मेरे साथ चलने का ये मतलब है कि आप कहीं नहीं पहुँचने वाले, आप बस मिटने वाले हो। कौन चलेगा मेरे साथ, न आप चल सकते हो, न मैं आपसे उम्मीद रखता हूँ कि आप अंत तक मेरे साथ चल सकते हो, क्योंकि वो अंत यात्रा का अंत नहीं होगा, वो अंत आपका अंत होगा। कौन ऐसा पागल है जो अपना अंत कराने के लिए मेरे साथ चले? कभी-न-कभी तो आप टपकोगे ही। और जो जितने ज़्यादा अवधि तक मेरे साथ रहकर टपकता है, वो उतना ज़्यादा ज़हरीला होकर फिर डसता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपको पिछले दो साल से सुन रही हूँ। परिवर्तन ये आया है कि मैं अकेली यहाँ आ गई आज, और मैं आ गई। दूसरी बात, मैंने घर पर किसी को बताया नहीं, सिर्फ़ मेरी बेटी को पता है और किसी को नहीं बताया। रात को फोन आया था मेरे हस्बैंड का, तो मैं सो गई थी। करीब 11:00 बजे के आसपास फोन आया। बोलते हैं, "घर पर कब तक आओगे?" मैंने बोला, "मैं दिल्ली जा रही हूँ।" आचार्य जी, उसके बाद से बम बम बम, ऐसी आवाज़ आती रही, दरवाज़े पटकने की, और कोई आवाज़ नहीं आई। मैं "हेलो, हेलो" बोल रही थी, लेकिन उधर से कोई रिप्लाई नहीं आ रहा था।
मुझे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ा। मैंने सेकंड टाइम कॉल किया और फिर उन्होंने फोन भी नहीं उठाया, तो मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है क्योंकि इतना कोई विशेष मुद्दा है नहीं। मैं जो इस काम के लिए आई हूँ, वो काम मेरे लिए बहुत ज़्यादा ज़रूरी था। मेरा एक प्रश्न जो था, वो प्रश्न का जवाब अपने आधे से ज़्यादा सेशन में वो हो गया है। प्रश्न का जवाब मुझे मिल गया है, तो प्रश्न तो कुछ रहा नहीं। बस लास्ट का उसमें ये था मेरा, कि जब अहम् जगह-जगह जाकर चिपक जाता है, अलग-अलग विषय से, व्यक्ति से, तो उसकी ये आदत ख़ुद की भी होती है कि वो फिर अपने विषय दूसरे भी बना लेता है। एक जगह चिपकता है, फिर दूसरी जगह चले जाता है।
अभी मेरा लास्ट




