सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: एक सज्जन अपने बेटे को साथ लेकर आए थे। बेटा बारहवीं में था, बोले मेरा सपना है कि मैं इसे कंप्यूटर साइंस पढ़ाऊँगा, वो भी एकदम किसी टॉप की जगह पर। वो चाहते थे वो आईआईटी क्लियर कर ले। बहुत पहले की बात है। वो बेटा बैठा हुआ है सामने, उसकी शक्ल पर ही लिखा है छपरी। उससे दो-चार मैंने सवाल पूछ दिए फिजिक्स के, बहुत साधारण से एकदम, तो इधर-उधर पगले झाँक रहा है। और उसको लाज भी नहीं आई कि उसे कुछ नहीं आता। जो सवाल पूछे थे, वो ग्यारहवीं के मेकेनिक्स के थे, वो बारहवीं पूरी कर रहा था, उसे कुछ नहीं आता।
लेकिन इनको सपना है कि इसको तो मैं कंप्यूटर साइंस कराऊँगा। “वो भी इसका हो जाएगा। ये बहुत शार्प है, वैसे बहुत शार्प है, बस इनअटेंटिव हैं। कभी-कभी ध्यान नहीं देता, बहुत शार्प है।” ग्यारहवीं में नंबर कितने आए थे, छप्पन। मैंने कहा अगर अब तक छप्पन, तो आगे छप्पन हो कैसे होगा? सपना है। उनको नहीं दिखाई दे रहा था सचमुच कि उनका लाड़ला कभी नहीं…, है सपना। या तो इसकी बचपन से परवरिश ठीक से करी होती, इससे नहीं होगा। सपना है तो, और सपने को जो चीज़ ज़हर जैसी लगती है वो है सच। उसे सच बता दो वो रूठ जाता है, हिंसक भी हो सकता है।
बारह लाख लोगों ने यूपीएससी




