
सभी देवता वास्तव में आपकी आंतरिक शक्तियों के प्रतीक हैं, क्योंकि स्थूल जगत में कोई देवता नहीं होते; वे आपके भीतर ही हैं। दानव तुम्हारा वही हिस्सा है जो बार-बार चोट खाकर भी हठी की तरह खड़ा हो जाता है, अपनी पुरानी गलतियाँ दोहराने के लिए। यदि तुम्हें अपने भीतर के दानव को परास्त करना है, तो अपने काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और भय — इन 6 गुणों को सत्य और ऊँचाई की सेवा में माने देवी को समर्पित करना होगा।










“आज्ञा मानना बंधन है। भय बंधन है।”

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी, मेरा प्रश्न हैप्पीनेस (खुशी) के बारे में है कि व्हाट एग्ज़ेक्टली हैप्पीनेस इज़? (खुशी वास्तव में क्या है?) और हमें खुशी चहिए क्यों होती है। जैसे कि बचपन से ही जब हम किसी के पैर छूते हैं अपने से बड़ों का, तो सभी लोग बोलते हैं, "खुश




प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं आपकी काफ़ी सारी यूट्यूब लेक्चर्स देखे या सेशन (सत्र) देखे। तो जो आप चेतना की जो बात करते हो, अगर जो आपकी इच्छा या आपकी कोशिश है, मुझे पता नहीं कोशिश है कि नहीं। अगर एक कामना करते हैं या एक हाइपॉथेटिकल सिचुएशन (काल्पनिक स्थिति)…


प्रश्नकर्ता: मेरा जो प्रश्न है वो ये है कि मेरा मोटिवेशन लेवल (प्रेरणा स्तर) बहुत फ्लकचुएट (उतार-चढ़ाव) होता है, दिन में ही कई बार बहुत गहरे में भी चला जाता है। ऐसा लगता है कि मुझे किसी

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं। कैसे पता चले कि हम उनका अर्थ जान गये कि नहीं?



प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, मैं पंजाब से हूँ। मेरा सवाल लो सेल्फ़स्टीम, प्रोकास्टिनेशन (कम आत्मसम्मान, टालमटोल)


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि व्यक्ति में ख़ुद के प्रति प्रेम होना चाहिए। आपके अनुसार हमें अपने आन्तरिक कष्ट से मुक्ति की कोशिश करनी चाहिए। एक तरीक़े से यह स्वार्थ तो गहन अहंकार हुआ।

प्रश्नकर्ता: आम लोगों में अध्यात्म की जो बातें चलती हैं वहाँ ‘अल्प' की भाषा उपयोग की जाती है, और आजकल जैसे कि नए आध्यात्मिक केंद्रों में मिनिमलिज़्म (न्यूनतमवाद), अल्प की भाषा का प्रयोग हो रहा है। तो आचार्य जी, अध्यात्म में इस 'अल्प' का अर्थ क्या है?

आचार्य प्रशांत: थोड़ी विचित्र है मनुष्य की स्थिति। रहना उसे शरीर में ही है, रहना उसे जगत के साथ ही है। पर सिर्फ़ शरीर बनकर रहता है तो मौत का डर सताता है, अपने चारों तरफ़ और ऊपर और नीचे अगर सिर्फ़ जगत को ही पाता है तो बेचैन हो

आचार्य प्रशांत: ग्रन्थों का श्लोक हो, गुरुओं का आप्त वाक्य हो, किसी ज्ञानी का आर्ष वचन हो, कभी भूलना नहीं है कि उसमें कुछ भी आपके ज्ञान की बढ़ोतरी के लिए नहीं कह दिया जाता। उसमें कुछ भी इसलिए नहीं कह दिया जाता कि आपको संसार के बारे में कोई



प्रश्नकर्ता: आपसे प्रेरणा मिली है कि अध्यात्म, गीता, उपनिषद् का जीवन में बहुत महत्व है और जितनी जल्दी हो सके ज़िन्दगी में उतनी जल्दी इन ग्रंथों से परिचय हो जाना चाहिए। अब मेरा चौदह साल का बेटा है, उसे बहकते देख रहा हूँ। उपनिषद् इत्यादि उसे बताता हूँ तो उसे

प्रश्नकर्ता: आपने जो बात बतायी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में, तो अमृतबिन्दु उपनिषद् में तीसरे पेज पर ग्यारहवाँ श्लोक है, वहाँ पर बताया गया है कि ये तीनों अवस्था में आत्मा को एक ही जानो। पर मेरे अनुभव में जाग्रत अवस्था में कोई और होता हूँ, स्वप्न में — पता नहीं






प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या

मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८


अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेति वेद्यं न च तस्यारित वेता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥

प्रश्नकर्ता: हमने अभी समझा, आचार्य जी, कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। तो अब जो इंसान बाहर भी ढूँढ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है, तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा तो पा ही रहा है।

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखमा्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

नवद्वारे पूरे देही हँसो लेलायते बहि:। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में आपने एक बात कही थी कि हम सब की जो शुरुआत है वो एक बिंदु मात्र से हुई है और वैसा ही कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं कि शुरुआत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वह अपूर्ण क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है, चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। सत्य ही जब…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए यानि सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानि कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है?

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमॉंल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥
का जाति:। जातिरिति च। न चर्मणो न रक्तस्य न मांसस्य न चास्थिनः। न जातिरात्मनो जातिर्व्यवहारप्रकल्पिता॥१०॥
शरीर (त्वचा, रक्त, हड्डी आदि) की कोई जाति नहीं होती। आत्मा की भी कोई जाति नहीं होती। जाति तो व्यवहार में प्रयुक्त कल्पना मात्र है।
~ निरालंब उपनिषद (श्लोक क्रमांक १०)
आचार्य प्रशांत: आज जो…
यमराज तो यमराज ठहरे। हमारे स्वार्थों और हमारी भावनाओं से क्या लेना देना? तो वह पहली बात यह स्पष्ट कर देते हैं कि श्रेय और प्रेय आपस में अलग-अलग हैं। या तो यह पकड़ लो या यह पकड़ लो। यह दो नावों पर तुम एक साथ सवारी नहीं कर पाओगे। अपनी चालाकियां अपनी जेब में रखो। दुनिया भी ना छूटे और दिलदार भी मिल जाए, ऐसा नहीं होगा। जो दिलदार दुनिया छोड़े बिना मिल जाए वो दुनिया की ही धूल होता है। वहां फिर दिल जैसा कुछ होता भी नहीं। यह किसी की फिजूल जिद नहीं है कि दो में से एक ही मिल सकता है। यह अस्तित्व का एक साधारण नियम है।
प्रश्नकर्ता: गरुड़ पुराण और ये सारे, जो वाचे जाते हैं, ये भी कल्पना हैं? कहीं न कहीं से तो ये आया है।
आचार्य प्रशांत: कुछ भी जो है, वो कहाँ से आता है? कुछ भी जिसको आप बोलते हो कि “है”, वो कहाँ से आता है? बोलिए?
प्र: रचना तो…
प्रश्नकर्ता: आज शिविर में वज्रसूचिकोपनिषद् का पाठ किया तो जाना कि सचमुच में ब्राह्मण कौन होता है। आज तक लगता था कि ब्राह्मण जन्म या जाति के आधार पर बनते हैं; आज वो धारणा टूट रही है। ब्राह्मण कौन होता है, आचार्य जी और स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: पहले तो…
आचार्य प्रशांत: हम जैसे जीते हैं, हमारे लिए दो हैं, एक संसार और एक हम। संसार और एक हम, कुछ हम संसार की बात करते हैं, कुछ हम अपनी बात करते हैं। जब हम अपनी बात करते हैं तो भी हम अपने आप को देखते उन्हीं उपकरणों से और उसी…
प्रश्नकर्ता: जैसा आपने बताया कि कोई अन्तिम अवस्था नहीं होती है। हमें निरन्तर जीवनपर्यन्त अपनेआप को शुद्ध करते रहना होगा। तो हम जिन जीवनमुक्त महात्माओं के बारे में हमने जो पढ़ा है ‘निसर्गदत्त महाराज’,’रमण महर्षि’, ‘परमहंस योगानन्द’। वो जिस निरन्तर अवस्था में रहते हैं, वो जो बिलकुल फ्री फ्लो एटीटयूड…
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि अभी दशहरा आ रहा है और हर साल दशहरा मनाते भी हैं, लेकिन दशहरे का वास्तविक अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके दस सिर वही रावण। रावण वो नहीं जिसके दस सिर थे, जिसके ही दस सिर हैं वही रावण है। और हममें से कोई ऐसा…
आचार्य प्रशांत: गिरीश मोहन हैं, कह रहे हैं उपनिषद् में बहुत पहले पढ़ा था, “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो”। आपकी बातें सुनता हूँ तो वो श्लोक याद आ गया, मुझे समझाइए कि आप ताकत पर, बल पर इतना ज़ोर क्यों देते हैं ?
गिरीश मोहन! बल तो चाहिए न, नहीं तो बह…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। एक छोटी सी कन्फ़्यूज़न थी कि अब तक मैं समझता था कि जिसको हम लोग जीवात्मा कह रहे थे वो आत्मा है। और जिसको हम आत्मा कह रहे थे वो परमात्मा है, जिसे हम सत्य कहते थे। ये मेरी अपनी समझ थी।
तो मुझे अभी तक…
आचार्य प्रशांत: आज्ञा का अर्थ है– विशेषाधिकार किसी का, किसी के पीछे सुनना, किसी को बहुत ऊँचा स्थान दे देना, किसी को प्रथम मान लेना। आत्मा और आज्ञा साथ-साथ नहीं चलते। आत्मा किसी की नहीं सुनती। आत्मा किसी की आज्ञा पर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, महामृत्युंजय मंत्र का जाप क्या मदद कर सकता है कुछ वृत्तियों को काबू करने के लिए? क्योंकि वृत्तियों से मुक्ति ही सत्य की ओर ले जा सकती है और यह जाप भी बंधनों से मुक्ति के लिए जाना जाता है।
आचार्य प्रशांत: 'जाना जाता है,' किसके द्वारा? …
आचार्य प्रशांत: जैसे शरीर बढ़ता है खाने-पीने, हवा-पानी से, वैसे ही ये जो जीवात्मा है, मैं, अहम् भाव, अहंता, ये कैसे बढ़ती है? जो शरीर में गया वो शरीर ही बन जाता है न? उसके बाद अंतर नहीं कर पाओगे। सेब खाया, बताओ अब सेब कहाँ है? हर जगह है,…
“जो यज्ञ करने वालों के लिए सेतु के समान है, उस नाचिकेत अग्नि को, तथा जो भय शून्य है और संसार को पार करने की इच्छा वालों का परम आश्रय है, उस अक्षर ब्रह्म को जानने में हम समर्थ हों।” ~ (कठोपनिषद, प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, श्लोक २)
प्रश्नकर्ता: आचार्य…
प्रश्नकर्ता: जो श्रीमद्भगवद्गीता की दो मूलभूत बातें हैं, उनको जोड़कर सवाल है। श्रीमद्भगवद्गीता में ये कहा गया है कि आत्मा एक शरीर बदलकर दूसरा शरीर धारण करती है। पिछले दो-सौ वर्ष में जो मानव जनसंख्या है, वो क़रीब एक बिलियन से बढ़कर अब क़रीब आठ बिलियन होने को है। तो…
नर्क क्या है? ग़लत लोगों का साथ ही नर्क है। स्वर्ग क्या है? सही लोगों का साथ ही स्वर्ग है। ~निरालंब उपनिषद्
आचार्य प्रशांत: संसार के विषयों में रचे–पचे लोगों की संगति ही नर्क है। मैं नर्क से शुरू करूँगा, ज़्यादा क़रीब की बात है। हमें उसका अनुभव ज़्यादा है,…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा रेगुलर वर्क (नियमित कार्य) ही नहीं ख़त्म हो पाता है। मैं अपना काम समय से पूरा नहीं कर पाती हूँ। आप कहते हैं कि गीता सत्र सुनो पर वो भी नहीं सुन पाती हूँ, नियमित काम ही चलता रहता है। मैं न स्पोर्ट्स जा पाती हूँ…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। 'निर्वाण षटकम्' की एक पंक्ति है —
'न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'
तो इसमें जो मोक्ष के विषय में कहा गया है कि मैं मोक्ष भी नहीं हूँ, तो क्या शिव को मोक्ष भी नहीं चाहिए?
आचार्य प्रशांत: हाँ,…
आपको जब सुनता…
प्रश्नकर्ता: लगता है कि मन को कस के निचोड़ दूँ। लोहे की रॉड की तरह मोड़ दूँ कैसे भी। परन्तु कैसे मोडूँ इसे, इसे कैसे पटकूँ?
आचार्य प्रशांत: मन को तोड़ना है, मोड़ना है पर कैसे तोड़ना है? मन अपनेआप में कोई चीज़ तो है नहीं कि ये है (पास…
प्रश्नकर्ता: मेरा एक सवाल आपसे है आचार्य जी कि आज कि समय में कौन असली हिन्दू है? उसके बारे में आप मुझे ज़रा बताइए। किसको मैं असली हिन्दू बोलूँ?
आचार्य प्रशांत: जो मुक्ति मात्र को जीवन का लक्ष्य बनाता है, वेदान्त में दीक्षित है वो हिन्दू है। उनके अलावा जो…
आचार्य जी, फ़्रॉम लास्ट सो मैनी ईयर्स, आई एम लिसनिंग टू सो मैनी स्प्रिचुअल गुरूज़ एण्ड इन्सपिरेशन वीडियोज़ आई एम सीइंग (अन्तिम बहुत से सालों से…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सादर प्रणाम। मैंने एक लेख पढ़ा था स्वामी विवेकानन्द जी के ऊपर जिसमें उनका एक वक्तव्य था कि यू आर नीयरली गॉड इफ यू नो योर सेल्फ़ देट यू आर अ सोल (तुम अपनेआप को यदि आत्मा जानते हो, तो तुम ब्रह्म ही हो)। तो मुझे…
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो वो गहन अहंकार चाहिए। गहन माने गहरा। गहरा अहंकार…
आचार्य प्रशांत: 'अल्प'…
1. अहं ब्रह्मास्मि — "मैं ब्रह्म हूँ" (बृहदारण्यक उपनिषद्, प्रथम अध्याय, चतुर्थ ब्राह्मण, श्लोक क्रमांक १०)
2. तत्त्वमसि — "वह ब्रह्म तू है" (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ६, अष्टम खण्ड, श्लोक क्रमांक ७)
3. अयम् आत्मा ब्रह्म — "यह आत्मा ब्रह्म है" (माण्डूक्य उपनिषद्, अध्याय १, श्लोक २)
4. प्रज्ञानं ब्रह्म…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दीक्षा में पढ़ते हुए जो पहला श्लोक था, “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते,” तो इसमें पूर्ण का क्या मतलब है?
आचार्य प्रशांत: जिसकी तुम्हें तलाश है।
प्र: पूर्ण किससे पूर्ण है?
आचार्य: पूर्ण किसी से पूर्ण नहीं होता। पूर्ण मात्र पूर्ण होता है।
प्र: क्या उसमें संसार…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपको करीब-करीब सात-आठ महीनों से सुन रहा हूँ। करीब आपके बीस-पच्चीस कोर्सेज़ भी किये। मेरे तीन बच्चे हैं। एक अट्ठाइस साल का बेटा है, एक बाईस साल की और एक अठारह साल की बेटीयाँ है। तो आपसे मिलने के पहले मैं बच्चे से ये कह रहा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कबीर साहब ने बहुत बार वेदों और पुराणों की निंदा क्यों की है?
आचार्य प्रशांत: उनको वेद-पुराण की न निंदा करनी थी, न स्तुति करनी थी। जिस जगह जो बात ठीक लगी, उसको कहा 'ठीक;' जिस जगह जो बात ठीक नहीं लगी, उसको कहा 'नहीं ठीक।' उन्हें…
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥
‘उठो, जागो, वरिष्ठ पुरुषों को पाकर उनसे बोध प्राप्त करो। छुरी की तीक्ष्ण धार पर चलकर उसे पार करने के समान दुर्गम है यह पथ – ऐसा ऋषिगण कहते हैं।‘
~ कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, श्लोक १४…
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच॥
‘वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। और हे श्वेतकेतो! वही तू है। ऐसा कहे जाने पर श्वेतकेतु बोला – ‘भगवन्! आप मुझे फिर…
प्रसंग:
संसार रूपी वृक्ष क्या हैं? उस पर विराजते दो पक्षी क्या हैं? एक पक्षी खाता रहा, दूसरा देखता ही रहा का अर्थ क्या है? मौत से सब घबराते क्यों हैं? मृत्यु का भय क्यों सताता है?
श्लोक:
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजा: सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः…
तो…
य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशतः ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥
जो एक मायापति अपनी प्रभुतासंपन्न शक्तियों द्वारा संपूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।…
वह पुरम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीज़ों को जानता…
~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय ३, श्लोक १६)
आचार्य प्रशांत: जो मूल औपनिषदिक सिद्धान्त है इस श्लोक के…
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १८)
आचार्य प्रशांत: नवद्वार तो समझते ही…
आचार्य प्रशांत: दुःख का अभाव।…
वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…