
आचार्य प्रशांत: एक सज्जन अपने बेटे को साथ लेकर आए थे। बेटा बारहवीं में था, बोले मेरा सपना है कि मैं इसे कंप्यूटर साइंस पढ़ाऊँगा, वो भी एकदम किसी टॉप की जगह पर। वो चाहते थे वो आईआईटी क्लियर कर ले। बहुत पहले की बात है। वो बेटा बैठा हुआ है सामने, उसकी शक्ल पर ही लिखा है छपरी। उससे दो-चार मैंने सवाल पूछ दिए फिजिक्स के, बहुत साधारण से एकदम, तो इधर-उधर पगले झाँक रहा है। और उसको लाज भी नहीं आई कि उसे कुछ नहीं आता। जो सवाल पूछे थे, वो ग्यारहवीं के मेकेनिक्स के थे, वो बारहवीं पूरी कर रहा था, उसे कुछ नहीं आता।
लेकिन इनको सपना है कि इसको तो मैं कंप्यूटर साइंस कराऊँगा। “वो भी इसका हो जाएगा। ये बहुत शार्प है, वैसे बहुत शार्प है, बस इनअटेंटिव हैं। कभी-कभी ध्यान नहीं देता, बहुत शार्प है।” ग्यारहवीं में नंबर कितने आए थे, छप्पन। मैंने कहा अगर अब तक छप्पन, तो आगे छप्पन हो कैसे होगा? सपना है। उनको नहीं दिखाई दे रहा था सचमुच कि उनका लाड़ला कभी नहीं…, है सपना। या तो इसकी बचपन से परवरिश ठीक से करी होती, इससे नहीं होगा। सपना है तो, और सपने को जो चीज़ ज़हर जैसी लगती है वो है सच। उसे सच बता दो वो रूठ जाता है, हिंसक भी हो सकता है।
बारह लाख लोगों ने यूपीएससी का फॉर्म भरा है। आख़िरी सूची में एक हज़ार भी चयनित नहीं होते। एक हज़ार तब है जब सीटें बहुत बढ़ गई हैं, पहले और कम थीं। एक हज़ार का भी चयन नहीं होना है और बारह लाख लोगों ने फॉर्म भरा है। ऐसा कैसे हो सकता है? सपने।
अच्छा आप फैसला कर रहे हो कि आपको यूपीएससी बताएगी कि आप नाकाबिल हो? आप बस इंतज़ार कर रहे हो कि यूपीएससी आपको बताए कि आप नाकाबिल हो, वो भी तब मानोगे जब यूपीएससी चार या छह बार बताएगी। आप इंतज़ार कर रहे हो कि यूपीएससी आकर घोषित करे कि आप नाकाबिल हो, वो भी छह बार बोले आपके मुँह पर, चिल्ला के बोले, गाली दे के बोले। तब आप मानोगे कि ये आपके बस की नहीं है।
आपको स्वयं नहीं कुछ पता चल रहा, आप यूपीएससी की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हो? आप स्वयं अपने आपको नहीं परख पा रहे हो क्या? आपका कुछ आत्मज्ञान है कि नहीं है? या दूसरे जब बताएगा कि तुम अनफिट हो, तब मानोगे कि अनफिट हो? ख़ुद नहीं देख पा रहे?
चलो, मैं समझता हूँ, प्रयास की भी कोई महत्ता होती है। प्रयास की महत्ता होती है तो ये समझ में आता है कि अगर हज़ार सीट हैं, तो दस हज़ार लोगों ने फॉर्म भर दिए। जो थोड़ा नीचे वाले थे, वो भी बोले कि हम प्रयास तो कर सकते हैं न। दस हज़ार समझ में आता है, दस लाख नहीं समझ में आता। दस लाख का तो मतलब ही यही है कि तुम एकदम ही बेहोश सपनों में जी रहे हो। एकदम बेहोश, और उसका नतीजा, ज़िंदगी भर बर्बाद, जवानी बर्बाद, छह साल, आठ साल। छह साल, आठ साल में भी जो मुक्त हो जाए, उसका सौभाग्य है। हमारे जैसे सपने होते हैं, हम तो ज़िंदगी भर उनसे आज़ाद नहीं हो पाते।
एक जवान आदमी के पास जवानी में कुछ करने को नहीं है क्या कि वो बुढ़ापे की चिंता से परेशान है? ये प्रश्न होना चाहिए न।
आप जितने भी साल के हो, आप बीस-तीस साल के हो, आपको बुढ़ापे का ख़्याल आ क्यों रहा है? जवान आदमी पेंशन का ख़्याल कर क्यों रहा है? तुम्हें आज की चुनौतियाँ झेलनी हैं न? तुम्हें आज ज़िंदगी जीनी है। तुम्हें पेंशन का ख़्याल क्यों आ रहा है?
जब मैं आईआईएम में था, प्लेसमेंट में बैठ रहा था, उस वक़्त भी मेरे पास मेरी सरकारी नौकरी थी। मैं अकैडमी से लीव लकर के गया था एमबीए करने। तो मेरा इंटरव्यू हो रहा था, तो उन्होंने CV देखा मेरा, बोले, यू आर अ क्वालिफ़ाइड यूपीएससी ऑफ़िसर। मैंने कहा हाँ। तो बोले, देन यू शुड जॉइन द गवर्नमेंट, द ब्यूरॉक्रेसी, नॉट अस। प्राइवेट सेक्टर बैंक था एक, देश का सबसे बड़ा बैंक जो है प्राइवेट सेक्टर का। बोले आप उनको जॉइन करो, हमें क्यों जॉइन कर रहे हो? मैंने कहा, ठीक है देख रहा हूँ। बोले, नहीं वही सही है। उसमें पेंशन मिलेगी, हम आपको पेंशन थोड़ी देंगे।
और वो, मुझे लगा ये थोड़ा सा विनोदप्रिय आदमी है। मज़ाक कर रहा है, वो गंभीर था। वो सचमुच ये कह रहा था कि तुम आज की उम्र में, मैं चौबीस साल का था, तुम आज की उम्र में पेंशन की सोचो। और ये बात मुझे बड़ी रोचक लगी थी कि चौबीस की उम्र में मुझे कहा जा रहा है कि तुम इतनी सरकारी नौकरी करना क्योंकि उसमें पेंशन मिलती है।
आज से चालीस साल आगे की मैं क्यों सोचूँ? मेरे पास जीने के लिए आज का दिन है और आज की चुनौतियाँ हैं। अर्जुन कुरुक्षेत्र में खड़ा हुआ है, सामने उसकी सेना है, वो कह रहा है चालीस साल बाद क्या होगा? बाल सफेद हो जाएँगे? चलो भाई एडवांस में सब मेहंदी वेहंदी खरीद के रखो। मैं चालीस साल बाद अपने बाल सफेद कैसे करूँगा, और कौन-सी बैसाखी पकड़ूँगा, और मैं इनका ख़्याल करूँ या अभी मैं देखूँ कि मेरे तरकश में तीर कितने हैं और दुश्मन की ताक़त कितनी है? तो एक युवा व्यक्ति को ये पेंशन के ख़्याल कैसे आते हैं और ओल्ड एज सिक्योरिटी का ख़्याल कैसे आता है, ये मेरे खोपड़े से बाहर की बात है।
अगले दिन का पता नहीं, अगले साल का पता नहीं, और आज करने के लिए बहुत सारे काम हैं। इन दोनों बातों को मिलाओ। आज करने के लिए हमारे पास बहुत सारे काम हैं। आप पेंशन की बात कर रहे हो। क्लाइमेट चेंज जैसा है, तुम्हें पूरा भरोसा है तीस साल बाद पेंशन वग़ैरह जैसी कोई चीज़ बचेगी भी? तीस साल बाद ये दुनिया भी बच रही है ठीक से कि पेंशन ही बच जाएगी ठीक से। मेरे पास आज की इतनी भयानक चुनौतियाँ हैं जिनका मुझे सामना करना है। मैं पेंशन मतलब, मैं जितनी बार ये शब्द सुन रहा हूँ, मुझे उतना अजीब लग रहा है पेंशन। पेंशन में तो फिर भी चलो पक्का होता है सरकार दे ही देगी। पेंशन के नाम पर बच्चा पैदा किया, कि ये मेरी पेंशन बनेगा। वो टेंशन, पेंशन।