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वहीं मिलेगा प्रेम
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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"मुक्ति के लिए अपने मन से वस्तुओं के उपभोग की इच्छा को विष की तरह त्याग दो, क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन करो" ~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १, श्लोक २

आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र गीता, पहला अध्याय, दूसरा श्लोक।

अष्टावक्र दया की बात क्यों कर रहे हैं? अष्टावक्र कह रहे हैं कि, "यदि मुक्ति की इच्छा हो मेरे बच्चे तो इन्द्रियों के विषयों का परित्याग करो जैसे वो विष हों और क्षमा, आर्जव, दया, संतोष एवं सत्य का पान करो।" तो प्रश्न है कि दया की बात क्यों करी है, क्या अर्थ है दया का?

बातचीत अभी शुरू हो रही है। गुरु-शिष्य मिले हैं। बस पहला ही सोपान है अभी। कोई ऊँचाईयाँ नहीं हाँसिल हुई हैं। पहला अध्याय, दूसरा श्लोक है। अभी तो अष्टावक्र बस ये देख रहे हैं कि क्या है जो शिष्य के मन को आच्छादित ही किए हुए है, मन पर चढ़ा ही बैठा है, मन को ढके हुए है। तो वो कह रहे हैं कि वो सब विचार, ख़्याल, वो सारी बातें, वो सारे भाव जो तुम्हारे मन से उतरते ही नहीं हैं, जिनके बारे में तुम दिन-रात सोचते हो, जो लगातार चक्कर काटते रहते हैं भीतर, सबसे पहले तो ज़रा उनके प्रति चेत जाओ। जनक अभी 'मुक्ति' शब्द का आत्यंतिक अर्थ समझते भी नहीं हैं! उनके पास तो मुक्ति का बस एक ख़्याल है, उसको लेकर के वो आ गए हैं अष्टावक्र के पास और प्रार्थना करी है कि, "गुरु, मुक्ति चाहिए!"

जब शिष्य आता है गुरु के पास और कहता है, "मुक्ति चाहिए" तो कृपया ये न समझें कि कोई खरीदार किसी दुकानदार के पास आया है कि दाल-चावल चाहिए।

अंतर क्या है? खरीदार दुकानदार के पास आता है तो उसे पता होता है उसे क्या चाहिए और उसे उसके अतिरिक्त कुछ और दिया भी नहीं जा सकता। क्योंकि वो जो लेने आया है वो उसको लेने के बाद भी वही रहेगा, बस उसको हाथ में एक सामान, एक वस्तु की भाँति इकट्ठा करके वापस लौट जाएगा।

गुरु के पास जब शिष्य आता है तो वास्तव में उसे पता भी नहीं होता वो क्या लेने आया है! पर चूँकि कुछ तो कहना ही है तो कह देता है, "मुक्ति लेने आया हूँ।" कोई ये न सोचे कि मुक्ति दाल-चावल है कि वो ठीक-ठीक बता पाएगा कि, "गुरु मुझे मुक्ति चाहिए और मुक्ति ये-ये, ऐसी-ऐसी होती है।" शिष्य अगर इतना ही जानता होता कि मुक्ति क्या चीज़ है तो मुक्त ही होता। वो तो वो कुछ भी आकर के यूँ ही बोल देता है और गुरु बहुत ज़्यादा महत्त्व भी नहीं देता कि ये बोल क्या रहा है। वो आकर बड़बड़ा सा रहा है, "प्रेम चाहिए, आनंद चाहिए, मुक्ति चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए।" उसने कहा, "ठीक है, ठीक है! जो चाहिए मिलेगा, अभी तू बैठ जा!" अब बोल दें कि नहीं मिलेगा तो भग ही जाएगा। तो कह दिया जाता है कि, "ठीक है मिलेगा, बोल क्या चाहिए? प्लेसमेंट (नौकरी) चाहिए तो वो भी मिलेगा, बैठ जा, बैठ जा! तू बैठ तो जा एक बार!"

तो अष्टावक्र बोलना शुरू करते हैं। कहते हैं, "देखो! अगर मुक्ति चाहिए तो ये इन्द्रियों के जितने विषय हैं इनको विषवत जानना और क्षमा का, आर्जव का (आर्जव माने सरलता), दया का, संतोष का और सत्य का पान करना।" आप ये भी न सोचिए कि जनक को क्षमा या दया या आर्जव या सत्य का भी आत्यंतिक अर्थ पता है। जैसे उन्हें मुक्ति का कुछ नहीं पता ऐसे ही उन्हें इसका भी कुछ नहीं पता। अभी तो बात ऐसे चल रही जैसे कोई आसमान से बोल रहा हो किसी धरती वाले से। उसके लिए बातों के अर्थ ही अलग हैं, ये धरती पर हैं। संवाद हो पा रहा है यही चमत्कार है। बातचीत हो पा रही है यही बड़ी विरलता है।

असल में ये सब भाषा का धोखा है। गुरु जानबूझ कर ये धोखा कायम रखता है ताकि शिष्य को लगे कि उसकी बात समझी जा रही है। नहीं तो जब शिष्य बोलता है 'प्रेम' और जब गुरु बोलता है 'प्रेम' तो दोनों एक ही बात थोड़े ही कह रहे हैं! जब दोनों अलग-अलग बातें हैं तो दोनों के लिए अलग-अलग शब्द भी होने चाहिए। पर भाषा का धोखा ये है कि वो ज़मीन के लिए और आसमान के लिए शब्द एक ही रख लेती है। ये बड़ा अच्छा धोखा है, बड़ा प्यारा धोखा है, बड़ा उपयोगी धोखा है। इसी के कारण कोई किसी की मदद कर पाता है।

तो सत्य क्या है ये जनक नहीं जानते! शून्यता क्या है ये भी जनक नहीं जानते! आर्जव क्या है ये भी जनक नहीं जानते। लेकिन जनक का मन इनसे हट कर के बाकी चीज़ों से तो भरा ही हुआ है न। प्रेम क्या है ये जनक नहीं जानेंगे लेकिन मोह और घृणा क्या है ये जनक ज़रूर जानेंगे। समझो बात को। जनक का मन मोह और घृणा से तो भरा ही हुआ है। सत्य क्या है ये जनक नहीं जानेंगे लेकिन मिथ्या क्या है और तथ्य क्या है इन बातों से तो जनक का मन भरा ही हुआ है। द्वैत में जो कुछ होता है उससे तो शिष्य का मन भरा ही हुआ है न। शिष्य संसार से ही तो उठकर आ रहा है। अब भाषा की प्यारी विडंबना ये है कि भाषा में घृणा का द्वैत विपरीत मोह नहीं है, प्रेम है। समझो बात को!

एक संसारी की भाषा में घृणा का विपरीत है प्रेम। और एक ज्ञानवान की भाषा में घृणा का विपरीत है आसक्ति, मोह। जो जानता है उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा और मोह दोनों से हट के है। जो नहीं जानता उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा का विपरीत है।

अब गुरु को बड़ी सुविधा है। गुरु को अगर ये कहना पड़ता कि, "द्वैत की दुनिया को छोड़ कर तू ज़रा अद्वैत में आ जा" तो शिष्य को न कुछ समझ में आता, न शिष्य को भरोसा आता और न शिष्य गुरु के पास आता। पर भाषा ने काम आसान किया है। अब गुरु को बस इतना बोलना है कि, "तू एक काम कर, तू घृणा छोड़ दे!" या, "तू एक काम कर, तू प्रेम का पान कर।" शिष्य को लगेगा, "ठीक, ये तो ठीक बोला। बात जो भी कही वो मेरे क्षेत्र के भीतर की कही। मुझ से क्या कहा गया है, प्रेम कर। प्रेम तो मैं जनता हूँ। प्रेम क्या है, घृणा का विपरीत।" या, "मुझ से क्या कहा गया है, घृणा छोड़ दे। घृणा भी मैं जानता हूँ। घृणा क्या है, वो जिससे मेरा मन भरा रहता है।" तो शिष्य को लगता है, "ठीक है, मैं कर देता हूँ।"

अब शिष्य चूँकि शिष्य है, नादान, तो वो एक बात नहीं समझता कि द्वैत का एक सिरा कभी छूटता नहीं। जो तुमसे घृणा छुड़वा रहा है वो तुमसे आसक्ति भी छुड़वा रहा है। अष्टावक्र कह रहे हैं, "ऐसा करो क्षमा का पान करो!" क्षमा का पान करो का अर्थ होता है कि बदला, स्पृह, मत्सर ये सारे भाव जो मन में भरे हुए हैं इन्हे छोड़ो, इन्हे छोड़ो। राजा हैं जनक, हज़ार नियम बनाते हैं। उन नियमों को फ़िर तोड़ने वाले भी होते हैं। इतने शत्रु हैं उनको जीतना है। ये कह रहे हैं, "छोड़ो, वो सारी बातें जो मन में भरी हुई हैं उनको छोड़ो, क्षमा की ओर आओ।" जनक अगर सुन रहे हैं 'क्षमा' तो जनक के लिए 'क्षमा' का अर्थ है बदले की भावना ख़त्म करो; प्रतिकार नहीं करना है। जनक के लिए क्षमा का इतना ही अर्थ है। और अभी इतने से ही शुरुआत की जा सकती है कि द्वैत का एक सिरा छोड़ो। "एक छोड़ेगा दूसरा अपने आप छूट जाएगा फ़िर तू दोनों से छूट कर के वास्तविक क्षमा में प्रवेश करेगा।"

अभी समझिए आप। अभी अष्टावक्र जिस क्षमा को जानते हैं जनक उस क्षमा को जानते ही नहीं। जनक क्षमा बस इतनी जानते हैं कि किसी से बदला लेने का मन कर रहा था, मैंने बदला नहीं लिया तो इसको माफ़ी कहते हैं। जनक इतनी ही क्षमा जानते हैं।

अष्टावक्र के लिए क्षमा का कुछ और अर्थ है। उनके लिए क्षमा का अर्थ है ऐसा हो जाना कि क्षमा करने की ज़रुरत ही न पड़े। ऐसा हो जाना कि चोट ही न लगे। उस अटूट में स्थित हो जाना जिसमें दरार पड़ती ही नहीं। तो अब कोई कितनी भी चोट पहुँचाता रहे, हमें बदला क्या लेना है, हमें चोट लगती ही नहीं! ये अर्थ अष्टावक्र के लिए है, जनक ये अर्थ नहीं जानेंगे। लेकिन जो अष्टावक्र के वचन हैं वो जनक के लिए, नए-नवेले शिष्य के लिए सुविधापूर्ण हैं। ये उपाय है गुरु का, कि अभी-अभी आया है इसको तो कोई सरल काम ही दो जिससे ये शुरुआत कर सके। तो उसको ये काम दे दिया गया है कि, "भाई संतोष का पान करो, राजा हो।" राजा को पता है कि उसकी इच्छाएँ पूरी होती हैं। जब बड़ी इच्छा पूरी होती है तो इच्छा और बड़े की हो जाती है।

राजा को ज़रूरी है ये कहना कि, "तुम संतोष का पान करो" क्योंकि राजा की इच्छाओं का कोई अंत नहीं हो सकता। तुम्हारी जो इच्छाएँ होंगी राजा की इच्छाएँ तुमसे सौ गुना बड़ी होंगी क्योंकि निन्यानवे तक वो पहले ही पहुँचा हुआ है। तो उसको बोला, "तू संतोष कर ले, तेरा मन इच्छाओं से भरा हुआ है।" संसारी मन के लिए इच्छा होती है, नहीं तो अनिच्छा होती है। समझो बात को। या तो मेरा कुछ करने का मन है या मेरा वो करने का मन नहीं है। मनातीत को मैं जानता नहीं।

तुम को कोई काम बताया जाए तो तुम्हारे पास दो ही उत्तर होंगे। तुम कहोगे, "मेरा करने का मन है।" या तुम कहोगे कि, "मेरा करने का मन नहीं है।" इन दो के अलावा एक तीसरा जवाब भी हो सकता है वो तुम जानते नहीं। गुरु उस तीसरे जवाब में स्थित होता है। पर उस तीसरे में शिष्य आ सके इसके लिए पहले उसको इन्हीं एक-दो में घुमाना पड़ता है। एक-दो में ऐसे घुमाना पड़ता है कि एक-दो ज़रा साफ़ ही हो जाएँ। फ़िर उसको तीसरे में खींचा जा सकता है कि, "अब तू आ! एक-दो से मुक्त हुआ अब ज़रा तीन में पहुँच।" यही कारण है कि इस विधि का गुरुओं ने खूब उपयोग किया है।

कुछ सूफ़ियों ने कहा कि, "इश्क़-ए-मज़ाज़ी इश्क़-ए-हक़ीक़ी की सीढ़ी बन जाता है", वो ऐसे ही कहा। कहा कि, "तुम से हम जब बोलते हैं 'प्रेम', तो तुम प्रेम का एक ही अर्थ जानते हो - किसी दूसरे इंसान के प्रति खिंचाव। तो चलो तुम ऐसा करो तुम वही कर डालो, हम नहीं ऐतराज़ करते। तुम माँ-बेटे का या भाई-भाई या दोस्त-यार या प्रेमी-प्रेमिका, तुम ये ही खेल डालो। जितनी जान है उतनी जान से खेलो। ये खेल तो तुम हार जाओगे पर ये खेल तुम्हें थका-थका कर कहीं और पहुँचा देगा।" ये खेल ऐसा नहीं है जो कोई भी जीत सके। इश्क़-ए-मज़ाज़ी हमेशा हारेगा क्योंकि जो तुम खोज रहे हो वो तुम्हें किसी इंसान में मिल ही नहीं सकता। तो इसीलिए जो तुम अपने प्रेम प्रसंग बनाने निकलते हो उन्हें असफल होना-ही-होना है। लेकिन वो असफलता तुम्हें किसी दूसरे खेल में जिता देगी। तो सूफ़ी कहते हैं, "ठीक! तुम जाओ! ये ही कर लो।"

तुम रूमी के वचन देख लो या कभी-कभार जीसस के भी। जब वो प्रेम की बात करते हैं तो जो बात आदमी और परमात्मा के लिए कही जानी चाहिए वो ऐसे कही होती है कि आदमी और औरत के लिए भी उपयुक्त हो जाती है। ये संयोगवश नहीं है, ये गुरु की बहुत गहरे बोध से उठी हुई विधि है। या मीरा! मीरा जिस भाव से कृष्ण के लिए गाती हैं, कोई प्रेमिका अपने शरीरी प्रेमी के लिए भी ऐसे ही गा सकती है। ये भी विधि ही है कि तुम इसी भाव से किसी इंसान को भी पुकार लो। इंसान से तो बहुत नहीं पाओगे, वहाँ तो हारोगे लेकिन कुछ और मिल जाएगा। बात आ रही है समझ में?

अनाड़ी मन जो होता है उसके लिए ज़मीन का प्रेम ज़मीन से बंधे रहने की ज़ंजीर बन जाता है। और जो ज्ञानी होता है उसके लिए ज़मीन का प्रेम आसमान में उड़ने के पंख बन जाता है। अनाड़ी मन के लिए 'तथ्य' सिर्फ एक बंद कोठरी रह जाते हैं, मुर्दा तथ्य। और जागृत मन के लिए यही तथ्य सत्य का द्वार बन जाते हैं। ज़मीन तुम्हारा बंधन भी है और तुम्हारा अवसर भी। इसी से चिपके रह गए और ध्यान न दिया और समर्पित न हुए तो इससे बड़ा बंधन नहीं है। संसार महा-बंधन है पर यही संसार मुक्ति का अवसर भी है। सब कुछ तुम पर निर्भर करता है।

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