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मुक्ति से भी मुक्ति
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।

सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥

~ अष्टावक्र गीता

( अध्याय १८ श्लोक १४ )

अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?

आचार्य प्रशांत: मन अद्वैत को भी द्वैत के एक सिरे के ही तरह लेता है। मन अद्वैत का भी ध्यान तब करता है, अद्वैत की भी बात तब करता है जब उसे द्वैत से मुक्ति चाहिए होती है। तो द्वैत के तो दो सिरे होते ही हैं। और अगर उन दोनों सिरों वाले युग्म को हम एक इकाई मान लें, उस जोड़े को अगर हम एक इकाई मान लें तो मन उस एक इकाई के जोड़े की तरह अद्वैत को स्थापित कर देता है। तो द्वैत को अगर आप एक इकाई मानें तो मन कहता है द्वैत का द्वैत जोड़ा हुआ अद्वैत। ये उसकी लाचारगी भी है, ये उसकी प्रकृति भी है, यही उसकी सीमा है और यही उसका कष्ट है। इसके अलावा और वो कुछ कर नहीं सकता। तो अष्टावक्र हमें उस सब से भी मुक्ति दिला देना चाहते हैं जो हमारे लिए मुक्ति का पर्याय है।

मन साधारणतः तो फसा रहता है द्वैत में। द्वैत से मुक्ति चाहता है तो जा के फस जाता है अद्वैत में। अष्टावक्र द्वैत से तो मुक्ति दिला ही रहे हैं पर उस मुक्ति के फलस्वरुप वो किसी और झंझट में फंसने की छूट नहीं दे रहे। वो ये नहीं कह रहे कि विचलन से छूटे तो जाकर के ध्यान में फस गए। वो ये नहीं छूट दे रहे कि संसार से छूटे तो सन्यास में फस गए। नहीं तो मन मुक्ति के नाम पर बस पिंजड़ों के रूप बदलता जाता है, आकर बदलता जाता है, नाम बदलता जाता है। बड़ा पेड़ा पा जाने से मुक्ति थोड़े ही हो जाती है।

अष्टावक्र हमें बंधन से तो मुक्ति दिला ही रहे हैं, वो हमें मुक्ति से भी मुक्ति दिला रहे हैं। बंधन तो बंधन होता ही है। मुक्ति बंधन से ज़्यादा बड़ा बंधन हो जाती है। और अगर ध्यान से देखा जाए तो कोई भी बंधन, बंधन तभी बन पाता है जब उसने नाम मुक्ति का पहन रखा हो। विशुद्ध मुक्ति है हर प्रकार की मुक्ति से भी मुक्ति, विशुद्ध मुक्ति है जब मुक्ति का नाम लेने की भी जरूरत ना पड़े, विशुद्ध मुक्ति है जब आप ऐसे मुक्त हुए कि अपने आप को इस उपाधि से भी मुक्त कर दें कि आप मुक्त हैं। हर उपाधि एक सीमा होती है, हर उपाधि एक विशिष्टता होती है, हर उपाधि कुछ होती है। अष्टावक्र कुछ भी होने से आजादी दे रहे हैं। तो वो कह रहे हैं जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?

जिसके लिए अज्ञान नहीं है, जिसके लिए विश्व नहीं है वो करेगा क्या अब ध्यान और मुक्ति लेकर के? वो सब कुछ जो हमें अध्यात्म के नाम पर भाता हैं, वो सब कुछ जो हमें परमात्मा के नाम पर लुभाता है, वो हमें आकर्षक इसीलिए लगता है क्योंकि हम डरे हुए होते हैं, हम भ्रम में होते हैं, हम अज्ञान में होते हैं।

अपने जीवन पर ग़ौर करें। ध्यान की सुध आपको क्या शांति में आती है। शांति की तो याद ही तब आती है जब आप क्रोध में होते हैं या भ्रम में होते हैं या बेचैनी में होते हैं या उत्तेजना में होते हैं।

जो शांत है ही वो शांति को क्यों याद करेगा?

उसको न शांति की स्मृति रहेगी, न मन में शांति का विचार। वास्तव में किसी भी चीज़ की स्मृति, विचार या ज्ञान के लिए उससे दूरी चाहिए। ये मन की हर गतिविधि की सीमा है। ये मन की प्रकृति है। जो है वो मन में नहीं आ सकता, मन में वही उठेगा जो है नहीं। समस्त चेतना द्वैतात्मक होती हैं, वो उसी को देख पाती है जिससे दूरी है। जब आप डरे होते हो, जब आप मोह में या लालच में होते हो तभी तो परमात्मा की याद आती है ना। जब आप मौन होते हो, गहराई से संतुष्ट क्या तब भागते हो मंदिर की ओर।

अष्टावक्र कह रहे हैं जिसके जीवन से ताप चला गया उसके जीवन से तपस्या भी चली जाएगी। जिसके जीवन से पाप चला गया उसके जीवन से परमात्मा भी चला जाएगा। क्या करेगा वो अब परमात्मा की याद करके। क्या करेगा वो परमात्मा की सुध ले करके। पुण्य उसे अब करना क्यों है? पुण्य तो तभी तक आकर्षित करता था जब तक पाप था। और पाप और पुण्य दोनों से ही मुक्ति तभी तक आकर्षित करती थी जब तक दोनों में कोई सार्थकता प्रतीत होती थी। पुण्य से भागना होता था तो पाप की ओर आते थे। पाप से भागना होता था तो पुण्य कर आते थे। पाप, पुण्य दोनों से भागना होता था तो परमात्मा दिखाई देता था।

अष्टावक्र कह रहे हैं जो समस्त संकल्पों की सीमा पर जाकर के बैठ गया है। समस्त संकल्पों की सीमा हुई - मन की सीमा। जिसने मन की सीमा को ही पहचान लिया है, अब वो क्या करेगा मन की सीमा के अंदर किसी गतिविधि का आसरा रख के। आसरा तो अपने से बड़े वालों का रखा जाता है ना? मन के भीतर जो है उसका सहारा वो क्यों लेगा जो मन की कगार पर आकर खड़ा हो गया है। अब उसको ये सब बातें आकर्षित नहीं करती हैं।

जब जान लिया कि अज्ञान मात्र ज्ञान का घनीभूत रूप है तो अब कौन ज्ञान की और भागेगा। जब जान लिया कि जैसे मानसिक विक्षेप पाप बन जाते हैं, पुण्य बन जाते हैं ठीक उसी तरीके से तरंगे कभी-कभी परमात्मा कहला जाती है; मानसिक तरंगे। तो अब कौन परमात्मा की ओर भागेगा। उसने स्पष्ट देख लिया है कि डरे ना होते तो ना ग्रंथ की ओर जाते, ना गुरु की ओर जाते। ग्रंथ और गुरु और कुछ है ही नहीं, डर की प्रतिक्रिया ही हैं, छाया है। जिससे लड़ रहे हो उसी की छाया का सहारा लेकर के लड़ोगे क्या? सहारा तो किसी ऐसे का लेते है ना जो मुक्त हैं? छाया का अर्थ समझते हो जो किसी व्यक्ति के साथ, वस्तु के साथ, छवि के साथ साथ चलती हो।

मैं कह रहा हूं हमारे लिए भगवत्ता, परमात्मा, सत्य ये सब राग, द्वेष, लोभ आदि की छाया है। तुम्हें कुछ चाहिए होता है तो तुम्हें भगवान याद आता है। है कि नहीं? तो भगवान कौन हुआ; लोक की छाया। ज़्यादा ईमानदारी की बात तो ये होगी कि लोक को ही खोज निकालो। लालच के साथ रह लो, उसी को समझ लो। अष्टावक्र भागने के सारे रास्ते बंद किए दे रहे हैं। वो कहते हैं न ज्ञान, न विश्व, न ध्यान,न मुक्ति। अज्ञान सताता है और जब अज्ञान सताता है तब जो कष्ट मिलता है वो स्थूल होता है। जब विश्व सताता है तब भी जो कष्ट मिलता है वो स्थूल होता है। विश्व बाहर का है ना। चोट लगती है, दर्द होता है, अज्ञान होता है तो बात ज़ाहिर हो जाती हैं, जगह जाहि होती है। तो ये सब पकड़ में आ जाते हैं कि कहीं कोई कमी है। संसार से बहुत बंधा चोट लगी, कहीं कोई कमी है।

आंखें पकड़ लेती है, अनुभव पकड़ लेते हैं। लेकिन जब कोई ध्यान से और मुक्ति से बंध हो जाता है तब जो नुकसान हो रहा होता है वो सूक्ष्म होता है। वो अक्सर पकड़ में नहीं आता। चूंकि वो पकड़ में नहीं आता इसीलिए वो भीतर-भीतर पलता रहता है, वो चलता रहता है।

अष्टावक्र के सामने जो है वो स्थूल खतरों से तो स्वंय ही निपट लेंगे, वो जनक हैं? सुक्ष्म खतरों से अष्टावक्र उन्हें आल्हा किए दे रहे हैं कि कहीं फस ना जाना। ये जो सुक्ष्म खतरे हैं ये स्थूल वालों से कहीं ज़्यादा खतरनाक हैं। मुक्ति के पिपासु मत बन जाना। मुक्ति से तादात्म्य मत बैठा देना। फर्क नहीं पड़ता तुमने किससे तादात्म्य बिठाया, फर्क नहीं पड़ता कि तुम किसके साथ जुड़ गए, फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे विचारों में क्या आने लग गया, फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे मन में क्या घूमने लग गया; कहीं तो जाकर के अटक गए ना।

जहां ही जाकर के अटके वहीं तुम्हारा नर्क है।

छूटते-छूटते-छूटते अंततः जहां जा करके तुम्हें अटकना है अष्टावक्र तुम्हें उस जाल से भी आज़ाद किए देते हैं। बंधन तो बुरा लगता ही है तो वहां से छूटना और छूटने की अभिलाषा थोड़ी सहज होती है। पर मुक्ति बड़ी गौरवान्वित होती है। मुक्ति के साथ बड़े किस्से जुड़े होते हैं, बड़ी आशाएं जुड़ी होती हैं, बड़ी गरिमा जुड़ी होती है। मुक्ति का पूरा एक भव्य माहौल होता है उससे छूट पाना मुश्किल बात है। जो कुछ आपको बांध रहा हो और वो स्पष्टतः बंधन ही हो और वो भी कुरूप बंधन, ऐसा कुछ देखते ही जुगुप्सा जगे तो कौन बंधेगा। बंधते आप तभी होना जब जो बांध रहे हो वो आकर्षक हो। जब जो बांध रहा हो उसका सुंदर नाम हो, महिमामंडित हो, उसके गीत गाए हो, गुरुओं ने ग्रंथों ने उसकी स्तुति की हो।

अब आप बता दीजिए, अब आप बंधन में बंधोगे या मुक्ति में बंधोगे। बंधन में कौन बंधेगा? बंधन को तो आप देखोगे तो कहोगे जा तू, तू बंधन है हम तुम्हें जानते हैं तू जा। मुक्ति आएगी और आप मुक्ति के लिए अपने सारे कपाट खोल दोगे। अब कहोगे तू बड़ी चीज़ है। हमें हमेशा से बताया गया है और उन्होंने बताया है जो कभी किसी और की वंदना नहीं करते, जो कभी किसी और की अनुशंसा नहीं करते। उन्होंने हमसे कहा है कि पूरा ज़माना छोड़ देना संसार की किसी चीज़ पर हाथ मत रखना, बस मुक्ति कीमती है। तो हमें मुक्ति का मूल्य ऐसो ने समझाया है जिन्होंने बाकी सब कुछ मूल्यहीन समझा। हमारे पास कारण है उन पर विश्वास करने का। मुक्ति निःसंदेह बहुत बड़ी बात होनी चाहिए। तो मुक्ति के लिए तुम अपने सारे दरवाजे खोल दोगे और फसोगे। आप जब भी फंसे हैं मुक्ति की आस में ही फंसे हैं, एक और गलती मत कीजिएगा।

आप जिन भी बंधनों में हैं वो नाम मुक्ति का लिए हुए हैं, देख लीजिएगा। अष्टावक्र आपसे कह रहे हैं मुक्ति स्वयं मुक्ति का नाम लेकर के नहीं आती। मुक्ति कभी कोई नाम लेकर के नहीं आती। मुक्ति कभी आती ही नहीं। जब भी कोई मुक्ति का नाम लेकर के आए जान लेना बंधन है। मुक्ति कभी आएगी ही नहीं तो वो क्या नाम लेकर के आएगी। ये प्रश्न ही निरर्थक हैं। मुक्ति आने जाने वाली शय नहीं है। मुक्ति कभी कोई वादा करेगी ही नहीं, तो उसने क्या वादा किया ये पूछना ही व्यर्थ है। जो वादा करें उसी को बंधन जानना, जो आए उसी को बंधन जानना, जिसका भी कोई नाम हो उसे ही बंधन जानना। जो विकर्षक लगे उसको भी जान लेना कि लग रहा है, तो मानसिक है। और जो आकर्षक लगे तो जान लेना लग ही भर रहा है, मानसिक है।

जो मुक्ति अपना एहसास कराती हो वो मुक्ति नहीं है। जो मुक्ति कहीं से आई है वो मुक्ति कहीं को चली भी जानी है, वो मुक्ति नहीं है।

अष्टावक्र कह रहे हैं ऐसी मुक्ति को दूर से ही नमस्कार करो और विदा कर दो; हमें नहीं चाहिए। मुक्ति स्वंय कभी मुक्ति का नाम लेकर के नहीं आएगी। बंधन ही आएंगे मुक्ति का जामा ओढ़ के। कौन बंधन गुरुर के साथ घोषित करेगा कि वो बंधन हैं। बंधन की इतनी औकात कहां। बंधन मुक्ति का नाम लिए बिना एक कदम चल नहीं सकता। और ये बात मुक्ति की शान के खिलाफ है कि वो अपना नाम ले।

तुम्हें जिसने भी फसाया है उसने तुम्हें यही कहकर फसाया है कि वो तुम्हें आज़ादी देगा।

जो कुछ भी तुम्हें खींचता है, तुम्हारे मन में हावी हो जाता है वो कहीं ना कहीं तुम से आकाश का वादा ज़रूर करता है। कभी बड़े आकाश का, कभी छोटे आकाश का, कभी नीले आकाश का, कभी गुलाबी आकाश का। कान ही मत धरना कि वादे को कैसे कहा गया है, कैसे वर्णित है। वादे की भाषा पर ग़ौर ही मत करना। विवरण क्या है ये पढ़ने भी बैठे तो फसे। क्योंकि लोभ ना होता तो पढ़ने में भी रस क्यों पाते। शैतान के तो पूंछ है, दूर से ही पकड़ में आ जाएगा। आप भगवान से बचिए। आप जिसे भगवान जानते हैं वो बस शैतान ही है जिसने पूंछ छुपा ली है। जो वास्तविक भगवान है वो तो न चिन्हित हो सकता है, न चित्रित। उसका तो कोई रूप, रेखा, रंग हो नहीं सकता। उसकी तो बात ही व्यर्थ है। और आप जिसे भगवान जानते हैं जान लीजिएगा वो शैतान मात्र हैं। ग़ौर से देखोगे तो पूंछ भी दिख जाएगी।

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