आमतौर पर हमने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जीवन का लक्ष्य माना है। माना गया है कि धर्म, अर्थ और काम रहेगा, तो अन्ततः मोक्ष उतरेगा — यह भ्रम है। हमने यह बड़ी-से-बड़ी गलती की है कि धर्म को अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन बना लिया है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति का नाम धर्म नहीं हो सकता; वो तो कोई दुकान होगी। ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि यदि धर्म वो है जो अर्थ और काम की सेवा में लगा हुआ है, तो अर्थ और काम को ही नहीं, धर्म को भी त्याग दो — इनको त्यागना ही मोक्ष है।
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विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम्, धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु।।
~ अष्टावक्र गीता
अर्थ:
हे साधक, काम (इन्द्रिय-लालसा) जो शत्रु के समान है, और अर्थ (धन) जो अनर्थों से भरा है — इन दोनों के लिए किया जाने वाला धर्म भी त्याज्य है; सर्वत्र (हर स्थिति में) उसका अनादर करो।
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