कर्तव्य सज़ा है नासमझी की

Acharya Prashant

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कर्तव्य सज़ा है नासमझी की
हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि मेरा क्या कर्त्तव्य है। जीवन इतना बदलाव वाला है कि कोई आकर कैसे बता सकता है कि इस पल में क्या करना है? जब आँखें दी गई हैं तो सहारे की क्या ज़रूरत है? किसने बता दिया कि ‘यह करने योग्य है’? कर्त्तव्य क्या है? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

कर्त्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः। शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः॥

~ अष्टावक्र गीता अध्याय 18, श्लोक 57

आचार्य प्रशांत: “सेंस ऑफ़ ड्यूटी” कर्त्तव्यों के बारे में बात करना चाह रहे हैं। अष्टावक्र गीता का अठारहवाँ अध्याय, सत्तावनवाँ श्लोक; और ये सिर्फ़ अष्टावक्र गीता में नहीं है कि जहाँ कर्त्तव्यों से च्युत होने के लिए कहा गया है, या यूँ कहा गया है, कि जो ज्ञानी है उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं बचता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कई बार ये कहते हैं, कि कर्त्तव्य सिर्फ़ उसके लिए रह जाते हैं जो अभी भली-भाँति योग में आरूढ़ नहीं हुआ है। “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” बहुत प्रसिद्ध उक्ति है श्रीकृष्ण की। यहाँ तक कि कर्मयोग का जो अध्याय है जिसमें श्रीकृष्ण लगातार कह रहे हैं कि “तुम अपने कर्त्तव्यों का ही पालन करते रहो, बस कर्मों के कर्ता न बनो, जो भी करो वो मुझे समर्पित करते चलो,” वहाँ पर भी इतना वो कह गए हैं कि “ये सारे कर्त्तव्य तुम्हारे लिए सिर्फ़ तब तक हैं जब तक तुम आत्मा में स्थित ही नहीं हो गए।”

तीसरे अध्याय का सत्रहवाँ श्लोक है भगवद्गीता का, “जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।” आगे के अध्याय में जब वो अर्जुन से कहते हैं कि “जितने तू धर्मों का पालन करता है उन सबको छोड़ दे और सारे धर्मों को छोड़कर धर्म की शरण में आ जा।”

कर्त्तव्यों को छोड़ कर जो तेरा एक मात्र कर्त्तव्य है उसको जान ले। धर्मों को छोड़कर जो तेरा एक मात्र धर्म है उसको जान ले। ठीक यही बात अष्टावक्र भी कह रहे हैं। कर्त्तव्य सिर्फ़ तब तक हैं जब तक कोई अपने आप को कर्ता मानता रहे; आत्मा न कर्ता है न भोक्ता है। तो इसलिए जो आत्मरूप में स्थित हो गया उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष बचता नहीं है। वो बस आत्मा में रमण करता है, खेलता है। लीला हो जाता है उसका जीवन।

आपने जो बात रखी है वो कहाँ से आती है ये मैं समझ रहा हूँ। रोज़मर्रा के कर्त्तव्यों से बंधा हुआ आदमी जब रोशनी देखता है, उसकी ओर बढ़ने लगता है, तो कर्त्तव्य उसको बुलाते हैं, मन में ग्लानि भी उठती है कि “कहीं मैं ग़ैर-जिम्मेदार तो नहीं हूँ,” कि “मेरे ये जो कर्त्तव्य हैं मैं उनका भली-भाँति पालन नहीं कर पा रहा हूँ ये मेरी गलती, मेरी कमज़ोरी तो नहीं है,” और दूसरे लोग जो कर्त्तव्य की रस्सी से आपसे बंधे हुए हैं, उन लोगों द्वारा इस बात का एहसास भी अक्सर कराया जाता है कि तुम अपने कर्त्तव्य का, धर्म का, ड्यूटीज़, रिस्पॉन्सिबिलिटीज़, ऑब्लिगेशन्स का पालन करो। हो सकता है कोई आपसे वर्णाश्रम धर्म की भी बात करे, कि “अभी तुम जिस आश्रम में हो, तुम्हें उसी अनुसार चलना चाहिए; तुम अभी गृहस्थ हो तो गृहस्थी का पूरा-पूरा पालन करो।”

ये सभी बातें ठीक हैं, पर तब तक जब तक आप वो हो। जो अपने आप को गृहस्थ जाने उसे तो गृहस्थ के कर्त्तव्य का पालन करना ही पड़ेगा। ठीक बात, इसमें कोई झंझट नहीं है। लेकिन जिसने अपने आप को अब जान लिया गृहस्थ से परे, गृहस्थ से इतर, गृहस्थ से अतीत, वो कैसे गृहस्थी के कर्त्तव्यों को निभाएगा? वो कैसे बंधा रहेगा? उसका धर्म अब वृहद धर्म हो जाता है, उसका धर्म अब गृहस्थ धर्म नहीं है। ‘गृह’ का अर्थ ही होता है दीवारें, एक छोटा दायरा। जो अपने आप को आत्मरूप जानने लगे उसका धर्म मिट नहीं जाता, अतिव्यापक हो जाता है।

छोटे-छोटे धर्म उसके मिटते हैं, छोटे-छोटे धर्म चले जाते हैं क्योंकि वृहद धर्म में अब वो स्थापित हो जाता है। अब उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ दो चार लोगों के प्रति नहीं है, पूरे अस्तित्व के प्रति है। अब वो दीवारों में क़ैद नहीं है, वो सबका है। वो ये कह कर पल्ला नहीं छुड़ा पाएगा कि, "मैंने अपनी पत्नी की और दो बच्चों की देखभाल कर ली, तो बहुत है।" अब उसका काम ऐसे चलेगा नहीं। अब वो सबका है या यूँ कह लीजिए कि किसी का नहीं है, एक ही बात है; पर ये पक्का है कि अब वो दो चार का अब वो नहीं हो सकता। तो किसी दृष्टि से देखकर आप ये कह सकते हैं कि अब उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं बचा और थोड़ा अलग दृष्टि से देख कर ये भी कह सकते हैं कि उसका कर्त्तव्य, उसका धर्म अब बहुत व्यापक हो गया, एक ही बात है।

बिल्कुल भी अपने मन में ये अपराध भाव मत आने दीजिए, ये ग्लानि मत आने दीजिए कि आप अपने कर्त्तव्य पूरे नहीं कर रहे हैं। ये जो छोटे-मोटे कर्त्तव्य संसार, समाज हमें थमा देता है, ये कोई कर्त्तव्य हैं ही नहीं। ये तो सिर्फ़ ग़ुलामी के आचरण हैं, कह दिया गया है कि ऐसा-ऐसा आचरण करो और ये नहीं बताया गया है कि ऐसा-ऐसा आचरण इसलिए करो क्योंकि तुम ग़ुलाम हो और ग़ुलाम को ये आचरण करना ही होता है।

हाँ ठीक है, ऐसा ऐसा आचरण करो, ये करो और वो करो। पर कभी ठहर कर हम ये नहीं पूछते, कि कौन ये आचरण कर रहा है? किसका है ये आचरण? कौन है जो इस कर्तव्य का पालन करे? कौन है वो जिसको तुम ये कर्त्तव्य दे रहे हो, और क्या ‘मैं’ वो हूँ? तुमने जितनी बातें कहीं करने को, तुमने जिस प्रकार का जीवन कहा जीने को, तुमने जो चर्या दी मुझे निभाने को, मुझे ये तो बता दो कि वो सब तुमने दिया किसको? यदि मैं वो हूँ तो ठीक, पर यदि मैं वो हूँ ही नहीं तो?

तो प्रश्न उठ सकता है कि "ठीक है, आज तुम जान गए हो कि तुम वो नहीं हो, पर जिस समय पर तुमको वो सब दिया गया था तब तो तुम वही थे न! तो अब तुम कैसे भाग सकते हो अपनी ज़िम्मेदारियों से?" निश्चित रूप से ये तर्क दिया जाएगा। आज तुम उठ बैठे हो, पर जब दिया गया था तब तो तुम वही थे?

तो बात बहुत सीधी है। सपने में आप किसी से वादा कर दें कि तुझे एक अरब दूँगा तो जगने के बाद आपकी कोई बाध्यता नहीं है कि उसको वो रुपये लौटाएँ। हाँ, जब तक आप सपने में हैं तब तक आप ज़रूर असमंजस में रहेंगे, दुविधा में रहेंगे कि कैसे-कैसे करके इसको ये पैसे लौटाऊँगा। रहेंगे कि नहीं रहेंगे? कभी देखा है, दुःस्वप्न आते हैं। और आप बड़े हैरान हैं, परेशान हैं, पसीने छूट रहे हों, हो सकता है रो भी पड़े हों, लेकिन फिर आप उठ जाते हैं, और फिर उसके बाद क्या वो हैरत कायम रहती है? स्वप्न में हो सकता है आपने हत्या भी कर दी हो, तो क्या उठ करके आप उसका प्रयाश्चित करते हैं? या उसके लिए आपको सज़ा मिलेगी? नहीं मिलेगी न? पुराना कर्म, अभी अपना फल आपको तभी देगा जब आप अभी भी वही हों जो पुराना था।

कर्मफल का सिद्धांत समझिएगा: अतीत में आपने कोई कर्म किया, अभी आपकी कोई बाध्यता नहीं है उस कर्म को निभाए चले जाने की, या उस कर्म के फल को ग्रहण किए चले जाने की, कोई बाध्यता नहीं है आपके ऊपर। बाध्यता तब है जब आप वही व्यक्ति हों जिसने वो कर्म किया था। अगर आपको बोध न आया हो, अगर आपने अपनी वही पहचान कायम रखी हो, तब तो फल आपको ग्रहण करना पड़ेगा। तब तो अतीत में आपने जो किया था उसकी आज की ज़िम्मेदारी को भी आपको पूरा करना पड़ेगा।

बुद्ध लौट कर गए पिता के पास; कितने साल बीत गए थे? बारह साल, चौदह साल, पिता ने उल्हाने देना शुरू किया। "ये कर दिया तुमने, वो कर दिया। अरे साधना करनी थी तो मुझे बताते मैं यहीं आसपास इंतज़ाम कर देता। पत्नी को छोड़कर चले गए, बच्चे को छोड़कर चले गए। कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी तुम्हारी? अपने कर्त्तव्यों का कोई पालन ही नहीं किया तुमने?" पूरी दुनिया जान गई थी कि बुद्ध क्या हैं पर पिता को नहीं दिखाई पड़ रहा था; परिवारजनों को अक्सर नहीं ही दिखाई पड़ता। बुद्ध ने सुना सब और उसके बाद क्या बोलते हैं? बुद्ध ने कहा, "पिता, ठीक से देख तो लो क्या मैं वही हूँ जो घर छोड़ कर गया था? तुम बात किससे कर रहे हो? तुम बात जिससे कर रहे हो, क्या मैं वही हूँ? ज़रा मुझे ध्यान से देखो। घर छोड़ कर जो गया था वो कोई और था, तुम्हारे सामने जो खड़ा है वो कोई दूसरा है। तुम गलत व्यक्ति से बात कर रहे हो।"

तो कर्मफल तब मिले न जब आप वही व्यक्ति हों जिसने कर्म किया था। और अगर आप वही रह गए हैं, यदि आपने अपनी किसी पहचान को, अपनी मान्यताओं को, अपने अंतःकरण को पकड़ कर ही रखा है, उसको नया हो जाने का, उसको ताज़ा हो जाने का, उसको असली हो जाने का मौका ही नहीं दिया है, तब तो आपके पास कोई विकल्प नहीं है, आप जीवन भर कर्त्तव्यों का ही पालन करें। कुछ हो नहीं सकता। पर ये सारी बातें, मैं दोहरा रहा हूँ, जागृत मनुष्य पर लागू नहीं होतीं।

आपका एक मात्र कर्त्तव्य है, अपने बोध से चलना और कोई कर्त्तव्य नहीं है आपका।

जीवन को देखें, जानें और फिर जो समुचित लगे उसको होने दें। करें भी नहीं, होने दें; यही आपका कर्त्तव्य है, इसके अतिरिक्त कोई कर्त्तव्य नहीं है आपका। न समाज का दिया हुआ, न आपका ही कोई पुराना वादा, कुछ नहीं निभाना है आपको। समझ रहे हैं बात को? और इससे घबराने की कोई बात नहीं है, ये कोई वादा-ख़िलाफ़ी नहीं हो गई। जिनके प्रति आप कर्त्तव्य रखना चाहते हैं आप उनके ही ज़्यादा काम के होंगे यदि आप बोधयुक्त हैं। आपको क्या लगता है ये जो पूरी दुनिया अपने कर्त्तव्यों को पूरा किए जा रही है, ये लोग एक-दूसरे को सुख दे पाते हैं? ये लोग एक-दूसरे के आनंद के, प्रेम के कारण बनते हैं? ये कुछ नहीं बनते हैं। कर्त्तव्य की पूर्ति नहीं होती है, कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है।

मैं पिता हूँ, तो क्या कर्त्तव्य है मेरा? बेटी को पढ़ाओ, लिखाओ और शादी कर दो। ये कौन सा कर्त्तव्य है? तुम इंसान हो या पिता हो? पहले तय कर लो। और इंसान में भी तुम क्या हो? शरीर हो या आत्मा हो? तय कर लो। पर इन बातों को हम यूँ लेते हैं कि जैसे ये तो प्रकृति प्रदत्त हों। कि "भई देखिए, बंदे का कुछ कर्त्तव्य तो होता ही है न, ऐसे-ऐसे करना।" और आपको लगता है जैसे कोई आदि-सत्य बोला जा रहा है; ये तो महावाक्य बोला जा रहा है। ये बेवकूफी की बात है जो बोली जा रही है। तुम चूँकि अंधे हो इसलिए तुम्हें एक कोड ऑफ़ कंडक्ट थमा दिया गया है, कि जब बच्चे पैदा हों तो ऐसा-ऐसा करना।

अरे, जागृत आदमी को बताने की ज़रूरत पड़ेगी कि लड़की के साथ क्या करना है? कि बच्ची पैदा हुई है तुम्हारे घर में, तो क्या करना है उसे बताना पड़ेगा? पर नहीं हमें बताना पड़ता है। बच्ची पैदा होती नहीं है तो तुरंत सबसे पहले खाता खोला जाता है उसके नाम का। वो इसलिए ही खोला जाता है क्योंकि आप अंधे हैं, आपको पता ही नहीं है कि क्या करना है। और आप सोचते हैं कि, "मैं बड़ा रिस्पॉन्सिबल पिता हूँ, इस कारण मैंने ये किया है।" आपको बड़ा अच्छा लगता है, सुकून की भावना आती है, “सुरक्षित रहेगा मामला, दहेज देने के काम आएगा!”

हमारा तो प्रेम भी ‘कर्त्तव्य’ होता है! अब शादी कर ली है न, तो चलो घुमाने-फिराने ले जाओ। क्यों प्रेम कर्त्तव्य बन गया है? क्योंकि हम अंधे हैं, हम प्रेम जानते नहीं, तो इसलिए कोई बाहर वाला आकर हमें एक पट्टी थमा देता है, एक चर्या दे देता है कि ऐसा-ऐसा कर लेना; और ये जो ऐसा-ऐसा किया जाता है उसी का नाम प्रेम होता है। “अच्छा शादी के दो तीन साल हो गए, अब तुम्हारा कर्त्तव्य है कि बच्चे पैदा कर लो।” क्योंकि हम अंधे हैं।

ये कोई बाहर वाला आ कर बताएगा कि प्रेम क्या है और संतान क्या है? पर हमारे जीवन में जो कुछ है वो सब कर्त्तव्य से ही बंधा हुआ है, सब कर्त्तव्य-जनित ही है। घर क्यों है? क्योंकि कर्त्तव्य है। पत्नी क्यों है? क्योंकि कर्त्तव्य है। नौकरी क्यों कर रहे हो? क्योंकि कर्तव्य है। बच्चे क्यों पैदा किए? कर्त्तव्य है। जी ही क्यों रहे हो? क्योंकि कर्त्तव्य है।

कर्त्तव्य का मतलब समझते हैं? जो करना चाहिए, ‘कर्त्तव्य,’ जो करने योग्य है। किसने बता दिया कि ‘ये करने योग्य है?’ और किसी और को क्या हक़ है तुम्हें ये बताने का कि ये करने योग्य है? कर्त्तव्य शब्द ही गंदा है।

प्रश्नकर्ता: यहाँ पर मैं एक सवाल करना चाहती हूँ। हम जब गीता की बात कर रहे हैं, पर फिर रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भी बात सब करते हैं कि उन्होंने सौतेली माँ को भी इतना आदर और सम्मान दिया, और उनके कहने पर चौदह साल का वनवास लिया।

आचार्य प्रशांत: चूँकि हम अंधे हैं इसलिए हमें ये पता नहीं है कि राम के साथ योगवशिष्ठ जैसा अद्भुत ग्रंथ भी जुड़ा हुआ है। क्योंकि हम अंधे हैं इसीलिए हमने राम-गीता नहीं पढ़ी है, हम बस इतना ही जानते हैं कि राम पिता के कहने पर चले गए थे जंगल। पर राम का बोध कितना गहरा है वो हम नहीं जानते हैं। राम कर्त्तव्य का निर्वाह करने वाले लोगों में नहीं हैं। राम किसी मर्यादा का पालन करने वालों में नहीं हैं। आपको राम को जानना है तो आप वशिष्ठ के पास जाइए और देखिए।

तब आप कहेंगे कि, "राम ऐसे हैं!" तब आपको राम और श्रीकृष्ण में कोई अंतर ही नहीं दिखाई देगा। पर चूँकि हम कुछ नहीं समझते, हम स्वयं को ही नहीं समझते, हम जीवन को नहीं समझते, अतः स्वाभाविक ही है कि हम राम को भी नहीं समझते। आप मुझे इतना बता दो कि ये जो आपका आम आदमी है जिसको कुछ समझ नहीं आता, उसको राम समझ आ जाएगा? पर वो दावा यूँ करेगा जैसे राम को जानता है, “देखो राम ने भी यही किया इसलिए हम कर रहे हैं।” ग़ज़ब हो गया।

तुम राम के अन्तःस्थल को नहीं समझते, राम के कर्म को कैसे समझ जाओगे?

राम का हर कर्म कहाँ से उद्भूत हो रहा है, ये तुम जानोगे कैसे? राम तो आत्म-रूप हैं। कबीर कभी आत्मा बोलते ही नहीं, वो लगातार राम-राम-राम ही कहते हैं, राम और कुछ हैं ही नहीं, ब्रह्म हैं राम। तुम न स्वयं को जानते, न तुम ब्रह्म को जानते, तुम राम को कैसे जान जाओगे? फिर इसीलिए तुमने राम के इर्द-गिर्द हर तरीके की नौटंकी बुन रखी है। ऐसी-ऐसी कहानियाँ प्रचलित कर रखी हैं कि पूछो मत। और वही तुम अपने बच्चों को सुनाते रहते हो, वही तुम रामलीलाओं में दिखाते रहते हो।

तो असली राम तो कहीं पीछे छूट गया। कबीर के राम का किसी को पता नहीं है। कौन-सा राम बचा है? दंतकथाओं का राम बचा है, मिथकों का राम बचा है। हम किस राम को जानते हैं? हम उस राम को जानते हैं जो रावण से लड़ा और उसका सर काट दिया। उसके अलावा हम किसी राम को जानते नहीं। हम उस राम को जानते हैं जो जंगल-जंगल घूमता था। उसके अलावा हम किसी राम को जानते नहीं। राम कोई व्यक्ति थोड़े ही हैं, पर हम व्यक्ति रूप के अतिरिक्त राम को जानते कहाँ हैं।

जब आप स्वयं कर्ता होते हैं तो आप किसी और के सिर्फ़ कर्म ही देख पाते हैं। जब आप आत्मरूप में होते हैं तब आपको संपूर्ण जगत में आत्मा ही दिखाई देती है।

चूँकि हम स्वयं अपने आप को सिर्फ़ कर्ता जानते हैं, इसीलिए हम जब राम को भी देखते हैं तो सिर्फ़ उनके कर्मों को देखते हैं। और कर्मों को देख कर किसी के बारे में आप क्या जान सकते हो? श्रीकृष्ण के कर्म को देख करके आप कैसे समझ जाओगे श्रीकृष्ण को? कर्म भर को देखा तो बड़ी गलतफ़हमी हो जाएगी। बेईमान हैं, चोर हैं, स्त्रियों को छेड़ते हैं, फिर तो यही दिखाई देगा। धोखे से युद्ध जीत लिया, फिर तो यही दिखाई देगा। और राम के सिर्फ़ कर्मों को देखोगे, तो दिखाई देगा कि स्त्रियों को उत्पीड़न करते हैं। बीवी की अग्नि परीक्षा कराई, फिर धोबी के कहने पर छोड़ आए। कर्म भर देखोगे तो तुम्हें क्या दिखाई देगा? और अंधे होते हैं वो जो सिर्फ़ कर्म देखते हैं, कर्म का स्रोत नहीं देख पाते।

प्रश्नकर्ता: फिर मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहा उनको?

आचार्य प्रशांत: जिन्होंने कहा सो कहा, आपने सुना क्यों? राम पहले आए या ये जो उनको उपमा दी गई है ये पहले आई? तो आप सीधे राम के पास जाइए न। उपमा देने वाले तो हज़ार हैं। रोशनी आई, उस रोशनी को बाद में आप हज़ार नाम देते रहिए, उसके हज़ार आकार खींचते रहिए, उसकी मूर्तियाँ बनाते रहिए; उन मूर्तियों में थोड़े ही सच है, उन उपमाओं में थोड़े ही सच है! सच कहाँ है? सच उस रोशनी में है। आप सीधे उस रोशनी से क्यों नहीं संपृक्त हो जातीं?

ये तो यूँ ही है कि जैसे दिया जला और बुझ गया और उसके बाद धुँआ-धुँआ है, और आप उस धुँए में आकृतियाँ खोज रहे हो। और कोई कह रहा है, "रोशनी जो है न, वो ऐसी होती है। कैसी होती है रोशनी? गधे के सर की तरह होती है। क्यों? क्योंकि धुँए में गधे का सर दिखाई दे रहा है।" कोई कह रहा है, "रोशनी जो होती है सरसों के तेल के जलने की गंध की तरह होती है।” क्योंकि दिया तो बुझ गया है और कमरे में अब सरसों के जले हुए तेल की गंध बाक़ी है। तो रोशनी क्या है? रोशनी सरसों के जले हुए तेल की गंध है। आप रोशनी के पास जाइए, रोशनी के बाद की इन सब चीज़ों से आपको क्या लेना देना है? सीधे स्रोत से जुड़िए।

मैंने कई बार कहा है कि श्रीकृष्ण का चरित्र भी यदि समझना हो, श्रीकृष्ण के कर्म भी यदि समझने हों तो पहले भगवत समझिए, पहले गीता के साथ एक हो जाइए। यही बात राम के विषय में है। रामायण के राम को यदि समझना हो तो पहले योगवशिष्ठ पढ़िए। जो सीधे तुलसीदास को पढ़ेंगे वो राम को कभी नहीं जान पाएँगे, क्योंकि वो “रामचरित मानस” है, चरित्र है वहाँ पर, आचरण भर की बात है, आत्मा की नहीं। समझ रही हैं?

आप बेफिक्र होकर अपने एक मात्र कर्त्तव्य पर रहिए, बाक़ी सारे कर्त्तव्य तो छोटी चीज़ें हैं, धूल समान हैं, वो अपने आप उड़ेंगे। और मन छोटा मत करिए।

ज़िंदगी इतनी ज़बरदस्त रूप से बदलाव वाली, उठापटक वाली, हज़ार रूपों वाली है कि उसमें आपको कोई आकर के बता कैसे सकता है कि आपका क्या कर्त्तव्य है? कितना लंबा चौड़ा मैनुअल लेकर के आप चलेंगे जिसमें हर पल के लिए लिखा हो कि अब इस पल पर ये करना, ये रहा आपका कर्त्तव्य। अभी आप यहाँ बैठे हुए हैं, आपको कैसे पता कि आपका क्या कर्त्तव्य है? और स्थिति बदलेगी। थोड़ी देर में आप पाएँ कि आपके बगल वाला ऊँघ रहा है, थोड़ी देर में आप पाएँ कि यहाँ पर प्रकाश बंद हो गया है, आप कैसे जानोगे आपका क्या कर्त्तव्य है? कौन आकर आपको बताएगा? बताओ न कौन आकर बताएगा? कितने ग्रंथ तुम पढ़ोगे? कितने शास्त्र तुमे मन में लाद कर चलोगे?

तो जीवन कैसे जीना है?

किसी भी पल में किसी भी स्थिति में क्या है समुचित कर्म, इसका फैसला तो आपके अपने होश से ही हो सकता है। और वो होश पूर्व-नियत नहीं हो सकता, कि कुछ और होशमंद लोगों ने अपने होश में आपको थमा दिया है कर्म और आपको बस उसे कर देना है। नहीं ऐसे नहीं हो पाएगा, क्योंकि वो लोग कितने भी होशमंद रहे हों, समय किसी के लिए नहीं ठहरता और स्थितियाँ कभी एक सी नहीं होतीं।

आपकी स्थिति सर्वथा नई है और आपको कोई और मदद नहीं कर सकता। आपको किसी की मदद की ज़रूरत है ही नहीं तो कोई और मदद कर क्यों दे? जब आपको जीवन के साथ खेलने का, जीवन की प्रत्येक चुनौती का हँस करके समुचित प्रत्युत्तर देने का साधन आपके भीतर ही उपलब्ध करा दिया गया है, तो आपको किसी कर्त्तव्य की आवश्यकता क्या है? जिसको आँखें दे दी गई हों, उसको अपने साथ एक सहारे की ज़रूरत क्या है जो उसे बताता चले कि आगे क्या और पीछे क्या?

तो बड़ी अजीब स्थिति होगी न! कि आँखे हैं और इधर से उधर से पूछ रहे हैं कि "भाई, वो क्या है?" अरे, आँखें खोलो और देख लो। वैसे ही हमारा है! "भाई अब करना क्या है? इस स्थिति में मेरा क्या कर्त्तव्य बनता है?" अरे, थोड़ा ध्यान से देखो और जान जाओ कि क्या कर्त्वय बनता है। कौन तुम्हें बताने आएगा? पर हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है। क्या मतलब हो गया है? कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि क्या कर्त्तव्य है मेरा।

हमारे लिए गुरु का भी क्या मतलब हो गया है?

कि जिसके पास जाएँ और पूछें "महाराज अब इस दशा में मुझे क्या करना चाहिए?" और वो बता भी दे कि "देखो तुम्हें ये करना चाहिए।" और अगर वो न बताए तो, "ये देखो, इन्हें कुछ आता नहीं है, ये हमें ठीक से गाइड नहीं कर पाए।" क्योंकि आपके क्लासरूम्स में भी तो यही होता है न "बताइए हम करें क्या?" और जैसे ही ये सवाल आपके कान में पड़े कि "अब मुझे करना क्या है?" वैसे ही आपको जान जाना चाहिए कि प्रश्न गड़बड़ है।

वो आपसे पूछ रहा है कि "मेरा कर्त्तव्य क्या है?" आप उसकी मदद करना चाहते हैं तो उसे जगाइए। आप उसकी मदद करना चाहते हैं तो उसे बताइए कि तुम्हारा एक मात्र कर्त्तव्य है, अपनी आँखें खुली रखना। और उसके अलावा तुम्हरा कोई कर्त्तव्य नहीं है, कोई भी कर्त्तव्य नहीं है तुम्हारा। न समाज के प्रति, न माँ के प्रति, न पिता के प्रति, न किसी के प्रति। न मेरे ही प्रति। इस पूरे अस्तित्व में किसी का किसी के प्रति कोई कर्त्तव्य है ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: लोग हमें याद कराते हैं कि तुम स्वार्थी हो, ऐसी बातें करते हो।

आचार्य प्रशांत: तो तब आपका क्या कर्त्तव्य है?

प्रश्नकर्ता: कान बंद कर लेना।

आचार्य प्रशांत: बस ठीक। आपको जीवन इसलिए नहीं दिया गया, कि आप यहाँ पर आएँ और आपने कोई पुरानी भूल कर रखी है, कोई पुरानी आपकी देनदारी है, कुछ बैठे हुए दायित्व हैं, उनका आप निर्वाह करें, उनका पालन करें, हिसाब चुकता करें। जीवन इस ख़ातिर नहीं है। "दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा।" ग़ज़ब कर्त्तव्य है, जीना ही पड़ेगा और "जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा।"

नदी आपको पानी देती है पर इसलिए नहीं कि उसका कर्त्तव्य है देना, इसलिए कि उसको बहना है। और जो बह रहा है उससे औरों को कुछ-न-कुछ मिलेगा ही। पेड़ आपको फल देता है पर इसलिए नहीं कि उसको आपकी बड़ी परवाह है, इसलिए क्योंकि उसका स्वभाव है फल देना। सूरज रोशनी देता है। जानवरों को देखते हैं आपको ख़ुशी मिलती है। पर उन्हें कोई आतुरता नहीं है आपको ख़ुशी देने की, कि आपको ख़ुशी देने के लिए हिरण कुलाचें भरता हो। नहीं, हिरण की बुद्धि नहीं ख़राब हुई है कि आपको देखे और कहे कि "ये मेरा कर्तव्य है कि मैं इनको खुश करूँ।" ये सब बीमारियाँ आदमी की ही हैं कि "पति के घर लौटने का समय हो आया है तो मेरा कर्त्तव्य है कि मैं सज लूँ, खुश होंगे।" प्रकृति में और कुछ नहीं है जो किसी को खुश करना चाहता हो, लेकिन प्रकृति सबको खुश कर देती है।

ये बड़ी मज़ेदार बात है! पूरे अस्तित्व में कुछ नहीं है जो किसी और के आनंद हेतु हो, अस्तित्व में कुछ हेतु है ही नहीं। जो कुछ है बस है, स्वयंसिद्ध है, अपने लिए है। सिर्फ़ इंसान ने ये बना रखा है कि तुम्हारे दायित्व हैं, तुम्हें कुछ देना है। अरे देना तो तब है न जब पहले पाना है। दायित्वों की बात तो खूब कर लेते हो कि “देय है” और जो पाना है, वो कब आएगा?

जहाँ पा लिया गया है वहाँ देना अपने आप हो जाता है, स्वयमेव हो जाता है। आप पाने पर रहें, अपने-आप बँटेगा, बिना कोशिश के बटेगा, बड़े-से-बड़े कर्त्तव्य की पूर्ति हो जाएगी और बिना आपके जाने हो जाएगी, बिना आपके करे हो जाएगी। आप आनंदमग्न रहें, अस्तित्व के साथ एक रहें, अपनी मौज में जिएँ, यही कर्त्तव्य है। इसमें ये शक़ बिल्कुल भी न उठे कि, "क्या इसका मतलब ये कि अगर कोई हमारे बगल में तड़प रहा हो तो भी हम अपनी मौज में रहें?" जो इंसान मौज में है वो ठीक-ठीक जानेगा कि अगर कोई बगल में तड़प रहा है तो क्या करना है। और क्या करना है वो भी कोई एक चीज़ नहीं हो सकती है।

अलग-अलग मौके में अलग-अलग कर्म होंगे; तो मैं कुछ नहीं कह सकता कि क्या करना है। स्थितियाँ इतनी अलग-अलग होती हैं कि मैं कुछ भी नहीं कह सकता कि क्या करना है। लेकिन ये पक्का है कि अगर मैं स्वस्थ हूँ, अगर मैं स्वयं में स्थित हूँ तो फिर मैं जो भी करूँगा किसी भी स्थिति में, वही उचित कर्म होगा। बिना कर्त्तव्य के कर्म होगा, बिना कर्ता के कर्म होगा; और बिना कर्त्तव्य के, बिना कर्ता के जो कर्म होता है वही दैवीय कर्म है, वही उचित कर्म है। वही सम्यक कर्म है, वही श्रीकृष्ण का निष्काम कर्म भी है।

प्रश्नकर्ता: और अगर ऐसा भी हो सकता है, कि कुछ अतीत के लोग जो होश में थे उन्होंने ये समझ कर कि आने वाले जो लोग होंगे वो बेहोश होंगे, उन्होंने कुछ जाना और उन्होंने कुछ कर्त्तव्य दे दिए और उन कर्त्तव्यों के देने के पीछे ये मान्यता थी कि ये लोग सुखी रहेंगे, प्रसन्न रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे। और बहुत सारे ऐसे लोग हैं इस समाज में जो उन कर्त्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन कर भी रहे हैं, फिर ऐसा क्यों है कि तब भी इन्सान अपनी दुर्गति पर है, दुखी है?

आचार्य प्रशांत: देखो, जितने कर्त्तव्य होंगे वो सब विरोधाभासी होंगे। वो सब ऐसे होंगे जो तुम्हें एक-दूसरे से लड़वाएँ। तुम्हारा कर्त्तव्य क्या है? अपने परिवार की ख़ुशी। और पड़ोसी का कर्त्तव्य क्या है? उसके परिवार की ख़ुशी। अब लड़ोगे न आपस में। एक देश क्या चाहेगा? कि, "अधिक-से-अधिक मुझे मिल जाए, संसाधन के रूप में, धन के रूप में, प्रगति के रूप में।" पड़ोसी देश क्या चाहेगा? वो भी यही चाहिए। अब लड़ोगे न?

जो भी कर्त्तव्य छोटा है, सीमित है, वो तुम्हें आपस में सिर्फ़ लड़वाएगा। एकमात्र कर्त्तव्य जिस में आदमी आदमी से न लड़े, समरसता रहे, वो तो व्यापक कर्त्तव्य ही हो सकता है। अस्तित्वगत कर्त्तव्य। वरना तो जितने छोटे-छोटे कर्त्तव्य हैं ये सब सिर्फ़ कलह के और द्वेष के कारण बनेंगे।

प्रश्नकर्ता: और ये समय-बद्ध भी होते हैं। जैसी ज़रूरत है वैसे बना दिए गए हैं।

आचार्य प्रशांत: किसके लिए बनाए गए हैं? इस बात को समझिएगा। भगवद्गीता बड़ा अच्छा उदाहरण है। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण जो ऊँचे-से-ऊँची बात कही जा सकती है, वो अर्जुन से कह देते हैं। सांख्ययोग समझा देते हैं और उससे साफ़-सुथरी, शुद्ध बात कही नहीं जा सकती, पर अर्जुन नहीं समझता है। नहीं समझता है तो फिर तीसरे अध्याय में कर्म की बात होती है कि तू अपने कर्त्तव्यों का ही पालन कर; "तू क्षत्रिय है क्षत्रिय धर्म का पालन कर, तू लड़।"

पहले तो यही कहा उससे कि "न कोई मरता है, न कोई मारता है, तू लड़ क्यों नहीं लेता, तू क्या डर रहा है?" पर वो नहीं समझ रहा। तो जो न समझे, कर्त्तव्य उसके लिए है। और वहाँ पर भी जब अर्जुन को वो कर्त्तव्य दे रहे हैं, कि "कर्त्तव्यों का पालन कर, बस इतना कर कि कर्त्तव्यों का कर्ता मत मान लेना अपने-आपको; कर्त्तव्य करता चल और समस्त कर्त्तव्यों को, समस्त कर्मो को मुझमें समर्पित करता चल।" जब ये बात उससे कह भी रहे हैं, तब भी एक बात बोल दी है कि "जो आत्मा में रमण करता हो उसके लिए बेटा कोई कर्त्तव्य नहीं है।" तो जो नासमझ हो ये उसकी सज़ा है कि उसको कर्त्तव्यों का पालन करना पड़ेगा। बात समझ में आ गई?

कर्त्तव्य क्या हैं? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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