
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।
आचार्य प्रशांत: जी, नमस्ते।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमें ये सिखाया गया है बचपन से कि “सत्यमेव जयते” — जीत हमेशा सत्य की ही होती है, जो हमारा आदर्श राष्ट्रीय वाक्य भी है। आज के दौर में, युवाओं के सन्दर्भ में और आज के श्लोक के सन्दर्भ में ये बात कितनी हद तक प्रासंगिक है?
आचार्य प्रशांत: नहीं है। बहुत बार मैंने ये समझाया है। बहुत अच्छा प्रश्न है पहले तो। “सत्यमेव जयते” हम जानते हैं उपनिषद् से ही आता है। कहाँ से आता है? सब लोग लिखिए कम्युनिटी पर किस उपनिषद् से आता है?
ये मैंने बहुत बार बोला है कि पारमार्थिक तल पर होगा — “सत्यमेव जयते।” अपने लिए सत्य हमेशा जीता हुआ है, “सत्यम् एव जयते” — सत्य ही जीता हुआ है। वो अपने लिए होगी बात। लेकिन जहाँ तक हमारी बात है, मैंने उपमा देते हुए कहा है कि सत्य हमारे लिए एक बहुत छोटे से बच्चे जैसा है, एक नन्हे पौधे जैसा है — हमारा सत्य। उसको हम जिताएँगे या हरवाएँगे, वो हमारे ऊपर है। तो सत्य के तल पर सत्य ही है, तो उसे हराने वाला कोई होगा ही नहीं। वहाँ अद्वैत है। सत्य के तल पर तो सत्य मात्र है तो उसे कौन हराएगा, तो वहाँ अद्वैत है। तो वहाँ आप बिल्कुल कह दीजिए जाकर के — “सत्यमेव जयते।” ऋषि उसी तल पर रह रहे हैं, तो उसी ऊँचाई से उन्होंने उद्घोषणा कर दी कि “सत्यमेव जयते।” ठीक है, बिल्कुल ठीक है।
लेकिन हम-आप जहाँ रह रहे हैं जिस दुनिया में, वो अद्वैत का नहीं तल है, वो द्वैत का तल है। वहाँ सब कुछ अहंकार के लिए है, वहाँ दृश्य और दृष्टा का खेल चल रहा है न। वहाँ अहंकार है, संसार है। अहंकार है, संसार है। अब अहंकार को अपने आप को बचाना है, संसार को भोगना है। अहंकार को बचाना है, संसार को भोगना है। अहंकार के लिए तो ये चलता है। तो अहंकार जब स्वयं को बचाएगा, तो सत्य कहाँ से जीत जाएगा, सत्य की जीत तो अहंकार की हार में है।
और अहंकार, अहंकार माने हम और आप। हम तो बोलते हैं कि, 'नहीं, हमें अपने हिसाब से चलना है, हम ही होशियार हैं, अपनी बुद्धि लगाएँगे, अपना स्वार्थ पूरा करेंगे।' पैदा हुए हैं, अपनी कामनाएँ पूरी करने के लिए। जब अहंकार ये सब करेगा, तो सत्य कहाँ से जीत जाएगा।
तो ये इस दुनिया की जो बात है, इस दुनिया में सत्यमेव जयते बहुत यदा-कदा होता है, विरल घटना होती है कि सत्य जीत गया। यहाँ तो झूठ ही जीतता है।
यहाँ कितनी बार मैं आप लोगों से कहता हूँ न कि झूठ है, ये दुनिया है अपने आप फैलता है झूठ इसमें। और सत्य को इस दुनिया में जिताने के लिए — बाप रे बाप! कमर टूट जाती है। आप देखते ही हो। और क्या कर रहे हो, जो करने की कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। किसको जिता रहे हो, जो जीता ही हुआ है — “सत्यमेव जयते।” सत्य को कौन हराएगा।
जो जीता हुआ है, उसको जिताने के लिए कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। वो जीतता फिर भी नहीं। इतना दुर्बल है सत्य, कि वो जीता हुआ है तब भी उसको जिताने के लिए, आपकी संस्था भी तो यही कर रही है — जीते हुए को जिताने के लिए कमर तोड़ मेहनत कर रही है। पर फिर भी वो जो जीता हुआ है, वो इस संसार में रोज़ हारता है। रोज़ हारता है।
तो “सत्यमेव जयते” हमें ये बताने के लिए है कि "भाई, सच जीत नहीं रहा है और उसे जिताओ।" वो ये बताने के लिए नहीं है कि सत्य तो सदा जीतता ही है। नहीं, नहीं। सत्य अगर सदा जीतता ही है, तो फिर पुलिस की भी क्या ज़रूरत है, फौज की भी क्या ज़रूरत है, न्याय व्यवस्था की भी क्या ज़रूरत है, सत्य तो अपने आप ही जीता हुआ है। जब सत्य अपने आप जीता हुआ है, तो न्यायाधीश क्या करेंगे वहाँ पर फिर। सत्य तो पहले ही जीता हुआ है, न्याय क्यों करना है।
नहीं!
असत्य ही जीता हुआ है। और असत्य को हराना है, तो बहुत जान लगानी पड़ती है। बहुत जान लगती है।
ये सब होता है जब हमने दर्शन नहीं पढ़ा होता। और हमें नहीं पता होता कि जो भी वचन, चाहे वो ऋषि हो या संत हों, उनकी अपनी दशा का वर्णन मात्र होते हैं। वो वचन बस उनके ऊपर लागू होते हैं, सब पर नहीं लागू होते। वो पारमार्थिक वचन हो गए। उन पारमार्थिक वचनों को व्यवहारिक तल पर नहीं लाना चाहिए। अब ये तब तक नहीं पता होगा जब तक या तो आपने नागार्जुन का शून्यवाद पढ़ा हो, तो वहाँ भी पारमार्थिक और व्यवहारिक तल आते हैं। या आपने आचार्य शंकर का पढ़ा हो दर्शन — अद्वैतवाद — तो वहाँ भी फिर आ जाते हैं, पारमार्थिक, व्यवहारिक, और प्रातिभासिक तल।
जो दर्शन जिसने पढ़ा होगा, वो समझ जाएगा कि “सत्यमेव जयते” बस सबसे ऊँचे तल पर लागू होता है, निचले तल पर तो नहीं कभी लागू होता। पर हमने नहीं पढ़ा होता, तो हम सोचते हैं “सत्यमेव जयते” माने एक यूनिवर्सल ट्रुथ है। नहीं! यूनिवर्सल ट्रुथ नहीं है। बहुत जान लगानी पड़ेगी तब होगा।
सच एकदम ऐसा है, मुझे इससे बेहतर कोई लगता ही नहीं कि छवि आपको बताऊँ, जैसे बहुत छोटा बच्चा। है तो पर बड़ा होगा कि नहीं होगा, आप जानो। सत्य, अब हम कहते हैं ना कि “धर्मो रक्षति रक्षितः,” हम सोचते हैं कि धर्म हमारी रक्षा कर देगा। नहीं। सत्य इतना छोटा बच्चा है कि वो आपकी रक्षा करे, इससे पहले आपको उसकी रक्षा करनी पड़ेगी। पहले उसे पाल-पोस के बड़ा तो करो अपनी छाती में, उसके बाद वो तुम्हारी रक्षा करेगा। हमारी कोई रक्षा नहीं करने वाला है, क्योंकि हमने अपने सत्य को बिल्कुल बचपन में ही मार दिया है। उसकी जो पौध है वही कुचल दी है, निपिंग इन द बड, वैसा किया है हमने। तो वो कहाँ से हमारी रक्षा करेगा?
अपने भीतर सच को पालना पड़ता है। हर इंसान को माँ बनना पड़ेगा, नर हो, नारी हो।
माँ बनने का वास्तविक अर्थ यही है, कहते हैं ना, माँ बनो और स्वयं को जन्म दो। पुराना मेरा एक लेख है, माँ बनो और स्वयं को जन्म दो। उसका यही अर्थ है कि तुम्हारे भीतर, चाहे तुम पुरुष हो, चाहे तुम स्त्री हो, तुम्हारे भीतर तुम्हारा नन्हा सा बच्चा बैठा हुआ है, वही सत्य कहलाता है और उसकी भ्रूण हत्या हो जाती है। ये संसार इसीलिए है कि तुम्हारा शरीर चले 80 साल तक, और तुम्हारा सत्य बचपन में ही मार दिया जाए, या अधिक से अधिक जवानी में मार दिया जाए। है ना?
ये संसार इसलिए है, ताकि शरीर तो खूब खींचे। मेडिकल साइंस है, वो खींच देगी। कानून व्यवस्था है, वो आपके शरीर को बचाकर चलती है, ये सब। अर्थव्यवस्था तरक्की करती है कि आप खाए, पिएँ अच्छा और आपका शरीर बचा रहे। तो ये दुनिया तुम्हारे शरीर को तो खूब आगे बढ़ा देगी, लेकिन तुम्हारे सत्य की भ्रूण हत्या करके। तुम्हारा काम है, अपने उस बच्चे को बचाना। वही वास्तविक मातृत्व है, वही वास्तविक पितृत्व है। जिसने वो कर लिया धर्म उसकी रक्षा करेगा, सत्य उसे बचाएगा, नहीं तो फिर शरीर ढोते रहो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक प्रश्न और है मेरा। मैं काफ़ी दिनों से सोच रहा हूँ, बस उस पे आपकी राय लेनी है कि आपका विचार क्या है?
आचार्य प्रशांत: जी।
प्रश्नकर्ता: मैं अपने शरीर को मेडिकल साइंस को दान करना चाहता हूँ। क्या ये मेरा निर्णय सही है या नहीं?
आचार्य प्रशांत: नहीं, निर्णय तो कर्म होता है। उसके पीछे कर्ता देखा जाता है हमेशा। है ना? तो निर्णय के पीछे आप कहाँ से आ रहे हैं, सब कुछ इससे तय हो जाएगा। अगर आप एक सामाजिक स्तर पर अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं, करुणा के स्रोत से आ रहे हैं। आप इस समझ से आ रहे हैं कि, "मृत्यु के बाद शरीर तो वैसे भी राख हो जाना है, इससे अच्छा है किसी के काम आ जाए" इस बोध से आ रहे हैं....
प्रश्नकर्ता: इसी बोध से आ रहे हैं, कि कम से कम मेडिकल साइंस में जो अध्ययन होता है, उसमें रिसर्च के काम आए।
आचार्य प्रशांत: बहुत सुंदर, बहुत बढ़िया। बिल्कुल ठीक है। बहुत बढ़िया बात है, सबको करना चाहिए। एक बार हमने साल भर पहले भी ये बात करी थी कि भाई, अपने जो ये अंग वग़ैरह हैं, बहुत एक आसान प्रक्रिया होती है उसको प्लेज कर दो। ऑर्गन प्लेज होती है, वो कर दो। आपके क्या काम आएगा। आँखें लग जाती हैं, किसी और को लग जाती हैं। और आपके अंग होते हैं, अगर बचे रह गए मृत्यु के बाद तो किसी के काम आ जाते हैं। पूरा शरीर ही ले जाते हैं अस्पताल वाले, उससे नए डॉक्टरों को सीखने में मदद मिलती है।
प्रश्नकर्ता: ठीक, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी।
प्रश्नकर्ता: एक आख़िरी बात कहनी थी आपसे। बहुत जल्दी अपनी बात ख़त्म करूँगा। मैं काफ़ी कुछ पढ़ता रहता था, तो कभी विवेकानंद के बारे में पढ़ता था, भगत सिंह के बारे में पढ़ता था और लोगों के बारे में पढ़ता था। तो ये लगता था कि हम इनके समय में नहीं हुए, और ये हमारा सौभाग्य है कि हम आप जैसे एक व्यक्ति के रूप में मिले हैं। जो आप हमें मिले हैं, और महसूस होता है कि हमारे दौर के आप स्वामी विवेकानंद हैं। हम ये महसूस कर पाते हैं कि हम उनके दौर में जी रहे हैं, ये हमारा सौभाग्य है।
प्रणाम आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी “सत्यमेव जयते” के ऊपर किसी ने एक प्रश्न पूछा था, तो उसी पे एक प्रति प्रश्न था कि जैसे आपने बोला कि अभी जो जीतता है वो झूठ ही जीतता है। लेकिन इससे पहले आपके वीडियो, आपने बोला हुआ है, कि जो सत्य है, जो झूठ है, वो ऐक्चुअली जीतता तो हमेशा सत्य ही है।
आचार्य प्रशांत: अरे! तो झूठ जब जीतता है, तो क्या वो कहता है अपनी नज़र से, अपनी ओर से, कि सत्य जीता है।
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: हाँ तो, वो तो पारमार्थिक तल की बात हो गई ना कि झूठ भी जीते, तो सच जीता। अहंकार जब जीतता है, तो वो तो यही कहता है ना, मैं जीता। वो ये थोड़ी कहता है, कि अहम् के जीतने में भी आत्मा की जीत है। वो ये कहता है क्या?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: तो फिर। आप अहंकार हो, आप अपनी बात करो, पारमार्थिक की बात क्यों कर रहे हो। देखिए जो बातें ज्ञानियों ने, संतों ने, अपनी परम दशा में बोल दी होती हैं, उनको उनकी बात मान के श्रद्धा के साथ सर झुका के छोड़ देना चाहिए। वो भूलिएगा नहीं वो पुराना। कोई मुझे मिला था, बोले कि, "वो काहे के लिए हम कुछ भी पढ़ें? आपको क्यों सुनें? कबीर साहब ख़ुद बोल गए हैं —
'पाछे-पाछे हरि फिरे, कहत कबीर कबीर।।’
तो हमें क्या ज़रूरत है मेहनत करने की, हरि हमारे पीछे आएँगे।"
अरे! वो साहबों, कबीरों की बात है। तुम्हारे पीछे थोड़ी आएँगे हरि। वो कबीर साहब थे, तुम झुन्नू लाल हो! दोहे में ये थोड़ी लिखा है, "पाछे-पाछे हरि फिरे, कहत झुन्नू लाल झुन्नू लाल!" वो बात उन्होंने अपनी, वो आत्मदशा है। ऐसी रामखुमारी चढ़ती है कि आदमी ऐसी बातें बोल जाता है। वो उनकी अपनी दशा है। वो उन्होंने आपको सिखाने के लिए नहीं बोला है। वो उन्होंने बस अपनी हालत बयान कर दी है। वहाँ उनको बस ऐसे नमन करना चाहिए और कहना चाहिए, "ये वाली जो बात है, ये आपकी है। ये वाली बात हमारे लिए नहीं है, हम इसमें से कुछ नहीं सीख पाएँगे।" और दूसरी ओर ऐसी साखियाँ हैं जो सीख देती हैं, वो आपको संबोधित करके कही गई हैं। इन दोनों में अंतर करना होगा।
जो पहली साखी है, वो पारमार्थिक तल की है। उसको सिर्फ़ सर झुकाया जा सकता है। “सत्यमेव जयते” हो गया, “पाछे-पाछे हरि फिरे” हो गया, “अहम् ब्रह्मास्मि” हो गया — ये सब बातें पारमार्थिक तल की हैं। इनको ये नहीं कहना चाहिए कि, "जब अहम् ब्रह्म ही है तो मैं अहंकार का नाश क्यों करूँ, बंद करो गीता। अरे! जब महावाक्य उपनिषदों का है कि 'अहम् स्वयं ब्रह्म है।’ जब अहम् ब्रह्म है ही, तो मैं क्यों गीता पढूँ, बंद करो। अहंकार को काटने की बात बंद करो सब।”
वो बातें ऊपर की हैं, ऊपर की। जो ऊपर की बात हो, उसको ऊपर रहने दो। आप उन बातों पर ध्यान लगाइए जो आपके तल की हैं, जो आपको संबोधित करके, एक शिष्य की तरह, आपको सिखाने के लिए बोली गई हैं। समझ रहे हैं बात को?
तो ये वाली बात कि "अगर अहंकार भी जीत रहा है तो आत्मा ही बनकर जीत रहा है, तो अहंकार की जीत में भी आत्मा की ही जीत है" — ये ऊपर वाली बात है। आप जहाँ हो, अहंकार के तल पर, व्यावहारिक तल पर, वहाँ आप ये थोड़ी करते हो कि "मैं झूठ हूँ, लेकिन झूठ की जीत में भी सच की जीत है।" आप ये थोड़ी मानते हो, आप तो बोलते हो, मैं ही सच हूँ। अहम् ही आत्मा है।
अध्यात्म में ये बड़ी गड़बड़ हो जाती है। कुछ मुट्ठी भर सूत्र हैं जो ऊपर वाले तल के हैं, और उनको रट लेना बहुत आसान है, 10, 20, 100, 50। कोई बड़ा ज्ञानी है तो वो पाएगा कि ऐसे करीब 200 सूत्र हैं अलग-अलग ग्रंथों में। बाइबल में आ जाएगा, कि मैं और मेरे पिता एक हैं। "आई ऐम द लाइफ़, द ट्रूथ, द वे।" (मैं मार्ग हूँ, सत्य हूँ और जीवन हूँ।) तो ऐसे सूत्र मिल जाते हैं, हर जगह पर हैं। अल-हल्लाज मंसूर बोल गए — "अनल-हक़," मैं ही सत्य हूँ। हर जगह मिल जाते हैं।
अब उन सूत्रों को पकड़ करके, जो ये तथाकथित आध्यात्मिक साधक होता है, ये बोलता है, "मैं ही तो हूँ वो 'अनल-हक़।' आई ऐम दैट। तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि। मैं ही तो वो हूँ। मी एंड माई फादर आर वन।" ये सूत्र किसी बहुत-बहुत ऊँचे आदमी की अपनी भीतरी दशा का वर्णन है, ये उसकी अपनी बात है। ये उसने आपको बता दी, एहसान मानिए। पर ये बात आपकी बात नहीं हो गई। सिर्फ़ इसलिए कि उसने आपको बता दिया, तो इसलिए वो बात आपकी थोड़ी हो गई।
अष्टावक्र बोले अगर "अहो अहं नमो मह्यं," तो ये उनके लिए ठीक है। आप थोड़ी बोल जाएँगे कि "मैं ही तो मैं हूँ, और मैं स्वयं को ही नमन करता हूँ।" बस आप ऐसे कर लीजिए (हाथ जोड़ना) कि "अरे वाह! ये ऋषि अष्टावक्र ने अपने संदर्भ में कुछ बोल दिया है।" फिर जो वो आपको सिखाने के लिए बोलते हैं, वो अलग बात है।
तो पहले ही सूत्र में आपको क्या सिखाते हैं? कि अगर चाहते हो मुक्ति को, तो विषयों को विश्ववत् त्याग दो। अब ये आपको सिखाया है उन्होंने, तो ये ग्रहण करिए। पर जहाँ वो बोलते हैं कि "मैं तो स्वयं को ही नमन करता हूँ, क्योंकि मेरे अलावा तो कोई है ही नहीं, मैं ही एकमात्र सत्य हूँ।" अब आप अब इस बात को पकड़ लोगे तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। ये बात किसी अष्टावक्र को शोभा देती है, पारमार्थिक तल को शोभा देती है। हमें थोड़ी शोभा देती है कि हम बोलना शुरू कर दें, "मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, दूसरा कोई नहीं।" हमें नहीं शोभा देता ये।
तो ये दो तरह के जो सूत्र होते हैं अध्यात्म में, हमें इनमें भेद करना सीखना होगा और मैं बहुत समय से बता रहा हूँ। लेकिन इसमें जो सूत्र हमें नहीं पकड़ने चाहिए, वही सबसे लज़ीज़ लगते हैं, और उन्हीं को पकड़ने का सबसे ज़्यादा मन करता है। "पाछे पाछे हरि फिरे" — क्या जलवा है भाई का! क्या जलवा है! "पाछे-पाछे हरि फिरे।" वो भी ऐसे नहीं कि बस फिर ही रहे हैं, वो बेचारे एकदम दुखी होकर के बेबसी में हैं, "झुन्नूलाल- झुन्नूलाल प्लीज़, झुन्नू-झुन्नू लिसन टू मी झुन्नू, लास्ट टाइम I मेड अ मिस्टेक झुन्नू, प्लीज़ फॉर्गिव मी झुन्नू!"
हरि बोल रहे हैं। बड़ा अच्छा लगता है। जो सूत्र बिल्कुल नहीं पता होने चाहिए, वही हम पकड़ लेते हैं। और जो हमारे काम के हैं, उनको ऐसे, "ये हटाओ"। समझ रहे हैं बात को?
तो मेरी भी बातों में कुछ कभी-कभार धोखे से कुछ ऊपर की बातें आ जाती होंगी। उनको पकड़ के मत बैठ जाइएगा। और मेरे ही ऊपर आकर उद्धृत कर देते हैं, "ऐ! तूने जो बोला था ना, मेरे पास रिकॉर्डिंग है उसकी," एकदम खट से चार्जशीट फाइल होती है। और मेरे तो सारे अपराधों का लेखा-जोखा आपके पास है, क्योंकि सब कुछ रिकॉर्डेड है। वो सारी रिकॉर्डिंग आप ही के पास है, तो निकाल के ले आएँगे "देखो, ये बोला था, तब तो ये बोला था, अब बोल रहे हैं कि ऐसा नहीं है। ऐसे कैसे पलटी मार दी?"
भाई, तब अपनी बात बोली होगी, आज तुम्हारी बात बोल रहा हूँ। दोनों बातों में अंतर होगा।
प्रश्नकर्ता: आपने एक सेशन के दौरान समझाने के लिए बोला था।
आचार्य प्रशांत: समझाने के लिए ही सब बोलता हूँ। आप समझते हो?
प्रश्नकर्ता: जी, कोशिश करते हैं। धन्यवाद आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: हाँ जी, बोलिए।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने आज जो उदाहरण लिया सूरज वाला, तो एक्चुअली मुझे वो फील हो चुका है, वो सूरज वाला जो आपने बताया। वो बात अलग है कि मैं अलग से, मतलब सच के साथ चल नहीं पाया। मतलब मेरी बेईमानी कहूँगा मैं उस चीज़ को। तो अब ऐसा लगता है फ़िलहाल कि सच से बहुत दूरी हो गई है। एक तरफ़ तो मतलब अहम् कहता है कि किसी न किसी तरीक़े से कुछ न कुछ हो जाएगा। मतलब होप वो ले के चल रहा है फ्यूचर पे।
बट ख़ुद मैं उस चीज़ को होने नहीं देना चाहता। एक तरीक़े से बायपोलर टाइप बन गया, कि काइंड ऑफ जैसे लूप होता है हमारा। तो आपने भी कहा है कि जैसे, "जिसको जो जान गया, उसको तो मतलब अगर वो उसको ज़िंदगी नहीं बना रहा, तो उसको सज़ा मिलनी चाहिए।" तो मतलब वही चीज़ है, तो मुझे लग रहा है कि वो सज़ा ही है, एक तरीक़े की। तो इस पर?
आचार्य प्रशांत: क्या चाहते हो, मैं क्या करूँ? अब बताओ।
प्रश्नकर्ता: कुछ नहीं, मैं मे बी शेयर ही करना चाहता था शायद ये।
आचार्य प्रशांत: अच्छा ये दूरी-वूरी कुछ नहीं होती है। दूर भाग के कहाँ जाओगे? उसको बोलते हैं, 'कूटस्थ अंतर्यामी।' तुम जहाँ जाओगे, वहाँ पहले से मौजूद है। तो सच से दूरी, ये बड़ा नासमझी का मुहावरा है। सच से कोई दूर नहीं हो सकता।
हाँ, ये सनस्क्रीन (आँखो के आगे हाथ लगाते हुए) आती है बीच में, इसको अभी हटा दो, वो प्रत्यक्ष है। बात तो सीधी है, "सत्य" माने — वो जो हृदय में हमेशा से विराजमान है। जो तुम्हारी असलियत है। उसके ऊपर तुम पाँच-सात तरीक़े के कोष चढ़ाकर बैठे हुए हो, तो दूरी क्या बनाओगे। अपने ही केंद्र से क्या दूरी बनाओगे।
जो तुम्हारी छाती के भीतर है, उससे भाग कर कहाँ जाओगे? जहाँ जाओगे, उसको लेकर ही जाओगे ना। तो सच से दूरी कैसे बना लोगे? सूरज तो फिर भी समझ में आता है कि, सूरज उधर है हम इधर हैं। इसीलिए समझाते हुए बोला था, कि बस उदाहरण के लिए कह रहा हूँ कि सूरज, वरना जिस सत्य की बात हो रही है, वो कौन सा सत्य है? वो कहाँ होता है? वो तो यहाँ होता है, केंद्र में होता है। तुम उसके ऊपर चढ़े होते हो, तुमसे दूर कहाँ से हो जाएगा। जहाँ जा रहे हो उसको लेकर ही जाओगे, उससे दूरी कैसे बनाओगे।
हाँ, उसके ऊपर बाक़ी सब जो तुमने अपने स्वार्थ के छिलके चढ़ा रखे हैं, उनको छील डालो। क्योंकि उनसे कुछ मिल रहा नहीं है। वैसे भी कोई बड़ा महान त्याग करने के लिए नहीं बोला जा रहा, बस देखने को बोला जा रहा है, कि जो कुछ तुम पकड़ के बैठे हो, उससे वैसे भी कुछ नहीं मिल रहा। तो छोड़ ही दो ना।
संतों ने स्वार्थ की तुलना जलते कोयलों, गर्म अंगारों से करी है। पकड़ के बैठे हैं ऐसे जैसे पता नहीं कौन से हीरे-मोती हों। छोड़ दो, तुम्हारा ही हाथ जल रहा है। स्वार्थ ऐसा है कि अंगारा है, उसको रत्न समझ के पकड़ के बैठे हो और तुम ही ने मुट्ठी बंद कर रखी है। तुम्हें कुछ ख़ास करना भी नहीं है छोड़ने के लिए, पकड़ ढीली कर दो गिर जाएगा। नहीं तो अपने ही हाथ जला रहे हो।
देखो साफ़-साफ़ कि जिन दिशाओं में तुम जा रहे हो उसमें तुम्हें कुछ है भी? क्या लाभ है? या बस डर के मारे, अंधे होकर भागे जा रहे हो?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ जैसे सिद्धांत होते हैं, नरक वग़ैरह का सिद्धांत होता है ये सब। तो काफ़ी कहानियाँ वग़ैरह माइंड में अब आने लगी हैं कि कर्मफल जैसा हो गया, कर्ता, भोक्ता। यही कहूँगा मैं तथ्यों और "सच" से दूरी थोड़ी कम हो गई है। मतलब कहानियों में ज़्यादा होने लगा है माइंड कि जैसे कि इतने एज तक होगी, ज़्यादा मतलब मृत्यु का ज़्यादा याद रहता है, कि 90 साल बाद ऐसे ये मृत्यु होगी, उसके बाद कैसे जन्म होंगे। ये सब चीजें माइंड में ज़्यादा चलती हैं।
अभी आज अष्टवक्र गीता पढ़ रहा था, तो उसमें भी यही था कि शरीर-भाव में ही जीना ही मूढ़ता है। तो इस शरीर-भाव से कैसे निकला जाए?
आचार्य प्रशांत: प्यार करो, और शरीर प्यार में आड़े आएगा। सिर्फ़ तब पता चलेगा कि तुम्हारे और शरीर के इरादे कितने अलग-अलग हैं। नहीं तो नहीं पता चलता।
शरीर का कुछ नहीं करना है। उसको बस ऐसे ही, टट्टी, पेशाब और खाना-पीना, यही है उसका "सो जाओ।"
प्रेम जब जीवन में आता है न, तभी पता चलता है कि अरे प्रेम की दिशा जाना है, और शरीर ही पकड़ लेता है, या प्रेम की दिशा को शरीर पता नहीं कौन सी दिशा बना देता है। और प्रेम माने, ये नहीं कि लड़की ही हो। कुछ भी, कोई भी, कहीं किसी सार्थक जगह पर प्यार करो तो सही न। जवान आदमी हो तुम, किसी परीक्षा से ही प्यार कर लो। ये मुझे दिख रहा है कि मेरे लिए एक सार्थक दिशा है, अच्छी परीक्षा है, इसको उत्तीर्ण करना है और देखना शरीर कैसे पकड़ता है तुमको।
सत्रों से प्यार कर लो, और देखो कि 11:30–12 बजे नहीं कि शरीर झूमना शुरू कर देता है। तब पता चलेगा। तुम तो सत्र सुनना चाहते हो और शरीर नालायक सोना चाहता है। तब समझ में आएगा कि तुम शरीर नहीं हो। तुम कुछ चाहते हो, शरीर कुछ और चाहता है।
अगर तुम शरीर ही होते, तो शरीर तुम्हारे इरादों का विरोध क्यों करता, वो भी इतने ऊँचे अच्छे इरादे।
तुम सत्र सुनना चाहते हो, शरीर ऐसे लेट रहा है, लोट रहा है, गिरा जा रहा है शरीर। ये नहीं पता चलता जब तक पशुवत जीवन से आगे का कोई लक्ष्य नहीं बनाते। शरीर तो पशु है, तुम भी अगर पशु ही हो तो तुम में और शरीर में कभी लड़ाई नहीं होगी। दोनों मौज में घूमोगे।
जैसे वो था नहीं “नाटू-नाटू" करके दो नाचते हैं। तुम और शरीर, दोनों ऐसे ही नाच रहे हो अपना "नाटू नाटू नाटू नाटू नाटू।" अब उन दोनों में से किसी एक को प्यार हो जाए, तब नाच भंग होगा। तुम्हें प्यार हो सकता है। शरीर तो प्यार जानता नहीं, शरीर तो बस रासायनिक क्रियाएँ जानता है। पर तुम प्यार जान सकते हो। तुम्हें प्यार हो जाए न तो देखो, दो ऐसे नाच रहे हैं — “नाटू-नाटू।” एक को इश्क़ हो गया, अब वो उधर देखेगा न जहाँ इश्क़ है। दूसरा वाला उसकी गर्दन में हाथ डाल के उसको पकड़े हुए है, कि तुझे नहीं जाने दूँगा। अब नाच ख़राब होगा।
तुम्हारा तो नाच मस्त चल रहा है, क्योंकि शरीर भी जानवर और चेतना भी तुम्हारी अगर जानवर जैसी ही चल रही है, तो अपना "नाटू-नाटू"।
ज़िंदगी में किसी ऊँचाई से दिल लगाकर देखो, देह-भाव अपने आप गिरेगा।