कभी भी आपके साथ ऐसा हो रहा हो कि कोई चीज़ बाद में समझ में आ रही हो, तो ये याद रख लीजिए, जो चीज़ आपको बाद में समझ में आ रही है, वो आपको हमेशा से ही समझ में आ रही थी। बाद में कुछ नया नहीं समझ में आया। बाद में आपने बस उसको एकनॉलेज करा है। बाद में आपने उसको बस अभिस्वीकृति दी है। पता पहले से था, पर हम उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे। हम में यह क्षमता होती है, नोइंग बट नॉट एक्सेप्टिंग। पता पहले से था पर उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे, क्योंकि उम्मीद थी कि क्या पता मज़े आ ही जाएँ आगे। अब जब मज़े नहीं आए, उम्मीद टूट गई, तो हम एकनॉलेज कर लेते हैं कि हाँ, गड़बड़ हो गई। गड़बड़ हो रही है, ये शुरू से ही पता था।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। तो आचार्य जी, ये सेवन नंबर चैप्टर है जिसमें लिखा हुआ है: “देयर इज़ ग्रेट फन इन कैचिंग योर ओन इनर मिसचीफ़ रेड हैंडेड।” अक्सर, मेरे साथ जो होता है आचार्य जी, जब बात मतलब निकल जाती है गाड़ी, तब मुझे समझ में आता है कि गलती हो गई।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो समझ में पहले ही आ रहा होता है, पर पहले उम्मीद बाक़ी होती है कि काम बन जाएगा। ठीक है? काम बन जाएगा, और वो काम बनना वास्तव में कभी है नहीं। तो हम फिर जब देख लेते हैं कि काम नहीं बना, तब ये स्वीकार करते हैं कि शुरू में ही गलती हुई थी। गलती शुरू में ही हुई है, ये बात शुरू में ही जानी जा सकती है। और हमें एक धुंधला सा एहसास होता भी है कि मैं शुरुआत में ही गलत कर रहा हूँ, पर उस एहसास को हम दबाकर रखते हैं। क्योंकि जब हम काम शुरू कर रहे होते हैं, तो ये कामना होती है कि इसका हमें कुछ सुखद फल मिल जाएगा। तो उस सुखद फल की आशा में, जो आप जान रहे होते हो कि आप काम कर रहे हो उसमें कुछ गड़बड़ है, आप अपने उस जानकारी को, अपने उस ज्ञान को आप दबा देते हो।
अब सुखद फल तो आया नहीं। जब नहीं आया, तो फिर हम कहते हैं, अब मुझे समझ में आ रहा है कि गलती हो गई। अब कैसे समझ में आएगा? वो पहले से ही समझ में आ रहा था, वो पहले से ही पता था पर पहले ऐसा था कि जानी हुई चीज़ को भी नहीं जानना चाहते थे। जानी हुई चीज़ को भी दबाकर रखना चाहते थे, इस उम्मीद में कि काम बन ही जाएगा।




