अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: होली का पर्व है। रंग सभी खेलेंगे, उत्सव सभी मनाएँगे, गुलाल खूब उड़ेगी। बहुत अच्छा रहेगा, सुंदर रहेगा। और इस अवसर पर ये समझना भी आवश्यक हो जाता है कि इस पर्व का वास्तविक महत्त्व क्या है? इस पूरे आयोजन का अर्थ क्या है?
तो राजा हिरण्यकश्यप थे, असुरों के राजा। ब्रह्मा जी की उन्होंने उपासना करी और वरदान प्राप्त किए। क्या वरदान माँगा? कि मृत्यु न हो मेरी। हिरण्यकश्यप ने वरदान माँगा, कि मृत्यु न हो मेरी; न दिन में, न रात में, न घर के अंदर, न घर के बाहर, न अस्त्र से, न शस्त्र से, न नर द्वारा, न पशु द्वारा, न धरती पर, न जल पर, न आकाश में। और उन्हें ये वर प्राप्त भी हो गए। हिरण्यकश्यप फूले नहीं समाए, अहंकार और प्रबल हो गया। अब उन्हें कोई मार नहीं सकता था।
पूरे राज्य में घोषणा कर दी, कि यहाँ उनके अतिरिक्त किसी और की उपासना नहीं होगी। बल इतना था राजा को, कि सबको राजा की बात माननी ही पड़ी सिवाय राजा के अपने बेटे के, प्रह्लाद। उसने कहा, “मैं तो विष्णु की ही उपासना करूँगा।” राजा हिरण्यकश्यप के अहम् के लिए ये बड़ी खिंझाने वाली बात थी, बड़ी चोट थी। पूरी दुनिया उनका यशोगान कर रही है, उनके समक्ष नमित है, और अपने ही महल में अपना ही बेटा कह रहा है, कि “नहीं राजा, मैं परम सत्ता आपको नहीं मानता। मैं तो विष्णु का उपासक हूँ, सत्य का उपासक हूँ। मैं तो विष्णु के समक्ष ही नमित रहूँगा।”
तो राजा ने बहुत तरीकों से प्रह्लाद को समझाया, बहलाया, फुसलाया, डराया, धमकाया। प्रह्लाद नहीं माना। तो अंततः राजा ने अपनी बहन होलिका को कुछ उपाय करने के लिए बुलाया। होलिका ने एक लकड़ियों की बड़ी चिता समान तैयार करवाई और उस पर प्रह्लाद को लेकर बैठ गई; होलिका को सिद्धि थी कि अग्नि उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अपेक्षा ये की थी हिरण्यकश्यप ने और होलिका ने कि लकड़ियाँ जलेंगी और उनके साथ प्रह्लाद भस्म हो जाएगा। होलिका को तो सिद्धि प्राप्त है, उसका कुछ बिगड़ेगा नहीं।




