
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न बंगाल और अंधविश्वास के ऊपर है। तो बंगाल की धरती विवेक और करुणा की प्रयोगशाला रही है। यहाँ पर स्वामी विवेकानंद जी ने विवेक का आह्वान किया है। रविंद्रनाथ ठाकुर ने चेतना का सौंदर्य दिखाया है। और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने यहाँ पर बहुत सारे काम किए हैं। फिर भी यहाँ पर आजकल भी ये अंधविश्वास और ग्रह-दोष, ये सब फिर भी कंटीन्यूअसली चल रहा है। तो क्या बुद्धि होना ही जागृति का मात्रा हो सकती है या फिर कुछ और भी चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देखिए, अंधविश्वास क्या है? जो उदाहरण आपने लिया, उसी से देख लेते हैं। ठीक है? समझना चाहेंगे। अंधविश्वास सिर्फ़ यही नहीं होता कि किसी बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लिया। अंधविश्वास की परिभाषा इससे थोड़ी अलग है और थोड़ी गहरी है। यूँ ही किसी भी बात पर विश्वास कर लेने को अंधविश्वास कहना मोटे तौर पर ठीक है, लेकिन सटीक नहीं है। आपने बात करी ग्रह-दोष, काल-दशा, ये सब। तो हम कहते हैं कि ग्रहों से असर पड़ रहा है। किस पर? मुझ पर न, मुझ पर। ये बात ऐसा लगेगा कि जैसे, अरे! इसमें क्या है? ये तो ऑब्वियस है। पर इस बात में कुछ छुपा हुआ है। तो इसको थोड़ा पकड़कर चलिएगा। ठीक है?
कोई बाहर गुप्त, अदृश्य दैवी शक्तियाँ हैं, जो जीवन का निर्धारण कर रही हैं। किसके? मेरे न। सारी समस्या वहाँ से शुरू होती है, जहाँ किसी को भीतर बैठा मान लिया जाता है। और जो भीतर बैठा माना गया है, वो मानने वाले के अनुसार ही कमजोर है, अपूर्ण है। ठीक है? भीतर कोई बैठा हुआ है। भीतर कोई बैठा हुआ है जो अकेला है, बेचैन है, अपूर्ण है, कमजोर है। ठीक है? कोई है। कोई ख़ास है जो भीतर बैठा है। उसको मैं क्या बोलता हूँ? मैं। मैं उसको “मैं” बोलता हूँ।
और जैसे ही भीतर कोई ऐसा बैठा मान लिया जाता है, तो भीतर जो बैठा है, वो अपने आप में पूर्ण तो है नहीं।एक छोटी-सी चीज़ है और ये वो ख़ुद ही मानता है, वो बहुत छोटी-सी चीज़ है। प्रमाणित होती है उसकी मान्यता उसकी कामनाओं में, उसके भटकाव में। वो ख़ुद ही लगातार इधर-उधर घूम रहा है कि कुछ पा लूँ, कुछ पा लूँ, कुछ अपने आप में जोड़ लूँ। अपने आप में जोड़ने का प्रयास तो वही करता है न, जो अपने आप को अपूर्ण मानता है। ठीक? तो भीतर कोई बैठा हुआ है, जो अपूर्ण है। और उसकी अपूर्णता की पुष्टि इस बात से होती है कि उसमें लगातार कामनाएँ बनी रहती हैं, “ये पा लूँ, ऐसा कर लूँ।” भय भी बना रहता है कि कहीं मेरा कोई नुकसान न हो जाए।
पूर्ण का तो कोई नुकसान होगा नहीं। कामना और भय दोनों यही बताते हैं कि मानने वाला ख़ुद को छोटा मानता है, अधूरा मानता है। तो “मैं” हूँ, और “मैं” छोटा हूँ और अधूरा हूँ। तो वहीं से फिर ये मान्यता निकलकर आती है कि बाहर कोई है, जो बड़ा है, पूरा है, श्रेष्ठ है, बलवान है। बाहर कोई तो होगा न, जो बड़ा होगा, पूरा होगा, श्रेष्ठ होगा, बलवान होगा। अब वो बाहर कौन है? बाहर वो कौन है? आँख जिसको भी देखती है, वो भी छोटा-छोटा ही नज़र आता है। मैंने अपने आप को क्या मान लिया?
श्रोता: अपूर्ण।
आचार्य प्रशांत: मैं तो अपूर्ण हूँ। और कैसा हूँ? अल्प हूँ। अपूर्ण हूँ, अल्प हूँ, दुर्बल हूँ; मैं ये हूँ। और अगर मैं कहूँ कि मुझसे श्रेष्ठ, जो मेरे जीवन और भाग्य का निर्धारण करता है, बाहर कहीं है, तो मुझे दिखाई देता है कि बाहर वाले, तुलना में, अपेक्षतया तो मुझसे ताकतवर हो सकते हैं। पर एकदम ताकतवर तो वो भी नहीं हैं। ठीक है? मेरे पास कम पैसा हो सकता है, किसी के पास ज़्यादा हो सकता है। मुझे कम ज्ञान हो सकता है, किसी के पास ज़्यादा हो सकता है। पर अनंत पैसा या अनंत ज्ञान, ये सब तो मुझे इनमें भी नहीं दिखाई देता। ये सब लोग कौन हैं? जो आँखों से दिखाई देते हैं।
आँखों से जो कुछ भी दिखाई देता है, दुनिया की सबसे बड़ी इमारत भी कहीं जाकर रुक जाती है। अनंत तो नहीं होती। दुनिया का सबसे बड़ा सागर भी सीमाओं में क़ैद होता है। अनंत तो नहीं होता। तो अब मामला फँसा। मैं क्या हूँ? छोटा, अल्प, अपूर्ण, इत्यादि। मैं ये हूँ। बाहर जितने हैं, वो मुझसे बड़े हैं। कुछ मुझसे छोटे भी हो सकते हैं। पर मामला बस तुलना का है। कोई मुझसे थोड़ा बड़ा है, कोई मुझसे थोड़ा छोटा है।
तो फिर वो कौन है, जो मेरी और इन सबकी ज़िंदगियों को चला रहा है? अब यहाँ कल्पना शुरू हो जाती है। अब कल्पना की जाती है किसी अदृश्य शक्ति की। क्योंकि जो कुछ दृश्य है, वो तो मुझे दिख रहा है कि सीमित है। इतनी बुद्धि मुझ में है कि जो कुछ भी दृश्य है, दृश्यमान है, विज़िबल है, वो तो सीमित है। भले ही मुझसे बड़ा हो, पर फिर भी सीमित है। तो फिर यहाँ से कल्पना उठती है किसी अदृश्य, अनंत शक्ति की, जो आसमानों पर बैठी हुई है। और हमारे पास दोनों चीज़ें होती हैं, कामना भी और भय भी, अपूर्णता के चलते।
जैसे हमारे पास दो चीज़ें होती हैं, कामना और भय, वैसे ही फिर हम बाहर दो तरह की शक्तियों की कल्पना करते हैं: अच्छी और बुरी। जिसको आप बोल देते हैं पॉजिटिव एनर्जीज़ और नेगेटिव एनर्जीज़। उनका संबंध कामना और भय से है। जो आपकी कामना पूरी करती हो, उस शक्ति की आप कल्पना कर लेते हैं कि सकारात्मक शक्ति है, पॉजिटिव एनर्जी है। और जिससे आपको भय लगता हो, जो आपकी कामना तोड़ती हो, जो आपके सुखों पर घात करती हो, ऐसी शक्ति की आप कल्पना कर लेते हैं। कहते हैं कि ये नकारात्मक ऊर्जा है, नेगेटिव एनर्जी है। समझ में आ रही है बात?
सारा अंधविश्वास इसी द्वैत से शुरू होता है, “मैं और मेरा रचयिता।” और इन दोनों में भी जो पहला अंधविश्वास है, वो है “मैं”। तो अंधविश्वास बस यही नहीं है कि कोई कहे कि साहब, बाहर निकलते वक़्त दही चाट लोगे तो शुभ हो जाएगा, ये अंधविश्वास है। नहीं-नहीं, वो अंधविश्वास की सतह मात्र है। अंधविश्वास बस यही नहीं है कि फलाने पेड़ के चार चक्कर लगाने से घर में समृद्धि आ जाएगी, वो भी अंधविश्वास की सतह मात्र है। मूल अंधविश्वास है अहंकार।
और जहाँ अहंकार होगा, वहाँ निश्चित रूपेण, अनिवार्यतः ये कल्पना भी होगी कि बाहर कोई है जो अहंकार का भाग्य-विधाता है। क्योंकि अहंकार तो इतना-सा है न, लुंज-पुंज, छोटा, अल्प, दुर्बल। वो स्वयं तो अपना भाग्य चला नहीं रहा। ये तो स्पष्ट होता है। हम सबको दिखाई देता है कि हमारी ज़िंदगी हमारे हाथ में तो है नहीं। ये सबको दिखाई देता है न, कुछ भी हो जाता है। तो फिर हमें ये प्रश्न उठता है कि कौन बैठा है बाहर जो हमारी ज़िंदगियों को चला रहा है।
वहाँ से फिर कल्पना उठती है कि कुछ दैवीय शक्तियाँ हैं और कुछ दानवी शक्तियाँ हैं। कुछ सहायक शक्तियाँ हैं और कुछ भयावो शक्तियाँ हैं। ये है अंधविश्वास। प्रथम अंधविश्वास है अहंकार। दूसरा अंधविश्वास है अहंकार का रचयिता। और फिर उसके आगे टर्शियरी अंधविश्वास है, बाक़ी वो सब जिनको हम अंधविश्वास के नाम से जानते हैं। जिनको हम अंधविश्वास कहते हैं, वो अंधविश्वास का न तो मूल है, न तना है। वो तो अंधविश्वास की पत्तियाँ हैं। पहले मूल आएगा, फिर तना आएगा, फिर शाखा आएगी, फिर प्रशाखा आएगी, फिर पत्ती आती है। है न? प्राइमरी, सेकेंडरी, टर्शियरी, उसके आगे फिर पैरा-टर्शियरी।
हम जिसको अंधविश्वास के रूप में एकनॉलेज करते हैं,अभिस्वीकृति देते हैं कि अच्छा, ये अंधविश्वास है, बिल्ली रास्ता काट गई, कुछ अशुभ हो जाएगा, इसको हम कह देते हैं कि ये अंधविश्वास है। और ये अंधविश्वास बचा रह जाता है, बचा इसीलिए रह जाता है क्योंकि पत्ती तोड़ने से पेड़ नहीं हटेगा। हम जिन बातों को अंधविश्वास बोलते हैं, वो अंधविश्वास के महावृक्ष की छोटी-छोटी पत्तियाँ हैं। इतना बड़ा पेड़ है, उसमें से वो पत्तियाँ आप हटा दोगे, पेड़ का कुछ नहीं बिगड़ता।
अंधविश्वास के पेड़ की जड़ है अहंता। अहंता, जिसको आप बोलोगे जीव या जीवात्मा। जीवात्मा प्रथम अंधविश्वास है, उसी जीवात्मा को अहंकार कहते हैं। भीतर कुछ है। भीतर कुछ है; मैं कोई हूँ; मेरी इस शरीर से भिन्न भी कोई विशिष्ट सत्ता है, ये है मूल, प्रथम अंधविश्वास। इसको समझिए अच्छे से। और जब तक ये अंधविश्वास रहेगा, तब तक आगे जितनी अंधविश्वास की धारा बहेगी, आप उसको नहीं रोक सकते। ठीक वैसे जैसे जब तक गंगोत्री है, तो गंगा बहेंगी।
जब तक जड़ बची हुई है, तो वृक्ष बार-बार खड़ा होगा। अंधविश्वास के वृक्ष की जड़ में बैठा है अहंकार या जीवात्मा।
आप ये नहीं कर पाओगे कि मानते भी हो कि भीतर कोई जीव है या जीवात्मा है, और साथ ही-साथ कह दो, कि “मैं तो बहुत आधुनिक हूँ, तरक़्क़ी-पसंद हूँ, वैज्ञानिक और तार्किक सोच रखता हूँ, रैशनल हूँ, मैं अंधविश्वास नहीं मानता।” अंधविश्वास नहीं मानते, पर ये तो मानते हो न हम कि मृत्यु के बाद शरीर से कुछ निकलता है। इस तरह की बातें भी करते हो, कि “अरे, तुमने मुझे धोखा दे दिया, मेरी आत्मा को चोट लग गई।” तो तुम कैसे कह सकते हो कि तुम अंधविश्वासी नहीं हो।
अंधविश्वास जहाँ से शुरू होता है, वो चीज़ तो तुमने पकड़ रखी है। क्या नाम है उस चीज़ का? जीवात्मा। जीवात्मा के बारे में विशिष्ट बात ये है कि वो अपने आप को शरीर से भिन्न भी कुछ मानती है। वो अहंकार से भी ज़्यादा ख़तरनाक कॉन्सेप्ट है। क्योंकि अहंकार तो मात्र ये कहता है कि शरीर के माध्यम से मैं बोल रहा हूँ। मेरा शरीर, मेरा हाथ। अहंकार इतना ही बोलता है। जीवात्मा और ज़्यादा विषैला सिद्धांत है, क्योंकि वो कहता है, शरीर न भी रहे मैं तो भी हूँ। मैं डिस-एंबॉडीड उड़ता हूँ। वही जीवात्मा तो फिर भूत है न, जो डिस-एंबॉडीड उड़े, कि शरीर नहीं है, पर मैं हूँ।
अहंकार तो फिर भी ये कहता है, कि मैं शरीर का स्वामी हूँ। मैं शरीर के मध्य बैठा करता हूँ। तो अहंकार अगर साँपनाथ है, तो जीवात्मा नागनाथ है। कम से कम मुर्दा ‘मैं’ तो नहीं बोलेगा। मुर्दा ‘मैं’ नहीं बोलता, पर जीवात्मा का सिद्धांत कहता है कि शरीर मुर्दा हो भी जाए, तो भी जीवात्मा है। शरीर के मरते ही ‘मैं’ तो बंद हो जाता है न। शरीर समाप्त तो ‘मैं’ समाप्त। कोई ‘मैं’ नहीं बोलता मुर्दा। शरीर समाप्त तो ‘मैं’ समाप्त, पर शरीर समाप्त तो जीवात्मा नहीं समाप्त।
हमारी मान्यता कहती है, शरीर समाप्त भी हो गया, तो भी अभी जीवात्मा निकलेगी, परमात्मा के चरणों में जाएगी। नदियाँ पार करेगी, और ये होगा और वो होगा। और अगर पापी जीवात्मा है, तो उसको सज़ा मिलेगी। अगर पुण्य उसने संचित किए हैं, तो उसको स्वर्ग मिलेगा, अगला बढ़िया जन्म मिलेगा। ये मूल अंधविश्वास है। पूरी प्रक्रिया समझ में आ रही है, कैसे चल रहा है? अगर वो है, तो उसको बनाने वाला भी कोई होगा न। और बनाने वाला ये सब नहीं हो सकता, मटेरियल पावर। क्योंकि मटेरियल तो जो कुछ है, वो हमें दिखाई पड़ता है कि कैसा है, ख़ुद ही सीमित है, लिमिटेड है। तो फिर हम किसी अनलिमिटेड पावर की कल्पना करते हैं, एक ऐसा अनलिमिटेड पावर, ऐसी असीम शक्ति, जो हमारी समझ से बाहर की है। हमारी ये कल्पना चलती है, एक असीम शक्ति है जिसको हम समझ नहीं सकते।
और एक बार आपने कह दिया कि कोई असीम शक्ति है, जिसको आप समझ नहीं सकते, तो अब सब तरह के अंधविश्वास संभव हो जाते हैं, तुरंत आप तर्क दे दोगे। मैं कहूँगा, देखो साहब, ये जो रंगों का यहाँ आपने जोड़ बैठाया है, ये बहुत अशुभ है। आप कहेंगे, “कैसे? समझाइए, ये अशुभ कैसे है?” मैं कहूँगा, देखो, हर चीज़ समझी नहीं जा सकती। कुछ बातें मनुष्य की तर्क-क्षमता से बाहर की होती हैं। ये सब सुना है आपने?
इस तरह के बहुत घूम रहे होते हैं। बड़े अनुभवी लोग, विशेषकर बाबाजी प्रकार के, वो कुछ बोलें, और आप उनसे कहें कि समझाओ, तो कहेंगे, “हर चीज़ समझी नहीं जा सकती। इसको बस मान लो, चुपचाप।” ये हक़ उन्हें हमने ही दिया है, हमारी मान्यता ने ही उनको ये हक़ दे दिया है। हमारी ही मान्यता है न कि हमारी क़िस्मत को आसमानों से चलाया जा रहा है। कि जीवात्मा निकलेगी, तो कहीं आसमानों में चली जाएगी, और वहाँ जाकर शरणागत हो जाएगी, हमारी ही मान्यता है न। तो जब हमने ही मान लिया है कि इस दृश्य जगत से पार एक सार्वभौम शक्ति बैठी है, जो हम सबकी क़िस्मत तय करती है, जब हमने ये बात मान ली है, तो फिर कोई क्यों न बोले कि हर चीज़ जानी नहीं जा सकती। बिल्ली रास्ता काटती है, तो अशुभ होगा और इसके पीछे कोई तर्क नहीं है बस चुपचाप मान लो, बस मान लो, चुपचाप।
आप कहेंगे, नहीं, हम तो नहीं मानते इतना ज़्यादा क़िस्मत-वग़ैरह होती है। हम तो नहीं मानते। अच्छा, नहीं मानते? पर ये सब तो मानते हो न। जब फ़िल्मों में गाना आता है कि दूर कहीं आसमानों में होते हैं ये सारे फ़ैसले। धुन याद आ रही है? उस वक़्त आपको अपनी रोमांटिक धुन में ये पता भी नहीं चलेगा कि आपने अंधविश्वास पाल लिया, कि दूर कहीं आसमानों में जोड़े बनाए जाते हैं। कि ऊपर वाला जोड़े तय करके भेजता है। कि मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ, तो कहीं ऊपर वाले ने मेरे लिए कोई मेरा जोड़ीदार तय कर रखा है। ये सब अंधविश्वास ही है।
उससे कहो, कभी सामने तो आए। डीडीएलजे, “मेरे ख़्वाबों में जो आए, आके मुझे छेड़ जाए, उससे कहो कभी सामने तो आए।” माने तय तो पहले से ही है। पहले से तय है और भीतर कोई बैठा है, जो उसको जानता भी है, वो मेरे ख़्वाबों में आता है। आप देखिए, इसमें भावना क्या है? इसमें क्या चल रहा है? इसका मनोविज्ञान समझिए, कि कोई मेरे लिए पहले से, कोई एक विशिष्ट मेरे लिए पहले से निर्धारित करके, किसी ऊपरी ताक़त द्वारा किसी जगह पर रख छोड़ा गया है। और वो आने भी लग गया है। कहाँ? सपनों में आने लग गया है। तो अब वो प्रार्थना कर रही है। वो गाना नहीं है। वो प्रार्थना करी जा रही है कि अब उसको मेरे समक्ष भी प्रस्तुत करें देव।
श्रोता: सर, हम लोग के समक्ष ही हैं आप।
आचार्य प्रशांत: अरे, मैं अंधविश्वास हो गया फिर। ये बात आ रही है समझ में?
जब धरती की हमारी इक्वेशंस बैलेंस नहीं होती न, तो हम उनमें एक इमैजिनरी वेरिएबल ऐड कर देते हैं, बैलेंस करने के लिए। यहीं से अंधविश्वास शुरू होता है। लगभग ऐसी ही बात है कि आप ₹100 लेकर गए थे। ₹100 ले गए थे और घर वापस आए, तो कुल हिसाब कर रहे हैं, कहाँ ख़र्च किया, कहाँ ख़र्च किया? तो 80 ही रुपए सामने आ रहे हैं, 20 का कुछ पता नहीं चल रहा। इक्वेशन बैलेंस ही नहीं हो पा रही। तो आपने कह दिया कि ये जो 20 है, ये आसमानों के पास चला गया। ये बेईमानी है न? इसी बेईमानी में अंधविश्वास की जड़ है, कि यहाँ का कुछ समझ में नहीं आ रहा, तो कह दिया वहाँ से चल रहा है।
यहाँ का कुछ समझ में नहीं आ रहा, भूल हो रही है हिसाब में, त्रुटि हो रही है तर्क में। दर्शन अधूरा है कि सतही है, तो सस्ता जुगाड़ निकाल लिया। क्या बोल दिया? वो ₹20 वहाँ चला गया। वहाँ तो नहीं चला गया। तुमने कहीं कोई भूल करी है। असावधानी करी है। तुम्हारे हिसाब में कुछ गड़बड़ है। तुम ठीक से देख नहीं रहे। तुममें ध्यान की कमी है। लेकिन आराम से कह दिया, “अरे, ये सब तो वहाँ चला गया, वहाँ।” ये है अंधविश्वास की शुरुआत।
बात आ रही है समझ में?
कहीं पर था, मेरे लिए बड़े आश्चर्य की बात थी, लेकिन अच्छा हुआ कि हुआ था। बहुत साल पहले की बात है। तो कोई कह रहा था कि भूत-बाधा और इस तरह की चीज़ें, वही जो अंधविश्वास के अंतर्गत आती हैं। तो मैं उसको तरह-तरह से समझा रहा था कि तुम क्या भूत-प्रेत में उलझे हो, ये सब थोड़ी हो सकता है। वो सुनता रहा, सुनता रहा, सुनता रहा, फिर बोलता रहा, “ये बात आप उनको तो कभी बोलते नहीं, जो अच्छी ताक़तों में विश्वास रखते हैं। ये बात आप उनको तो कभी बोलते नहीं।” मैंने कहा, “क्या मतलब?” बोला, “मैं यही तो बोल रहा हूँ कि बुरी ताक़तें होती हैं। अगर अच्छी ताक़तें हो सकती हैं अदृश्य, तो फिर बुरी ताक़तें भी होंगी न?”
मैंने कहा, हाँ, हाँ। बोलता, “इसका मतलब ये बताइए कि अगर भगवान है, तो फिर भूत भी होगा न। आप ये कैसे कह सकते हो कि भूत तो नहीं है, पर भगवान है? आप ये कैसे कह सकते हो?” मैं निरुत्तर हो गया, क्योंकि उसकी बात बिल्कुल ठीक थी। अगर एक अदृश्य शक्ति को मानोगे, नेगेटिव वाली, तो पॉज़िटिव वाली भी माननी पड़ेगी, एंड वाइस-वर्सा। और ये भूतवादियों के पास बहुत बड़ा तर्क रहता है। वे कहते हैं, “अगर आसमानों में छुपा हुआ भगवान हो सकता है, तो फिर इसी तरह यहाँ हवाओं में छुपे हुए भूत-प्रेत क्यों नहीं हो सकते? क्यों नहीं हो सकते?”
अब आप क्या तर्क दोगे? क्योंकि आधार तो दोनों का एक ही है, कि कुछ है छुपा हुआ, जो मेरा कल्याण कर सकता है या मेरी हानि कर सकता है। कुछ है, कुछ है। कोई है जिसने मुझे बनाया था, तो फिर कोई है जो मुझे मिटा भी सकता है। और इन सबके मूल में वो नहीं है, मैं हूँ। मैं कुछ हूँ, तभी तो मुझे बनाया न। पहले मैं क्या मानता हूँ? कि मैं कुछ हूँ। अगर मैं कुछ हूँ, तो फिर मुझे बनाने वाला भी कोई होगा। सारी बात यहाँ फँस रही है।
मूल अंधविश्वास है, अहंकार। वो अहंकार और विकृत रूप लेता है जीवात्मा के अंधविश्वास में।
और एक बार जीवात्मा बन गई, तो अब तो कितनी भी तरह का अंधविश्वास चलेगा, आप उसको रोक नहीं पाओगे। बिल्कुल नहीं रोक पाओगे।
दर्शन, वेदान्त, इसीलिए परम सत्ता को वहाँ नहीं स्थापित करता। बिल्कुल मना कर देता है। कहता है, न आँखों के सामने, न आँखों के पार, आँखों के पीछे।
आँखों के सामने तो नहीं है; जो बिल्कुल आदिम क़िस्म का, प्रिमिटिव अंधविश्वास होता है, वो तो ये भी मानता है कि पहाड़ों पर जो ओझा बैठा है, वही देवता है। ये सब चलता है।कि जो यहाँ व्यक्ति कोई घूम रहा है। होता था गाँव में तांत्रिक घूम रहा है, आजकल फ़िल्में भी वैसी आती हैं, उसी के भीतर कुछ देवीय है, “उड़ू-उड़ू-उड़ू।” ये बिल्कुल एकदम प्रिमिटिव क़िस्म का सुपरस्टिशन है। वेदान्त कहता है, ये नहीं चलेगा। आँखों के सामने देवीयता है, ये नहीं चलेगा।
तो फिर उससे एडवांस्ड क़िस्म का, और उन्नत अंधविश्वास क्या चलाया गया? कि नहीं, नहीं, नहीं, जो परम शक्ति है, वो आँखों से दिखाई नहीं दे सकती। वेदान्त कहता है, न ये भी नहीं चलेगा; न आँखों के सामने, न आँखों के पार, न पृथ्वी पर है, न आकाश पर है; परम सत्ता बस यहाँ है, हृदय में। “अहम् ब्रह्मास्मि।” और किसी को अगर तुमने माना, तो जान लो कि माना है और मान्यता ही अंधविश्वास है। सत्य कोई मानने की बात नहीं होती।
ये जो हमारी भाषाएँ रहती हैं न, कि “अच्छा, आप लोग कौन-से भगवान जी को मानते हैं? अच्छा, आप लोग कौन-से देवता जी को मानते हैं?” ये भाषा ही अंधविश्वास की है। सत्य कोई मानने की बात नहीं होती? “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति,” वो हुआ जाता है, माना नहीं जाता। वो कहीं न सामने है, न इस लोक में है, न परलोक में है। वो मात्र हृदय में हो सकता है। आपके ही सत्य को उच्चतम, उच्चतम माने परम कहा गया है। आत्मा ही अंतिम सत्य है, और आत्मा से ऊँचा कोई होता नहीं। तो परम आत्मा कहना कोई आवश्यक भी नहीं, और कहना भी है तो यही कह सकते हैं कि आत्मा ही परमात्मा है। आप ही वो हो, तत्त्वमसि।
अब अंधविश्वास की जड़ उखाड़ ली आपने; अब अंधविश्वास नहीं बच सकता। अब नहीं बचेगा। लेकिन जिस क्षण आप जीव-जगत और जीव-ईश्वर के द्वैत में विश्वास करने लगे, आपने एक नहीं, सौ क़िस्म के अंधविश्वास स्वीकार कर लिए, फैला दिए।
अब यहाँ से आपको समझने में मदद मिलेगी कि क्यों बहुत पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वासी होते हैं। क्योंकि अंधविश्वास का मूल शिक्षा से नहीं हट सकता। बहुत लोग सोचते हैं कि एजुकेशन से सुपरस्टिशन हट जाएगा, बहुत लोग सोचते हैं। हाँ, मदद मिल जाती है; मदद मिल जाती है। पर उतनी ही मदद मिलती है जैसे कोई बहुत बड़ा पेड़ हो आपने उसकी प्रूनिंग कर दी हो। आप पत्तियाँ हटा दोगे, कुछ उसकी टहनियाँ वग़ैरह हटा दोगे, पर न तो उसका तना गया है, न उसकी जड़ गई है। इसीलिए आप पाते हो कि साइंटिस्ट्स भी ये सब काम कर रहे हैं कि मुहूर्त देख के रॉकेट छोड़ेंगे।
एक नई हवा चली है, जिसमें सर्जन तक ये कह रहे हैं कि सही समय पर सर्जरी होगी तो चाँसेज़ बेहतर हैं। ये बिल्कुल यही शब्द हैं, “सही समय पर सर्जरी होगी।” और सही समय से मतलब ये नहीं है कि उसकी कंडीशन देख के सही समय माने; मुहूर्त वग़ैरह निकाल करके सही समय पर होगा तो देखो, शायद चाँसेज़ बेहतर हों। हॉस्पिटल में हमारे इन-हाउस एक ज्योतिषी जी हैं, आप जाकर उनसे कंसल्ट करें।
आ रही है बात समझ में?
तो आपने कहा कि बंगाल में बड़े-बड़े चिंतक हुए, बड़े दार्शनिक हुए। आपने बड़े ऊँचे नाम लिए, ईश्वरचंद्र विद्यासागर; महिला उत्थान में ग़ज़ब कर दिया उन्होंने, जान लगा दी; पूरा देश आभार और सम्मान से याद करता है उनको। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानन्द, आप ये सब नाम ले रहे थे।
समस्या रह जाएगी तब तक, जब तक जीवात्मा रह जाएगी। वो अहंकार का बड़े से बड़ा प्रदर्शन होता है। अहंकार जीवात्मा के माध्यम से मालूम है क्या कह रहा है? वो कह रहा है: “जब तक शरीर है, तब तक तो मैं हूँ ही। शरीर मर भी गया, तो मैं उड़ जाऊँगा। जीवात्मा बनकर अहंकार अपने आप को अमर बना लेता है, अपने आप को अमर बना लेता है।
अरे भाई, तुझे अमर होना ही है। तुझे अमर होना ही है, तो सत्य के शरणागत हो जा, अमर हो जाएगा। अमरता तो तेरा स्वभाव है। पर तूने अमर होने का क्या चोर-दरवाज़ा निकाला है। अमर होने के लिए आत्मा हो जा न। और आत्मा कोई चिड़िया नहीं होती जो उड़ती। तू अमर होने के लिए जीवात्मा क्यों होना चाहता है? क्यों होना चाहता है? कारण बता देता हूँ। आत्मा भोक्ता नहीं होती; आत्मा साक्षी होती है। आत्मा साक्षी होती है, तो आत्मा बनने में मज़े नहीं आते, क्योंकि भोगने को तो मिलेगा नहीं। आत्मा के साथ आप ये शब्द नहीं लगा सकते कि आत्मा पर दाग़ लग गया, कि आत्मा पर कर्मफल लग गया, कि आत्मा दुख-सुख भोग रही है। आत्मा के साथ ये सब होता ही नहीं।
तो आत्मा बनने में अहंकार के मज़े नहीं हैं। पर जीवात्मा ये सब कुछ करती है, सिद्धांत अनुसार। कहते हैं न कि तुम बुरे काम करोगे, तो तुम्हारी जीवात्मा पर उन सब बुरे कामों का कर्मबंध लग जाएगा, और वो सब कर्मफल लेकर चलोगे, और उसका हिसाब, उसकी अकाउंटिंग अगले जन्म में देनी पड़ेगी।
जीवात्मा बनने में लाभ है। क्या लाभ है? मज़े मारे जा सकते हैं, भोगा जा सकता है। अच्छा भी बना जा सकता है, और बुरा भी बना जा सकता है। जीवात्मा बनने में लाभ है, जीवात्मा बनने में अपनी विशिष्ट सत्ता तो है। आत्मा तो अलग-अलग होती नहीं। हाँ, जीवात्मा ही हम कहते हैं, इसकी भी जीवात्मा अलग है, इसकी जीवात्मा अलग है, उसकी जीवात्मा अलग है। तो जीवात्मा बनने में विशिष्टता का भी भाव है, “मैं अलग हूँ।”
आत्मा तो एक सत्य है। अद्वैत, अनंत, अखंड, तो वो सबके लिए अलग-अलग होता नहीं, तो उसमें मज़ा नहीं आता। उसमें मज़ा नहीं आता। दूसरे, आत्मा होने का अर्थ है मिट जाना। कुछ शेष न रह जाए भीतर, उसको कहते हैं आत्मस्थता, कुछ शेष नहीं रह गया। तो आत्मा बनने में ख़तरा भी बहुत है, मिटना पड़ता है। और जीवात्मा बनने में ये करो, वो करो, भोगो। बैलेंस घटेगा, बढ़ेगा, अगले जन्म में देखा जाएगा। इस जन्म में भी सुख ले सकते हो। और पुण्य अगर अर्जित करें तो आगे स्वर्ग में अप्सराएँ भी मिलेंगी। जो आत्मस्थ हो गया, उसको अब अप्सरा तो मिल नहीं सकती। तो इसलिए ये जो जीवात्मा वाली बात है, ये बहुत-बहुत ख़तरनाक है और इसी ने भारत को इतना पीछे रखा हुआ है।
अभी भी बहुत लोग हैं, हमारे गीता सत्रों में भी हैं। कहीं पर श्लोकों में शब्द आता है “आत्मा” तो उसका अनुवाद कर लेते हैं “सोल”। आत्मा माने सेल्फ होता है। सोल नहीं होता। सोल इज़ द फर्स्ट सुपरस्टिशन। सोल जैसा कुछ होता नहीं, सोल, स्पिरिट, ये सुपरस्टिशन हैं। आत्मा माने सोल नहीं होता, आत्मा माने सेल्फ होता है। आत्म, सेल्फ, मैं। जब तक आपकी भाषा से “सोल” शब्द नहीं निकलेगा, तब तक अंधविश्वास बचा ही रह जाएगा। और बचा ही रह जाएगा माने जिसकी जड़ बची हुई है, वो पूरा जंगल भी बन सकता है। एक पेड़ ही नहीं रह सकता।
सोल क्या है? स्पिरिट क्या है? ये मन के कांसेप्ट्स हैं। तो जब कोई बात कहनी हो जिसमें “सोल” का उपयोग आवश्यक लग रहा हो या उपयोगी लग रहा हो, तो सोल मत कहिए। कहिए “माइंड”। मत कहिए, “माय सोल स्टैंड्स हर्ट और ब्लेमिश्ड।” क्योंकि है तो ये मेंटल कांसेप्ट ही न। तो सोल और कुछ नहीं है, माइंड ही सोल है। और माइंड के सेंटर में क्या होता है? मन के केंद्र में क्या होता है? अहम्। तो एक तरह से कहिए, जिसको आप सोल या जीवात्मा कहते हो, वो अहंकार मात्र है और कुछ नहीं।
और जब तक ये बात समझी नहीं जाएगी, तब तक बड़े से बड़ा समाज सुधार असफल ही रहने वाला है। जब तक परम सत्ता, परमात्मा, हृदय में ही स्थान नहीं पाएगी, तब तक आप कर लीजिए कोई भी धार्मिक सुधार, समाज सुधार, सब विफल जाना। आप बताइएगा, जितनी भी बड़ी से बड़ी धार्मिक या सामाजिक कुरीतियाँ होती हैं, क्या उनके केंद्र में जीवात्मा नहीं है? बोलिएगा। ये निचले वर्ण का है या तथाकथित निचली जाति का है? बताओ, इसकी जाति कैसे निचली है? शरीर तो सबका एक जैसा होता है। जो अपने आप को बहुत ऊँचे वर्ण का बोलता हो, जो बहुत निचले वर्ण का बोलता हो, दोनों के शरीर से सैंपल्स ले लो। जिस भी चीज़ के लेने हैं, खून, हड्डी, मांस, जिस भी चीज़ का लेना है, शरीर तो सबका एक जैसा ही निकलेगा।
तो फिर तुम दोनों में इतनी ज़बरदस्त भेद की मान्यता रखते हो, कि नहीं ये दोनों हैं तो अलग-अलग ही। वो भेद तुमने कहाँ से प्रक्षेपित करा है? जीवात्मा से, और कहाँ से। शरीर तो अलग होते नहीं हैं। कोविड में आप ये तो नहीं देख रहे थे कि वो ऑक्सीजन पहले किसने इस्तेमाल करा था, क्योंकि सबके फेफड़े एक जैसे हैं। जब खून की ज़रूरत होती है या प्लेटलेट्स की ज़रूरत होती है, तो अब भी आप नहीं देखते कि किसकी जाति से आ रहा है, क्योंकि शरीर सबके एक जैसे हैं। तो फिर हम कैसे मान लेते हैं कि एक जात दूसरी जात से अलग है? सोचो, कैसे मान लेते हैं?
कोई दुख भोग रहा होता है, बाबा जी तुरंत बोलते हैं, “अरे, ये तेरे पिछले जन्मों के पापों का नतीजा है।” ठीक? लेकिन पिछले जन्म के पाप कैरी फॉरवर्ड कैसे हुए? ये तो बताओ। कहेंगे, “वैसे ही हुए थे। वो टेक ऑफ की जीवात्मा और उसके बाद तेरी माँ के गर्भ में लैंड कर गई। सॉफ्ट लैंडिंग बिल्कुल ऐसे।” अब ये भाग्यवाद है। “क्योंकि अब मैं क्या कर सकती हूँ? मेरा तो पिछला जन्म ही ऐसा था। मैं पापिन थी। पिछले जन्म में मैंने कुछ किया होगा, कांड। बाबा जी की तपस्या भंग करी थी।” तो अब इसीलिए इस जन्म में मुझे तमाम तरह के दुख मिल रहे हैं।
जितनी भी कुरीतियाँ हैं, सामाजिक, वो भी नहीं हट सकती जब तक आप जीवात्मा को नहीं हटाओगे। और व्यक्तिगत तल पर रिस्पॉन्सिबिलिटी और अकाउंटेबिलिटी तब तक नहीं आ सकती जब तक आप जीवात्मा को नहीं हटाओगे। एक आदमी बिल्कुल गैर-ज़िम्मेदार है, काहिल है। क्या उसका शरीर ख़राब है? क्या उसका शरीर ख़राब है? नहीं, नियत ख़राब है। पर वो ये नहीं मानेगा कि नियत ख़राब है। वो क्या कहेगा? “मैं तो हूँ ऐसा। मैं क्या कर सकता हूँ? मैं तो ऐसा ही हूँ।”
तुम ऐसे कैसे हो? समझाओ न। जेनेटिकली तुम ख़राब हो? जींस तो तुम्हारे वही हैं जो किसी और के भी हैं। पर तुम न काम करना चाहते, न मेहनत करना चाहते, न ज़िम्मेदारी उठाना चाहते, तो तुमने अपनी इरिस्पॉन्सिबिलिटी किस चीज़ के पीछे छुपाई है? कर्मफल है। मैं क्या करूँ? लॉ ऑफ़ कर्मा है, लॉ ऑफ़ कर्मा है। आप बात को समझ रहे हैं।
आपको जितना समाज सुधार करना है, कर लीजिए। आपको जितनी आर्थिक तरक़्क़ी करनी है, कर लीजिए। अमेरिका में क्या अंधविश्वास कम है? आपको जितनी वैज्ञानिक तरक्की करनी है, आप वो भी कर लीजिए। आपको जितनी तरह की तरक्कियाँ करनी हैं, आप शिक्षा में क्रांति कर लीजिए। आप ऐसा कर दीजिए कि हर बच्चा पीएचडी करेगा, कर लीजिए, ये भी कर लीजिए। तो भी अंधविश्वास बचा रह जाएगा, क्योंकि अंधविश्वास की जड़ बची रह जाती है। अंधविश्वास की जड़ है, मैं। द ईगो इज़ द फर्स्ट सुपरस्टिशन। वो है नहीं, पर कहती है कि “मैं हूँ।” और उसी ईगो का जो सबसे विशियस, सबसे विषैला रूप होता है, वो होता है सोल।
जब तक आप सोल के सुपरस्टिशन को नहीं हटाते, कुछ भी चलेगा, कुछ भी चलेगा। फिर कुछ भी बोलो, कह दो कि “ये तो माय सोल इज़ सेइंग दिस।” और सोल पर तो किसी का बस होता नहीं न। दूसरी ओर, अगर आप माइंड की भाषा में बात करेंगे, तो ये ज़्यादा रिस्पॉन्सिबल, ज़्यादा ज़िम्मेदारी की भाषा है। क्योंकि माइंड मेरा है। माइंड में क्या हो रहा है, ये मैं तय करूँगा। माइंड में क्या रखना है, ये मैं तय करूँगा। पर सोल ऐसी चीज़ हो जाती है, जो आपने इन्हेरिट करी है। क्योंकि वो उड़ती है। वो आपसे पूछ के तो नहीं उड़ती। बात आ रही है समझ में?
इस पर बहुत और देर तक बात करी जा सकती है कि एक आदमी जो अंधविश्वासी हो गया, उसके जीवन में कितने तरीके के ज़हर आ जाते हैं। हम लोग अंधविश्वास को यूँ ही बस वही छोटी-मोटी बात समझ लेते हैं, कि वो मतलब ऐसा लगता है जैसे कोई साधारण-सी बुराई है। ठीक वैसे जैसे किसी को कह देते हैं कि “अरे, वो स्मोकिंग करता है” और “वो सुपरस्टिशियस है।” नहीं साहब, ज़मीन-आसमान का अंतर है।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
जिसने एक बात भी बिना जाँचे-परखे माननी शुरू कर दी, उसने मानने के दरवाज़े खोल दिए न। अगर एक बात भी आपने मान रखी है, कोई भी एक बात भी आपने मान रखी है, ‘मान, बिलीफ़,’ तो अब आप सौ बातें भी मान सकते हो। जिसने एक झूठ मान लिया, तो हम कहते ही हैं कि एक झूठ से सौ झूठ पैदा होते हैं। जिसने एक झूठ मान लिया, अब वो सौ झूठ मानेगा। तो अंधविश्वास कोई छोटी-सी चीज़ नहीं होती। कि “वो मैं खाते वक़्त हमेशा नॉर्थ की ओर मुँह करके खाना चाहता हूँ। जनरली, यू नो, मुझे लगता है कि इट इज़ गुड फ़ॉर मी।”
ना-ना। आप किसी के साथ खाना खाने बैठे और शुरू में वो ये लक्षण दिखा दे, खाना छोड़ के भाग जाइए। “मैं तो सुबह उठकर सबसे पहले अपने राइट पैर को ज़मीन पर रखती हूँ।” ये जहाँ भी हैं, इनके घर में बहुत नाश मचा होगा। क्योंकि अगर कोई इस जैसी बात को मान सकता है, तो उसे कुछ भी मनवाया जा सकता है। और मानने का मतलब होता है तथ्यों से दूर चले जाना। मान्यता यही करती है न, फ़ैक्ट से दूर कर देती है। इमेजिनेशन का काम ही यही होता है कि अब फ़ैक्ट के लिए कोई जगह नहीं है। और जहाँ फ़ैक्ट के लिए जगह नहीं है, वहाँ फिर सत्य के लिए क्या स्थान होगा? फ़ैक्ट्स आर द डोर टू ट्रुथ।
तो इन छोटी-छोटी बातों को अपनी कोई यूँ ही इनोकुओस हैबिट मत कह दिया करिए, कि “अरे, ऐसे ही, इसमें कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं हो गया। मुझे लगता है, मैं ऐसा ही मानता हूँ।”
नहीं, नहीं, नहीं। एक चीज़ मानी, तो सौ चीज़ें माननी पड़ेंगी। और दुनिया खूब चढ़ बैठेगी आपके ऊपर, क्योंकि वो तो चाहते ही हैं कि आपको कुछ भी मनवा दिया जाए। एक बात और समझिएगा, अगर परम सत्ता का नाम भगवान है, तो ये भगवान का अपमान है कि उन्हें कल्पना की वस्तु बना दिया जाए या कहानी की वस्तु बना दिया जाए। भगवान का वास्तविक सम्मान इसी में है कि कहा जाए, “न यहाँ, न वहाँ, न ये लोक, न परलोक, हृदय।” और उनके बारे में कोई क़िस्सा-कहानी नहीं हो सकता। सारे क़िस्से किसके हैं? अहंकार के हैं।
हम क्या कहना चाहते हैं? कि हमने भगवान को भी अहंकार की कहानी बना दिया। नहीं। कहानियाँ अच्छी होती हैं। फ़िल्मों में अच्छी लगती हैं, नाटकों में अच्छी लगती हैं। अध्यात्म में कहानियाँ नहीं जँचती। अध्यात्म में कहानियों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हाँ, बोध-कथाएँ हैं तो ठीक है। बोध-कथाएँ आप जानते हैं न उपनिषदों में भी आती हैं, जैन स्टोरीज़ हैं, सूफ़ी स्टोरीज़ हैं, वो अलग बात है। वो पैरेबल्स हैं। वो कुछ सिखाने के लिए हैं। वो ये दावा नहीं करतीं कि एक बार भगवान जी ने ये करा, फिर एक बार भगवान जी ने ऐसा कहा और भगवान जी ने फिर श्राप दे दिया। उनमें ये नहीं आता।
परम सत्ता का भी वास्तविक सम्मान इसी में है कि उसके विषय में मौन रहा जाए। इसीलिए आत्मा की परिभाषा नहीं होती। इसीलिए ब्रह्म अचिंत्य है। इसीलिए सत्य अकथ्य है। उपनिषद् कहते हैं, वाणी जाती है कि कुछ वर्णन करे, असफल हो जाती है। कान कहते हैं, कि उसके बारे में कुछ सुन पाएँ, कुछ सुनाई नहीं देता। मन सोचता है, उसके बारे में चिंतन या कल्पना करे, चिंतन, कल्पनाएँ, ये सब खाली हाथ लौट आते हैं। ये है सम्मान परम सत्ता का। क्योंकि कहने वाला मैं हूँ, मैं अपने आप को जानता हूँ, मैं अपनी सीमाओं को जानता हूँ। अपनी सीमाओं में रहते हुए मैं असीम की बातें क्यों करूँ? मुझे नहीं करनी है असीम की बात। मुझे बस झुक जाना है। बात अगर करनी भी है तो किसकी करूँगा? अपनी करूँगा। इसे कहते हैं, आत्म-अवलोकन, आत्म-प्रेक्षण, सेल्फ़ ऑब्ज़र्वेशन।
आत्मा को नहीं जानना है, सत्य को नहीं जानना है, भगवान को नहीं जानना है; स्वयं को जानना है। और स्वयं को जानना माने अपने झूठ को जानना है।
ख़ुद को देखोगे तो और क्या दिखाई देगा? अध्यात्म माने भगवान की खोज नहीं होता। अध्यात्म माने सत्य की खोज नहीं होता। अध्यात्म माने स्वयं की खोज होता है। और स्वयं माने परमात्मा नहीं होता, स्वयं माने अहंकार। तो इसीलिए कहता हूँ कि सच को मत खोजो, झूठ को खोजो। मत कहो कि सत्य की पहचान करनी है, माया को पहचानो। माया घुसी पड़ी है भीतर, उस पर नज़र रखो। सत्य को छोड़ दो, उसका मूक वंदन पर्याप्त है। चुप हो जाओ सत्य के सामने, यही सम्मान है, यही प्रार्थना है; चुप हो गए, बस।
ये जो हम अपनी प्रार्थनाओं में और आरतियों में ज़ोर-ज़ोर से गुणगान करते हैं न, ये कोई बहुत सम्मान की बात नहीं है। वो आरतियाँ, वो प्रार्थनाएँ भी हमने लिखी हैं और उन गुणों की कल्पनाएँ भी हम ही ने करी हैं। ये कोई बहुत सम्मान की बात नहीं है। हमें लगता है हम अपनी ओर से बड़ा अभिवादन कर रहे हैं। ना, ना। हम कुछ और ही कर रहे हैं, अहंकार मुस्कुरा रहा है पीछे बैठकर। वो कह रहा है, “सम्मान के बहाने अपमान कर दिया।”
तो शिक्षा आवश्यक है, पर शिक्षा मात्र से अंधविश्वास नहीं हटेगा; शिक्षा आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं है। ठीक वैसे जैसे अविद्या आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं है। हमें अविद्या के साथ-साथ विद्या भी चाहिए। इसी तरीके से हमें शिक्षा, यानी जो हमारी फ़ॉर्मल एजुकेशन है, जो औपचारिक हमारी शिक्षा है, स्कूल की, कॉलेज की, हमें उस शिक्षा के साथ-साथ आत्मज्ञान चाहिए, तब अंधविश्वास हटेगा। जब विद्या और अविद्या दोनों मिल जाते हैं, तब अंधविश्वास हटता है। और इन दोनों में भी ज़्यादा ज़रूरी है विद्या, क्योंकि विद्या माने ख़ुद को जानना। जब आपको ख़ुद का ही नहीं पता होगा, तो आप ये कैसे पता करोगे कि अविद्या कैसी हासिल करनी है?
जो आदमी ख़ुद को नहीं जानता, वो कह रहा है, “मैं चार किताबें उठा रहा हूँ पढ़ने के लिए।” वो कौन-सी किताबें उठा लेगा? एकदम व्यर्थ किताबें, मूर्खतापूर्ण किताबें। जाएगा कहीं पर, देखेगा सबसे बढ़िया मस्त बिकने वाला पॉप लिटरेचर कौन-सा है? फ़ैंटैस्टिक फ़िक्शन कौन-सा है? वो उसको उठाकर पढ़ने लगेगा और क्या कहेगा कि मैं क्या हासिल कर रहा हूँ? अविद्या। साहब, अविद्या भी हासिल करने वाले आप ही हैं, तो पहले आपको ठीक होना पड़ेगा फिर अविद्या हासिल करिए। तो विद्या, अविद्या, दोनों आवश्यक हैं; लेकिन इन दोनों में भी पहला स्थान किसका है? विद्या का, ख़ुद को जानने का। और जब व्यक्ति ख़ुद को भी जानता है और दुनिया को भी जानता है, तो अंधविश्वास समूल हट जाता है। सेल्फ़ को भी जानता है और साइंसेज़ को भी समझता है। अब अंधविश्वास हटेगा, अब ज़िंदगी में बिल्कुल एक मौलिकता और ताज़ापन आता है। सच्चाई आती है ज़िंदगी में।
मेरा आपसे आग्रह है, कुछ भी ऐसा मत करिए जो आप जानते-समझते नहीं कि क्यों कर रहे हैं। आप लोग मुझसे कहते हैं न कि आप कुछ रखते हैं मेरे लिए, थोड़ा-बहुत कुछ भी? तो इतना आग्रह समझिए बात को मेरी, कुछ भी ऐसा मत करो जो आप नहीं जानते कि क्यों कर रहे हो। बस ये मत कह दो कि “ऐसा तो होता ही है, तो हम भी कर रहे हैं।”
क्यों कान छिदवाकर ये लटका रखा है? बताओ तो। मनुष्य हो। मनुष्य अपना कान छिदवाकर उसमें एक मेटल क्यों लटका रहा है? मेरे देखे, ये एक ह्यूमन एनाटॉमी है, ये इयर लोब्स हैं। ये इसलिए होते हैं ताकि आपके ईयर-ड्रम तक कचरा न पहुँचे। ये उसको सुरक्षा देने के लिए होते हैं, क्योंकि वो एक ओपन एंट्री है, तो उसके आसपास ये बना दिया गया। क्यों इसमें छेद करके मेटल लटका रहे हो? पर ये तो सभी करते हैं। ये तो मतलब सभी करते हैं। अरे, क्यों कर रहे हो? नाक में छेद क्यों कर रहे हो? गले में मेटल क्यों लटका रहे हो?
मैं विरोध नहीं कर रहा, मैं प्रश्न कर रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, अगर आपको पता है कि क्यों लटका रहे हो, तो ज़रूर लटकाओ। मैं लटकाने का विरोधी नहीं हूँ। मैं ना जानने का विरोधी हूँ। जानकर, समझकर आपको लटकना है, लटकाना है, कुछ भी करिए, सब ठीक है। पर बिना जाने कुछ भी क्यों कर रहे हो? ये मैं आपसे आग्रह कर रहा हूँ। अगर नहीं जानते तो मत करो, नहीं जानते तो सवाल पूछो। नहीं, पर हर चीज़ समझी थोड़ी जा सकती है। फिर फँस गए न! आ गया वही पुराना तर्क, “नहीं, पर हर चीज़ समझी थोड़ी जा सकती है।” आ गई हीन भावना। अच्छा, तुम नहीं समझ सकते, पर जिसने ये परंपरा बना रखी है, वो समझता था। वो कौन है? सुपरमैन।
“नहीं, पर वो हमारे श्रेष्ठ पुरखे हैं, वो सब जानते थे।” जहाँ से ये परंपरा आ रही है न, उस समय न तो शिक्षा थी, न प्रयोगशालाएँ थीं, वो सब जानते थे। वो सब जानते थे, उनकी बनाई परंपराएँ आपको ढोनी हैं, है न?
लोग साधारण बीमारियों से भी मर जाते थे, क्योंकि दवाई नहीं थी। और वो सब जानते थे, वो सब जानते थे, एक-एक महिला के 10–10 बच्चे होते थे, क्योंकि इन्फ़ेंट मॉर्टैलिटी या मॉर्टैलिटी ऐट बर्थ ऐसी होती थी कि आधे बच्चे मर जाते थे, तो इसीलिए इतने बच्चे फिर पैदा करने पड़ते थे। “अच्छा, पुरखे सब जानते थे, सब जानते थे।”
बैलगाड़ी पर ज़िंदगी चल रही थी। “अच्छा, सब जानते थे।” “लो अतीत से उतना ही लो जितना पोषक है। जीर्ण क्षण का मोह मृत्यु का द्योतक है।” हाँ, लीजिए, लीजिए संस्कृत व्याकरण बहुत सुंदर है अतीत से उसको लीजिए, और उसको इतना भी बदलने की ज़रूरत नहीं है। बहुत बढ़िया तार्किक नियम बना दिए गए हैं, बिल्कुल लीजिए। षड्दर्शन है आपके पास, जाइए, पढ़िए। अतीत को ठुकराने की बात नहीं कर रहा हूँ, विवेक की बात कर रहा हूँ। पता होना चाहिए, अतीत से क्या लेना है और क्या नहीं लेना है।
रोज़ हम लोग भगवद्गीता पढ़ रहे हैं, संतवाणी पढ़ रहे हैं, मुनि अष्टावक्र के पास हैं, वहाँ आचार्य नागार्जुन के पास हैं। उस दिन चुआंग्ज़ु के साथ थे। उससे पहले डायोजनीज़ के साथ थे। ये सब अतीत के ही हैं न, हम नमन करते हैं इनको। पर इसका ये मतलब नहीं है कि अतीत की सब परंपरा और अंधविश्वास भी हम ढोते चलेंगे। उसको ठुकराना सीखिए। मत कह दीजिए कि “पहले से चल रहा है तो ठीक ही होगा।” आपने ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम लिया। वो भी यही कह देते कि पहले से चल रहा है, ठीक ही होगा, तो बाल विवाह, विधवा विवाह, इनमें कोई सुधार नहीं आ पाता। और राममोहन राय भी बोल देते कि सती चल रही है तो ठीक ही होगी। तो पता नहीं आज सब लोग यहाँ बैठे भी होते कि नहीं।
पीछे से जो चलता आ रहा है, सब ठीक नहीं होता। बार-बार मत कह दीजिए कि “हमारे पुरखे बेवकूफ़ थे क्या?” हो सकता है, हों। अरे भाई, कल हम भी किसी के पुरखे होंगे। मैं तो निरा बेवकूफ़ हूँ। आप भी थोड़े-बहुत तो बेवकूफ़ होंगे ही। तो जब हम किसी के पुरखे होंगे और हम बेवकूफ़ हैं, तो हमारे पुरखे भी तो हमारे ही जैसे थे। उनमें भी कुछ बुद्धिमान थे, तो कुछ बेवकूफ़ भी रहे होंगे। हर तरह के इंसान होते हैं।
और आमतौर पर परंपराएँ बुद्धिमान लोग नहीं बनाते, उनके लिए बोध पर्याप्त होता है। ये परंपराएँ जो निकलती हैं न एक-एक गाँव से, ये बनाने वाले बुद्धिमान लोग नहीं होते। बुद्धिमान अपने पीछे पुस्तकें छोड़ जाते हैं, दर्शन छोड़ जाते हैं, समझ छोड़ जाते हैं। वो ये नहीं कहते कि टोना टोटका है, यही परंपरा है, इसका पालन करो। “हमारे घर में तो जब भी नई बहू आती है, पहले दही से नहाती है।” क्यों? क्या? लस्सी? अलग-अलग क्षेत्रों में अपना अलग-अलग। इसी को हम कहते हैं हमारी क्षेत्रीय पहचान है, “वहाँ दही चलती है, हमारे गाँव में लस्सी चलती है। सांस्कृतिक धरोहर है हमारी।” अरे, इसमें क्या है? तुम्हारी धरोहर है, उपनिषद्।
कल्चरल हेरिटेज जैसा कुछ नहीं होता, इंटेलेक्चुअल हो सकती है हेरिटेज, और स्पिरिचुअल हो सकती है। इंटेलेक्चुअल मतलब, किसी ने कोई आइडिया दिया था, विचार दिया था, सिद्धांत दिया था। और स्पिरिचुअल माने, किसी ने बोध के सूत्र दिए थे, समझ दी थी। सिद्धांत दिया तो इंटेलेक्चुअल बौद्धिक। और समझ के सूत्र दिए तो आध्यात्मिक विरासत।
क्यों मैं संस्कृति की बात कर रहा हूँ? क्योंकि बहुत सारा अंधविश्वास संस्कृति के नाम पर ही ढोया जाता है। कि “ये तो हमारी ट्रेडिशन और कल्चर है न।” तो आप इसको सुपरस्टिशन क्यों बोल रहे हैं? अभी मैं ये बात बोल रहा हूँ न जाने कितने लोग बहुत नाराज़ हो रहे होंगे। यहाँ पर नहीं तो बाद में कभी, अगर ये छपेगा, तो लोग नाराज़ होंगे। वो कहेंगे, “देखो, ये हमारी संस्कृति को बुरा बोल रहा है।”
प्रश्नकर्ता: सर, एक फ़ॉलो-अप है। सर, आपने वैज्ञानिकों की बात की, चिकित्सकों की बात की। एक मनोवैज्ञानिक भी अगर माइंड को स्टडी करता है, वो ऑब्जेक्टिवली करता है। लेकिन हम अगर कला की ओर जाएँ, आर्ट्स की ओर जाएँ, वहाँ पर हम देखते हैं कि कोई एक गाना लिख रहा है, कोई एक मूवी बना रहा है। उनमें बहुत ऊँचे दर्शनों का प्रभाव होता है, वो हम देख पाते हैं। लेकिन फिर भी वो एक ही बात कहते हैं, “हम चांस नहीं ले सकते। हम थोड़ी-बहुत कर लेंगे सुपरस्टिशन, तो क्या होगा?”
और वो पॉपुलर मीडिया में भी आते हैं, और वो प्रचार भी होता है पॉपुलर मीडिया में। एक बैट्समैन जब बैटिंग करने जाता है, वो बाएँ पैर का जूता पहले बाँधकर रखता है।
आचार्य प्रशांत: ये देख रहे हो न जहाँ कहीं भी कामना है, वहाँ पर जीवात्मा और अंधविश्वास, दोनों को ठुकराना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। ये सब एक ही घराने के हैं। दिखाई दे रहा है? कामना, अहंकार, जीवात्मा, अंधविश्वास। ये जो तुम्हारा बैट्समैन है, इसको बड़ी कामना है कि किसी तरह टीम में बसा रहूँ, ताकि एंडोर्समेंट्स मिलेंगे, एडवर्टाइज़मेंट्स मिलेंगे। पैसा भी तो कमाना है, बाहर जाकर सेटल भी तो होना है। तो इसलिए इसे अंधविश्वासी होना पड़ेगा, क्योंकि भीतर कामना बिल्कुल लपटें, जल रही हैं। बात समझ में आ रही है?
और कामना जितनी प्रबल होती है, आदमी उतना कहता है “चांस कौन ले, रिस्क कौन ले।” ये सब एक ही घराने के हैं, अच्छे से समझना। इसीलिए अंधविश्वास रखे-रखे आध्यात्मिक नहीं हो पाओगे। कामना, अहंकार, जीवात्मा, अंधविश्वास, अगर ये एक ही घराना है, तो इसका मतलब जहाँ अंधविश्वास है, वहाँ क्या है? अहंकार। तो जो अंधविश्वास रख रहा है, वो अहंकारी है। तो फिर वो आध्यात्मिक कैसे हो जाएगा? और मज़ेदार बात ये कि अंधविश्वास सबसे ज़्यादा तथाकथित धार्मिक, आध्यात्मिक लोगों में पाया जाता है। जो अपने आप को धार्मिक बोलता हो, उसकी कहीं ज़्यादा संभावना है अंधविश्वासी होने की। जबकि धर्म का मतलब ही होता है, अंधविश्वास से मुक्ति।
प्रश्नकर्ता: सर, आपने पर्सनल अकाउंटेबिलिटी की बात भी की। ये सब जब पॉपुलर मीडिया में आता है, तो इनका ज़मीनी जो प्रभाव है, वो बहुत बुरी तरह से होता है। अगर हम आज भी अगर थोड़े से दूर चले जाएँ यहाँ पे गाँव में, तो भी आज हम देखते हैं कि इनका जो बुरा प्रभाव है, वो पड़ रहा है। वो कोई डॉक्टर को न बुलाकर ओझा को बुलाते हैं। तो ये पर्सनल अकाउंटेबिलिटी की बात भी हो गई।
और एक चीज़, सर आप कामना की बात बोल रहे हैं। मेरा ये प्रश्न है: क्या अल्टिमेटली डर ही सबसे बड़ा बंधन है, जिनके सामने अगर कोई बुद्धिमान भी हो, कोई ज्ञानी भी हो, वो झुक जाता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, डर किसको लगता है? जिसको डर लगता है, उसकी बात करिए न। आप ख़ुद को बचाए-बचाए डर को नहीं हटा सकते, कि मैं तो बचा रहूँ पर डर हट जाए, ये नहीं हो पाएगा। और बहुत सारे तार्किक लोग, बुद्धिजीवी, ये कोशिश करते हैं। वो कहते हैं, “फ़्रीडम फ्रॉम फ़ियर।” वो कभी नहीं कहते, “फ़्रीडम फ्रॉम सेल्फ़।”
सेल्फ़ माने अहंकार को बचाना है और फ़ियर को हटाना है, ये कैसे कर लोगे, भाई? ये कैसे कर लोगे? सेल्फ़ का मतलब ही है एक इमैजिनरी, फ़िक्टिशियस, काल्पनिक एंटिटी, जो छोटी-सी है, अकेली है, उदास है, अपूर्ण है। और लगातार इसी उधेड़बुन में है कि क्या पकड़ लूँ, क्या छोड़ लूँ। किस दुकान से क्या ख़रीद लूँ और किससे बचकर निकल लूँ। यही तो करता है न अहंकार।
भाई, अगली कौन-सी कामना पूरी करनी है? नौकरी तो लग गई, अब अगला ये है, अब अगला वह। अहंकार माने बस यही, उसकी परिभाषा में ही उसका दुख छिपा हुआ है। उसकी परिभाषा ही यही है कि मैं अल्प हूँ, अपूर्ण हूँ, अकेला हूँ, असुरक्षित हूँ। अल्प हूँ, अपूर्ण हूँ, अकेला हूँ, असुरक्षित हूँ, ये अहंकार की परिभाषा है। तो इस परिभाषा के साथ ही डर चलता है। आप कैसे डर हटा दोगे बिना अहंकार को हटाए? और एक चीज़ और समझना, आप जब पढ़े-लिखे लोगों की बात कर रहे हो, अहंकार बस वही नहीं होता कि नई बहू के ऊपर दही डाल दी। अंधविश्वास बस यही नहीं होता कि बिल्ली रास्ता काट गई, यही नहीं है अंधविश्वास। अंधविश्वास सारा किसके लिए होता है? अहंकार के लिए।
और अहंकार बोलता है, मैं अकेला हूँ, मैं अपूर्ण हूँ, मुझे अपनी कामनाओं के पीछे भागना है। तो जो लोग इस तरह की बातों में नहीं भी मानते हैं, बिल्ली और दही और लस्सी और धागा और पेड़ और नदी में जाकर डुबकी मारकर ये; जो इन बातों को नहीं भी मानते, वो ये तो मानते हैं न कि कॉर्पोरेट करियर हो, ईएमआई वाला बढ़िया 3-बीएचके हो, तो ज़िंदगी सेट हो गई। ये तो वो भी मानते हैं न? ये भी सुपरस्टिशन है। ये भी सुपरस्टिशन है, क्योंकि इसका संबंध भी किससे है? इसका संबंध भी अपूर्ण अहंकार से है। ये व्यक्ति क्या कह रहा है? कि अगर ये सब मिल जाएगा, तो पूर्णता मिल जाएगी। ये भी सुपरस्टिशन है। क्यों? क्योंकि तुमने मान लिया है। तुमने पूछा नहीं। तुमने मान लिया है। तुमने पूछा नहीं कि ये सब मिलने से कुछ होता है क्या?
जो व्यक्ति स्वयं को नहीं जानता, उसे अंधविश्वासी होना पड़ेगा। चाहे इस तरीके से, चाहे उस तरीके से। चाहे पढ़े-लिखों के तरीके से, चाहे अनपढ़ों के तरीके से। चाहे ग्रामीणों के तरीके से, चाहे मेट्रो वालों के तरीके से। पर उसे अंधविश्वासी तो होना पड़ेगा। “नहीं, वीकेंड आया है, एंजॉय तो करना है, करना है, करना है।” आपने कभी इसको सोचा? क्या मतलब है इस बात का? एक कोई गाँव में बैठा है, वो कहता है कि पूर्णिमा के दिन झरने के नीचे नाग निकलकर नाचते हैं, और उधर जाकर हमें भी नाचना चाहिए। आप कहोगे, “ये देखो, गँवार।” गँवार भी नहीं आप पढ़े-लिखे लोग हो, तो बोलोगे “गहवार।”
और आप जो बोल रहे हो, कि अब वीकेंड आ गया, तो हमें निकलकर नाचना चाहिए, ये बराबर का गँवार क्यों नहीं है? मैं पूछ रहा हूँ, बस। उसने भी आनंद को एक समय से जोड़ दिया है, बस वो बेचारा पढ़ा-लिखा नहीं है तो उसने एक बड़ी क्रूड, स्थूल कहानी बना दी है कि झरने के नीचे नाग नाचते हैं, तो हम भी नाचेंगे। आप कहोगे, बेसिर-पैर की बातें। अरे, आनंद का झरने से, पूर्णिमा से और नाग से क्या लेना-देना? यही कहोगे न? अब मैं आपसे पूछ रहा हूँ, आनंद का वीकेंड से क्या लेना-देना? आप बताओ। ये सुपरस्टिशन नहीं है क्या कि पाँच दिन अच्छे से अपनी दुर्गति कराओ, ऐसी नौकरी में रहो जहाँ खून चूसा जाता है, और उसके बाद कहो, वीकेंड आ गया है। अभी मैं जाकर बिल्कुल एकदम टॉप-एंड-टॉप हो जाऊँगा। ये सुपरस्टिशन नहीं है क्या? तुमने कभी पूछा कि ये सब क्या चल रहा है?
तो इसीलिए ये जो वीकेंड वाला क्राउड है, कोई अंग्रेज़ी बोलने वाले बाबा जी आ जाएँ और वो इनको पूर्णिमा का कुछ ख़ास सूत्र बता दें, कि “स्पेशल पूर्णिमा ऑफ़रिंग फ़्रॉम बाबा जी।” तो ये जो पढ़ा-लिखा वीकेंड क्राउड है, उनकी ओर चला जाएगा। क्योंकि सुपरस्टिशस ये पहले से था। बाबा जी ने बस उस सुपरस्टिशन को एक फ़ॉर्मल, एंग्लिसाइज़्ड तरीके से चैनलाइज़ कर दिया है। सुपरस्टिशस ये पहले ही थे। इन्होंने क्या करा था? इन्होंने कहा था अब 10th के बाद, अब 12th में आ गए हैं, तो हमें अब मेडिसिन, इंजीनियरिंग, सी.ए. कुछ देखना है। क्यों देखना है? तुमने कभी पूछा? तुमने कहा, परंपरा है, तो हम पालन कर रहे हैं। तुमने कभी पूछा कि क्यों करनी है इंजीनियरिंग? नहीं, परंपरा का पालन करा।
पर गाँव में वो अपनी परंपरा का पालन करता है कि हल चलाने से पहले मिट्टी ले जाऊँगा और तालाब किनारे उसकी पूजा करूँगा, तो आप कह देते हो सुपरस्टिशस है। और आप भी तो पूरी ज़िंदगी परंपराओं का ही पालन कर रहे हो। पर आप पढ़े-लिखे आदमी हो, तो आप उसको एक फ़ॉर्मल, पॉलिश्ड विनियर दे देते हो। लेकिन आपने सुपरस्टिशन के अलावा और क्या करा? अब 12th के बाद ये कर लिया, अब मुझे जॉब मिलनी चाहिए। अब मुझे एक अच्छी गर्लफ़्रेंड, बॉयफ़्रेंड मिलना चाहिए। अब मेरे दो क्यूटी-क्यूटी बेबीज़ होने चाहिए। ये सुपरस्टिशन कैसे नहीं है? आपको कैसे पता कि इससे कुछ मिलेगा आपको? बोलिए न। आपको कैसे पता?
ठीक जैसे वो माने बैठा है, कि हल चलाने से पहले खेत की मिट्टी को तालाब किनारे ले जाकर पूजने से फ़सल अच्छी हो जाएगी। यही मानता है न वो? और फ़सल अच्छी हो गई, तो मेरी ज़िंदगी धन्य हो जाएगी, वो भी यही मानता है। आप भी तो यही मान रहे हो कि अच्छी लड़की मिल गई तो ज़िंदगी बिल्कुल धन्य हो जाएगी। आपको कैसे पता? आपको क्या पता? क्या पता बोलिए तो?
अब अब्रॉड जाकर सेटल हो जाते हैं। क्या पता आपको? वो भी किसी एक ख़ास जगह को पवित्र मानता है, तालाब किनारे। आप भी एक ख़ास जगह को पवित्र मानते हो, अटलांटिक किनारे। ये तो यहाँ से जाएँगे, यू.एस. में सेटल हो जाएँगे, ईस्ट कोस्ट पर। नहीं, तालाब किनारे अंधविश्वास हो गया और अटलांटिक किनारे आप प्रोग्रेसिव हो गए, फ़ॉरवर्ड हो गए, प्रोफ़ेशनल हो गए। पता उसे भी कुछ नहीं है। पता आपको भी कुछ नहीं है। दोनों ही माने चले हो, बस।
जो नहीं समझते, उसको समझने का प्रयास करो। ये छोटी बात नहीं है। ये सब कुछ है। हमारी ज़िंदगी बिल्कुल अंधी चल रही है। छोटे नहीं, हमारे सब बड़े-बड़े फ़ैसले मान्यता से हो रहे हैं। उनमें कहीं कोई समझदारी, कोई अंडरस्टैंडिंग, बोध नहीं है। आप अपनी ज़िंदगी के सब फ़ैसले देखिए, और अगर उनको क्रॉस-क्वेश्चन किया जाए, तो दूसरे या तीसरे सवाल पर आप अटक जाएँगे। आपके पास कोई वजह नहीं होगी। आप बस ऐसे कहेंगे, “वो तो मतलब करना ही होता है न, ऐसा।”
आप अपनी ज़िंदगी के जो टॉप फ़ाइव डिसीज़न्स हैं, पाँच सबसे बड़े फ़ैसले, वो लिख लीजिए। और ख़ुद से पूछना शुरू करिए कि ये फ़ैसला मैंने क्यों किया? एक या दो प्रतिप्रश्न करेंगे आप, और आप पाएँगे कि आप निरुत्तर हैं। आपको पता ही नहीं कि आपने जो किया, वो क्यों किया। और वो सब ज़िंदगी के केंद्र में बैठा हुआ है। वो फ़ैसले छोटे फ़ैसले नहीं हैं। वो ज़िंदगी का आधार बन गए हैं। तो हम छोटे-मोटे सुपरस्टिशस नहीं हैं। हमारी पूरी लाइफ़ ही सागा ऑफ़ सुपरस्टिशन है। सिर्फ़ अंधविश्वास की एक लंबी धारा है जन्म से मृत्यु तक।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा आपसे एक प्रश्न है, कि जिसे हम आभास कहते हैं, कि मुझे आभास हो गया था कि ये होगा, और वो हो जाता है आपकी ज़िंदगी में। और कई बार वो चीज़ बहुत नेगेटिव होती है, जो कि आपको शायद उस क्षण पर रोक देती है। समय चाहे कितना भी बीत जाए, तो क्या उसे भी हम सुपरस्टिशन में ही गिनेंगे?
आचार्य प्रशांत: बेशक, आप इंट्यूशन की बात कर रही हैं। स्टैटिस्टिकल रिगर की डिमांड है कि सैंपल थोड़ा बड़ा होना चाहिए। एक या दो घटनाओं को लेकर हाइपोथेसिस को वैलिड नहीं माना जा सकता। आपने ये तो बता दिया कि आपको एक-दो बार इंट्यूशन हुआ और वो इंट्यूशन सही निकल गया। ये भी तो बताइए कि 50 बार इंट्यूशन हुआ था, और उसमें कुछ नहीं निकला।
लेकिन मेमोरी भी अहंकार की ग़ुलाम होती है। और अहंकार को अपने बचे रहने के लिए अंधविश्वास चाहिए। तो वो मेमोरी में बस उन चीज़ों को रजिस्टर और स्टोर करके रखेगा, जो उसके बचे रहने में सहायक, हेल्पफ़ुल होंगी। 50 में से 48 बार जो आपको लग रहा था, इंट्यूशन, प्रीमोनिशन वो सब बेकार निकला, अहंकार उस चीज़ को मेमोरी से ही डिलीट कर देगा, धीरे-धीरे। याद नहीं रखेगा। लेकिन एक बार ऐसा होगा कि आपको लग रहा था, “आज ऐसा क्यों लग रहा है कि घर के सामने एक्सीडेंट होगा?” और उस दिन हो गया , तो आप उसको 100 साल तक याद रखोगे। ये याद रखना भी किसी इंटेंशन से है, इसमें मेमोरी कम है, इंटेंशनलिटी ज़्यादा है।
सोचिए न, आपने जो पूरा बड़ा सैंपल था, वो नहीं याद रखा। आपने सिलेक्टिवली एक–दो घटनाएँ याद रखीं। वही जैसे पुराना उदाहरण चलता है न, कि मैं आपको बताऊँ कि 13 तारीख़ को कितने लोग मर गए दुनिया में, और 13 तारीख़ को कितने एक्सीडेंट्स हो गए। मैं आपको बताऊँ कि 13 तारीख़ को, क्योंकि और फिर मैं इससे साबित कर दूँ कि जो 13 का आँकड़ा है, वो अशुभ है। तो जो मैंने आपके सामने रखा, उसमें झूठ तो कुछ भी नहीं है। 13 तारीख़ को सचमुच इतने एक्सीडेंट हुए, और इतने लोग मरे, और इतने व्हीकल्स थे जिनके रजिस्ट्रेशन प्लेट में 13 लिखा हुआ था, और वो सब एक्सीडेंट हो गए। ये सब मैं डेटा आपके सामने रख सकता हूँ, और इसको रखकर मैं क्या साबित कर सकता हूँ? कि 13 का आँकड़ा अशुभ होता है।
अब इसमें इंटेंशनलिटी देखिए, इसमें चेरी-पिकिंग देखिए। मैंने छुपा क्या गया हूँ? मैंने छुपा क्या गया? मैंने छुपा गया कि 12 और 14 को क्या हुआ था। मैंने छुपा गया कि 13 को तो ये हो रहा है, पर 12 को भी यही हो रहा था और 14 को भी यही हो रहा था। बल्कि 1 से लेकर 31 तक हर दिन यही हो रहा था। मैंने याद बस क्या रखा?
श्रोता: 13 तारीख।
आचार्य प्रशांत: ये जो सेलेक्टिव कोटिंग है न, ये बड़ी ज़बरदस्त चीज़ होती है। वैसी चीज़ होती है कि मेरे दो घंटे के वीडियो में से अभी कोई 30 सेकंड की क्लिप निकालेगा, “आचार्य प्रशांत एक्सपोज़्ड।” न तुम्हें उसका आगा पता, न पीछा पता। तुम कुछ भी लेकर आ गए हो, तुम जानते भी हो कि तुम ये जो कोट लिख रहे हो, या फ़ोटो दिखा रहे हो, या क्लिप दिखा रहे हो, उसका पूरा कॉन्टेक्स्ट क्या है? तुम्हें कुछ पता भी है?
ये तो छोड़ दो कि उसे पता नहीं है और वो अज्ञानी है। बात यहाँ अज्ञान की नहीं है, बात यहाँ नियत की ख़राबी की है। अज्ञान की बात नहीं है, ये बात बेईमानी की है। बात समझ रहे हैं? इंट्यूशन माने कुछ नहीं होता है। देखिए, समझिए। इवोल्यूशन की प्रक्रिया रही है न पूरी। उस समय पर शरीर को बचाने के लिए बहुत आवश्यक था कि अनुभवों का स्ट्रेटेजिक इस्तेमाल किया जाए। क्योंकि उस वक़्त पर इंटेलेक्ट बहुत डेवलप्ड नहीं थी। टेक्नोलॉजी जैसी कोई चीज़ नहीं थी। इकोनॉमिक्स जैसी कोई चीज़ नहीं थी। कोई सोशल स्ट्रक्चर नहीं था जो आपको सिक्योरिटी दे सके। वेपन्स जैसा कुछ नहीं था आपके पास। लैब्स जैसा कुछ नहीं था। न सैटेलाइट, न जीपीएस कुछ नहीं। जंगल में हो आप।
तो आप कैसे बचोगे जानवरों से? और अन्य तरीके के ख़तरों से कैसे बचोगे? कैसे बचोगे? तो आप ऐसे बचोगे कि जो हमारी सेंस ऑफ़ इंट्यूशन है, वो हाइपर-डेवलप हुई। वो डर के कारण हुई, क्योंकि ख़तरा कभी भी आ सकता है। किसी भी झाड़ी से कोई भी जानवर आपके ऊपर कूद सकता है। और झाड़ियाँ ही झाड़ियाँ हैं आप उन्हीं के बीच में से निकल रहे हो लगातार। किसी भी झाड़ी से कोई भी कूद सकता है आपके ऊपर।
अब मुझे एक बात बताइए इवोल्यूशनरी पर्सपेक्टिव से ज़्यादा सेफ़ स्ट्रेटेजी क्या है? थोड़ा बताइएगा। ठीक है?
दस बार मुझे इंट्यूशन हुआ कि मेरे ऊपर भेड़िया कूदने वाला है, क्योंकि खुर-खुर-खुर कुछ हुआ, या हल्का-सा कुछ हुआ, और मेमोरी में सेव था कि ऐसी आवाज़ें पहले जब भी हुई हैं तो भेड़िया कूदा है। तो मैं चल रहा हूँ, और इधर झाड़ी में से ज़रा सरसराहट हुई, और मैंने कहा, भेड़िया कूदा। दस बार इंट्यूशन हुआ और मैं भाग गया दस बार। बाद में पता चलता है कि नौ बार वहाँ कोई भेड़िया नहीं था, बस एक बार था। तो नौ बार तो मेरा जो एफर्ट था भागने का, वो ख़राब ही गया, वेस्ट गया। लेकिन वो जो एक बार में बच गया, वो पर्याप्त है। उस एक बार बचने के लिए अगर दस बार भागना पड़े, तो कोई समस्या नहीं है। समझ में आ रही है न बात?
अब मान लो दस बार ऐसी इंट्यूशन होती कि भेड़िया है, और मैं कहता, मैं नहीं भागूँगा। तो नौ बार तो ये बहुत एफिशिएंसी की बात होती कि भेड़िया नहीं था और आप नहीं भागे। पर एक बार भेड़िया था, और वो एक बार दी एंड हो जाता। उस एक बार में दी एंड हो जाता।
तो इवोल्यूशनरी तरीके से हमारे भीतर एक हाइटेंड सेंस ऑफ़ फ़ियर बैठ गया, जो कि डेंजर्स को या परसेप्शंस को एग्ज़ैजरेट करके दिखाता है कि एक बार भेड़िया होगा, तो कितनी बार दिखाएगा? दसे बार। और ये स्ट्रेटजी यूज़फ़ुल थी, क्योंकि नौ बार अगर यूँ ही फ़िज़ूल भाग गए, तो कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं हो गया। लेकिन वो जो दसवीं बार भेड़िया था, तब अगर नहीं भागे होते तो मारे जाते। तो कुल मिलाकर के ये स्ट्रेटजी यूज़फ़ुल थी।
पर अब आप जंगल में नहीं हो। अब उस इवोल्यूशनरी स्ट्रेटजी की कोई ज़रूरत नहीं है। ये जिसको आप इंट्यूशन कहते हो, ये कोई आसमानों से सिग्नल नहीं आता। ये आपके ही जो पुराने एक्सपीरियंसेज़ हैं, उनसे एक इनफ़रेंस उठता है, और वो इनफ़रेंस 90% गलत ही होगा, मिसप्लेस्ड ही होगा। वही जैसे दस में से नौ बार आपको लग रहा है भेड़िया है, नौ बार नहीं होगा। एक बार हो सकता है। बात समझ रहे हैं?
तो इंट्यूशन में कुछ डिवाइन या मिस्टिकल नहीं होता। इंट्यूशन भी, जिसको आप सिक्स सेंस बोल लो या इस तरह की चीज़ें, उसमें भी कुछ ऐसा नहीं होता कि योर फ़ेवरेट डीटी इज़ सिग्नलिंग टू यू। ऐसा कुछ नहीं है। वो भी आपके ही जो एक्सपीरियंसेज़ हैं, थॉट्स हैं, डिज़ायर्स हैं, उनसे एक सेंसेशन उठता है। तो उसको बहुत गंभीरता से लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। और न उन सब चीज़ों में फँसने की ज़रूरत है कि आप फलानी जगह जाएँ, वहाँ पर कोई योगिनी रहती हैं और वो आपकी यहाँ पर कुछ करके आपकी सिक्स सेंस एक्टिवेट कर देंगी। तो उससे आपको आने वाली घटनाएँ पता चलनी शुरू हो जाएँगी।
और वो क्या एक वर्ड यूज़ करते हैं? हाइटेंड परसेप्शन। योर परसेप्शन विल बी शार्पन्ड एंड हाइटेंड। ये परसेप्शन माने क्या होता है? माने क्या? ये इंद्रियाँ हैं, ये देखती हैं। ये मन है, ये सोचता है। परसेप्शन क्या होता है? पर इन सब शब्दों की आड़ में लोग भी हमें धोखा देते हैं, और हम स्वयं को भी धोखा देते हैं।
प्रश्नकर्ता: हाय सर। सर, मेरे को लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन के बारे में इससे कनेक्शन जानना था। और एक चीज़, जैसे डॉक्टर्स भी बोलते हैं कि मून से, या वेव से, या स्टोन का उससे कनेक्शन होता है। आई डोंट नो अबाउट इट, सो आई वांट टू नो द कनेक्शन।
आचार्य प्रशांत: ये बातें तो मैंने कहा था, पहले मेरे छोटे भाई से पूछ लिया करिए, हम वही आपको एनलाइटन कर देगा। या लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन बिटवीन पोल्स ऑफ़ अ मैग्नेट, बिटवीन व्हाट?
श्रोता: मैनिफ़ेस्टेशन।
आचार्य प्रशांत: अरे, मैनिफ़ेस्टेशन व्हाट?
प्रश्नकर्ता: जो सोचते हैं, वो हो जाता है, ऐसा ये जो फ़ंडा है इसके बारे में। और सर, सच में ट्राई करते हैं, कभी-कभी वर्क भी करते हैं, पता नहीं कैसे वर्क करता है।
आचार्य प्रशांत: कभी-कभी वेग है। सारी जो बात है न, उस कभी-कभी में छिपी हुई है, कभी-कभी तो कुछ भी हो जाता है। एक बंद घड़ी भी दिन में दो बार, माने कभी-कभी सही समय दिखाती है।
प्रश्नकर्ता: सर, एक बुक पढ़े थे उसमें पार्किंग स्पॉट।
आचार्य प्रशांत: क्यों पढ़ी? इतनी अच्छी-अच्छी किताबें हैं दुनिया में, उनको छोड़कर ये क्यों पढ़ा?
प्रश्नकर्ता: सर, अभी ये भी पढ़ रहे हैं तो।
आचार्य प्रशांत: अब ये पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन, मैनिफ़ेस्टेशन माने क्या? क्या कहना चाहते हो? क्या बोलना चाहते हो?
प्रश्नकर्ता: सर, दैट इफ यू थिंक अबाउट समथिंग, अ हायर पावर विल ब्रिंग इट टू यू।
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो वही है न फिर। कोई बैठा है जो तुम्हारी मुरादें पूरी करेगा। यही है न? हाँ तो कोई नहीं बैठा है।
प्रश्नकर्ता: सर, एक मैंने क्लास अटेंड किए थे एक जन का, तो उन्होंने कहा था कि उनका पहले ये मतलब था कि उनके पास खाने का भी पैसा नहीं था। तो उसके बाद उन्होंने एक करोड़ मैनिफ़ेस्टेशन करके मतलब उन्होंने हाँ किया है, और मतलब उसके बाद उन्होंने और भी जितना बंगला, गाड़ी, ये सब कुछ उन्होंने मैनिफ़ेस्टेशन से मैनिफ़ेस्ट किया है। और अपनी डायरीज़ में लिखकर रखते हैं, और वो ये मैनिफ़ेस्टेशन करते जाते हैं।
वो ये टेक्निक्स भी सिखाते हैं। वॉटर मैनिफ़ेस्टेशन टेक्निक, डिफ़रेंट-डिफ़रेंट काइंड ऑफ़ मैनिफ़ेस्टेशन टेक्निक।
आचार्य प्रशांत: देखिए, टेक्निक की एक डेफ़िनिशन होती है। ठीक है? कोई भी चीज़ जो आपको सिखाई जाए, अगर उसमें लॉजिक या साइंस है, तो उसमें कुछ शर्तें होती हैं। शर्त ये होती है कि वो वेरिफ़ायबल और फ़ॉल्सिफ़ायबल होना चाहिए। नहीं तो उसको टेक्निक नहीं बोलते।
आप अपनी कार के पीछे खड़े होकर बोलिए, “ॐ शूरारा” और वो उड़ जाएगी। ये टेक्निक नहीं है, आप बोलो, ये एविएशन की नई टेक्निक आई है। कार के पीछे खड़े हो जाओ, हम साइलेंसर में उँगली दे दो, और बोलो “ॐ शूरारा”, और कार बिल्कुल सकपका के, झल्ला के उड़ जाएगी। ये क्या है? इसका कोई वेरिफ़िकेशन है? और अगर आप कहो कि मैं इसको नहीं मानती, तो आप इसे फ़ॉल्सिफ़ाई कैसे करोगे? ये तो बस एक दावा है जो आपके दिमाग में डाला जा रहा है। इसका कोई प्रमाण नहीं है।
प्रमाण के रूप में ये व्यक्ति किसको प्रस्तुत कर रहे हैं? स्वयं को। कह रहे हैं, मेरे साथ हुआ था, मेरे एक करोड़ आ गए। अरे भाई, पीयर-रिव्यू कोई चीज़ होती है, तुम्हारे साथ हुआ था, तुम यहाँ दो-चार बैठे हैं, इनके साथ करके दिखा दो, वो भी तो माने। मैं ख़ुद ही अपनी बात का प्रमाण बन जाऊँ, ये क्या है? मेरी कार है, वो उड़ जाती है ऐसे ही। अब आपको मानना पड़ेगा। कार के पीछे जाना है, साइलेंसर में कुछ डाल दीजिए और बोलिए “ॐ शूरारा”, और वो ऐसे उड़ जाएगी। ये क्या है? ये क्या मतलब? इसको टेक्निक वर्ड क्यों, अपमान क्यों कर रहे हैं हम टेक्निक वर्ड का?
पर अच्छा लगता है न? मैं जो चाहती हूँ, मुझे मिल जाएगा। लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन, मैनिफ़ेस्टेशन दोनों एक ही बात कहते हैं। तुम जो चाहती हो, वो हो जाएगा।
अच्छा, चलिए एक काम करते हैं। ठीक है? ये यहाँ पर इस काले मग में चाय रखी हुई है। ठीक है? आप दोनों मैनिफ़ेस्ट करिए। एक ही गुरुजी की आप दोनों शिष्य हैं। तो आप दोनों मैनिफ़ेस्ट करिए कि आप दोनों इसी से चाय पी रही हैं। करिए। कैसे हो जाएगा?
अरे, बहुत बढ़िया है ये। ये मैं आपको बता रहा हूँ, आप जब कुछ भी मान सकते हैं, तो आप ये भी मानिए न। ये प्लैटिनम और टाइटेनियम की एलॉय का है और 180 करोड़ का है। हम तो कुछ भी मान लेते हैं, तो ये भी मानो। अरे, मैं कह रहा हूँ न, आई एम द प्रूफ़। हाँ, ये 180 करोड़ का है। आप दोनों मैनिफ़ेस्ट करिए कि आप दोनों ही इससे चाय पी रहे हैं। करिए। और अभी इतना महँगा है, तो बहुत लोगों को लगा, सब लोग करो, सब इसी से पी रहे हो।
आप देख नहीं रहे हो कि ये बात कितनी बेतुकी है? क्योंकि हम सब लगभग एक जैसी ही चीज़ें चाहते हैं। चाहते हैं कि नहीं? चाहते हैं कि नहीं?
कॉलेज में एक जॉब आई है। तीन वैकेंसीज़ हैं, और तीन सौ लोगों को चाहिए। ठीक? ऑफ़िस में प्रमोशन होना है, उसके लिए आठ उम्मीदवार हैं। ठीक? चाहते हैं न? अब सब के सब लगे हैं मैनिफ़ेस्ट करने में, और सब के सब सेम टेक्नोलॉजी फ़ॉलो कर रहे हैं, अकॉर्डिंग टू टेक्नोलॉजी। तो टेक्नोलॉजी अगर सब सेम फ़ॉलो कर रहे हैं, तो उसका आउटपुट भी सेम आना चाहिए।
भाई, पानी का टेंपरेचर बढ़ाने की टेक्नोलॉजी क्या होती है? उसके नीचे आग जला दो। ये एक टेक्नोलॉजी है। तो जितने लोग आग जलाएँगे, सबको सेम आउटपुट मिलेगा न? तो अब पंद्रह लोगों को ये कप चाहिए, और पंद्रह के पंद्रह कह रहे हैं, मुझे यही कप चाहिए। द मोस्ट कोवेटेड कप प्लैटिनम-टाइटेनियम एलॉय। किसको मिलेगा ये? किसको मिलेगा?
श्रोता: जो सबसे पहले है।
आचार्य प्रशांत: नहीं सबका यही है कि हमें भी मिले, हम सबसे पहले हैं। और हर आदमी कह रहा है, सबसे पहले मैं इसको पकड़ रहा हूँ। किसको मिलेगा?
श्रोता: जो चोरी करेगा।
आचार्य प्रशांत: सब के सब यही मैनिफ़ेस्ट कर रहे हैं कि कोई चोरी नहीं कर पाया, मुझे मिल गया। किसको मिलेगा?
श्रोता: जिनका इंटेंट सबसे ज़्यादा होता है उन लोगों के हिसाब से।
आचार्य प्रशांत: सब पीक इंटेंसिटी पर बैठे हैं अपनी-अपनी। किसको मिलेगा?
श्रोता: किसी को नहीं।
आचार्य प्रशांत: किसको मिलेगा? क्योंकि किसी को मिल भी नहीं सकता। लेकिन सुनने में बहुत अच्छा लगता है। न हिलना है न, डुलना है, आँख बंद करके “ॐ शूरारा” करना है। न खून बहाना, न पसीना बहाना। क्या करना है? “ॐ शूरारा, आ-रहा आ-रहा आ-रहा आ-रहा।”
कामना जिसने पाल ली, उसको दुनिया बहुत मूर्ख बनाती है। एक बार आप में कामनाएँ आ गईं न, अब आप लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन की दुकान में भी लुटोगे, मैनिफ़ेस्टेशन की दुकान में भी लुटोगे। सब आपको एक ही वादा करेंगे तुम्हारी कामना पूरी कर दूँगा। सौ बार बाबा जी के यहाँ जाओगे। जितने बाबे होंगे, सब यही बोलेंगे, तुम्हारी कामना पूरी कर दूँगा। जो-जो दुनिया तुमसे लेना चाहती होगी, सब ले लेगी। बस क्या बोलकर? “कामना पूरी कर देंगे।” दिख नहीं रहा है, ये सब बस कामना-पूर्ति के खेल हैं। और ये ऐसे खेल हैं जिनमें कामना-पूर्ति किसी भी हालत में हो भी नहीं सकती। हो ही नहीं सकती।
अच्छा, चलो अभी आपके चेहरे पर असंतोष है। कह रहे हैं, “ऐसे थोड़ी है, ॐ शूरारा, कुछ तो होता होगा।” अच्छा, मान लो कामना-पूर्ति हो भी सकती है, ठीक। तुम माँगोगे क्या? क्या माँगोगे? आप इसको भी माँगो, इसके लिए मुझे आपको ललचाना पड़ा। आप ये भी तभी माँगोगे जब मैं आपको ललचाऊँगा कि ये 180 करोड़ का है। तो कहोगे, मुझे चाहिए। अगर मैं मान भी लूँ, कि लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन है, भाई, “लॉ” शब्द बहुत संवेदनशील होता है। ऐसे ही नहीं बोल देते हैं कि कोई चीज़ लॉ है। लॉ कैसे लॉ है? कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ है, फिज़िकल लॉ है, केप्लर के लॉ हैं, न्यूटन के लॉ हैं। ये कौन-सा लॉ है? कैसे बोल दिया आपने किसी चीज़ को?
ये लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन नहीं है। ये फ़्लॉ ऑफ़, जो भी बोलिए, कुछ भी। लॉ ऑफ़ डिज़ायर है, लॉ ऑफ़ फ़ूलिशनेस है व्हाटएवर। मान लीजिए कि ऐसा होता भी है कि आप बैठे-बैठे करें “हुड़ूहुड़ू”,”, और जो आप चाह रहे हो वो आपको आ जाए। क्योंकि आपने कैसे करा है? इंटेंसली। व्हाटएवर दैट इंटेंसिटी मीन्स? फ़ॉर मी, इंटेंसिटी इज़ ऑल्सो अ फ़िज़िकल क्वांटिटी, व्हिच इज़ क्वांटिफ़ायबल। इंटेंसिटी मेज़र की जा सकती है। इंटेंसिटी कोई सब्जेक्टिव चीज़ नहीं होती।
तो आप माँग भी रहे हो, तो क्या माँगोगे? आप अगर लालची आदमी हो, तो क्या माँगोगे? आप घृणा से भरे हुए हो, तो क्या माँगोगे? बोलो न। आप डर से भरे हुए हो, तो क्या माँगोगे?
श्रोता: सिक्योरिटी।
आचार्य प्रशांत: आप ईर्ष्या से भरे हुए हो, तो क्या माँगोगे? और हम इन्हीं चीज़ों से तो भरे होते हैं न। आप अज्ञान से भरे हुए हो, तो क्या माँगोगे? और हम इन्हीं चीज़ों से तो भरे होते हैं न? तो अगर ये मैनिफ़ेस्टेशन, अट्रैक्शन ये सब होता भी है, तो आप माँगोगे क्या? यही सब तो माँगोगे। और जो माँगोगे, वो क्या बनेगा आपके लिए? मैं अभी नफ़रत में जल रहा हूँ, मैं क्या माँगूँगा? AK-47। मिल जाएगा मान लो, मान लो तुम्हारा अट्रैक्शन, मैनिफ़ेस्टेशन होता भी है। मिल भी गया आपको AK-47, तो क्या होगा अब आगे? जेल ही तो जाओगे। और क्या होगा? समझ में आ रही है बात?
पहली बात तो ये कि ऐसे मिलता नहीं। दूसरी बात ये कि अगर ऐसे मिलता भी हो, तो ले मत लेना। क्योंकि जो लोगे, वो जेल भिजवा देगा तुम्हें। कोई ड्रग-एडिक्ट हो, वो क्या माँगेगा?
श्रोता: ड्रग।
आचार्य प्रशांत: कोई सेक्स-एडिक्ट हो, वो क्या माँगेगा? उसको मिल गया, तो मतलब रेप ही रेप होंगे चारों तरफ़। हम और क्या माँगते हैं?
आप में से कौन-कौन निर्वाण माँगता है लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन की क्लास में? कि आँख बंद करके मैनिफ़ेस्ट कर रही हूँ कि मैं बुद्ध हो गई। कोई करता है? इसी से समझ लो कि ये पूरा खेल किस चीज़ का है। किसका है? कामना का। कोई कह रहा है, “मैनिफ़ेस्टिंग कि मेरा बहुत बड़ा घर बन गया है, मेरा वीज़ा आ गया है, मेरा ये हो गया है।” व्हाटएवर। जो चीज़ें तुम माँग रहे हो, वो चीज़ें तुम्हारे लिए ज़हर ही तो हैं। अच्छा है कि मिलती नहीं हैं। और अगर मिल गईं, तो क्या होगा, ये कभी सोचा?
देखो, ये प्रकृति क्या चीज़ है, ये समझना बहुत ज़रूरी है। वो अपने हिसाब से चलती है, वो अपने नियम-क़ायदे किसी के लिए नहीं बदलती। आप कर लो जितनी आपको डिज़ायर्स करनी हैं। लॉज़ ऑफ़ फ़िज़िक्स विल नॉट चेंज एंड एवरीथिंग इज़ फ़िज़िकल। इफ़ देयर इज़ अ थिंग, इट इज़ अ फ़िज़िकल थिंग। एवरीथिंग इज़ फ़िज़िकल, और फ़िज़िक्स के लॉज़ सब्जेक्टिव नहीं होते। वे आपके लिए नहीं बदलेंगे। आप कर लो कितनी कामना, चाहे प्रार्थना, कुछ भी कर लो। हाँ, आप स्वयं को बदल सकते हो। पर स्वयं को अहंकार बदलना नहीं चाहता। तो वो क्या चाहता है? वो चाहता है, जगत के नियम बदल जाएँ।
पूरी दुनिया पर धूप बरस रही है, मेरे घर पर बादल बरस जाएँ। यही तो होता है लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन। पूरी दुनिया झुलस रही थी, पर मैंने बादलों को अट्रैक्ट कर लिया और बादल मेरे आँगन में बरस गए। बादल क्या हैं? बादल एक फ़िज़िकल चीज़ हैं। और वो किस पर चलेंगे? लॉज़ ऑफ़ फ़िज़िक्स पर। आपकी डिज़ायर्स से फ़िज़िक्स नहीं बदलने वाली। ये जो आपको जादू-टोना और चमत्कारों की बातें बता दी गई हैं, कि कोई आदमी चल गया पानी पर, कोई मुर्दा ज़िंदा हो गया, वो सांकेतिक बातें हैं।
मरकर कोई ज़िंदा नहीं होता, कोई इंसान पंख लगाकर आसमान में नहीं उड़ता, कोई व्यक्ति नहीं पानी पर चलता। किसी के नहीं चार हाथ होते। कोई ऐसा नहीं होता कि सपने में भगवान आकर गुप्त ज्ञान दे जाएँ। भक्ति करने से रात में अचानक धन नहीं आ जाता। दुनिया अपने नियमों पर चलती है, और दुनिया के नियम व्यक्ति-निरपेक्ष होते हैं। वो आपके लिए नहीं बदलेंगे।
“गॉड, गॉड, गॉड आज मेरी शादी है, आज बारिश मत करना।” बारिश नहीं हुई, इसका मतलब ये नहीं है कि गॉड को आपसे प्यार है। इसका मतलब ये है कि बारिश होनी ही नहीं थी। और अगर होनी है, तो तुम जितनी गॉड से प्रार्थना करनी है कर लो, बारिश होगी। तुम्हारी प्रार्थनाओं से बारिश नहीं टलने वाली।
बारिश नहीं हो रही है, फ़सलें सूख रही हैं, तो आप जाकर वहाँ यज्ञ कर रहे हो, उससे बारिश नहीं होने वाली। हाँ, आपको सांत्वना मिल जाए वो अलग बात है। आप कुछ भी करके बादल अट्रैक्ट नहीं कर लोगे। दुनिया को बदलने की या प्रकृति के नियमों को बदलने की कोशिश मत करो। किसको बदलना है? स्वयं को बदलो। और भीतर बिल्कुल बलबला रही हैं कामनाएँ। देखो कि उनमें कुछ नहीं रखा है। देखो कि तुम्हें जो चाहिए, वो चीज़ दूसरी है। ये अंड-बंड तरीके कि यहाँ से ये मिल जाए, यहाँ से वो मिल जाए।
अच्छा, एक बात बताओ। आप में से कितने लोग ठगे गए हैं कभी-न-कभी? ठीक। जब भी ठगे गए हैं, मैं लुटने की बात नहीं कर रहा। लुटने की बात नहीं कर रहा। लूटा तो डर दिखाकर जाता है, ठीक है? मैंने ब्लैकमेलिंग की भी बात नहीं कर रहा। मैंने ठगे जाने की बात कर रहा हूँ। जब भी ठगे गए हैं, क्या पहले आपको ललचाया नहीं गया था? बोलिए। ये है। और कोई तरीका ही नहीं है ना आपको ठगने का। आपको पहले ललचाया जाएगा, तभी तो आपको फिर ठगा जाएगा। कामना, “माया महा ठगनी हम जानी।”
जिसके पास ये भीतर दहकती हुई कामनाएँ न हों, वो दुनिया में क्यों ठगा जाएगा? और इनका काम ही यही होता है कि ये बाहर आपको ठगवाएँ। दूसरा नहीं ठग रहा आपको। कौन ठग रहा है? आपकी अपनी कामनाएँ। कामनाओं को पूरा करने की कोशिश बाद में कर लेना। पहले ये देख लो कि भीतर अपने डायनामाइट रखकर चल रहे हो। भीतर अपने ही दुश्मन को बैठाकर चल रहे हो। और अब दुनिया तुम्हारी ही कामनाओं का इस्तेमाल करके तुम्हें ठगेगी। वरना किसी की क्या हैसियत? क्या ताक़त कि तुम्हें ठगे? आपके पास लालच न हो, तो कोई आपको कैसे ठगेगा? बोलिए।
तो जब ठगे जाओ, तो दोष दूसरे को मत देना, दोष स्वयं को देना। चले गए मैनिफ़ेस्टेशन की दुकान में, दो साल बाद पता चला कि ठगे गए। उसको दोष मत देना, उसने तुममें लालच नहीं पैदा किया। तुम लालची थे, इसलिए उसकी दुकान में गए। तुममें लालच न होता, तो तुम उसकी दुकान के सामने से निकल जाते। सौ बार निकल जाते, दुकान के अंदर नहीं जाते।