जन्माष्टमी केवल बाल-कृष्ण की पूजा, मिठाई और उत्सव का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, मोह, भय और अज्ञान से युद्ध करने का अवसर है। मूर्ति, गुरु और गीता साधन हैं, मंज़िल नहीं—वे हमें अपनी क्षुद्रता दिखाकर सत्य की ओर ले जाने वाले दर्पण हैं। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होता है, जब मन झूठ और आसक्ति से मुक्त होकर सत्य, आत्मबोध और अपनी उच्चतम संभावना की ओर जागता है।
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Originally published in Navbharat Times on 04 September '26
जन्माष्टमी का अपना अलग रंग होता है। आधी रात मंदिरों में शंख गूँजते हैं, झाँकियाँ सजती हैं, झूले झूलते हैं, घर-घर माखन-मिश्री और खीर का भोग लगता है, और पूरा देश एक नन्हे बालक के जन्म का उत्सव मनाता है। पर उत्सव की इसी चमक के बीच एक शांत-सा प्रश्न कहीं रह जाता है, जिसे हम पूछना प्रायः भूल जाते हैं: जिस कृष्ण का जन्मदिन हम इतनी धूम-धाम से मना रहे हैं, वे आख़िर हैं कौन और हमसे चाहते क्या हैं? क्या हमें गीता के कृष्ण उतने ही याद रहते हैं, जितने कहानियों के कृष्ण?
कहानियों के कृष्ण
एक कृष्ण वो हैं जिन्हें हमने गढ़ लिया है: माखन-चोर, झूले पर बैठे, गोपियों के बीच रास रचाते। इन्हें याद रखना आसान है, क्योंकि इनसे कोई माँग नहीं आती। राम के साथ जो ग्रंथ है, रामचरितमानस, वह रसीला नहीं, त्रासद है। वहाँ वियोग है, कष्ट है, और त्याग की माँग है। और त्याग और मर्यादा का पालन आज कौन करना चाहता है? इसलिए जनमानस में भागवत पुराण चढ़ता है, जिसकी कथाओं में विवेक-बुद्धि लगानी नहीं पड़ती, बस बैठकर रसपान करना है। सीधी बात है, हमें पीड़ा नहीं, पेड़ा चाहिए। लोगों को बहुत रस आ गया है बस कृष्ण के नाम पर नाचने में, और यह व्याधि पूरे देश में गहराई से फैल चुकी है। कृष्ण की हमने जो अलौकिक छवि बना दी, उस छवि के कारण गीता हमसे छिन गई। एक बार कृष्ण को कान्हा और लड्डू-गोपाल बना दिया, तो फिर उन्हें गीताकार की तरह देखना कठिन हो जाता है, क्योंकि गीता पढ़ना तो ख़तरे की बात है, वहाँ भ्रम टूटते हैं, अहंकार टूटता है।




