नेपाल की बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानना असली कारण से बचना है। ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का फटना और हिमालय का अस्थिर होना बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट से जुड़ा है। इसके पीछे हमारी अंधी उपभोग-वासना, विकास की गलत समझ और प्रकृति के शोषण की प्रवृत्ति है। हिमालय की तबाही भारत के जल, खेती और भविष्य से भी जुड़ी है। समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संयम और अपनी कामनाओं को समझने में है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Navbharat Times on 30 August '26
जरा कल्पना कीजिए। सुबह के नौ बज रहे हैं। त्रिशूली नदी के किनारे दुकानें रोज की तरह खुल रही हैं; तीर्थयात्री कैलाश की ओर निकल रहे हैं; पानी के किनारे बनी पनबिजली परियोजनाओं पर मजदूरों की शिफ्ट शुरू हो चुकी है। साठ साल का कोई तीर्थयात्री जो मैदानी इलाकों के किसी शहर से आया है, उसने एक दिन पहले ही कैलाश की परिक्रमा पूरी की है और आज सुबह सीमा की ओर लौट रहा है। उसके फोन में अभी भी तस्वीरें हैं और वो इसी गुमान में है, जैसा कि कोई भी आम व्यक्ति सोचेगा, कि उसने अपने जीवन में कुछ बड़ा, कुछ सार्थक कर लिया है। नौ बजे वो सड़क पर है। सब कुछ एक आम सुबह जैसा ही लग रही है। और तभी यकायक पर्वत दहाड़ उठता है।
26 अगस्त की सुबह, नेपाल सीमा से करीब बीस किलोमीटर उत्तर में तिब्बत में ल्हेंदे नदी के बहुत ऊपर एक ग्लेशियर से बर्फ और चट्टान का एक विशाल टुकड़ा टूटकर नीचे नदी में गिर गया। पानी का बहाव रुक गया। पानी रुका, इकट्ठा हुआ, ऊपर उठा, और जब वो इतनी मात्रा में जमा हो गया कि उसने अपनी ही बनाई दीवार को तोड़ दिया, तो वो एक साथ नेपाल के रसुवा ज़िले में आ गिरा। वो अपने साथ सब कुछ बहा ले गया। पूरे के पूरे गाँव, पुल, सड़कें, किनारे पर बनी एक दर्जन से अधिक पनबिजली परियोजनाएँ, सब कुछ। गिनती अभी भी जारी है।




