हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि मेरा क्या कर्त्तव्य है। जीवन इतना बदलाव वाला है कि कोई आकर कैसे बता सकता है कि इस पल में क्या करना है? जब आँखें दी गई हैं तो सहारे की क्या ज़रूरत है? किसने बता दिया कि ‘यह करने योग्य है’? कर्त्तव्य क्या है? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
कर्त्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः। शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः॥
~ अष्टावक्र गीता अध्याय 18, श्लोक 57
आचार्य प्रशांत: “सेंस ऑफ़ ड्यूटी” कर्त्तव्यों के बारे में बात करना चाह रहे हैं। अष्टावक्र गीता का अठारहवाँ अध्याय, सत्तावनवाँ श्लोक; और ये सिर्फ़ अष्टावक्र गीता में नहीं है कि जहाँ कर्त्तव्यों से च्युत होने के लिए कहा गया है, या यूँ कहा गया है, कि जो ज्ञानी है उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं बचता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कई बार ये कहते हैं, कि कर्त्तव्य सिर्फ़ उसके लिए रह जाते हैं जो अभी भली-भाँति योग में आरूढ़ नहीं हुआ है। “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” बहुत प्रसिद्ध उक्ति है श्रीकृष्ण की। यहाँ तक कि कर्मयोग का जो अध्याय है जिसमें श्रीकृष्ण लगातार कह रहे हैं कि “तुम अपने कर्त्तव्यों का ही पालन करते रहो, बस कर्मों के कर्ता न बनो, जो भी करो वो मुझे समर्पित करते चलो,” वहाँ पर भी इतना वो कह गए हैं कि “ये सारे कर्त्तव्य तुम्हारे लिए सिर्फ़ तब तक हैं जब तक तुम आत्मा में स्थित ही नहीं हो गए।”




