जिसकी ओर बढ़ रहे हो, उसे दिल में बसाकर बढ़ना || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)

बुल्लिआ हिजरत विच्च इस्लाम दे मेरा नित्त है खास आराम। नित्त नित्त मराँ ते नित्त नित्त जीवाँ मेरा नित्त नित्त कूच मुकाम।
मैं भी हज़रत पैगम्बर की तरह हिज़रत करता हूँ, यात्रा करता हूँ, लेकिन मेरी यात्रा ऐसी है जो तब शुरु होती है, जब मैं बिलकुल शान्त, आराम, विश्राम की हालत में होता हूँ। मेरा मंज़िल की तरफ सफ़र ऐसा है कि मैं रोज़ मरता हूँ, रोज़ जी उठता हूँ क्योंकि भीतर की यात्रा ही कुछ ऐसी है जिसमें जीना-मरना साथ-साथ है।
~ बाबा बुल्लेशाह
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, बाबा बुल्लेशाह कहते हैं कि मेरी यात्रा ऐसी है कि वो तब शुरू होती है जब मैं बिलकुल शान्त, आराम की अवस्था में होता हूँ। परन्तु मेरी यात्रा जैसी है और जब से शुरू हुई है, वो शान्ति और आराम की हालत में तो नहीं चल रही है। तो क्या मेरे भीतर की यात्रा अभी शुरू भी नहीं हुई है?
भीतर की यात्रा ही कुछ ऐसी है जिसमें जीना-मरना साथ-साथ है। आचार्य जी, साथ-साथ जीने-मरने की मन की यात्रा कैसे की जा सकती है? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: इन पंक्तियों को थोड़ा समझेंगे। जो अर्थ आपने लिखकर के भेजा है, अर्थ उससे थोड़ा ज़्यादा गहरा है। चलिए, कोई बात नहीं।









