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क्या ज्ञानी पुरुष भी भोगविलास करते हैं?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।

निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||

~ अष्टावक्र गीता

अनुवाद: स्थितप्रज्ञ पुरुष महान भोगों में विलास करते हैं, और पर्वतों की गहन गुफाओं में भी प्रवेश करते हैं, किन्तु वे कल्पना बंधन एवं बुद्धि वृत्तियों से मुक्त होते हैं।

आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और हमें विलास से बड़ा डर लगता है। (अनुवाद पढ़ते हुए) कुछ भी उनके लिए वर्जित नहीं है। कभी ऐसा करते भी दिख सकते हैं। कभी वैसा करते भी दिख सकते हैं। कुछ भी कर रहे हो, कुछ भी न कर रहे हो, वो रहते मुक्त ही हैं। उनके बारे में कोई धारणा मत बना लेना, कोई छवि मत बना लेना। जो आम छवि है भक्त की, योगी की, ज्ञानी की, त्यागी की उन छवियों से आज़ादी दे रहे हैं अष्टावक्र। अष्टावक्र कह रहे हैं कि न यह जो वास्तविक योगी है, यह जो वास्तविक ब्रह्मचारी हैं, यह जो ज्ञानी है, यह जो स्थितप्रज्ञ है यह किसी भी प्रकार के भोग से हटता नहीं है पीछे। क्योंकि पीछे हटने का अर्थ होगा कि कहीं तो उसने डर देखा, कि कहीं तो उसने असत्य देखा, कि कहीं तो उसने ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ और देखा। पीछे हटने अर्थ हो गया– कहीं तो उसने अपनी व्यक्तिगत रूचि या अरुचि को महत्व दिया।

जीवन जो दशा दिखाता है वह उसी दशा में जीता जाता है। जीवन यदि भोग का अवसर उपलब्ध कराता है तो वो उससे पीछे नहीं हटता। और यदि जीवन उसे बिल्कुल एक रुखा-सुखा वृत्ति का जीवन भी देता है तो उसे उससे भी कोई शिक़ायत नहीं। राज महल में भी रह लेगा, गुफ़ा में भी रह लेगा। सुसाधु भोजन मिलेगा वह भी कर लेगा। और रुखा-सुखा खाली पेट वह भी चलेगा। समस्त वृत्त वह त्याग देता है। बस मुक्ति नहीं त्याग सकता। चाहे तो भी नहीं, क्योंकि मुक्ति स्वभाव है उसका। कल्पना, बंधन एवं बुद्धि वृत्तियों से मुक्त होते हैं। यह ऐसी आध्यात्मिकता है जो आपको आध्यात्मिकता से भी आज़ादी दिलाती हैं। आपके मन में चाहे जो छवि हो सुधी की, ज्ञानी की ये उसी को खंडित करेगी। यह जो आम धार्मिक मन होता है उसको तो यह बात पचेगी ही नहीं कि जो स्थितप्रज्ञ हैं, वह महान भोग विलास में रत भी हो सकता है। वह कहेगा न हमें तो सन्यास में कुछ और ही अर्थ पता था। हमें तो त्याग का, भक्ति का कुछ और ही अर्थ पता था।

भोग से तो पीछे हटना है। और अष्टावक्र ने स्वयं सिखाया है कि जो ज्ञानी है वह न कर्ता है, न भोगता है। जब न कर्ता है, न भोगता है तो भोग विलास में रत कैसे हो सकता है? जब वह भोगता नहीं है, इसीलिए तो भोग सकता है। क्योंकि भोग-भोग के भी वह क्या नहीं हो जाएगा; भोगता।

जब भोग-भोग के भी भोगता न हो जाओ तब तुम्हें भोगने का हक़ मिल गया पूरा। जब कर-कर के भी कर्ता न हो जाओ तो करने का हक़ मिल गया तुम्हें पूरा। जब न करके न करके भी तुम न करने के कर्ता न हो जाओ तब कुछ न करने का भी हक़ मिल गया तुमको। जो ही करने पर, जो ही होने पर तुम होनी से और करने से अछूते रह जाओ, अब वहां के कपाट खुल गए तुम्हारे लिए। जिस बंधन में होकर भी तुम मुक्त रह आओ, अब उस बंधन मे ही तुम्हारी मुक्ति है। अरे! इतनी आसानी से समझ में आ रही है तो फ़िर स्वयं खोज कर क्यों नहीं लाए थे? और गहराई से जानिए। बात उतनी सतही नहीं है, जितनी प्रतीत होती हैं। शब्द हल्के होते हैं, शब्द सतही होते हैं। बात बहुत दूर तक जाती है। जीवन बदल जाएगा, एक-एक तरीक़ा है जो चलने का, फिरने का, बात करने का, संबंध बनाने का सब बदल जाएगा। एक श्लोक भी समझ में आ गया तो कायांतरण हो जाएगा। एक श्लोक भी!

प्रश्नकर्ता: एक शब्द आया था पिछले सत्र में निर्वासना। जिसकी वासना न हो, वो वासना में लिप्त न हो। तो शारीरिक रूप से देखे तो भोग तो सारे शारीरिक रूप से ही होते हैं। तो फ़िर निर्वासना क्या हुई?

आचार्य: वासना क्या? जो वास करें वह वासना। जहां तुम वास करो सो वासना। इसलिए जब कहीं से निकाल दिया तो निर्वासित हो गए। इसका वास्तविक अर्थ समझना; जहां जाकर बैठ गए हो वही वासना है। और जो तुम में बैठ गई है वहीं वासना है। यह और कुछ नहीं है जो मन से न उतरे। तुम बस देख लो कहां जाकर बैठ रहे हो? क्या है जो मन में चलता रहता है? कहां गद्दी डाल दी है? और किसने तुम में गद्दी डाल दी है। दोनों एक ही बात है। जिसने तुम में गद्दी डाल दी होती है उसी में तुम गद्दी डाल देते हो।

जो वासना तुम में घुसती है तभी तो तुम वासना में घुसते हो। हुई ना एक ही बात। जहां जाकर बैठ गए हो, जहां जाकर चिपक गए हो, जहां से अब उठने का नाम ही नहीं ले रहे हो वही वासना है। इसलिए निर्वासन हो जाना है। मनाओ की निर्वासित हो जाओ। और निर्वासित होने का अर्थ निकाल दिया जाना भी होता है। या तो ख़ुद निकल जाओ या प्रार्थना करो कि निकाल दिए जाओ और कोई तरीक़ा नहीं है। ख़ुद निकल पाने की जब हिम्मत न हो तो प्रार्थना करो कि कोई और निकाल दें। क्योंकि कोई और नहीं निकालेगा तो तुम चिपके ही बैठे हो।

फकीरों की कथाएं हैं ऐसी कि उनका भिक्षा पात्र और तो ज़्यादा कुछ होता नहीं, एक-आद चिथड़ा, भिक्षा पात्र यह सब लेकर घूम रहे हैं। एक दिन वह भी खो गया। तो बोले धन्यवाद! अपने आप तो कभी छुड़ा नहीं पाए थे। अपने आप तो कभी छोड़ नहीं पाते, भला तुमने छीना। तो मनाओ की निर्वासित हो जाओ और धन्यवाद दो उन स्थितियों का जो तुम्हारी वासनाएं छिन्ने। इसीलिए हमारे कैंप बड़ी अचूक जगह होते हैं। फ़ोन का सिग्नल ही नहीं आता। तुम्हारी एक तिहाई वासनाएं तो उस डब्बे में होती हैं। कभी हम चार-पांच रोज़ तो स्थितियां ऐसी हो जाती है कि तुम अपने फोन से निर्वासित हो जाते हो। तुम से कहा जाए कि स्वेच्छा से चार-पांच दिन के लिए बंद कर दो। करोगे कभी? निर्वासित हो गए, अब ठीक है। भाई हम बहाने वाले लोग हैं। अशांत किसी बहाने से ही तो होते हो। जब अपना केंद्र छोड़ा था, घर छोड़ा था तो कोई बहाना मार के ही तो छोड़ा था। तो हम ऐसे लोग हैं जो बहाना मार के बाहर निकले हैं। और वापस जाने के लिए भी बहाना चाहिए। भले ही वापस जाने की कितनी भी तड़प हो। जब तक बहाना नहीं मिलेगा, काम नहीं चलेगा। तो शास्त्र बहाना है, गुरु बहाना है। वापस तो तुम्हें स्वयं ही जाना है। तड़प रहे हो वापस जाने को पर बहाना चाहिए।

आज एक सज्जन से बात हो रही थी वही MTM(निजी मुलाकात) में। तो बातचीत के पन्द्रह-बीस मिनट हुए नहीं होंगे कि अतिप्रफुल्लित स्क्रीन ही नाचने लग गई। मैं बड़ा हल्का अनुभव कर रहा हूं। मैं बहुत खुश हो गया। सारे सवाल मिल गए, हल हो गए। समाधान हो गया। मैंने कहा ऐसा है यह जो कुछ भी हो गया, यह पहले भी तुम्हारे साथ हो चुका था। तुम्हें बस घोषित करने का बहाना चाहिए था। हल्का होता है और हल्कापन है यह तुम जानते भी थे, हल्के भी थे बस बहाने बाज़ हो। तो हमें भटकने का बहाना भी चाहिए और घर वापस जाने के लिए भी हमें बहाना चाहिए। तो उसको मिल गया बहाना कि आचार्य जी से मुलाक़ात हुई और आचार्य जी के आशीर्वाद से हम हल्के हो गए। मैंने कहा मेरा कोई आशीर्वाद नहीं है। मैंने क्या किया है? पन्द्रह मिनट में तो मैं बोलना शुरू करता हूं। अभी तो मैंने बात छेड़ी भी नहीं है। अभी तो वार्म अप चल रहा है। तुम मेरे कारण नहीं हल्के हो गए। जैसे हर कारण एक बहाना होता है, वैसे ही तुमने मेरे माध्यम से बहाना पा लिया। मुझे कारण बना लिया और हर कारण क्या है; बहाना है। होना तो वही है जो होना है। पर हम बिना कारण कुछ होने नहीं देते। कारण उसके साथ ज़रूर जोड़ना है। हम यह कभी नहीं कहेंगे कि होना था इसलिए हुआ। हम कहेंगे यह वजह थी इसलिए हुआ। वजहें सारी है फ़िज़ूल। कोई किसी वज़ह से नहीं होता। वजहें हमारी सारी ऐसी है कि कुतुबमीनार के नीचे लाश निकल रही हो। तुम कहो अरे! अरे! अरे! गिरने की वजह से मर गया। अब नीचे से गुजरती लाश का कुतुबमीनार से क्या ताल्लुक? पर वज़ह तो चाहिए तो मन कुछ-न-कुछ जोड़-तोड़ करके कहीं-न-कहीं तार जोड़ेगा, जुगत लगाएगा।

जब अशांत हो जाओ तब जान लेना एक ही कारण है, क्या? सागर से लहर उठी है। जब शांत हो तब भी जान लेना कि एक ही कारण है, क्या? सागर ने लहर को वापस खींच लिया है। बाकी सारे कारण बहाना है। वास्तव में यह कारण भी बहाना है। इसीलिए अशांति के कारणों को एक कारण जानो। क्या? कि अहम् वृत्ति है। अशांति के लिए जितने भी कारण मिलते हो उन सारे कारणों को विविध मत जान लेना। वह सब एक हैं। क्या? अहम् वृत्ति। उन सब कारणों को एक कारण जानो और भूल जाओ। और शांति के लिए भी जितने कारण मिलते हो उन सब को एक ही जानना। क्या? स्वभाव की पुकार है। वहीं वापस जाना है जहां के हैं। तो उन सब कारणों को भी एक कारण जानो और भूल जाओ। अलग-अलग कारण मत बना लेना कि आज शान्त हैं क्योंकि सत्र में बैठ आए। आज शांत है कि आज धूप ज़रा कम है। आज शांत है क्योंकि दूध में पानी कम मिला है। ये सब बेकार की बातें हैं।

शांत हो यदि तो इसलिए शांत हो क्योंकि शांत होना ही है। इसके अतिरिक्त कोई कारण नहीं है। बाकी सारे कारण बस यूं ही है, उनको तवज्जो नहीं। और अगर अशांत हो तो उसके लिए भी कारण या बहाना मत ढूंढ लेना। यह मत कह देना कि अशांत इसलिए हूं क्योंकि पति ने कोई बात बोल दी। अशांत इसलिए हूं क्योंकि आज रुपए, पैसे लूट गए। अशांत हूं दुकान में आज कम बिक्री हुई। अशांत इसलिए हूं क्योंकि आज पेट ज़रा गड़बड़ है। बेकार की बातें हैं। अशांति का भी सिर्फ़ एक ही कारण होता है, क्या? अशांत होना है। अलग-अलग कारण ढूंढ कर के तुम कारणों को वैधता दे देते हो। अलग-अलग कारण ढूंढ करके तुम कारणों को जायज़ बना देते हो। और जायज़ भी क्यों बना देते हो, उसका भी एक ही कारण है। क्या कारण है? कि अशांत होना है।

प्र: शांत होना तो स्वभाव है।

आचार्य: अशांत होना भी स्वभाव है। शांत होने पर थोड़े ही स्वभाव हैं। अशांत भी स्वभाव हैं। जब अशांत हो जाओ भूलना नहीं कि अशांति के नीचे भी बैठी क्या हुई है; शांति ही। बंधन ही स्वभाव ही है। ऐसा नहीं कि मुक्ति मात्र स्वभाव है। क्योंकि बंधन भी क्या है? मुक्ति का ही एक रूप है बंधन और कुछ नहीं है। प्रच्छन्न मुक्ति को बंधन कहते हैं। अप्रकट मुक्ति को बंधन कहते हैं। बंधन का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है, बंधन झूठ है। जब बंधन वास्तव में होते ही नहीं, मुक्ति ही स्वभाव है तो बंधन को और क्या कहें मुक्ति के अलावा? या तो यह कह दो कि मुक्ति के अलावा भी कुछ होता है। और अगर नहीं होता तो यह बंधन कहां से आ गया? निश्चित रूप से आप जिसको बंधन कह रहे हो, वह और कुछ नहीं है मुक्ति का ही मुखौटा है। इसलिए जो लोग बंधन में होते भी हैं, उन्हें वास्तव में बंधन से छूटना नहीं है। उन्हें बस यह याद रखना है कि बंधे लग रहे है, है अभी भी आजाद ही। इसीलिए वास्तव में जो कहते हैं कि हम तो परमात्मा को भूले हुए हैं, उन्हें भी कुछ याद नहीं करना है। क्योंकि इस भूलने-भूलाने में भी हैं सब याद ही। भूलना कुछ नहीं है। सतत् स्मरण की मुक्ति में यह भी शामिल है कि भूल जाओ। आ रही है बात समझ में?

प्र: अज्ञानी तो इसलिए भोगता है क्योंकि वासना है। ज्ञानी जो भोग रहा है उसमें वासना का क्या रोल है?

आचार्य: ज्ञानी भोग ही नहीं रहा।

प्र: अभी आपने कहा महा भोगो में विलास करते हैं।

आचार्य: महा भोग है पर भोग ही नहीं रहा। वह भोगते हुए भी भोगता नहीं है। इसीलिए आप यह नहीं कहोगे कि वह भोग रहा है। भोग हो रहा है। ये दो बहुत अलग-अलग बातें हैं।

प्र: उसमें वासना है कि नहीं?

आचार्य: है, बिल्कुल है।

प्र: तो दोनों में फ़र्क क्या है?

आचार्य: है, बहुत फ़र्क है। ज्ञानी के भी वासना है, अज्ञानी के भी वासना है। और फ़र्क तब भी पूरा-पूरा है। क्या फ़र्क है? ज्ञानी वासना को मात्र वासना नहीं जानता। और अज्ञानी के लिए वासना मात्र वासना है। ज्ञानी वासना में भी वासना से निर्वासित रहता है, वासना से आज़ाद रहता है। अज्ञानी जब वासना में है तो उसके लिए वासना तो है पर सिर्फ़ वासना है। अज्ञानी की परेशानी यह है कि या तो उसके लिए वासना सिर्फ़ वासना है। और अगर उसे किसी तरीक़े से स्मरण करा दिया जाए कि वासना के आगे भी कुछ है तो उस बेचारे की वासना गिर जाती है। वह या तो वासना में रह सकता है या उसकी वासना बुझी रह सकती है। या तो जली होगी या तो बुझी होगी। ज्ञानी की वासना जब जली भी हुई है तब भी बुझी हुई है।

ज्ञानी किसी स्त्री के साथ है। वह जब देख रहा है उसके चेहरे को तो उसको अच्छे से पता है कि यह चेहरा राख है। कितनी सुंदर आंखें हैं पर ये और कुछ नहीं है यह वैसे ही खड्डे हैं जैसे फरीद ने देखे थे। फरीद एक स्थान पर कहते हैं कि जो सुंदर-सुंदर आंखें हैं, एक दिन ऐसा आएगा इसमें पक्षी आ कर के अंडे दे रहे होंगे। कपाल भर बचेगा, खोपड़ा! यह जो अभी इतना सुंदर चेहरा दिख रहा है तो इन आंखों में एक दिन गिद्ध, कौवे आ कर के अंडे डाल रहे होंगे अपने। खत्म हो चुका होगा सब कुछ। तो ज्ञानी जब अपनी प्रियसी के साथ भी हैं और उसके चेहरे को देख रहा है। सुंदर आंखों को देख रहा है तब भी उसको दिख तो रहा है, अतीत भी दिख रहा है, भविष्य भी दिख रहा है, समय का पूरा प्रसार दिख रहा है। ठीक तब जब उसे सुंदर तन दिख रहा है, तभी उसे एक छोटी सी बच्ची भी दिख रही हैं और एक बुढ़िया की लाश भी दिख रही है। सब दिख रहा है। और ये सब देखते हुए भी वह वासना में रह सकता है। वह चाहे देख रहा है पूरे शरीर को और उसको दिख रहा है ये कुछ नहीं है। लाश पड़ी हुई है सामने। उसको ये भी दिख रहा है ये कुछ नहीं है। यह एक छोटा सा भ्रूण पड़ा हुआ है सामने। उसके बाद भी वह वासना में रह सकता है। आप यही काम अज्ञानी के साथ कर दीजिए। उसको बड़ी तकलीफ़, बड़ी परेशानी हो जाएगी। वह उत्तेजना में हो किसी स्त्री के साथ और आप उसे कहें कि यह लाश है, उसकी उत्तेजना स्खलित हो जाएगी। सारी वासना छू-मंतर हो जाएगी। जहां देखेगा की लाश है और अगर उसने किसी तरीक़े से कल्पना कर ली, भाव दृश्य कर लिया कि लाश पड़ी हैं मेरे सामने और ये आंख नहीं है ये खोह है, बिल है। इसमें तो सांप घुसा हुआ है, एक से घुस रहा है दूसरे से निकल रहा है तो उसकी वासना तो गई। पिंड छुड़ा के भागेगा, कहेगा ये भूतनी पड़ी है। ज्ञानी अज्ञानी में यह अंतर है।

ज्ञानी जब वासना में है भी, तो भी सत्य में भी है। और अज्ञानी जब वासना में है तो वह सिर्फ़ वासना में है। अज्ञानी की निशानी ये है कि वह सत्य में हो ही तब सकता है जब वह वासना में नहीं हो। इसीलिए आप के तथाकथित सन्यासी वासना का त्याग करते हैं ताकि सत्य में हो सके। उसके लिए यह जो खेल है वह चुनाव का है, विकल्प का है, हाँ या न का।

वह कहता है या तो स्त्री के साथ हो सकता हूं या तो सत्य के साथ हो सकता हूं। इसीलिए जो आज तक आध्यात्मिकता रही है उसमें वासना के त्याग की बड़ी बात रही है। क्योंकि जब तक वासना का त्याग न हो तब तक भगवान की याद आती नहीं। यह मज़बूरी रही है अज्ञानी की। और ज्ञानी की खूबी यही है कि वह जब वासना में है तब भी उसे भगवान में ही स्थित रहना है। जो सत्य ऐसा हो कि शर्तें लगाता हो, सत्य है ही नहीं। जो सत्य कहता है मुझ में तुम तभी हो जब तुम संसार से अलग हो तो वो सत्य नहीं है।

जहां कहीं भी आप यह बता पाए कि सत्य आया तो संसार छूटा, तो वहां जान लेना कि सत्य नहीं आया है। यह संसार का ही कोई दूसरा रूप है जो छा गया है। वास्तव में जो सत्य में जाएगा उसे संसार से भागने की कोई आवश्यकता दिखाई पड़ेगी नहीं, बिल्कुल बंद हो जाएगी। अज्ञानी, ज्ञानी का भेद समझ रहे हैं ना?

जिसका अध्यात्म संसार से अलग हो कर के शुरू होता है उसका अध्यात्म खोखला है।

ज्ञानी वासना में भी सत्य में हैं। इसलिए अष्टावक्र कह रहे हैं कि स्थितप्रज्ञ महान भोग विलास में रत रह सकता है। आवश्यक नहीं है कि रहे। आगे यह भी कहते हैं कि वह किसी अंधेरी गुफ़ा में भी पाया जा सकता है। पर वह महान भोग विलास मैं भी रत रह सकता है। सालों तक हो सकता है न विलास हो, न भोग हो और फ़िर हो सकता है कि समय बदले स्थितियां ऐसी हो तो निरन्तर भोग भी है, विलास भी है। और इसीलिए उसका भोग विलास महान है। क्योंकि भोग के रहते हुए भी वह स्थापित वहीं है जहां महत् बैठा हुआ है। महानता और किसका नाम है? महत् के साथ लगातार जुड़े हुए हो तो महान हो। चल रहा होगा भोग, हम कहां है? हम तो महत् के साथ ही बैठे हैं, वहीं चौकी है हमारी। उसके अलावा हम कहीं बैठते नहीं। और भोगी की क्या मजबूरी है, भोगता की क्या मजबूरी हैं कि वह पूजाघर में तभी जा सकता है जब पहले स्नानघर गया हो। वहां शर्तें लगी होती है। वहां अगर वासना चल रही हो तो पूजा नहीं चल सकती। वहां पर यह भेद ज़रूर होगा कि वासना चल रही है तो पूजा नहीं चल रही। बल्कि अगर वह वासना में रत हो और उसमें आप उसे भजन सुना दे तो उसकी वासना गिर जाएगी। आप उसे कहिए जब तुम अपनी पत्नी के साथ हो, ठीक तब उपनिषदों के श्लोकों का पाठ करना। वह कहेगा क्यों मूड खराब करते हो। उससे होगा ही नहीं। वह कहेगा या तो उपनिषद करवा लो कर लेंगे, बिल्कुल कर लेंगे। हमें अष्टावक्र पसंद है अष्टावक्र बिल्कुल कर लेंगे। या स्त्री करवा लो, स्त्री भी पसंद है कर लेंगे। ये भी पसंद है ये भी कर लेंगे। वो भी पसंद है वो भी कर लेंगे। पर दोनों एक साथ नहीं कर पाएंगे। जो दोनों को एक साथ कर ले वह ज्ञानी। जो दोनों को अलग-अलग करें वह मूर्ख। तो इसीलिए कोई चिन्ह मत बनाइएगा। कोई प्रतीक इत्यादि मत रख लीजिएगा।

आपने पा लिया किसी को गुफ़ा में बैठे हुए तो आपने कह दिया ज्ञानी है यह ज़रूर। यह आवश्यक नहीं है कि कोई गुफ़ा में घुस गया तो ज्ञानी ही है। आपने पा लिया किसी को परित्याग किए हुए तो आपने कह दिया यह निश्चित रूप से सन्यासी है। कोई आवश्यक नहीं है। वास्तव में जो बुद्ध पुरुष हैं, ब्राह्मी पुरुष उसके निशान ढूंढने बड़े मुश्किल हैं। जिन्होंने जाना उन्होंने बार-बार कहा भी है कि जो असली वाला होता है, वह निरंजन होता है। निरंजन के दो अर्थ एक तो यह कि उस पर कोई दाग-धब्बा नहीं लगता और दूसरा यह कि उसका कोई निशान नहीं होता।

मैं पढ़ रहा था, कुरान में भी बड़े सुंदर तरीक़े से ज़िक्र है कि मैं जिसको भेजूंगा वह उनको नज़र ही नहीं आएगा। जो निशान खोजते हैं, जो चिन्ह् खोजते हैं, जो ढ़र्रे खोजते हैं, जो रूप, रंग के ग़ुलाम होते हैं उनको सच नज़र नहीं आएगा। स्थितप्रज्ञ की पहचान इससे नहीं हो सकती कि वह क्या कर रहा है? सिर्फ़ इससे हो सकती है कि वह जो भी कर रहा है, वह करते हुए वह बैठा कहां है? कर तो वह कुछ भी सकता है। पूरा आकाश उसका है, पूरा ब्रह्मांड उसका है। आपका करना सीमित है। आपके लिए हजार वर्जनाएं हैं। उसके लिए कोई वर्जनाएं नहीं है।

चौंक मत जाइएगा अगर आप उसको गिल्ली-डंडा खेलते पाएं। और चौंक मत जाइएगा कभी आप उसको हवाई जहाज़ उड़ाता पाएं। और यह बात ज़रा अजीब लगती है न? अष्टावक्र पायलट है। हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता है। अष्टावक्र कटी पतंग लूटने दौड़ रहे हैं, बिल्कुल हो सकता है। पर यह छवि मन में समाती ही नहीं। अष्टावक्र पतंग लूटकर के हुड़दंग मचा रहे हैं। अष्टावक्र डिस्को थिक में नाच रहे हैं। बात जमी नहीं कुछ। अष्टावक्र किसी डांस बार में नाचती औरत का भी नाम हो सकता है। क्यों स्त्री नहीं हो सकती अष्टावक्र? और ज़रूरी है कि सुशील स्त्री हो? ज़रूरी है कि आपका समाज जिसे मान्यता देता हो वैसी ही स्त्री हो? डांस बार की नृत्यकी अष्टावक्र क्यों नहीं हो सकती?

और देखिए कितना मुश्किल लग रहा है इस बात को पचाना। बिल्कुल हो सकती हैं, पर आप चौंक जायेंगे तुरंत इंकार कर देंगे। जो अभी-अभी निकली है अधनंगी और हो सकता है उसने आधा बोतल चढ़ा भी रखी हो। और कहे आप से बाहर आकर के कि मैं ही हूं अष्टावक्र। और आप उसको देखेंगे, उसका रूप, उसकी वेशभूषा मानेंगे ही नहीं। जनक के दरबार के लोगों ने भी नहीं माना था। हंसे थे, कहते हैं ये आठ जगह से टेढ़ा ये ज्ञान देगा। तो अष्टावक्र मुड़े, जाने लगे। जनक ने कहा जाते कहां हो बेटा। कम उम्र के थे। अब आप तो यह भी न माने कि ग्यारह वर्ष की उम्र का कोई अष्टावक्र हो सकता है। आपके मन में अष्टावक्र की जब भी छवि उठती हैं, यह जानते हुए भी कि ग्यारह की उम्र में उन्होंने उपदेशित किया था जनक को। क्या ग्यारह साल की बच्चे की उठती है? कहिए उठती है? ग्यारह साल का बच्चा ऐसे ही होगा जैसे रिदम(एक बालिका श्रोता)। कि जैसे विधु, माधव। अब बैठाइये यहां रिदम को, बात पचेगी ही नहीं।

रिदम यहां बैठ कर के बता रही है कि हे जनक! सुनो। आप कहोगे ये लो बेटा चिप्स खाओ अभी।

मज़ा ही आ रहा है इनको। ये अभी घर जाएं और माधव कहे थोड़ा बैठिये यहां थोड़ा और समझिए। कहेंगे हटो तुम अभी दूध उधर रखा है पियो जाकर। तो जनक ने कहा रुको बेटा कहां मुड़ के जा रहे हो? तो अष्टावक्र ने कहा मुझे नहीं पता था कि मैं चर्मकारों की सभा में आ गया हूं। क्योंकि आप लोग तो बस चर्म को क़ीमत देते हो। चमड़ा ही दिखाई देता है आपको, तो आप सब चर्मकार हुए। मुझे तो लगा था कि सुधिजन होंगे। आप सब तो बड़े सतही लोग निकले। चमड़े से अर्थ है कि जो आदमी सिर्फ सतह-सतह जानता हो, उसे चर्मकार कह रहे थे। चर्मकार से उनका आशय कोई जाती या धंधा नहीं था। जो मात्र चर्म जानता हो। जो मात्र सतह जानता हो।

जब वास्तविक अष्टावक्र सामने आता है तो वह हमारी नज़र में ही नहीं आता। पकड़ में, पहचान में ही नहीं आता। ग्यारह साल का टेढ़ा-टपरा बच्चा जैसे वो बात अपाच्य थी, वैसे यह बात अपाच्य हैं जो श्लोक संख्या सतर में बोल गए। कि स्थितप्रज्ञ महान भोग विलास में भी रत हो सकता है। यहां तो नियम बने हुए हैं भोगी के विरुद्ध। यहां तो जिसको जितना सूखा देखा उसको उतना आदर मिलता है। महा आदर उनको मिलेगा, ये महाराज इन्होंने दस साल से मुंह नहीं धोया। क्या बात है, क्या बात है। अब तो कम हो गए हैं। अभी कुछ दशकों पहले तब लोग इसी बात पर आदरणीय हो जाते थे कि किसी ने नाखून नहीं काटे हैं बीस साल से, तो नाखूनी बाबा। और उनके नाखून बढ़-बढ़ कर ऐसे ऐसे ऐसे ऐसे (हाथों से इशारा करते हुए) हो गए हैं।

कोई थे जो बीस साल से नहाए नहीं थे। चलते थे खूब चलते थे। अभी भी होंगे कहीं इधर-उधर छुपे बैठे होंगे। जो ज़रा अंधविश्वासी क्षेत्र होंगे वहां पर उनको आदर, सम्मान, दक्षिणा मिल जाता होगा। किसी की खासियत यही थी कि वह बात नहीं करता था, थूकता था बस। आप उससे बात करने आईए आपके ऊपर थूक देगा। लोग बड़े प्रभावित हो जाते थे। क्या बात है, क्या बात है। कहानियों को आदर मिल जाता है ना। किसी के बारे में कहानियां फ़ैला दो आदर मिल जाएगा। फ़ैला दो कहानियां की किसी ने मुर्दे को जिंदा कर दिया। वह हो गया आदर का पात्र। चिलबिल्ले बाबा उनकी खासियत यह थी कि उनके पास जाए तो वो धड़ाधड़ भागते थे दूर। तो वो नज़र ही ऐसे आते थे कि वो भाग रहे हैं। भक्तजन पीछे-पीछे हैं। और होता था कि जो पास जाकर छू ले उसको सिद्धि प्राप्त हो गयी। और दौड़ा रहे हैं भाई, हर तरह के हुए हैं और ऐसे ही हुए हैं। ऐसो को ही तुमने….

अष्टावक्र कह रहे हैं चिन्ह् मत खोजना, निशानी मत खोजना। इन लक्षणों पर मत चले जाना। कर्मों पर मत चले जाना। कुछ करने या न करने से कुछ साबित नहीं हो जाता। यहां तो हम अच्छे से जानते हैं कि किस को सिद्ध पुरुष घोषित करना है। आप चर्चे से पूछो वो कहेगा आपको हम सेंट तब घोषित करेंगे जब पहले साबित हो जाए कि आपने जादू किया है? तो हमें अच्छे से लक्षण पता है जो जादू करे वो सेंट।

अब आपको किसी को सेंट घोषित करना है तो उस बेचारे ने या बेचारी ने जादू न भी किया हो तो आपको जादू खोज कर लाना पड़ता है। अभी हाल ही में हुआ। जादू का आविष्कार किया गया। वो था नहीं कहीं, करो! और जादू भी आप किसको कहेंगे आपको अच्छे से पता है। आप सांस ले रहे हो उसको कभी जादू मानते हो? आप देख पा रहे हो इसको कभी जादू मानते हो? आप हो इसको आप जादू मानते हो? नहीं! जादू भी आप इसी को मानते हो कि आपने किसी का कैंसर ठीक कर दिया। ये जादू हो गया। अब ये जादू है। पगले हो! जिसको यह जादू समझ में नहीं आता कि तुम हो, इससे बड़ा जादू क्या हो सकता है? मिट्टी सांस ले रही हैं इससे बड़ा कोई जादू हो सकता है? तो फ़िर वो ऐसे जादू खोजते हैं कि खोज के लाओ की मदर ने कहीं किसी मुर्दे को ज़िन्दा किया हो। किसी की बीमारी ठीक की हो। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया हो और इनके स्पर्श व आशीर्वाद से उठ बैठा हो। जादू तो है ही पर जादू वैसा नहीं होता जैसी हमने उसकी छवि बना रखी है।

संसार जादू है, बच्चा जादू है, जानवर जादू है, झरना जादू है, आप जादू हो। मैं जो कह रहा हूं आपको पता चल पा रहा है यही जादू है। कभी इस जादू पर ग़ौर किया? कैसे हो पा रहा है कि मैंने कुछ कहा और तुम जान गए कि क्या कहा। मैं सुनने की बात नहीं कह रहा हूं। मैं जानने की बात कर रहा हूं। ये जानना क्या है? ये बोध क्या है? बोध से बड़ा कोई जादू होता है? पर नहीं, तुम अन्य और जादू खोजोगे। क्योंकि हमने स्थितप्रज्ञ के साथ, हमने ज्ञानी के साथ लक्षण जोड़ रखे हैं। जो मुर्दों को जला दें वह ज्ञानी। आसान है ज्ञानी बनना। दो-चार लोग ढूंढ के लाओ और पिटवा दो ढिंढोरा कि ये हैं जिन्होंने मुर्दा ज़िन्दा किया है। मैं सोचता हूं किसी दिन कर ही दिया जाए। बड़ा मज़ा आएगा। जब सब चले जाएंगे तब अपन ताली पीट के हसेंगे। तुम मर जाना ठीक है। आप रोते हुए आइएगा। फ़िर तभी तुम्हें याद आना चाहिए कि अरे आचार्य जी हैं। बड़े पहुंचे हुए ज्ञानी हैं, उनको बुलाते हैं। फ़िर आचार्य जी आएंगे, ऐसे ऐसे करेंगे। फ़िर कहेंगे न, यह मामला बड़ी दूर का है, इसमें नहीं हो सकता। स्वयं यमराज आ कर के इसकी आत्मा को खोखे में बंद कर के ले गए हैं। बड़ी जुगत लगानी पड़ेगी। सब सिफ़ारिश चलेगी। फ़िर महाराज बैठेंगे समाधि में, घोर समाधि में। फ़िर कुछ भी उटपटांग बकेंगे। दो-चार बार थूकेंगे। फ़िर बच्चे के सर में मारेंगे दो-तीन बार। और बच्चा अचानक उठ जाएगा। हो गया!और जैसे ही बच्चा उठकर बैठेगा पांच-छः खरगोश आएंगे कहेंगे आयुष्मान भवः। खरगोशों का सामूहिक कीर्तन। विधमा जी के नेतृत्व में। हो गया बस सिद्ध पुरुष। अष्टावक्र कह रहे हैं इन बेवकूफियों में मत पड़ जाना। ऐसे नहीं होता।

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