ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, ग्रह–नक्षत्र, चाँद–तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न कोई प्रमाण है। इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है: अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व भाग्य पर डाल देना। जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और तर्क की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, तो फिर कोई बाहरी ताक़त आकर उसको ग़ुलाम बनाती है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, मान्यता पर चलना शुरू कर दिया, वो भारत की ग़ुलामी बन गया।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न न एस्ट्रोलॉजी के ऊपर है। आजकल हमारी निर्भरता एस्ट्रोलॉजी पर बढ़ती जा रही है। बहुत सारे न्यू एप्स भी आ गए हैं एस्ट्रोलॉजी पर। टेक्नोलॉजी के जरिए लोगों तक इसका प्रचार किया जा रहा है। और हम लोग अपने जीवन में जो भी गलत हो रहा है, उसको भाग्य से जोड़ते हैं। तो ये कितना सही है। एस्ट्रोलॉजी को और ज़्यादा बढ़ावा मिलना, लोगों का इस पर निर्भर होना और इसके लिए जिज्ञासा और विश्वास पैदा होना?
आचार्य प्रशांत: सही या गलत तो इससे तय होता है न कि वो चीज़ क्या है। इंसान का स्वभाव है जानना, तो जहाँ कहीं भी जिज्ञासा हो, जानने की इच्छा हो, तार्किकता हो, वैज्ञानिकता हो, सच्चाई और तथ्यों के लिए सम्मान हो, वो तो अच्छा ही होता है। उसमें तो कभी कुछ बुरा नहीं हो सकता। और इसके विपरीत, जहाँ ख़ुद को ही झाँसा देने की कोशिश हो और अनपरखी मान्यताएँ हों, वहाँ कुछ अच्छा नहीं हो सकता। तो इसी से सब तय हो जाता है।
देखिए, ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, सेलेस्टियल बॉडीज़, ग्रह, नक्षत्र, चाँद, सूरज, तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न इसका कोई प्रमाण है। ठीक है? लेकिन ऐसी बातें करके मनोवैज्ञानिक रूप से हमें एक सांत्वना मिल जाती है। पहला ये कि मेरी ज़िंदगी में जो हो रहा है, उसका ज़िम्मेदार मैं नहीं हूँ, भाग्य है। मैं क्या करूँ? सूरज, चाँद, नक्षत्र की स्थिति ही मेरी ऐसी चल रही है कि मेरे साथ जो होगा, उल्टा-पुल्टा ही होगा। तो अपने दुख या अपने बंधन का ज़िम्मेदार मैं नहीं हूँ। तो ज़िम्मेदारी से बचने में मदद मिल जाती है, आदमी




