जो सीखने को तैयार है, उसके लिए तो समूचा अस्तित्व ही गुरू है। पर तुममें पहले सीखने की वो महत् आकांक्षा तो उठे। पहले तुम ये मानो तो, कि जीवन बड़ा सूना है, बड़ा व्यर्थ जा रहा है, तुम्हारे भीतर एक छटपटाहट तो उठे। तुम तो झूठे संतोष में जी रहे हो, तुम तो माने बैठे हो कि ये तो ठीक है, मुझे पता ही है। हाँ! हाँ! ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, सब ठीक है। मस्त रहो! बस ऐसा है, सन्तुष्ट रहो, “संतोषं परमं धनम्।” जिसमें तड़प नहीं है, उसके लिए तो अध्यात्म की शुरुआत ही नहीं हो सकती।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के संवाद में हम देखते हैं कि ऋषि दो-तीन श्लोक बोलते हैं और जैसे राजा जनक के भीतर शून्यता उतरने लगता है। तो इससे हम ये समझें कि अगर किसी को समझाना हो तो शब्द का सहारा ही लिया जा सकता है, या फिर वो तरीका कि जैसे कहानियों में हम पढ़ते हैं कि गुरु ने हाथ पकड़ा और शिष्य को परम ज्ञान मिल गया?
आचार्य प्रशांत: समझने वाले तो कैसे भी समझ जाते हैं। पेड़ से एक पत्ता गिर रहा था, लाओत्ज़ू वहाँ खड़े हैं, वो पत्ते को गिरता देख रहे हैं, और बिल्कुल बोध तरंगित हो गया भीतर। कुछ नहीं है, हवा में तैरते एक पीले पत्ते को देखकर!
जो बिल्कुल प्रस्तुत हो, तैयार हो, खड़ा हो सीखने को, उसका तो हो ही जाता है। अवधूत से पूछोगे, वो कहेगा, ‘मैंने बहेलिये से सीख लिया, मैंने मछली से सीख लिया, मैंने शिकारी से सीख लिया, मैंने कबूतर से सीख लिया, मैंने अजगर से सीख लिया।’ जिस-जिस से सीखा जा सकता था, उसने सबसे सीख लिया।
जो सीखने को तैयार है, उसके लिए तो समूचा अस्तित्व ही गुरू है। पर तुममें पहले सीखने की वो महत् आकांक्षा तो उठे। पहले तुम ये मानो तो, कि जीवन बड़ा सूना है, बड़ा व्यर्थ जा रहा है, तुम्हारे भीतर एक छटपटाहट तो उठे। तुम तो झूठे संतोष में जी रहे हो, तुम तो माने बैठे हो कि ये तो ठीक है, मुझे पता ही है। हाँ! हाँ! ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, सब ठीक है। मस्त रहो! बस ऐसा है, सन्तुष्ट रहो, “संतोषं परमं धनम्।” जिसमें तड़प नहीं है, उसके लिए तो अध्यात्म की शुरुआत ही नहीं हो सकती।







