होली खेलने से पहले होली को समझो

Acharya Prashant

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होली खेलने से पहले होली को समझो
अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: होली का पर्व है। रंग सभी खेलेंगे, उत्सव सभी मनाएँगे, गुलाल खूब उड़ेगी। बहुत अच्छा रहेगा, सुंदर रहेगा। और इस अवसर पर ये समझना भी आवश्यक हो जाता है कि इस पर्व का वास्तविक महत्त्व क्या है? इस पूरे आयोजन का अर्थ क्या है?

तो राजा हिरण्यकश्यप थे, असुरों के राजा। ब्रह्मा जी की उन्होंने उपासना करी और वरदान प्राप्त किए। क्या वरदान माँगा? कि मृत्यु न हो मेरी। हिरण्यकश्यप ने वरदान माँगा, कि मृत्यु न हो मेरी; न दिन में, न रात में, न घर के अंदर, न घर के बाहर, न अस्त्र से, न शस्त्र से, न नर द्वारा, न पशु द्वारा, न धरती पर, न जल पर, न आकाश में। और उन्हें ये वर प्राप्त भी हो गए। हिरण्यकश्यप फूले नहीं समाए, अहंकार और प्रबल हो गया। अब उन्हें कोई मार नहीं सकता था।

पूरे राज्य में घोषणा कर दी, कि यहाँ उनके अतिरिक्त किसी और की उपासना नहीं होगी। बल इतना था राजा को, कि सबको राजा की बात माननी ही पड़ी सिवाय राजा के अपने बेटे के, प्रह्लाद। उसने कहा, “मैं तो विष्णु की ही उपासना करूँगा।” राजा हिरण्यकश्यप के अहम् के लिए ये बड़ी खिंझाने वाली बात थी, बड़ी चोट थी। पूरी दुनिया उनका यशोगान कर रही है, उनके समक्ष नमित है, और अपने ही महल में अपना ही बेटा कह रहा है, कि “नहीं राजा, मैं परम सत्ता आपको नहीं मानता। मैं तो विष्णु का उपासक हूँ, सत्य का उपासक हूँ। मैं तो विष्णु के समक्ष ही नमित रहूँगा।”

तो राजा ने बहुत तरीकों से प्रह्लाद को समझाया, बहलाया, फुसलाया, डराया, धमकाया। प्रह्लाद नहीं माना। तो अंततः राजा ने अपनी बहन होलिका को कुछ उपाय करने के लिए बुलाया। होलिका ने एक लकड़ियों की बड़ी चिता समान तैयार करवाई और उस पर प्रह्लाद को लेकर बैठ गई; होलिका को सिद्धि थी कि अग्नि उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अपेक्षा ये की थी हिरण्यकश्यप ने और होलिका ने कि लकड़ियाँ जलेंगी और उनके साथ प्रह्लाद भस्म हो जाएगा। होलिका को तो सिद्धि प्राप्त है, उसका कुछ बिगड़ेगा नहीं।

हुआ उल्टा, ईश अनुकंपा से प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ और होलिका भस्मीभूत हो गई। हिरण्यकश्यप ये देख कर के क्रोध से विक्षिप्त हो गया। उसने एक लोहे का खंभा गर्म करवाया और प्रह्लाद से कहा, “जा, इस लोहे के खंभे को गले लगा ले, देखता हूँ अब तेरा विष्णु कैसे बचाता है तुझे।”

तो कहानी कहती है, विष्णु पुराण में इसका उल्लेख आता है, कहानी कहती है कि प्रह्लाद ने खंभे को गले लगाया और फिर खंभे से विष्णु अपने नरसिंह अवतार में प्रकट हुए; आधे सिंह थे, आधे नर थे। हिरण्यकश्यप की तरफ़ बढ़े, उसे धर दबोचा; गोधूलि बेला थी, न दिन था, न रात थी, बीच का समय था। हिरण्यकश्यप को उठाकर के महल के प्रवेश-द्वार की चौखट पर ले गए, न महल के अंदर, न बाहर, और फिर अपने पंजों से, अपने बघनखों से हिरण्यकश्यप का हृदय फाड़ दिया अपनी गोद में बिठाकर। न धरा में, न आकाश में अपनी गोद पर बैठाकर। न अस्त्र से, न शस्त्र से; न घर के अंदर, न घर के बाहर; न दिन में, न रात में; न नर द्वारा, न पशु द्वारा, आधे-आधे नर थे, आधे पशु थे। सब शर्तें पूरी हुईं। हिरण्यकश्यप का वध हुआ। सत्य जीता, श्रद्धा जीती, अहंकार हारा।

तो ये है होली के उत्सव के पीछे की कथा। इस कथा से मैं समझता हूँ पाँच-छह बड़े मर्म की, बड़े तत्व की बातें हमें पता चलती हैं।

पहली बात, अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए।

हिरण्यकश्यप ने बड़ी साधना करी और साधना करके वरदान यही माँगा कि वो अमर हो जाए, उसे किसी भी तरीके से मृत्यु न आए।

हम भी बहुत श्रम करते हैं, बड़ी मेहनत करते हैं। आम आदमी की ज़िंदगी देखिए, सुबह से शाम तक मेहनत ही करता रहता है। ये जानना ज़रूरी है कि वो मेहनत कर किस लिए रहा है। सत्य के सामने नमित होने के लिए, या फिर अपने अहंकार को ही और बढ़ाने के लिए।

हिरण्यकश्यप की साधना देखिए न, कितनी साधना करी लेकिन किस लिए? इसलिए नहीं कि प्रभु से ही मिल जाए, सच के सामने झुक जाए, जीवन को सार्थक कर ले। पूरी साधना करके चाहा उसने यही कि उसका शरीर अमर हो जाए, उसकी अपनी व्यक्तिगत सत्ता अमर हो जाए। तो ख़तरा है, बहुत बड़ा ख़तरा है। सिर्फ़ मेहनत करना काफ़ी नहीं है। श्रम या साधना करना काफ़ी नहीं है। ये देखना भी ज़रूरी है कि किसके लिए मेहनत कर रहे हो। उद्देश्य क्या है? मेहनत के पीछे कौन बैठा है?

दूसरी बात, अहम् को जो कुछ भी मिलेगा, उसका इस्तेमाल वो स्वयं को बढ़ाने के लिए ही करेगा। दूसरों के कल्याण के लिए नहीं अपने स्वार्थ के लिए ही करेगा। बड़ी से बड़ी शक्ति और सिद्धि उपलब्ध हो गई थी हिरण्यकश्यप को। मृत्यु का भय, मृत्यु का ख़तरा, आदमी के सामने सबसे बड़ा ख़तरा होता है; हिरण्यकश्यप का वही ख़तरा टल गया था। न दिन में मरेगा, न रात में मरेगा, न अंदर मरेगा, न बाहर मरेगा, न अस्त्र से मरेगा, न शस्त्र से मरेगा, न मनुष्य से मरेगा, न पशु से मरेगा। और क्या चाहिए?

इतने बड़े वरदान का उपयोग करके हिरण्यकश्यप दुनिया में ऊँचे से ऊँचा सत्कार्य कर सकता था। जगत की तमाम बुराइयों से लड़ सकता था, संसार को स्वर्ग बनाने के अभियान पर निकल सकता था। लेकिन हिरण्यकश्यप ने इस ताक़त का उपयोग किया तो किस लिए? स्वयं भगवान बन जाने के लिए। आज्ञा लागू कर दी, “पूरे राज्य में कोई ईश्वर-वंदना नहीं करेगा, सब हिरण्यकश्यप के सामने ही झुकें।”

सीख क्या मिलती है हमें? अगर गलत हाथों में ऊँची से ऊँची चीज़ भी पड़ जाए, बड़ी से बड़ी शक्ति भी पड़ जाए, तो उसका दुरुपयोग ही होगा। हम सब भी अपने लिए बहुत कुछ अर्जित करना चाहते हैं। अपने प्रियजनों के लिए भी बहुत कुछ अर्जित करना चाहते हैं, लेकिन अर्जित करने से पहले, अपनी शक्ति बढ़ाने से पहले, दूसरों की सामर्थ्य बढ़ाने से पहले से पहले ये ज़रूर देख लें कि कौन है जिसकी शक्ति बढ़ने जा रही है। किन हाथों में सत्ता दी जा रही है।

शक्ति दुधारी तलवार है। उसका इस्तेमाल ऊँचे से ऊँचे पुण्य के लिए भी हो सकता है, और बड़े से बड़े पाप के लिए भी। शक्ति बहुत आवश्यक है कि उन्हीं हाथों में रहे जो पुण्य की प्रेरणा से चलें।

तीसरी बात, ये रिश्तों की, संबंधों की बात है। और होली पर तो हम संबंधों का ही उत्सव मनाते हैं, मित्रों से, यारों से मिलते हैं। सबको रंग लगाते हैं, गले मिलते हैं, “बुरा न मानो, होली है।” संध्या समय समाज में जिनको भी जाते हैं, उन सबसे मिलते हैं, बैठते हैं, गुजिया बँटती है। पर संबंध किससे? संबंध कैसे? संबंधों का आधार क्या है? ये जानना ज़रूरी है।

देखिए प्रह्लाद की ओर। पिता से जन्म का रिश्ता था, बहुत निकट का रिश्ता था, शरीर का रिश्ता था। लेकिन प्रह्लाद ने कहा, कि सत्य से मेरा जो रिश्ता है वो पिता से मेरे रिश्ते से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। हिरण्यकश्यप मात्र पिता हैं मेरे, सत्य परमपिता है। जिस प्रह्लाद की स्मृति में, जिस प्रह्लाद के सम्मान में होली का त्यौहार हम मनाते हैं, उस प्रह्लाद का भाव देखिए, उस प्रह्लाद की श्रद्धा देखिए। वो कह रहा है, पिता मेरे कितने ही बलशाली हों, मैं अपने ही पिता के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाऊँगा अगर वो सत्य की अवहेलना कर रहे हैं, अगर वो सच्चाई के विरुद्ध जा रहे हैं।

और प्रह्लाद क्या है? बालक मात्र है। और क्या ताक़त है उसके पास? कुछ नहीं। और सामने उसके क्या है? उसके सामने एक अति बलशाली राजा है और उसके सामने पिता है। पिता का मोह है, पिता के प्रति जो प्राकृतिक आकर्षण होता है, वो है।

लेकिन वो बच्चा रक्त के संबंध की परवाह नहीं करता। वो कहता है, पिता से होगा ख़ून का रिश्ता, ख़ून के रिश्ते से ज़्यादा बड़ा कुछ और होता है। न वो ख़ून के रिश्ते की परवाह करता है, न सामने जो अत्याचारी है उसके बल की परवाह करता है। वो कहता है, झुकूँगा तो सिर्फ़ सच के सामने। न शरीर के संबंध के सामने झुकूँगा, न समाज के सामने झुकूँगा, न पिता के सामने झुकूँगा, न राजा की ताक़त के सामने झुकूँगा। मैं झुकूँगा तो सिर्फ़ एक चीज़ के सामने, एक सत्ता के सामने, जो इस योग्य है कि उसे नमित हुआ जाए।

जब हम दोस्तों, यारों, संबंधियों के पास जाएँ होली में, तो सदा याद रखें कि पहला संबंध हमें प्रह्लाद ने सिखाया है कि सत्य के साथ होना चाहिए। बाक़ी सब संबंध पीछे के हैं, प्रह्लाद ने अपने पिता को भी पीछे छोड़ दिया था। सच्चाई इतनी बड़ी चीज़ है कि उसके लिए किसी को भी पीछे रखा जा सकता है।

अगली बात, हम हो सकता है बहुत चालाक हों। हम हो सकता है बड़े सिद्धहस्त हों। हमें हो सकता है उसी तरह कुछ सिद्धियाँ प्राप्त हों जैसे होलिका को प्राप्त थीं। कोई सिद्धि काम नहीं आएगी। होलिका ने बड़ी चालाकी खेली, बोली, “आ प्रह्लाद, मेरी गोद में बैठ जा।” अब प्रह्लाद बालक मासूम, निर्दोष, भोला-भाला, वो बैठ गया। और होलिका चढ़ गई प्रज्वलित अग्नि पर और होलिका की चालाकी ये थी कि मेरा तो कुछ बिगड़ेगा नहीं, प्रह्लाद जल मरेगा। हुआ उल्टा, होलिका की चालाकी ही उसे उसके अंत तक ले गई। होलिका की चालाकी ही उसे ज्वालाओं तक ले गई।

यही सीख है हमको भी, जो जितना चालाक होगा वो अपनी चालाकी के द्वारा ही जल मरेगा। बड़ी से बड़ी चालाकी निर्दोष मासूमियत के सामने छोटी है। जब भी कभी द्वंद्व होगा चतुरता में, होशियारी में, चालाकी में और निर्दोषता में, भोलेपन में, मासूमियत में; यक़ीन मानिए, श्रद्धा रखिए, मासूमियत जीतेगी, निर्दोषता जीतेगी। चालाकी बड़ी चीज़ लगती है पर चालाक लोगों का वही हश्र होगा जो होलिका का हुआ था।

तो जब आप होली का त्यौहार मना रहे हों, तो अपनी चालाकी को ज़रा पीछे छोड़ दीजिएगा। प्रह्लाद की तरह बाल मन हो जाइएगा, प्रह्लाद की तरह भोले हो जाइएगा, निर्दोष हो जाइएगा। होली अवसर है, अपनी चालाकियों को पीछे छोड़ने का। दुर्भाग्य की बात है कि समय कुछ ऐसा है अभी कि हमें लगता है कि जो जितना चालाक है, वो जीवन में उतना आगे बढ़ेगा। बात बिल्कुल झूठी है। एक सीमा तक चालाकी जाती है, उसके बाद वो अपना काल स्वयं बन जाती है। अपनी ही ज्वाला में स्वयं जल जाती है।

और आख़िरी बात, जिससे सब कुछ मिला हो उसके ही ख़िलाफ़ खड़े मत हो जाना। भगवान से वरदान पाए हिरण्यकश्यप ने और वो भगवान के ही ख़िलाफ़ खड़ा हो गया। और अहंकार की ये बड़ी पहचान होती है, उसे जिससे सब कुछ मिला है वो उसका ही विरोध करने लगता है। विरोध ही नहीं करने लगता; जिससे सब कुछ पाया है वो अपने आप को उससे ही ज़्यादा बड़ा समझने लग जाता है।

हिरण्यकश्यप, जिससे पा रहा है वरदान, कह रहा है, “मैं उसी की पूजा नहीं करूँगा।” और न सिर्फ़ मैं नहीं करूँगा, बल्कि पूरे राज्य में निषेधाज्ञा है, कोई पाया न जाए ईश्वर की वंदना करते हुए। “मेरी ही सत्ता है।” भूल गया बिल्कुल कि उसको ये सत्ता मिली किससे।

वैसा ही इंसान का जीवन है, बिल्कुल भूल जाता है कि जीवन मिला किससे है। बिल्कुल भूल जाता है कि ये सूरज, ये चाँद, ये हवा, ये पानी न हो तो उसका क्या होगा। बिल्कुल भूल जाता है कि ये धरती उसने कमाई नहीं है। बिल्कुल भूल जाता है कि जीवन की मूल चीज़ें उसे मुफ़्त ही मिली हुई हैं, उपहार-स्वरूप। कोई अनुग्रह, धन्यवाद का कोई भाव उसके मन में नहीं उठता परमात्मा के प्रति। बल्कि वो परमात्मा के ही, सत्य के ही ख़िलाफ़ खड़ा हो जाता है। झूठ का पैरोकार बन जाता है, अपनी ज़िंदगी ही झूठ पर आधारित कर देता है।

हिरण्यकश्यप, हिरण्यकश्यप का उदाहरण है, किसी न किसी अर्थ में हम सब हिरण्यकश्यप हैं। किसी न किसी अर्थ में हम सबके भीतर नन्हा प्रह्लाद भी बैठा हुआ है। होली का अवसर इसलिए है कि हम अपने भीतर के प्रह्लाद को जागृत करें, हिरण्यकश्यप और होलिका को ज़रा दूर करें स्वयं से।

सब है हम में, हिरण्यकश्यप का अहंकार है, होलिका की चालाकी है, और प्रह्लाद की निर्मलता, निर्दोषता भी है हम में। जिसने आपको सारे वरदान दिए निश्चित रूप से वो उन वरदानों से बड़ा होगा। जो ईश्वर आपको वरदान दे सकता है कि न आप दिन में मरेंगे, न रात में मरेंगे, न अंदर मरेंगे, न बाहर मरेंगे, वो ईश्वर उन वरदानों को काटने का उपाय भी जानता है।

होंगे आप कितने भी बड़े, होंगे आप कितने भी सामर्थ्यशाली, चतुर, चालाक, जिसने आपको सब कुछ दिया है वो आपसे बड़ा ही है और आपसे ज़्यादा चालाक है। ईश्वर के बारे में कह सकते हो कि वो चालाकों से ज़्यादा चालाक है। होगा तुम्हारे पास बहुत कुछ, उसके पास तुम्हारी सत्ता को काटने के बड़े उपाय हैं। उसने तुम्हें ये दे दिया वरदान कि न घर के अंदर मरोगे, न बाहर मरोगे, तो वो तुमको चौखट पर मार देगा। दे दिया उसने तुमको वरदान कि न दिन में मरोगे, न रात में मरोगे, तो वो तुमको गोधूलि बेला में मार देगा। परम सत्ता सब पर भारी पड़नी है, उसका विरोध मत करो। उसके विरुद्ध मत खड़े रहो। उसके सामने नमित रहो, प्रेम की भावना रखो, श्रद्धा रखो।

ये कुछ बातें हैं होली के पर्व के विषय में। अब जब हम सब होली खेलें तो बाहर के रंगों के साथ-साथ भीतर उसका भी सुमिरन करते रहें, जिसका कोई रंग नहीं है। “मन के बहुत रंग हैं पल-पल बदले सोए। एक रंग में जो रहे ऐसा बिरला कोए।” बाहर के रंग सुंदर हैं, शुभ हैं। भीतर उसको भी याद रखिएगा, जो सब रंगों से आगे का है, होली है ही इसीलिए ताकि उसका स्मरण, सुमिरन हो सके।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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