ये दुनिया किसी को भी प्यार दे सकती है। कृष्णों, बुद्धों को थोड़ी प्यार दे देगी। यही महाभारत है, यही दुख है, यही सर्वनाश है। सब प्यारे हैं, सिंहासन प्यारा है, दुशासन प्यारा है, यार प्यारा है, परिवार प्यारा है — सत्य प्यारा नहीं है। सोचो, क्या कर रहे हैं लोग? ये बाण अर्जुन पर चला रहे हैं, सारथी कौन बैठे हैं? श्रीकृष्ण। इन्हें ख़्याल तो आया होगा कि एक आध भूला-भटका बाण श्रीकृष्ण को भी लग सकता है, आया तो होगा न? और लगे भी होंगे बाण, पर अपने आग्रहों के लिए ये श्रीकृष्ण का खून बहाने से भी नहीं चूक रहे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा आज का प्रश्न ये है कि जैसे हमारे महाकाव्य रामायण और महाभारत में अक्सर ऐसे मौके आते हैं, जब सत्य और धर्म एक तरफ़ होते हैं और परंपरा तथा लोकधर्म दूसरी तरफ़ होते हैं। जैसे कि लोग विभीषण को पसंद नहीं करते, क्योंकि वो अपने भाई को छोड़कर श्रीराम की तरफ़ आ गए थे और ऐसे ही बहुत लोगों की नज़र में कर्ण हीरो हैं, क्योंकि वो अपनी दोस्ती की ख़ातिर श्रीकृष्ण के ख़िलाफ़ खड़े हो गए। तो मुझे आपसे ये जानना है कि सत्य बड़ा है या परंपरा और लोकधर्म?
आचार्य प्रशांत: हमारी निष्ठा सत्य के प्रति होनी चाहिए न, बाक़ी तो सब झुनझुना है। सत्य से ऊँचा तो कुछ भी नहीं होता न। बाक़ी सब जो ऊँचा होता है, वो इसलिए ऊँचा होता है क्योंकि वो सत्य की सेवा में होता है। अगर कोई चीज़ हम ऊँची मानते भी हैं, तो वो ऊँची तब तक ही है और सिर्फ़ इसलिए ही है क्योंकि वो सत्य से संबंधित है, वो सत्य की सेवा कर रही है तो हम उसको भी सम्मान दे देते हैं। दे देते हैं न?
आप कहीं पर जाते हो किसी से मिलने के लिए तो उसका जो स्टाफ होता है, आप उसका भी अभिवादन कर लेते हो। आ रही है बात समझ में? क्यों कर लेते हो? यही जो लोग हैं जिनको आप अभी नमस्ते कर रहे हो, आप जिससे मिलने गए हो, वो कोई ऊँचा व्यक्ति हो सकता है। ये दूसरे लोग उस व्यक्ति के साथ न हों तो क्या तब भी आप इनको नमस्कार करोगे? करोगे क्या? तो वो सब प्रतीक चिन्ह, धारणाएँ, मान्यताएँ जिनको हम कहते हैं कि ये भी नमन योग्य हैं, वो मात्र तभी तक नमन योग्य हैं जब तक वो सत्य की सेवा में हैं।




