पारमार्थिक तल पर — “सत्यमेव जयते” — सत्य ही जीता हुआ है। लेकिन हम जिस दुनिया में हैं, वहाँ सत्य को जिताने के लिए कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है; असत्य को हराने के लिए बहुत जान लगानी पड़ती है। “सत्यमेव जयते” हमें यह बताने के लिए है कि सच जीत नहीं रहा है, उसे जिताओ। सत्य हमारे लिए एक छोटे बच्चे और नन्हे पौधे जैसा है। उसको हम जिताएँगे या हरवाएँगे, वह हमारे ऊपर है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।
आचार्य प्रशांत: जी, नमस्ते।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमें ये सिखाया गया है बचपन से कि “सत्यमेव जयते” — जीत हमेशा सत्य की ही होती है, जो हमारा आदर्श राष्ट्रीय वाक्य भी है। आज के दौर में, युवाओं के सन्दर्भ में और आज के श्लोक के सन्दर्भ में ये बात कितनी हद तक प्रासंगिक है?
आचार्य प्रशांत: नहीं है। बहुत बार मैंने ये समझाया है। बहुत अच्छा प्रश्न है पहले तो। “सत्यमेव जयते” हम जानते हैं उपनिषद् से ही आता है। कहाँ से आता है? सब लोग लिखिए कम्युनिटी पर किस उपनिषद् से आता है?
ये मैंने बहुत बार बोला है कि पारमार्थिक तल पर होगा — “सत्यमेव जयते।” अपने लिए सत्य हमेशा जीता हुआ है, “सत्यम् एव जयते” — सत्य ही जीता हुआ है। वो अपने लिए होगी बात। लेकिन जहाँ तक हमारी बात है, मैंने उपमा देते हुए कहा है कि सत्य हमारे लिए एक बहुत छोटे से बच्चे जैसा है, एक नन्हे पौधे जैसा है — हमारा सत्य। उसको हम जिताएँगे या हरवाएँगे, वो हमारे ऊपर है। तो सत्य के तल पर सत्य ही है, तो उसे हराने वाला कोई होगा ही नहीं। वहाँ अद्वैत है। सत्य के तल पर तो सत्य मात्र है तो उसे कौन हराएगा, तो वहाँ अद्वैत है। तो वहाँ आप बिल्कुल कह दीजिए जाकर के — “सत्यमेव जयते।” ऋषि उसी तल पर रह रहे हैं, तो उसी ऊँचाई से उन्होंने उद्घोषणा कर दी कि “सत्यमेव जयते।” ठीक है, बिल्कुल ठीक है।




