आचार्य प्रशांत: ग्रन्थों का श्लोक हो, गुरुओं का आप्त वाक्य हो, किसी ज्ञानी का आर्ष वचन हो, कभी भूलना नहीं है कि उसमें कुछ भी आपके ज्ञान की बढ़ोतरी के लिए नहीं कह दिया जाता। उसमें कुछ भी इसलिए नहीं कह दिया जाता कि आपको संसार के बारे में कोई और कहानी पता चल जाए। चाहे विषय सांसारिक हो, चाहे काल्पनिक, अध्यात्म का उससे कोई केन्द्रीय सम्बन्ध नहीं हो सकता। अध्यात्म का केन्द्रीय सम्बन्ध सिर्फ़ और सिर्फ़ जो प्रार्थी है, जो शिष्य है, जो जीवात्मा है, उसके मन से है।
बहुत आगे निकल जाने पर बहुधा ये ख़तरा हो जाता है कि हम भूल जाते हैं कि हम कहाँ से चले थे, किस भाव से चले थे। हम क्यों आये थे उपनिषद् के पास? हम इसलिए तो नहीं आये थे कि हमको पता चले कि देवों की उत्पत्ति कैसे होती है, कितने देव हैं, उनके क्या नाम हैं, वो कैसे आगे बढ़े, किन दानवों से उनका द्वन्द्व हुआ, किन क्षेत्रों का उन्होंने अधिग्रहण करा। तुम इसलिए तो नहीं आये थे न उपनिषदों के पास?
फिर से याद करो बिलकुल, उपनिषद् के पास आये ही क्यों थे? क्यों आये थे? क्योंकि हम अशान्त थे इसलिए हम उपनिषद् के पास आये। हम उपनिषदों के पास अपने सामान्य-ज्ञान अथवा अपने धार्मिक ज्ञान में वृद्धि के लिए नहीं आये हैं। जीवन तो हमारा यूँही तमाम तरह के क़िस्सों से, धारणाओं से भरा ही हुआ है न। ये कोई बात हुई कि धर्म-ग्रन्थों के पास भी आ रहे हो और वहाँ से और कहानियाँ पकड़ लीं?
तो ये मूल सिद्धान्त कभी छोड़ना नहीं है कि मैं परेशान हूँ, मैं इसलिए धर्म-ग्रन्थ के पास आया हूँ, और उपनिषद् मुझसे जो कुछ कह रहे हैं वो इसीलिए कह रहे हैं कि मेरी परेशानी शान्त हो। तो इस पूरे वक्तव्य के और इस पूरे प्रयास के केन्द्र पर मैं और मेरा आन्तरिक कोलाहल बैठा हुआ है।
तो श्लोक में फिर जो भी बात कही जाएगी, चाहे बात रुद्र की हो, चाहे देवताओं की हो, चाहे हिरण्यगर्भ की हो, ब्रह्मा की हो, हम बार-बार पूछते रहेंगे, 'इसमें मैं कहाँ हूँ? रुद्र कौन? देवता कौन है? हिरण्यगर्भ की बात क्यों हो रही है? अरे भाई! मैं तो उपनिषदों के पास इसलिए आया हूँ क्योंकि मुझे चैन की नींद नहीं आती, मैं दुविधा में पड़ा रहता हूँ, भविष्य की चिन्ता है, अतीत की स्मृतियाँ कचोटती हैं, चारों तरफ़ से असुरक्षा है। मैं तो उपनिषद् के पास इसलिए आया था। मुझे ये क्यों नये-नये प्रसंग, नये-नये नाम दिये जा रहे हैं?'







