अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न बंगाल और अंधविश्वास के ऊपर है। तो बंगाल की धरती विवेक और करुणा की प्रयोगशाला रही है। यहाँ पर स्वामी विवेकानंद जी ने विवेक का आह्वान किया है। रविंद्रनाथ ठाकुर ने चेतना का सौंदर्य दिखाया है। और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने यहाँ पर बहुत सारे काम किए हैं। फिर भी यहाँ पर आजकल भी ये अंधविश्वास और ग्रह-दोष, ये सब फिर भी कंटीन्यूअसली चल रहा है। तो क्या बुद्धि होना ही जागृति का मात्रा हो सकती है या फिर कुछ और भी चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देखिए, अंधविश्वास क्या है? जो उदाहरण आपने लिया, उसी से देख लेते हैं। ठीक है? समझना चाहेंगे। अंधविश्वास सिर्फ़ यही नहीं होता कि किसी बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लिया। अंधविश्वास की परिभाषा इससे थोड़ी अलग है और थोड़ी गहरी है। यूँ ही किसी भी बात पर विश्वास कर लेने को अंधविश्वास कहना मोटे तौर पर ठीक है, लेकिन सटीक नहीं है। आपने बात करी ग्रह-दोष, काल-दशा, ये सब। तो हम कहते हैं कि ग्रहों से असर पड़ रहा है। किस पर? मुझ पर न, मुझ पर। ये बात ऐसा लगेगा कि जैसे, अरे! इसमें क्या है? ये तो ऑब्वियस है। पर इस बात में कुछ छुपा हुआ है। तो इसको थोड़ा पकड़कर चलिएगा। ठीक है?
कोई बाहर गुप्त, अदृश्य दैवी शक्तियाँ हैं, जो जीवन का निर्धारण कर रही हैं। किसके? मेरे न। सारी समस्या वहाँ से शुरू होती है, जहाँ किसी को भीतर बैठा मान लिया जाता है। और जो भीतर बैठा माना गया है, वो मानने वाले के अनुसार ही कमजोर है, अपूर्ण है। ठीक है? भीतर कोई बैठा हुआ है। भीतर कोई बैठा हुआ है जो अकेला है, बेचैन है, अपूर्ण है, कमजोर है। ठीक है? कोई है। कोई ख़ास है जो भीतर बैठा है। उसको मैं क्या बोलता हूँ? मैं। मैं उसको “मैं” बोलता हूँ।




