प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं। कैसे पता चले कि हम उनका अर्थ जान गये कि नहीं?
आचार्य प्रशांत: “जे जानत ते कहत नहिं, कहत ते जानत नाहिं।” ये बहुत विचित्र बात है। श्वेताश्वतर उपनिषद् पर अभी जो पिछला ही सत्र था, तो ऋषि यही कह रहे थे।
स्पष्ट हो जाए जब कि नहीं जानते, तो आपको पता भी नहीं चलेगा, आप जान गये। लेकिन अगर उद्देश्य है कि जानना है, तो कुछ नहीं जान पाओगे। उद्देश्य अगर ये जानना है कि नहीं जानते, तो तुम जान भी नहीं पाओगे और कुछ धीरे से, बहुत आहिस्ता से, चुपचाप, मौन से, आपको पता चल जाएगा।
कुछ ऐसा पता चल जाएगा, जिसके पता चल जाने का भी आपको पता नहीं होगा। पता तो चल गया, पर आपको पता भी नहीं है कि पता चल गया। हाँ, जो पता चल गया, वो अब आपमें खून बनकर बहेगा। तो आपके काम आने लगेगा। पर आपको पता नहीं होगा कि आपको पता है। हाँ, उसकी जब ज़रूरत होगी, तो वो आपके हाथ में आ जाएगा।
बहुत पहले, आठ-दस साल पहले, यूँही मन में उदाहरण आ गया था, तो मैंने दिया था कि जैसे एक ऐसी ख़ास जेब हो जो बिलकुल खाली रहती हो; आपका अस्तित्व एक ख़ास जेब की तरह हो जाएगा जो सदा खाली रहती है, पर जब कोई वास्तविक ज़रूरत पड़ती है और आप हाथ डालते हैं, तो ठीक उसमें उतना ही रहता है, जितना आपको चाहिए। बस उतना ही, ठीक उतना ही जितना चाहिए।
और जब तक ज़रूरत नहीं रहती, उसमें कुछ नहीं रहता। मन ऐसा हो जाता है। इसमें कुछ नहीं रहता, कोई ज्ञान नहीं। 'कुछ पता है?' ‘बिलकुल कुछ नहीं पता। हाँ, ज़िन्दगी कोई जवाब मॉंगेगी, तो जवाब आ जाएगा। कहाँ से आ गया? ये हमको नहीं पता।’







