
अविवेकी जीव के मन में, ‘मैं’ और ‘मेरे’ का विचार उठता है, फिर रजस मन पर छा जाती है, उस मन पर जो वास्तव में, मौलिक रूप से सात्विक है।
~ उद्भव गीता, अध्याय १८, श्लोक ९
प्रसंग:
रज का क्या अर्थ होता है? अविवेकी आदमी "मै" का भाव क्यों…

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।

आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।

काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।

मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।

आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।

आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।

शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।

एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।

धर्म तो सबसे ऊँची बात होनी चाहिए न? तो धर्म के नाम पर ऐसे काम क्यों कर रहे हो, जो एक छोटे बच्चे को भी दिख रहा है कि गलत है? और सबसे खौफ़नाक बात ये है, कि हमारे बच्चों को धीरे-धीरे झटका लगना बंद हो जाता है। वो इसी माहौल के हो जाते हैं, रच-बस जाते हैं। ज़िंदगी हिसाब करेगी, जवाब माँगेगी और तब लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

मुक्ति का मतलब ये नहीं है कि किसी को छूना नहीं है; नदी से कहना है, दूर हट, मैं पुरुष हूँ, तू प्रकृति है। आ गई भ्रष्ट करने बार-बार चली आती है। तू भी आ जाती है। न जाने कितनी सारी तो तुम हो; कोई इधर से घुस रही, कोई उधर से घुस रही। छोटी, बड़ी, लंबी, चौड़ी, हरी, काली, नीली, पीली, हर रंग की होती हैं, आ जाती हैं। किसी को मना नहीं कर रहा, वो सबको आलिंगन में ले रहा है और कह रहा है, तुम सब भी आ जाओ, तो भी मैं तो रहूँगा सागर ही।

मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाकी मंदिर गंदे हैं तो रहें। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ? दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी। वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है, भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। ख़ुद साफ़-स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता। ‘तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है,’ यह धर्म होता है।

दुनिया ऐसी हो जाए और ज़िंदगी ऐसी हो जाए कि किसी विरोध की ज़रूरत ही न पड़े। पर आज ऐसा नहीं है, आज बहुत कुछ ऐसा है जिसे विरोध की ज़रूरत है। तो मैं वो विरोध कर रहा हूँ ताकि जो कुछ हटाया जाना है, मैं उसको हटा दूँ और मेरे बाद, मेरे अलावा कम ज़रूरत पड़े किसी को उतना जूझने की। लेकिन मान लो, मैं काम नहीं कर पाता पूरा, जिसकी बहुत संभावना है, तो जूझने से डरना मत। याद रखना कि संघर्ष इसीलिए है ताकि एक दिन संघर्ष न करना पड़े।

श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…

जब 'मोह-माया' कहते हैं, तो मोह से आशय होता है कि भीतर एकदम कोहरा फैल गया है, और माया से आशय होता है कि बाहर अब कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा। मोह माने जादू, जैसे किसी ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो। और जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं — माया। आमतौर पर बाहरी चीज़ों को माया माना गया है, इसीलिए भीतर वाली माया को मोह कह दिया गया; नहीं तो मोह भी माया ही है।

The spirit of question. दो लोगों का साथ बैठ के कोशिश करना कि हम समझें कि दुनिया क्या है? ज़िंदगी क्या है? हम कहाँ कैसे सोच रहे होते हैं? हमारी ड्रीम्स कहाँ से आती हैं? डेथ क्या है? लाइफ़ क्या है? लव क्या है? When you go into these questions and not just once, but continuously, you are continuously observing life — वो ट्रू रिलिजन है। उसमें जादू, ये कहानी, वो कहानी इन सब के लिए कोई जगह नहीं होती। नो मिरेकल, नो सुपरस्टिशन, बट डीप डीप ऑनेस्टी।

कभी भी आपके साथ ऐसा हो रहा हो कि कोई चीज़ बाद में समझ में आ रही हो, तो ये याद रख लीजिए, जो चीज़ आपको बाद में समझ में आ रही है, वो आपको हमेशा से ही समझ में आ रही थी। बाद में कुछ नया नहीं समझ में आया। बाद में आपने बस उसको एकनॉलेज करा है। बाद में आपने उसको बस अभिस्वीकृति दी है। पता पहले से था, पर हम उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे। हम में यह क्षमता होती है, नोइंग बट नॉट एक्सेप्टिंग। पता पहले से था पर उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे, क्योंकि उम्मीद थी कि क्या पता मज़े आ ही जाएँ आगे। अब जब मज़े नहीं आए, उम्मीद टूट गई, तो हम एकनॉलेज कर लेते हैं कि हाँ, गड़बड़ हो गई। गड़बड़ हो रही है, ये शुरू से ही पता था।

मेरे साथ चलने का ये मतलब है कि आप कहीं नहीं पहुँचने वाले, आप बस मिटने वाले हो। कौन चलेगा मेरे साथ, न आप चल सकते हो, न मैं आपसे उम्मीद रखता हूँ कि आप अंत तक मेरे साथ चल सकते हो, क्योंकि वो अंत यात्रा का अंत नहीं होगा, वो अंत आपका अंत होगा। कौन ऐसा पागल है जो अपना अंत कराने के लिए मेरे साथ चले? कभी-न-कभी तो आप टपकोगे ही। और जो जितने ज़्यादा अवधि तक मेरे साथ रहकर टपकता है, वो उतना ज़्यादा ज़हरीला होकर फिर डसता है।

आप तो किसी को समर्पित नहीं हो, न सच को, न झूठ को। आप दोनों को आधे-आधे हो, झूठा आदमी आपसे हमेशा जीतेगा।

हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

धर्म की आज के समय में जो आपको हानि दिख रही है, वह इसीलिए है क्योंकि हमारा धर्म आचरणवादी, परंपरावादी हो चुका है। कुछ भी ढकोसला या अंधविश्वास चल रहा हो, हम तत्काल उसका संबंध धर्म से जोड़ देते हैं। ऐसे काम, जो कोई आम आदमी अपनी ज़िंदगी में करे तो कहेंगे—'पागल है, मूर्ख है, यह सबके लिए ख़तरा है, इसे पागलखाने में डालो'—वही काम जब धर्म के नाम पर होते हैं, तो सम्माननीय हो जाते हैं।

सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति एकीकृत कर दी, तो देवी प्रकट हो गईं। आपके पास जो भी सद्गुण हैं — बुद्धि, धैर्य, बल, जो कुछ भी है — उसको बस सत्य की जीत के लिए अभियान करना है, तब देवी प्रकट होती हैं। सत्य की सेवा में नियुक्त रहो। जब आप अपनी सारी शक्तियों को बस एक लक्ष्य के लिए तैनात कर देते हैं, तो देवी का जन्म हो जाता है।

देवी कोई व्यक्ति नहीं हैं। आपके चित्त की मूल अहं–वृत्ति ही देवी महामाया हैं, जो संसार बनकर हमें दृष्टिगत होती हैं। वह देवी स्वयं संसार भी हैं और संसार की दृष्टा और अनुभोक्ता भी। उस मूल अहं–वृत्ति से अनेकों वृत्तियाँ निकलती हैं, जिनको अलग-अलग देवियों का नाम दे सकते हैं। मूल प्रकृति ही आगे चलकर तीन गुणों में विभाजित हो जाती है, जो तीन देवियों के नाम से जानी जाती हैं — सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी लक्ष्मी और तमोगुणी काली।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

ये दुनिया किसी को भी प्यार दे सकती है। कृष्णों, बुद्धों को थोड़ी प्यार दे देगी। यही महाभारत है, यही दुख है, यही सर्वनाश है। सब प्यारे हैं, सिंहासन प्यारा है, दुशासन प्यारा है, यार प्यारा है, परिवार प्यारा है — सत्य प्यारा नहीं है। सोचो, क्या कर रहे हैं लोग? ये बाण अर्जुन पर चला रहे हैं, सारथी कौन बैठे हैं? श्रीकृष्ण। इन्हें ख़्याल तो आया होगा कि एक आध भूला-भटका बाण श्रीकृष्ण को भी लग सकता है, आया तो होगा न? और लगे भी होंगे बाण, पर अपने आग्रहों के लिए ये श्रीकृष्ण का खून बहाने से भी नहीं चूक रहे।

प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

पारमार्थिक तल पर — “सत्यमेव जयते” — सत्य ही जीता हुआ है। लेकिन हम जिस दुनिया में हैं, वहाँ सत्य को जिताने के लिए कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है; असत्य को हराने के लिए बहुत जान लगानी पड़ती है। “सत्यमेव जयते” हमें यह बताने के लिए है कि सच जीत नहीं रहा है, उसे जिताओ। सत्य हमारे लिए एक छोटे बच्चे और नन्हे पौधे जैसा है। उसको हम जिताएँगे या हरवाएँगे, वह हमारे ऊपर है।

मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।

उपनिषदों के दर्शन ने आदिकाल से ही भारत और पूरे विश्व में श्रेष्ठतम चिंतकों को प्रेरित किया है। पॉल ड्यूसेन ने कहा, “वेदांत मानव चेतना की सबसे उत्कृष्ट कृतियों में है।” भारत की सुधारवादी धाराओं के मूल में भी उपनिषदों का ही चिंतन है। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, रमण महर्षि, जिद्दू कृष्णमूर्ति, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी इत्यादि उपनिषदों से गहराई से प्रभावित थे। पश्चिम पहुँचने के दो सौ वर्षों के भीतर ही उपनिषदों ने पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारकों, लेखकों व कलाकारों पर परिवर्तनकारी प्रभाव डाला।

दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती।

कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका श्रम बस मोह और ममता की वजह से है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसा हमने कहा आप पत्थर को ही घिसे जा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उतना ही श्रम अगर आप ज़्यादा काबिल और तैयार लोगों पर करें, तो ज़्यादा अच्छा परिणाम आएगा। तो निसंदेह हमारे घर वाले हमारे साथ रहते हैं। समझाने की शुरुआत आप अपनों से, परिवार जनों से ही करोगे। उन्हें ही समझाने की कोशिश करोगे। और मैं कह रहा हूँ, पूरी कोशिश, भरपूर प्रयास करिए उन्हें समझाने का। पर अगर दिखाई दे कि नहीं ही समझ रहे हैं, तो अटक मत जाइए, आगे निकलिए।