संचालित कर रहा है।

बाहर उपकरण हैं, भीतर कोई उपकरण नहीं है। हम नदी को सेंटीमीटर तक और हवा को डिग्री के दसवें हिस्से तक नाप सकते हैं, लेकिन उस अंधी कामना के बारे में जिसने इस पूरी मशीनरी को गति दी है, हम लगभग कुछ नहीं कह सकते। उसके लिए कोई डायल नहीं बना है और कोई सैटेलाइट अंदर की ओर मुड़कर नहीं देख सकता। एक कैमरा कीचड़ दिखा सकता है और मृतकों की गिनती कर सकता है। वो उस वासना की तस्वीर नहीं खींच सकता जिसने बर्फ़ को गर्म किया, क्योंकि वो कामना तिब्बत में या मानसून में या नदी में नहीं है। वो उन सबसे कहीं ज़्यादा करीब है और आपके भीतर बहुत बेहतर तरीके से छिपी हुई है।

वो कामना कोई अनोखी चीज़ नहीं है और ये किसी और की नहीं है। जलवायु संकट कोई तकनीकी समस्या नहीं है। ये इंसान के अंतर्मन का, आपकी चेतना का विकार है। हमें स्कूल, बाजार, स्क्रीन और परिवार, सभी ने यही बताया है कि हम उपभोग करने के लिए पैदा हुए हैं और उपभोग करने से हमें खुशी मिलेगी। प्रगति का मतलब ज़्यादा चीज़ों का मालिक होना है और किसी राष्ट्र को इस बात से आंका जाना चाहिए कि वो कितना उत्पादन और उपभोग करता है।

तो भीतर के उस खालीपन को हम बाहर से भरने की कोशिश करते हैं, एक और कार, एक और घर, एक और छुट्टी, खरीदी गई और घर लाई गई एक और चीज़। लेकिन भीतर का वो खालीपन अथाह है। इसलिए उपभोग भी अंतहीन होना चाहिए और बिना अंत के उपभोग करने के लिए हम आठ अरब लोगों को पृथ्वी को बिना अंत के जलाना होगा।

उपभोग ही उत्सर्जन है, दोनों के बीच कोई फ़ासला नहीं है। वो जलना ही हिमालय का तापमान है। उस तापमान ने ही बर्फ़ को तोड़ा। मुश्किल ये है कि उत्सर्जन किसी ऐसी चीज से नहीं जुड़ा है जिससे हम नफरत करते हैं। हर वो चीज़ जिससे आप प्यार करते हैं कार्बन डाइऑक्साइड है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन से कोई प्यार नहीं करता लेकिन आपको चाय पसंद है, और यही समस्या है।

शृंखला को पीछे की ओर ले जाओ और वो अपनी पूरी लंबाई में कहीं नहीं टूटती। उत्सर्जन जलने से आता है, जलना ऊर्जा की इच्छा से आता है और ऊर्जा उन कामनाओं पर खर्च की जाती है जो पूरी होने पर भी हमें संतुष्ट नहीं करतीं। और इस त्रासदी का ईंधन कोई कारखाना या हवाई जहाज़ नहीं है। ईंधन वो अंधी कामना है, पहुँच में आने वाली हर चीज़ की ओर दौड़ने की वो जल्दबाज़ी है जो इंसान तब करता है जब वो नहीं जानता कि वो वास्तव में कौन है, और इसलिए वो नहीं जानता कि उसे वास्तव में क्या चाहिए।

तो सच कहा जाए तो हिमालय की बर्फ़ किसी कारखाने की भट्ठी में नहीं पिघल रही है। वो हमारी प्रवृत्तियों में, स्वयं अहंकार में पिघल रही है। ये अहंकार ही है जो गर्म हो रहा है और ये अहंकार ही है जो अपने संपर्क में आने वाली हर चीज़ को झुलसा और पिघला रहा है। पहाड़ कोई बदला नहीं ले रहा, वो तो बस वहाँ था जहाँ बर्फ़ थी। वो बाढ़ बादल से नहीं आई और अंततः वो ग्लेशियर से भी नहीं आई। वो उस नज़रिए से आई है जिससे हमें ज़िंदगी को देखना सिखाया गया है।

यही वो बात है जिसे मैं इस साल पूरे ब्रिटेन में, कैम्ब्रिज यूनियन और ऑक्सफोर्ड तक, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन तक, लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के सत्रों और हाउस ऑफ लॉर्ड्स तक लेकर गया। हर बाहरी संकट का एक केंद्र होता है और वो केंद्र वो व्यक्ति है जो उपभोग करता है, जिससे कभी एक बार भी ये नहीं पूछा गया कि उसे कोई चीज क्यों चाहिए।

और ये कि कोई भी शिखर सम्मेलन, संधि या दक्षता में सुधार टिक नहीं पाएगा क्योंकि उनमें से कोई भी उस व्यक्ति तक, आपके भीतर तक, नहीं पहुँचता। मैंने उन श्रोताओं के सामने इसे एक नशे में धुत ड्राइवर के सवाल के रूप में रखा है। जब कोई आदमी नशे में गाड़ी चला रहा होता है तो हम उसका नशा नहीं उतारते, हम उसे ज्यादा चिकनी सड़कें, ज्यादा नर्म बैरियर, ज्यादा तेज एम्बुलेंस दे देते हैं और इसे 'सुरक्षा' कहते हैं। हमारे कानून और हमारी ग्रीन टेक्नोलॉजी भी यही करते हैं, वे इंसानी वासना के मलबे का प्रबंधन करते हैं, बिना उस वासना को एक बार भी छुए।

इसीलिए इस आपदा का गणित इतना अश्लील है। दुनिया की ग्रीनहाउस गैसों के लगभग एक प्रतिशत के दसवें हिस्से (0.1%) के लिए नेपाल ज़िम्मेदार है। एक नेपाली एक साल में हवा में लगभग आधा टन कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है, एक अमेरिकी लगभग चौदह टन, एक चीनी लगभग आठ टन, एक भारतीय लगभग दो टन। जिन लोगों की इस बाढ़ में जान गई उन्होंने लगभग कुछ भी नहीं जलाया था और जिन्होंने सबसे ज़्यादा जलाया था वे पानी के आसपास भी नहीं थे। जो लोग ज़िम्मेदार हैं वे लगभग बिना किसी अपवाद के बच निकलेंगे। हमेशा की तरह वे गरीब और बेज़ुबान ही होंगे जिन्हें पीड़ित होने और मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

उस तर्क को उसके अंत तक ले जाओ और वो उन जीवों तक पहुँचता है जिनका कोई फुटप्रिंट ही नहीं है, जानवर और जंगल, जिन्होंने कुछ नहीं जलाया और सब कुछ खो देंगे। और फिर भी इस शिकायत में सबसे गहरी खामी, भले ही इसका हर एक शब्द जायज़ हो, ये विश्वास है कि 'दूसरे लोग' जैसी कोई चीज़ है। प्रकृति राष्ट्रीयता का कोई रजिस्टर नहीं रखती। एक शहर में शुरू होने वाली बीमारी हर शहर की सड़कों को खाली कर देती है और एक गोलार्ध में जलाई गई कार्बन का एक अणु दूसरे गोलार्ध में बर्फ़ को पिघलाता है।

विदेशियों और उनके उत्सर्जन की बात करना ही ये भूल जाना है कि मानव जाति एक शरीर है। यही कारण है कि दूर उठते धुएं का एकमात्र समझदारी भरा जवाब यही है कि जहां भी धुआं उठे वहां अलार्म बजाया जाए, चाहे ये कितना भी अव्यावहारिक क्यों न लगे। न ही भारत खुद को अलग रख सकता है और केवल ये हिसाब लगा सकता है कि उसे क्या मिलना बाकी है। प्रति व्यक्ति हमारा उत्सर्जन कम है लेकिन हमारी आबादी इतनी विशाल है कि हम अब पृथ्वी पर तीन सबसे बड़े उत्सर्जकों में खड़े हैं। दुनिया की आपूर्ति श्रृंखलाएं चरमरा जाएंगी अगर इस उपमहाद्वीप के हम दो अरब लोग इस बात पर पुनर्विचार करें कि हम क्या उपभोग करते हैं और क्यों।

और इससे भी बड़ी क्रूरता ये है कि जो लोग डूबते हैं वे मुनाफा कमाने वाले चंद लोगों से नाराज़ भी नहीं होते, वे कतार में खड़े होते हैं ताकि वे भी उनके जैसे बन सकें। हम अपने शोषकों की ही पूजा कर रहे हैं। वे संपन्न लोग जिनके जीवन का हम अध्ययन करते हैं और जिनसे ईर्ष्या करते हैं, वे लोग जिनका फुटप्रिंट सबसे बड़ा है, वही लोग इस सज़ा को लिख रहे हैं। और हम पृथ्वी पर उनके उस दावे के पैमाने की प्रशंसा करते हैं जो हमें मार रहा है क्योंकि हमने उसी दावे को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है।

हम उसी सांस में युद्ध की पूजा करते हैं, और युद्ध इस दुनिया को जलाने वाले सबसे बड़े इंजनों में से एक है, हालांकि किसी भी सेना के उत्सर्जन की कभी गिनती नहीं की जाती। हम उन्हीं देशों से टैंक और लड़ाकू विमान खरीदते हैं जिनका धुआं हमारी बर्फ़ को पिघला रहा है और दुनिया को थोड़ी और तेज़ी से गर्म करने के विशेषाधिकार के लिए उन्हें मुनाफा चुकाते हैं। बर्फ को गर्म करने वाली ये मांग किसी पर बंदूक की नोक पर नहीं थोपी जाती, ये बेची जाती है और आप इसे खुशी-खुशी खरीदते हैं क्योंकि जब कोई उत्पाद बनता है तो एक खरीदार भी गढ़ना पड़ता है।

केवल एक ज़मीन ऐसी है जो हर सरकार और हर बाज़ार की पहुँच से बाहर है और यही वो इकलौती ज़मीन है जहाँ से इस कामना' को वापस खींचा जा सकता है। आपका अपना अंतर्मन आपकी अपनी संप्रभु जगह है। दुनिया की किसी भी ताक़त को आपके आंतरिक जगत पर कोई अधिकार नहीं है।

यहीं इस बाढ़ की पटकथा लिखी गई थी, उन कुछ सौ करोड़ निजी अंतर्मनों में जिन्होंने बिना ध्यान दिए अपनी संप्रभुता पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिनमें से हर एक को यकीन है कि वो महज़ एक 'सामान्य' जीवन जी रहा है। एक व्यवस्था उन व्यक्तियों की संघनित प्रवृत्तियों से अधिक कुछ नहीं होती जो इसे बनाते हैं। आपकी और मेरी कामना से अलग कोई अर्थव्यवस्था, बाज़ार या सभ्यता नहीं है। यही वो अपराधी है जिसे कोई सिस्मोग्राफ दर्ज़ नहीं करेगा। ये अहंकार है, "मैं" का वो झूठा अहसास जो पृथ्वी को अपनी बेचैनी के लिए महज़ ईंधन की तरह इस्तेमाल करता है, जो इस जलने को प्रगति कहता है। और जब ईंधन अपना काम कर चुकता है और पानी सड़कों पर आ जाता है तो अपनी मूर्खता छिपाने के लिए बाढ़ को ईश्वर की मर्ज़ी कह देता है।

और इसके नतीजे रसुवा में खत्म नहीं होते। बीस सालों से मैं हर उस व्यक्ति से जो इसे सुन सके, कह रहा हूं कि इस एक सवाल के सामने हर दूसरा सवाल छोटा है और ये पूरा समय आंकड़े सार्वजनिक रहे हैं। वैज्ञानिक अब कहते हैं कि हम छठे महा-विनाश के मुहाने पर खड़े हैं, और इससे पहले के पाँच में से तीन उसी चीज़ से संचालित हुए थे जिसे हम अब खुद के लिए निर्मित कर रहे हैं, यानी हवा में बहुत अधिक कार्बन डाइऑक्साइड। जो नया है वो तंत्र नहीं है। नया ये है कि ग्रह के इतिहास में पहली बार कोई प्रजाति जानबूझकर, सारे सबूतों के सामने होने के बावजूद, सूचियां बनी होने, झीलों की गिनती होने और चट्टान में पट्टिका लगी होने के बावजूद, अपने ही घर को नष्ट कर रही है।

अज्ञानता में किए गए विनाश को शायद माफ़ किया जा सकता है, लेकिन पूरे ज्ञान के साथ किए गए विनाश को नहीं। और जिन लोगों ने ये किया वे हिसाब-किताब के समय वहाँ नहीं होंगे। जिन लोगों ने सबसे ज़्यादा उत्सर्जन किया वे आने वाले दशकों में आराम से मर जाएंगे और ग्रह कहलाने वाला ये जलता हुआ मलबा युवाओं को झेलने के लिए छोड़ दिया जाएगा। हमने केवल वही नष्ट नहीं किया है जो हमें अपने पूर्वजों से मिला था, हमने अपने बच्चों का भविष्य नष्ट कर दिया है और हम इस तथ्य को उनसे छिपा रहे हैं।

इस हफ्ते जो पर्वत श्रृंखला कांप उठी वो लगभग दो अरब लोगों का वाटर टावर है, उनका पीने का पानी और उनकी फसलें उसी बर्फ़ से आती हैं। हज़ारों सालों तक ग्लेशियरों ने वो पानी जीवन के रूप में दिया। वे अब उसे मौत के रूप में लौटाना शुरू कर रहे हैं क्योंकि हमने उन्हें मौत दी है, और वे चुपचाप गायब नहीं होते बल्कि एक धमाके के साथ पीछे हटते हैं।

नेपाल और भारत ने इस हफ्ते जो सुना वो उन्हीं धमाकों में से एक था। ऐसे और भी धमाके होंगे। ये किसी एक देश की बाढ़ नहीं है। ये पूरी मानव जाति के सामने रखा गया एक ट्रेलर है, इसके अपने नज़दीकी भविष्य का एक रिहर्सल है। हम शायद वो आखिरी पीढ़ी हो सकते हैं जो वो जीवन जी रही है जिसे हम अब भी सामान्य कहते हैं। अगले पचास सालों में, शायद बीस या तीस सालों में ही पृथ्वी हमें ऐसा खंडहर दिखा सकती है जिसकी आज आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

और चुनने के लिए शायद उससे कम समय हो जितना हम खुद को बताना पसंद करते हैं। वार्मिंग एक सीधी रेखा में नहीं चलती जिसे एक हृदय परिवर्तन आसानी से रोक सके। ये फ़ीडबैक लूप्स से होकर गुज़रती है, ऐसी प्रक्रियाएं जो एक बार शुरू हो जाएं तो खुद-ब-खुद आगे बढ़ती हैं। सबसे स्पष्ट लूप पहाड़ों पर लिखा है। सफेद बर्फ़ सूरज की गर्मी को वापस आसमान में धकेल देती है लेकिन जहां बर्फ पिघलती है वहां नग्न काली चट्टान बच जाती है, और काली चट्टान गर्मी को सोख लेती है। वो गर्माहट और ज़्यादा बर्फ़ पिघलाती है जिससे और ज्यादा चट्टान नंगी होती है, जो और भी ज़्यादा गर्मी खींचती है, हर साल पहले से अधिक तेज़ी से, ठीक किसी ढलान पर छोड़ी गई गेंद की तरह।

ऐसे कम से कम दस लूप पहले ही घूम रहे हैं। अगर हम सब आज सुबह अपने तौर-तरीके सुधार भी लें, तब भी ये ग्रह अभी लंबे समय तक गर्म होता रहेगा, और ये कहना ईमानदारी होगी कि शायद हम पॉइंट ऑफ़ रिटर्न को पार कर चुके हैं। ये न तो आशा का कारण है और न ही निराशा का, क्योंकि दोनों ही मुंह फेर लेने के तरीके हैं। ये एक कारण है कि हमें खुद को बचाने के लिए किसी चालाक तकनीक या ज़्यादा मज़बूत संधि के आने का इंतज़ार करना बंद कर देना चाहिए।

और ये एक ऐसा कारण है जो नतीजों पर निर्भर नहीं करता। जो इंसान अपनी कामना को स्पष्ट रूप से देख लेता है वो इसलिए अंधाधुंध उपभोग बंद नहीं करता क्योंकि ग्रह को अभी भी बचाया जा सकता है, वो इसलिए रुक जाता है क्योंकि उसे बोध हो गया है। बर्फ़ को बचाया जा सकेगा या नहीं, ये उसके हाथ में नहीं है। लेकिन बिना ये जाने कि वो क्यों जला रहा है, बस जलते रहना, ये उसके हाथ में ज़रूर है।

तो जवाब बाहर नहीं पर भीतर है, क्योंकि संकट वहीं से शुरू हुआ था। जलवायु पहले से ही फट रही है और जो बर्फ़ ढीली हो चुकी है वो अभी लंबे समय तक पिघलेगी, चाहे किसी भी राजधानी में कोई भी संकल्प क्यों न लिया जाए। कोई भी योजना और कोई भी शिखर सम्मेलन इंसान की अंधी कामना तक नहीं पहुँच पाया है। जब तक इंसान खुद को नहीं जानेगा, वो पृथ्वी को निगलता रहेगा, और हम लगभग इसे निगल ही चुके हैं। ग्रीन टेक्नोलॉजी ज़रूरी हैं और नीतियां ज़रूरी हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं और अकेले वे विफल हो जाएंगी। आप किसी बीमारी का इलाज वहां नहीं कर सकते जहां वो है ही नहीं।

केवल लक्षण पर काम करेंगे तो लक्षण वापस आ जाएगा, क्योंकि बीमारी कभी लक्षण में थी ही नहीं। बीमारी आपकी वासना में है और कामना किसी पहाड़ पर नहीं है। बीमारी जितनी गहरी है, उसका इकलौता इलाज भी उतना ही गहरा है: बड़े पैमाने पर आत्म-शिक्षा (मास बेस्ड एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ़)। आत्मज्ञान ही आखिरी और एकमात्र पर्यावरणवाद है। जिस व्यक्ति ने ये देख लिया है कि वो क्या नहीं है, उसने अपनी कामनाओं के आर-पार भी देख लिया है। वो सीख जाता है कि कोई भी खरीद उसे कभी वो नहीं दे पाएगी जिसकी उसे तलाश है, और फिर वो आँख बंद करके उपभोग नहीं करता और उत्सर्जन अपने आप गिर जाता है।

पूछो कि पृथ्वी के साथ एक समझदारी भरा रिश्ता कैसा दिखेगा, और इसका ईमानदार जवाब ये है कि इसे पहले से तय नहीं किया जा सकता। इसकी कोई परिभाषा नहीं हो सकती। जिस क्षण हम इसे पूर्व-नियोजित करते हैं, हम इसे मार देते हैं। जो कुछ किया जा सकता है, वो बस एक प्रकाश दिखाना है और फिर बाकी सब उस व्यक्ति पर छोड़ देना है। सिर्फ देखना अपने आप में कुछ नहीं बदलता। ये केवल वो बिंदु है जहाँ से बदलाव पहली बार संभव होता है और यही वो इकलौता श्रम है जिसे कोई किसी दूसरे की जगह नहीं कर सकता। बाहर निकलने का रास्ता भीतर से होकर जाता है।

क्या हम अपने जीने के तरीके पर पुनर्विचार करेंगे? या हम हिमालय को ये काम हमारे लिए करने दें? और हिमालय के, प्रकृति के समझाने का तरीका तो निर्मम ही होगा, इस त्रासदी की तरह।

वो बाढ़ महज़ कोई खबर नहीं थी। वो एक आईना था। प्रकृति बार-बार इसे हमारे सामने रख रही है और आईना तोड़ने से उसमें दिख रहा चेहरा नहीं बदल जाएगा। जब पानी ने हमारे उस तीर्थयात्री को बहाया तो उसकी जेब में वही आईना था, बर्फ़ पर खड़े उसकी खुद की तस्वीर के रूप में, जिसे हममें से कोई भी खींचता और हर कोई खींच ही रहा है। अब बस इकलौता सवाल ये बचा है कि क्या आपके भीतर अभी भी इतनी हिम्मत और इतनी ईमानदारी है कि आप उस आईने में देखें, और ये स्वीकार करें कि वो चेहरा आपका ही है?

Originally published in Navbharat Times on 30 August '26

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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