
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा आज का प्रश्न ये है कि जैसे हमारे महाकाव्य रामायण और महाभारत में अक्सर ऐसे मौके आते हैं, जब सत्य और धर्म एक तरफ़ होते हैं और परंपरा तथा लोकधर्म दूसरी तरफ़ होते हैं। जैसे कि लोग विभीषण को पसंद नहीं करते, क्योंकि वो अपने भाई को छोड़कर श्रीराम की तरफ़ आ गए थे और ऐसे ही बहुत लोगों की नज़र में कर्ण हीरो हैं, क्योंकि वो अपनी दोस्ती की ख़ातिर श्रीकृष्ण के ख़िलाफ़ खड़े हो गए। तो मुझे आपसे ये जानना है कि सत्य बड़ा है या परंपरा और लोकधर्म?
आचार्य प्रशांत: हमारी निष्ठा सत्य के प्रति होनी चाहिए न, बाक़ी तो सब झुनझुना है। सत्य से ऊँचा तो कुछ भी नहीं होता न। बाक़ी सब जो ऊँचा होता है, वो इसलिए ऊँचा होता है क्योंकि वो सत्य की सेवा में होता है। अगर कोई चीज़ हम ऊँची मानते भी हैं, तो वो ऊँची तब तक ही है और सिर्फ़ इसलिए ही है क्योंकि वो सत्य से संबंधित है, वो सत्य की सेवा कर रही है तो हम उसको भी सम्मान दे देते हैं। दे देते हैं न?
आप कहीं पर जाते हो किसी से मिलने के लिए तो उसका जो स्टाफ होता है, आप उसका भी अभिवादन कर लेते हो। आ रही है बात समझ में? क्यों कर लेते हो? यही जो लोग हैं जिनको आप अभी नमस्ते कर रहे हो, आप जिससे मिलने गए हो, वो कोई ऊँचा व्यक्ति हो सकता है। ये दूसरे लोग उस व्यक्ति के साथ न हों तो क्या तब भी आप इनको नमस्कार करोगे? करोगे क्या? तो वो सब प्रतीक चिन्ह, धारणाएँ, मान्यताएँ जिनको हम कहते हैं कि ये भी नमन योग्य हैं, वो मात्र तभी तक नमन योग्य हैं जब तक वो सत्य की सेवा में हैं।
जो सत्य की सेवा में नहीं है, वो फिर नमन योग्य भी नहीं है।
हाँ, बिल्कुल अपने पिता को हम नमित होते हैं। होते हैं न? पिताजी हैं, नमस्कार करो। पर श्रुति हमें सिखाती है, नचिकेता के माध्यम से कि जब पिताजी ही दिखाई दें कि झूठ की सेवा में लगे हुए हैं तो उसने कहा मौत भली पिताजी से। यमराज के पास जाना पसंद करूँगा, पिताजी अब आप नमन योग्य नहीं रह गए। और पिताजी बिल्कुल नमन योग्य हैं, बिल्कुल हैं, पर कब तक हैं?
श्रोता: जब तक सत्य की सेवा में हैं।
आचार्य प्रशांत: और कोई बोले बाप की ख़ातिर झूठ भी बोलूँगा, गड़बड़ हो गई न? उसने क्या करा है, उसने बाप को सत्य से ऊपर रख दिया है। नहीं, बाप सत्य से ऊपर नहीं होता, सत्य ही बाप होता है। पर लोकधर्म इस बात को पचा नहीं पाता है।
मुझे बड़ा रोचक लगता है कि हम राम को पूजते हैं और विभीषण को धिक्कारते हैं। एक वो जो कोविड के दिनों में रामायण फिर से चली थी टीवी पर, उसकी एक क्लिप बड़ी वायरल हुई थी जिसमें कुंभकर्ण शायद कुंभकर्ण ही विभीषण को धिक्कार रहा है। वो कह रहा है, “राम होंगे कोई। मुझे भी पता है कि राम बहुत ऊँची बात है, लेकिन भाई का भाई के लिए मर जाना ही सबसे बड़ा धर्म है। और इसलिए विभीषण आगे से कोई भी अपने बच्चे का नाम विभीषण नहीं रखेगा।” ये बड़ी अजीब बात है। जो इंसान राम के लिए अपना घर, कुनबा, भाई सब छोड़कर आ गया, वो हमारी दृष्टि में धिक्कार योग्य है, ये लोकधर्म है।
भाई बिल्कुल सम्मान योग्य है, पर कब तक? जब तक भाई सत्य की सेवा में है, तब तक सम्मान योग्य है। पर देखो, लोकधर्म ने रामायण को भी कैसे विकृत कर डाला। कि “राम तो ठीक हैं, पर राम की ख़ातिर अगर भाई को ठुकराओगे तो हमसे गाली पाओगे।” माने तुम यही कह रहे हो ना कि भाई की सेवा करना राम की सेवा करने से ऊँची बात है। तो फिर तुम राम को ऊँचा कहाँ मानते हो। तुम तो भाई को ऊँचा मानते हो और यही तो चलता है, चलता है कि नहीं चलता है?
भाई की ख़ातिर झूठ बोलना बहुत अच्छी बात होती है कि नहीं होती है? भाई को बचाने के लिए कुछ भी कर देना तो अच्छी बात होती है न, “भाई कुछ भी कर देंगे।” यही बात उन सब पर लागू होती है जिनको हम श्रेष्ठ या पूजनीय मानते हैं। चाहे वो हमारे महापुरुष हों, चाहे वो हमारे पुरखे हों, चाहे वो राष्ट्र हो, जो कुछ सच के आइन है, वो पूजनीय है। लेकिन अगर वो झूठ की तरफ़ जा रहा है तो पूजनीय नहीं है। और इसका अर्थ ये भी है कि भले ही आप उसे अपना ना मानते हो, पर कोई हो पराया, बेगाना, पर अगर वो सच की तरफ़ जा रहा है तो वो भी पूजनीय है। अपना भी अगर झूठ की तफ़ जा रहा है तो पूजनीय नहीं रहा। ये मत कह दो कि “ये तो अपना है, ये तो श्रेष्ठ है, तो ये तो कुछ भी करे हम इसके साथ हैं।” नहीं, नहीं, नहीं, नहीं। ये भीड़ की उन्मादी मानसिकता है। ये नहीं करना है।
सच मेरा अपना है न, तो जो सच को अपना माने, वो मेरा अपना है। सत्य मेरा प्रेम है न, हाँ तो जो सत्य से प्रेम करे, मेरा उससे प्रेम है। कोई मेरा कैसे हो सकता है अगर वो सत्य का नहीं है। जिस क्षण कोई झूठ की तरफ़ चला जाता है, उस क्षण वो मेरे लिए पूजनीय नहीं रह जाता।
भाई के लिए झूठ का साथ दूँगा, लोकधर्म में चलेगा। कृष्णों के यहाँ नहीं चलेगा। भाई के लिए झूठ का साथ दूँगा। श्रीकृष्ण क्या बोलते हैं? लगाऊँगा एक बाण चला। भाई के लिए झूठ का साथ नहीं देना है, भाई झूठ के साथ खड़ा हो तो भाई पर ही बाण चला देना है। यही बात हमारे पवित्रता के सब प्रतीकों पर लागू होती है। राष्ट्र के लिए झूठ का साथ दूँगा। न न न न, श्रीकृष्ण क्या बोलते हैं। श्रीकृष्ण कोई हस्तिनापुर के लिए थोड़ी लड़वा रहे थे अर्जुन को। किसके लिए लड़वा रहे थे? सत्य के लिए लड़वा रहे थे। हस्तिनापुर के लिए दुर्योधन भी लड़ रहा था, दुर्योधन राजा बन जाता और हस्तिनापुर पर फिर कोई आक्रमण करता तो, क्या दुर्योधन उससे लड़ने नहीं जाता। बोलो? तो हस्तिनापुर के लिए तो दुर्योधन भी लड़ने को तैयार है। श्रीकृष्ण अर्जुन को ये थोड़ी कह रहे हैं, कि हस्तिनापुर श्रेष्ठ है। क्या कह रहे हैं? सत्य श्रीश्रेष्ठ है। अच्छे से समझ लो। हस्तिनापुर नहीं श्रेष्ठ है, सत्य श्रेष्ठ है। हस्तिनापुर बिल्कुल नमन योग्य है, पर सिर्फ़ तब तक जब हस्तिनापुर सत्य के साथ खड़ा है। जिस क्षण हस्तिनापुर सत्य के साथ नहीं खड़ा है, उस क्षण हस्तिनापुर फिर कुछ नहीं। और इसमें किंतु, परंतु, लेकिन नहीं लगाए जाते। वो अर्जुन ने लगाए थे, श्रीकृष्ण ने ध्वस्त कर दिए हैं। बात आ रही है समझ में?
या कुंभकर्ण वाला आग्रह रखना है, बड़े आत्मविश्वास के साथ वो धिक्कारता है विभीषण को। “अरे, भाई के लिए मर मिटने से बड़ी बात और कोई होती है क्या। भाई के लिए झूठ का भी साथ देना पड़े तो दो।” यही लोकधर्म है न। नहीं, किसी के लिए भी झूठ का साथ नहीं देना है। कितना अच्छा होता न कि कुंभकर्ण कहता, “विभीषण मैं तुझसे गाली-गलौज नहीं करूँगा, मैं भी तेरे साथ चलूँगा राम के पास।” कितना अच्छा होता न। पर लोकधर्म को सत्य से ज़्यादा ये सब प्यारे हैं—भाई, भतीजा, पति, पत्नी, बच्चा, ये सब कुल, कुटुंब, समुदाय। ये सब प्यारे हैं लोकधर्म को।
सत्य को तो बस ज़ुबानी कुछ जाकर के श्रद्धा-सुमन अर्पित कर दिए। “अरे नहीं, सत्यमेव जयते।” सत्य को इतना ही है ज़बान, पर जीवन किसके लिए है? जीवन तो मेरे बाक़ी आग्रहों के लिए है। और अगर कभी सत्य और बाक़ी आग्रहों में चुनाव करना पड़े तो मैं किसका चुनाव करूँगा? आग्रहों का चुनाव करूँगा। और कोई जा भी रहा हो सत्य की ओर तो उसको खूब गरियाऊँगा। कहूँगा देखो, “शत्रु के साथ जा रहा है,” और यहाँ शत्रु किसको बोला जा रहा है? सत्य को। अगर सत्य के साथ जाना शत्रु के साथ जाना है, तो इससे क्या पता चलता है कि तुम कौन हो? जिसके लिए सत्य शत्रु हो गया, वो अब कौन है? वो झूठ है, पर उसको समझ में नहीं आ रहा उसने क्या बोल दिया।
भीष्म स्वयं भी ज्ञानी थे, पर श्रीकृष्ण हँसी में लेते हैं उनको। बोलते हैं, कि तुम हस्तिनापुर के लिए प्रतिज्ञा बाँधकर बैठ गए। मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ और तुम बोल रहे हो, नहीं, मेरी निष्ठा तो राजसिंहासन के प्रति है कि जो भी कोई राजा होगा मैं कहूँगा नहीं, मुझे इसके साथ ही चलना है। राजा के साथ क्यों चलना है, श्रीकृष्ण के साथ चलना है न। राजा के साथ किस लिए चलना है, राजा तो दुर्योधन भी बन जाता, तो दुर्योधन के साथ चल देते क्या। और हुआ ही यही था, कौरवों की तरफ़ क्यों खड़े हो गए भीष्म। बोले “राजसिंहासन के साथ रहूँगा, यही प्रतिज्ञा करी थी। तो जो भी कोई राजसिंहासन पर है, मैं तो उसी को निष्ठा दिखाऊँगा।” ये लोकधर्म है, कि मेरा राज्य है तो जो भी कोई राजा है, मैं उसी के लिए निष्ठा दिखा दूँगा। ये काम भीष्म कर रहे थे। बाणों की शैया मिल गई और पूरी महाभारत करा डाली। भीष्म अगर छोड़ देते दुर्योधन को तो इतनी मारकाट नहीं होती।
ये निष्ठा का प्रश्न बहुत संवेदनशील है, किसके प्रति निष्ठा रखनी है? भगवद्गीता के छात्र हैं आप, बहुत स्पष्ट होना चाहिए। निष्ठा किसके प्रति रखनी है?
श्रोता: सत्य के प्रति।
आचार्य प्रशांत: भीष्म मत बन जाइएगा, दुर्योधन मत बन जाइएगा। और भीष्म अपनी तरफ़ से बहुत नैतिक आदमी हैं, हैं कि नहीं? कि बाप को वचन दिया था, कभी विवाह नहीं करूँगा, कुछ नहीं करूँगा। और वो वचन भी इसलिए दिया था क्योंकि बाप को विवाह करना था, वो किस्सा पता है न पूरा। अब अच्छे-ख़ासे ये मज़बूत ख़ुद जवान आदमी हैं। विवाह की उम्र हो भी रही है तो इनकी, और सोचो ये ऐसे हैं तो बाप बढ़ऊ किस उम्र के होंगे। और वो जाते हैं वहाँ, नदी में वो नहा रही थी, उसको देख लिया, और मचल गए। “बोले यही चाहिए, अभी चाहिए।” और लड़की का बाप भी धुरंधर, बोला अभी जो है लोहा गरम है। बोले अभी जो उगाहना है, उगाह लो।
बोले, “देखो, इतना बड़ा तो तुम्हारा ये पुत्र यहाँ खड़ा हुआ है। सिंहासन तो इसको मिलेगा। तुम तो ऐसे ही बुढ़ा रहे हो। अब ये जल्दी ही सिंहासन।” कौन पुत्र? भीष्म। बोले, “सिंहासन में तो ये बैठ जाएगा, मैं अपनी तुमको लड़की दे रहा हूँ, ये बेचारी क्या पाएगी, सिंहासन तो इसको मिल जाएगा।” तो पिताजी आए, मुँह लटकाए। देखो, क्या कर देती है वासना। पिताजी मुँह लटकाए आ रहे हैं भीष्म के पास और बोल रहे हैं, “बेटा, वो कह रहा है कि मेरी बेटी के बच्चे तो राज्य पाएँगे नहीं, तो मैं तो।” अब ऐसे मौके पर भीष्म क्या करते हैं, अपने आप से पूछिए, कि क्या वो करने योग्य है? ऐसा करना चाहिए? और उसी क्षण महाभारत तय हो गई थी कि अब होगी, क्योंकि एक आदमी ने बहुत गलत प्रतिज्ञा कर ली है। नैतिक तो हो गया वो, अच्छा पुत्र तो बन गया वो अपनी दृष्टि में, लेकिन सच्चाई से बहुत दूर छिटक गया वो। ये नैतिक कामों से बचा करो, लोकधर्म में भीष्म की बहुत प्रशंसा होगी। कहेंगे, “पुत्र हो तो भीष्म जैसा, कि पिता अगर मचलें तो लाकर के परोस के दे दे।” यही पुत्र का धर्म है वास्तव में।
भीष्म इतने ज्ञानी हैं, होने को तो ये भी हो सकता था ना कि ऐसे प्रतिज्ञा उठाने की जगह पिता से कहते, आओ बैठो यहाँ पर और अष्टावक्र की तरह मैं भी, बड़े हो मुझसे लेकिन तुम्हें कुछ बता सकता हूँ। ये भी तो कर सकते थे न? पर ये नहीं करा। बोले, पिता की इच्छा माने भगवान की इच्छा पूरी तो होनी चाहिए। और पिता कोई और आगे की इच्छा कर देते तो कैसे पूरी करते? यही काम भीष्म ने आगे भी करा। अंबा अंबालिका याद है। बोले, अपहरण करके ले आऊँगा। लोकधर्म में ये जायज़ है सब, चलेगा क्योंकि भाई “घर के बच्चों की शादियाँ नहीं हो रही, कुछ करना चाहिए न।” आज भी घरों में होता है कि नहीं, कि घर के बच्चों की शादियाँ नहीं हो रही, उसके लिए झूठ बोल दिया जाता है, खटके से। नहीं बोल देते? लड़के को कुछ है वो बात लड़की औरतों से छुपा दी जाती है, क्योंकि घर के बच्चे की शादी का मामला है, झूठ बोल।
भीष्म भी रथ लेके चले गए वहाँ, तीन लड़कियाँ उठा लाए — अंबा, अंबिका, अंबालिका। और उन्हीं में से फिर एक लड़की कथा है, आगे क्या बन जाती है?
श्रोता: शिखण्डी।
आचार्य प्रशांत: वो बोलती है, “मैं बताती हूँ।” मारे भी गए फिर उसी के हाथ। लोकधर्म में ये सब चलता है, वहाँ सत्य से ऊपर रिश्ते-नाते रखे जाते हैं। बाप की ख़ातिर भीष्म प्रतिज्ञा उठा लो, बच्चों की ख़ातिर जाकर अपहरण कर लो, कुछ भी कर लो। बीवी की ख़ातिर दफ़्तर में घूस खा लो और बोलो कि “ये तो मैंने घूस इसलिए खाई है, बीवी को दुबई घुमाना है, बेटे को इंजीनियरिंग करानी है, बिटिया को दहेज देना है, इसलिए घूस खाता हूँ।” घूस खाने का और कोई तर्क होता है, यही तो तर्क होता है। लोकधर्म में ये सब चलता है। ऐसे लोगों को इज़्ज़त मिल जाती है समाज में, मिलती है कि नहीं? या समाज में घूसखोरों को लताड़ा जाता है?
आपकी जान-पहचान में कितने घूसखोर हैं, हाथ खड़े करो। जिसकी जान-पहचान में एक-आध दो भी हों, खड़े करो, (श्रोता अपना हाथ उठाते हैं)। उनको जूता ले के मारते हो, मारते हो? नहीं, इज़्ज़त देते हो बल्कि। लोकधर्म में ये सब चलता है, वहाँ सत्य से ऊपर ये सब चलता है। फूफा पहुँचा हुआ घूसखोर है, कुछ नहीं है वो ऐसा ही है, ट्रक की चेकिंग किया करता है सड़क पर, ट्रक वाले से घूस नहीं ली, ट्रक ही ले लिया। एक दिन ट्रक पैक करके घर ले आया, बोला, “बच्चों खेलो।” पर आप फूफा को मारोगे थोड़ी जूता उठा के कि तुमने किसकी रोज़ी-रोटी छीन ली। तुमने तो, “फूफा जी, फूफा जी।” ये सब लोकधर्म में चलता है, वहाँ सत्य से ऊपर आग्रह होते हैं। वहाँ विभीषण को आज भी धिक्कारा जाता है, क्योंकि उन विभीषण की निष्ठा राम के लिए थी, भाई के लिए नहीं थी। वहाँ आज भी धिक्कारा जाता है विभीषण को।
कर्ण की भी निष्ठा किसके लिए थी? कर्ण भी ऐसा नहीं कि कोई मूर्ख आदमी थे, ज्ञानी है। पर कर्ण के सामने श्रीकृष्ण खड़े हो जाते हैं, अद्भुत संवाद है, उसको आप पढ़िएगा। कर्ण के सामने श्रीकृष्ण खड़े हैं, कर्ण कोई मूर्ख नहीं है। पर वही गलती कर गए, लोकधर्मी। क्या?
श्रोता: दोस्त ले लिए श्रीकृष्ण को छोड़ दिया।
आचार्य प्रशांत: भाई, दोस्त के लिए श्रीकृष्ण को भी छोड़ दूँगा। वो गलती आप भी रोज़ करते हो कि नहीं, घर में दोस्त आ गया सत्र के समय। आप श्रीकृष्ण को छोड़ देते हो कि नहीं। फिर कर्ण का क्या हुआ था? कुछ नहीं, पड़े हुए हैं। आप भी यही करते हो कि नहीं, और दोस्त हैं आपके भी दु:शासन टाइप ही कि नहीं? मौका नहीं मिल रहा, नहीं तो चीर हरण भी आपको ही दिखा दें, आप ही के घर में दिखा दे आपके दोस्त। हैं वही, लेकिन अब दोस्त आ गया है, “ए गणपत, काहे का सत्र कौन देखना है?” और दोस्त आएँगे भी उसी समय, रात का समय, दस- साढे दस का, वो आ गया है।
किस-किस के साथ हुआ है, बताना? दोस्त, यार, रिश्तेदार आ गए और श्रीकृष्ण को छोड़ दिया। जल्दी बताओ, हाथ खड़े कर दो ऐसे नहीं। अच्छा, भाई बिरादर के लिए किस-किस ने छोड़ा है? पिताजी मचल रहे थे इसलिए किस-किस ने छोड़ा है? पिताजी मचल रहे हों तो पिताजी की ख़ातिर प्रतिज्ञा नहीं कर लेते? पिताजी भी मचल रहे हों तो साफ़ बोलते हैं नचिकेता की तरह, यहाँ भीष्म और नचिकेता में अंतर आ जाता है। पिताजी मचल रहे हों तो साफ़ बोलते हैं, कि “बुढ़ऊ, ठंडे हो जाओ। बहुत प्यारी लग रही है तो उसे बहू बनाओ, उम्र मेरी है।” अब वो उसके पीछे माँ सत्यवती, माँ सत्यवती, शोभा देता है? उनसे कम उम्र की है वो। समझ में आ रही है बात कुछ?
अकेले हैं अर्जुन पूरी महाभारत में, जो सब छोड़छाड़ के खड़े हो गए हैं श्रीकृष्ण के साथ। वो भी न होते तो जान लो कि महाभारत भी न होती फिर। तो सीधे दुर्योधन को ही बनने दिया जाता, काम चल रहा था। एक दूसरा चरित्र मिलता ज़रूर पर वो उतना बलि नहीं है, विदुर का। मिलता एक और भी है वैसे, विकर्ण। पर ये सब हाशिए के हैं, वरना पूरे महाभारत में जितने हैं तो सब होशियार, समझदार, पर सबने प्राथमिकता किसको दी है? अपने नैतिक आग्रहों को, कि कोई बात बता दी गई। भीष्म के तो मन में यही रहा होगा न, “परंपरा से मुझे बताया गया है कि पिता ही भगवान होता है।” तो अब श्रीकृष्ण भी सामने खड़े हों तो श्रीकृष्ण भगवान नहीं हैं, पिता भगवान हैं। और पिता क्या हैं, ये दिख साफ़ रहा है। आप अगर आँख बंद ही न करना चाहें तो पिता की अवस्था तो दिख ही जाएगी न। आ रही है बात?
बाप हो, यार हो और चाहे हस्तिनापुर हो, किसी के प्रति निष्ठा नहीं रखी जाती। निष्ठा रखी जाती है, सत्य के प्रति।
हस्तिनापुर की गद्दी पर दुर्योधन बैठ गया। कल्पना करिए, आप क्या करोगे? आपको मालूम है, जो युद्ध हो रहा था इसमें कौरव पक्ष अपने आप को क्या नाम देता था? वो हस्तिनापुर की सेना थी, तो एक तरह से अर्जुन राष्ट्रद्रोह का काम कर रहे थे। जो अर्जुन काम कर रहे थे वो राष्ट्रद्रोह का था, वो एंटीनेशनल काम था। क्योंकि जो नेशनल फोर्स थी, जो ऑफिशियल फोर्स थी हस्तिनापुर की, वो तो उधर खड़ी थी, तो अर्जुन जो काम कर रहे हों तो राष्ट्रद्रोह का है, लोकधर्म की नज़र में। बात हस्तिनापुर की नहीं है, बात सत्य की है, और जो श्रीकृष्ण काम कर रहे हैं वो राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा है, सच्ची से सच्ची सेवा है।
क्या बेहतर होता कि भीष्म की तरह श्रीकृष्ण भी कह देते, कि “जिधर राजा है उधर मैं हूँ?” तो अगर श्रीकृष्ण भी ये कह देते तो क्या होता? तो श्रीकृष्ण को भी कहाँ जाकर खड़ा होना पड़ता? दुर्योधन के साथ। और दुर्योधन के साथ अगर श्रीकृष्ण भी खड़े हो जाएँ तो क्या होता हस्तिनापुर का और पूरे भारत का? हो जाती राष्ट्र की सेवा? तो राष्ट्र की सेवा के लिए फिर ज़रूरी था कि हस्तिनापुर का विरोध किया जाए, इसी में राष्ट्र की भलाई है, इसी में राष्ट्र के प्रति प्रेम है। आ रही बात समझ में?
जैसे बाप की भलाई होती, कि आए हैं भीष्म के पास और भीष्म भगा देते, या भीष्म बोलते, “मम्मी गंगा” क्योंकि थी तो वो भी पानी में ही, और सब नदियाँ गंगा भई। भीष्म ये भी तो कर सकते थे, कि “माता जी, आप तो मुझे जन्म देकर चली गईं।” भीष्म की माताजी कौन हैं?
श्रोता: गंगा।
आचार्य प्रशांत: बोले, “आप तो चली गईं और देखिए पीछे पापा क्या कर रहे हैं।” ये भी तो कर सकते थे, समझो बात को। पर न तो उन्होंने सत्य का उपदेश दिया पिताजी को, न माता जी को बुलाया कि “माता प्रकट हो जाओ, ज़रा इनको सेंट करो।” कुछ नहीं करा, वो सीधे उन्होंने भीष्म प्रतिज्ञा की, कि “आप कर लीजिए विवाह, मैं न तो कभी सिंहासन पर स्वयं बैठूँगा, न विवाह करूँगा, ताकि मेरी भी आने वाली पुश्तें सिंहासन पर दावा करें, ये संभावना भी ख़त्म हो जाए।” ये उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली। और यही नहीं, इसके आगे, “जो भी कोई उस सिंहासन पर होगा मैं उसकी सेवा करूँगा।”
ये सरकारी नौकरी जो मैंने छोड़ी थी, उसकी एक वजह ये भी थी। शर्त वहाँ यही थी, कि जो भी कोई सिंहासन पर होगा तुम उसकी सेवा करो। मैं क्यों करूँ? नहीं करूँगा। मेरी निष्ठा सिंहासन के प्रति नहीं है, सत्य के प्रति है। मुझे सत्य को सिंहासन पर बिठाना है। वो होना चाहिए न जीवन का उद्देश्य। या जो भी कोई जाकर सिंहासन पर बैठ गया मैं उसी का सेवक हो जाऊँ, बोलो। तो जब श्रीकृष्ण सामने हों तो अर्जुन बनो, भीष्म नहीं। अर्जुन बनो, कर्ण नहीं।
दुर्योधन बुरा है, ये बोलना आसान है। लोकधर्मी के लिए मुश्किल होता है ये बोलना, कि भीष्म और कर्ण भी बराबर के बुरे हैं। क्योंकि दोनों ही ले देकर श्रीकृष्ण के ख़िलाफ़ तो खड़े हैं। दुर्योधन को तो सब बुरा बोल देते हैं, दुर्योधन, दुर्योधन। भीष्म भी बराबर के बुरे हैं, कर्ण भी बराबर। दोनो श्रीकृष्ण के ख़िलाफ़ तो खड़े हैं न, किसके साथ खड़े हैं? कोई कह रहा, “यार के साथ खड़ा होना है दोस्ती की बात है, यार का उपकार है। मैं तो कुछ नहीं था, उसने मुझे राजा बना दिया, यार का उपकार उतारना है।” यार का उपकार बड़ा है या सत्य का उपकार बड़ा है?
महल्ला नवाँ में कहते हैं, “तन मन जे तोको दियो, तासे नेहु न कीन। अब क्यों डोरत बावरे, यूँ बनकर दीन।”
तन धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन।। ** कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन।।**
सबसे बड़ा उपकार तो सत्य का है, मैं जो कुछ भी हूँ उसकी वजह से हूँ और उससे ही नेह नहीं कर पाता मैं। नेह माने, प्रेम। सबसे प्रेम दिखाने चले जाते हो, परम से प्रेम नहीं दिखा पाते। कभी ग़ौर किया है? सबसे प्रेम होता है हमारा, बड़े प्रेमी हैं। कहते हैं, “ये हैं, देखिए ये मिसिज़ शर्मा हैं। अरे अरे अरे, बड़ी प्रेमी महिला हैं सबसे प्रेम करती हैं। कुत्ते से भी प्रेम करती हैं, सबसे प्रेम करती हैं।” बहुत अच्छी बात, सबसे प्रेम करना। बिल्कुल करो, सब पशु पक्षियों से प्रेम करो। बस एक से उनका प्रेम नहीं है। किससे?
श्रोता: सत्य।
आचार्य प्रशांत: उसके अलावा सबसे प्रेम है। देखा हमारे जीवन में सबसे कम प्रेम हम किसको देते हैं, बस गनीमत ये रह जाती है कि उसको आपके प्रेम की कोई दरकार नहीं है। अगर वो बेचारा भी आपके प्रेम पर आश्रित होता तो भूखों मर गया होता। क्योंकि ये संसार किसी को भी प्रेम दे सकता है, उसको प्रेम नहीं दे सकता, बहुत मुश्किल है।
धनिया बुद्धू को प्यार कर सकती है, बुद्ध को थोड़ी प्यार कर पाएगी। आप कल्पना करिए न, आप धनिया हैं। आपके सामने आप ही के जैसा कोई मिस्टर धनिया खड़ा हो जाए, खट से प्यार वग़ैरह आगे बढ़ जाएगा, एकदम मज़ा आ जाएगा। कोई दिक़्क़त नहीं है, और आपके सामने बुद्ध ही खड़े हो जाएँ तो आपकी क्या हालत होगी? प्रेम का पकोड़ा बन जाएगा, ख़त्म बात। कुछ नहीं होगा, ये होता है।
ये दुनिया किसी को भी प्यार दे सकती है। कृष्णों, बुद्धों को थोड़ी प्यार दे देगी। यही महाभारत है, यही दुख है, यही सर्वनाश है। सब प्यारे हैं, सिंहासन प्यारा है, दुशासन प्यारा है, यार प्यारा है, परिवार प्यारा है — सत्य प्यारा नहीं है। सोचो, क्या कर रहे हैं लोग? ये बाण अर्जुन पर चला रहे हैं, सारथी कौन बैठे हैं? श्रीकृष्ण। इन्हें ख़्याल तो आया होगा कि एक आध भूला-भटका बाण श्रीकृष्ण को भी लग सकता है, आया तो होगा न? और लगे भी होंगे बाण, पर अपने आग्रहों के लिए ये श्रीकृष्ण का खून बहाने से भी नहीं चूक रहे।
भीष्म को धर्म का इतना ज्ञान है, महाभारत में कई अवसरों पर भीष्म उपदेश देते हैं बाकायदा। धर्म का उपदेश दे रहे हैं भीष्म और बड़ा अच्छा है, वो पढ़ने लायक है। वास्तव में प्राणियों को सताना नहीं चाहिए, हिंसा नहीं करनी चाहिए, किसी भी प्रकार माँस का सेवन नहीं करना चाहिए। इसको लेकर भी भीष्म ने बड़े अच्छे उपदेश दिए हैं, उद्धरित भी किया है मैंने पहले। तो भीष्म वैसे तो धर्म के बड़े ज्ञाता हैं, सब अच्छा-बुरा जानते हैं, पर उनके भी बाण तो श्रीकृष्ण की ही दिशा में जा रहे हैं न। लगे भी होंगे, कि नहीं लगे होंगे?
इसीलिए हमारी भगवद्गीता में श्रीकृष्ण फूलों का हार पहनकर नहीं खड़े हैं। क्योंकि गीता के श्रीकृष्ण सारथी हैं और कहाँ फूलों का हार पहन कर घूम रहे होंगे? हमारी गीता में श्रीकृष्ण लहूलुहान हैं और वो सब बाण उन्हें लोकधर्मियों ने मारे हैं, नैतिक लोगों ने मारे हैं। बुरे लोगों ने नहीं मारे, तथाकथित अच्छे लोगों ने मारे हैं। किसी की निष्ठा बाप के लिए है, किसी की यार के लिए है, किसी की सिंहासन के लिए है। सबकी अपनी-अपनी निष्ठाएँ हैं और सब श्रीकृष्ण पर बाण चलाने को तैयार हैं। ये जो आपकी इधर-उधर की निष्ठाएँ होती हैं न, यही महाअधर्म है। आपको समझ में क्यों नहीं आ रही बात?
सौ तरह की बटी हुई निष्ठाओं को ही कहते हैं, अधर्म। क्योंकि सीधे-सीधे तो कोई बोलेगा ही नहीं, कि मैं श्रीकृष्ण-द्रोही हूँ। सीधे कोई नहीं बोलता। सब बोलते हैं, श्रीकृष्ण अच्छे हैं, श्रीकृष्ण अच्छे हैं, सब बोलते हैं। श्रीकृष्ण अच्छे हैं, बोलना बहुत गड़बड़ बात है। श्रीकृष्ण को अच्छा नहीं होना है, श्रीकृष्ण को सबसे अच्छा होना है। परम को प्रथम होना होगा, कि श्रीकृष्ण अगर सामने आएँगे तो अपनी सारी प्रतिज्ञाएँ भूल जाऊँगी। कौन बाप, कौन भाई, कौन राजा, क्या सिंहासन, माँ-बाप, कोई लेना-देना नहीं। सब प्रतिज्ञाएँ तोड़ देनी हैं, कुछ नहीं, कसमे, वादे, प्यार, वफ़ा, क्या रखा है इसमें। कुछ नहीं, सब छोड़ दिया।
आपसे कहा था न कि मेरे पास आना तो काम पूरे करके मत आना, काम छोड़ कर आना। जो अपनी पुरानी वरीयताएँ छोड़ नहीं सकता, जो अपनी पुरानी प्रतिज्ञाएँ तोड़ नहीं सकता, वो मेरे पास आए भी नहीं। जो श्रीकृष्ण को प्रथम रख सके बस वही यहाँ पर आए, स्थान तो वरना सभी उन्हें दे देते हैं। कोई चौथा, पाँचवा, अठारहवाँ, छ: सौवाँ स्थान, ऐसों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। पूरा महाभारत भरा हुआ है ऐसे ही दृष्टांतों से।
मूर्ख तो धृतराष्ट्र भी नहीं है, धृतराष्ट्र न हों तो भगवद्गीता का पहला श्लोक ही किसका है?
श्रोता: धृतराष्ट्र।
आचार्य प्रशांत: उसके बाद कुछ नहीं बोलते। उन्हें भी जानना है, कि बताओ क्या चल रहा है। तो एक स्तर कौतूहल तो उनमें भी है। वो जिज्ञासा भी बन सकती। पर उनके लिए भी श्रीकृष्ण से आगे कौन है?
श्रोता: उनके बेटे।
आचार्य प्रशांत: और अंदर की बात समझो। श्रीकृष्ण जब भी गए हैं धृतराष्ट्र के सामने, धृतराष्ट्र ने बहुत सम्मान दिया है। अपने सिंहासन से खड़े हो गए हैं। ये तक कहा है श्रीकृष्ण को, “आइए आप, आप यहाँ आए हैं तो सामने नहीं बैठेंगे, आप मेरे सिंहासन पर बैठिए।” बहुत सम्मान दिया है। लेकिन संजय अगर धृतराष्ट्र को बताते न, कि एक बाण आकर लगा है और श्रीकृष्ण नहीं रहे अब, तो धृतराष्ट्र को खुशी होती। और बाण तो लग ही सकता है भाई, सगुण हैं, अभी तो पुरुष ही हैं, मनुष्य हैं सामने, इसी रूप में हैं न। अंत भी उनका बाण लगने से ही हुआ था। शारीरिक मृत्यु कैसे हुई थी? बाण लगने से ही हुई थी। इतने बाण बरस रहे हैं चारों तरफ़ और छोटे-मोटे नहीं हैं। वहाँ तो सब महायोद्धा हैं, महायोद्धाओं के बिल्कुल तगड़े वाले अस्त्र। लग सकता था, श्रीकृष्ण को कुछ हो सकता था। दुर्योधन तो छोड़ो, धृतराष्ट्र भी प्रसन्न नहीं होते। दिखाते यही, कि “अरे-अरे ये क्या हो गया? श्रीकृष्ण की हानि हो गई, ये क्या हो गया।” दिखाते यही, पर भीतर ही भीतर उन्हें खुशी होती।
हम यहाँ धृतराष्ट्र की नहीं, आपकी बात कर रहे हैं। अगर कभी ये स्थिति आएगी न, कि सत्य में और पारिवारिक आग्रह में एक को चुनना पड़े और उसमें सत्य हारेगा या मारा जाएगा, आपका ही एक हिस्सा होगा जो मुस्कुराएगा। आप बहुत खुश होओगे।
कुंती, अब ये सब कथा है ठीक है कि उनको वर मिला था दुर्वासा ऋषि से, कि आप जिस भी देवता का आह्वान करें देवता आपके सामने प्रकट हो जाएँगे। ये सब ठीक है। धरातल पर क्या बात हुई होगी? सूर्य से प्रेम था कुंती का, ठीक। कुंती विवाहिता तो है नहीं, कर्ण पैदा हो गए। और फिर कुंती ने क्या करा? बच्चा ही बहा दिया। समाज और समाज से मिलने वाली इज़्ज़त बड़ी चीज़ हो गई, प्रेम से। लो हो गई अब महाभारत, अब होगी महाभारत। वो तुम्हारे प्रेम का फूल था और तुम उसको बहा आई। और अब जीवन भर अपनी आंखों के आगे तुम उसकी दुर्दशा होती देखती रही। लेकिन सामाजिक इज़्ज़त — “मैं तो रानी हूँ, मैं तो राष्ट्रमाता हूँ, मैं कैसे बता हूँ कि लोकधर्म की सीमाओं से आगे जाकर प्यार किया था मैंने कभी। कैसे बता दूँ? भले ही जिससे मैंने प्यार किया वो सूर्य जैसा तेजस्वी हो, मैं कैसे बता दूँ।”
और पूरी महाभारत कहती है, कि कर्ण को हराना बड़ा मुश्किल था क्योंकि सूर्य का प्रताप था उनमें। और अंत में भी वो इसीलिए हारे क्योंकि सूर्य ने उनको जो दे रखा था वो आकर अर्जुन के जो पिताजी थे, इंद्र, वो उनसे छल से माँग कर ले गए। बोले, ये उतार दो तुम अपना कवच-कुण्डल सब हमको दे दो। तो वो अपना लेकर चले गए, तो फिर कर्ण मारे गए। नहीं तो? अब ये सब प्रतीक हैं, समझा करो। इंद्र ऊपर से उतरे नहीं हैं, ब्राह्मण बन कर भिक्षा नहीं माँगी। क्या बात बोली गई है, इशारा समझिए। एक ऊँचा प्रेम प्रसंग था और उससे एक अद्भुत संतान का जन्म हो रहा है। बहुत प्यारी बात होनी चाहिए थी न ये। पर प्यारी बात नहीं है, दुनिया की नजरों में मेरी इज़्ज़त गिरनी नहीं चाहिए। क्योंकि लोकधर्म ने कहा है कि “बिना शादी के तुमने प्रेम कैसे कर लिया और ये बालक कहां से आ गया।” तो मेरा सम्मान दुनिया की नज़रों में कम नहीं होना चाहिए, लो बचा लो अपनी इज़्ज़त।
जिनके लिए इज़्ज़त प्रेम से बड़ी हो जाती है — गए।
और न जाने कितने उदाहरण आएँगे। धृतराष्ट्र वैसे क़ाबिल आदमी थे। बस समस्या क्या थी?
श्रोता: आँखे।
आचार्य प्रशांत: तो जैसे अष्टावक्र का अपमान किया गया था देह को लेकर, वैसे ही धृतराष्ट्र का अपमान हुआ। द्रोपदी के द्वारा नहीं और पहले उनको सिंहासन ही नहीं दिया। किसको दे दिया? छोटे भाई को, पांडु को। हालाँकि पांडु जब चले गए तो फिर राजा कौन बन रहे हैं, और लंबी अवधि तक कर रहे हैं शासन। तो पहले ही उनको दे देते न, पहले ही दे देते, पर बोल दिया, “नहीं, इसके तो आंखें नहीं हैं, तो ये कैसे कर सकता है।” देह बड़ी है, क्षमता, क़ाबिलियत, बोध, ये सब बाद की बातें हैं। लो होगी अब महाभारत।
जहाँ-जहाँ भी आध्यात्मिक सिद्धांतों का उल्लंघन होगा, वहां ही महाभारत खड़ी होगी।
विदुर की कोई सुनने को तैयार नहीं है। बताओ क्यों? क्योंकि उनको बोल दिया, ये तो दासी से पैदा हुए हैं। ये आ गई न वर्ण व्यवस्था! जाति खड़ी हो गई न! तो जहाँ जाति खड़ी होगी वहाँ महाभारत भी होगी। एकलव्य का अंगूठा काट लिया, बोलो क्यों?
श्रोता: शिष्य मोह।
आचार्य प्रशांत: शिष्य मोह, कि ये तो आगे निकल जाएगा मेरे अर्जुन से। और वो तो क़बीला था, आज की भाषा में कहें तो एस.टी. था। वो आगे निकला जा रहा था, वो भी बिना औपचारिक प्रशिक्षण के। जैसे मुझसे पूछते हैं, तुम्हारा गुरु कौन है? उसने भी ख़ुद ही कर मारा था। ग़लती बेचारे से बस ये हो गई कि बताने चला गया, कि मैंने सब सीख लिया और इतना बढ़िया सीख लिया है। बोले, “अच्छा, कैसे सीखा?” बोले, “आपकी बस एक प्रतिमा लगा रखी थी।” बोले, “तो फिर तो मैं ही गुरु हूँ, लाओ दक्षिणा दो।” अब महाभारत होगी न, होगी न।
ये सब आध्यात्मिक सिद्धांतों के उल्लंघन हमें दिखाई दे रहे हैं। अध्यात्म यूँ ही नहीं होता है, जब अध्यात्म नहीं होता तो महाभारत होती है। फिर ब्रह्मास्त्र चलते हैं, फिर महाप्रलय होती है, फिर पूरा देश मिट जाता है। महाभारत युद्ध के बाद का जो वर्णन है भारत देश का, वो कोई अच्छा वर्णन थोड़ी है। कोई नहीं बचा था, सब समाप्त। जो जीते थे, वो भी समाप्त। ये तीन वृद्ध लोग बचे हुए थे, गांधारी, कुंती, धृतराष्ट्र। ये जंगल चले गए, ये आग में मर गए। श्रीकृष्ण वापस जाते हैं तो वहाँ सब यादवों में गृहक्लेश हो गया। वो आपस में मर गए सारे। महाभारत के बाद जो होती है, वो और बर्बादी है। किसी को उससे कुछ लाभ थोड़ी हुआ।
ये सब देखकर पांडव विरक्त हो गए, वो बोले, हम भी जा रहे हैं। वो पहाड़ पर चढ़ गए, एक-एक करके मरते गए। युधिष्ठिर के साथ बचा, कुत्ता। कोई नहीं बचा, महाभारत के बाद भी कोई नहीं बचा। फिर बोल रहा हूँ, जहाँ कहीं भी परम के अलावा किसी को प्रथम बनाओगे, नतीजा बहुत दुखदाई होगा। निष्ठा न सिंहासन के लिए रखो, न बाप के लिए रखो। निष्ठा बस ‘आपके लिए’ रखो। जब श्रीकृष्ण हों साथ तो और इधर-उधर की क्या बात।
और प्रतिज्ञाधारी तो ख़ास तौर पर संभल जाएँ, क्योंकि पहले सेनापति ही कौरवों की ओर से भीष्म ही थे। बड़ा भरोसा था दुर्योधन को भीष्म का। बहुतों का ये है, कि अब हम क्या करें? बहुत देर हो गई, हमने पुरानी प्रतिज्ञाएँ कर ली हैं। कोई प्रतिज्ञा नहीं, हटाओ। ये करिएगा आप लोगों के लिए बोधकार्य है कि महाभारत में ही कितने उल्लेख हैं और कौन-कौन से चरित्र हैं, जिन्होंने सत्य की जगह किसी और को चुना और नतीजा बर्बादी पाया।
ये कृपाचार्य, कृपवर्मा, ये भी खड़े हुए थे दुर्योधन की तरफ़, क्या बोल के? ये बोल रहे हैं, “हम तो गवर्नमेंट एंप्लॉई हैं, हम तो राज्य के कर्मचारी हैं न। जिधर राज्य खड़ा है, उधर हमें भी खड़ा होना पड़ेगा। तो ये खड़े हो गए, बोले, “दुर्योधन के ही खाए-पीए पर हम चलते हैं, हमारी तनख़्वाह उसी से आती है। आज तक उसी ने हमें पाला है। तो अब जब लड़ाई होगी तो उसी की ओर खड़े हो जाएँगे।” लो हो गई महाभारत।
द्रोण को क्या पड़ी थी उधर खड़े होने की? उनका भी वही था। इन-हाउस कोच हूँ मैं तो। आप कुछ हो, सबसे पहले आपको श्रीकृष्ण का प्रेमी होना पड़ेगा। बाक़ी आपकी सब वरीयताएँ, सब पहचाने दो कौड़ी की हैं, हटाओ सब। वो शकुनी, वो दहेज में आया था। देखो दहेज प्रथा कितनी दूर तक जाती है, गांधारी आई थी वहाँ अफ़गानिस्तान से। बहुत सारा बक्से लाए गए थे। एक बक्सा खोला गया तो उसमें से ये निकला। हाँ ये छोटे ही थे। तो फिर दुर्योधन पैदा हुआ तो उससे दोस्ती हो गई इनकी।
और उसका भी बाद में विद्वानों ने मनोविश्लेषण करा है। तो बोलते हैं, “उसको चिढ़ थी, खुंदक थी कि ये मेरी सोने जैसी बहन, इसको अंधे से क्यों बाँधा।” बोला, “मैं इसको तबाह कर दूँगा सब।” उसने भी अपने आग्रहों को किससे ऊपर रखा? सत्य से ऊपर रखा।
द्रोपदी को कोई पाँचों से प्रेम था? बोलो। वो तो वहाँ पर सबको छोड़-छाड़ कर कर्ण को ठुकरा करके अर्जुन के लिए आई थी। सौ आसमानों को और तीन जहानों को छोड़ के आई तेरे लिए। वो सब छोड़-छाड़ कर वहाँ पर किसके लिए? कर्ण ने तो वो आँख भेद ही दी थी। एकदम बीच में चिल्ला के बोलती है, “नहीं भैया, तू हट।” अब देखो यहाँ भी गड़बड़ है न। कर्ण को भी क्यों हटा रही हैं द्रोपदी? कि ये सूतपुत्र है। आ गई न जात बीच में। और कर्ण को मिल गई होती द्रोपदी तो होता युद्ध? वो अपना मस्त।
और फिर वो प्रसन्न रही होंगी द्रोपदी कि अर्जुन बढ़िया धनुर्धर, सर्वश्रेष्ठ। वो आकर बोलती है, पाँचों बाँट लो। आपको कैसा लगे? आपका अफ़ेयर है। और आप वहाँ घर जाएँ, कहा जाए, ये चार बड़े भाई हैं। प्रेम से ऊपर यहाँ भी किसको रख दिया?
श्रोता: भाई।
आचार्य प्रशांत: और यहाँ पर भी फिर से उसने ही किया जिसने पहले भी प्रेम से ऊपर कुछ और रखा था। किसने? कुंती ने। कुंती को प्रेम समझ में ही नहीं आया जीवन भर, न अपना, न द्रोपदी का। और पाँचों ने मान भी ली, धर्मराज ने भी ये अधर्म मान लिया। अब धर्मराज हो तुम, तो मना करते कि ये क्या करवा रही हो माँ। उन्होंने भी ऐसे द्रोपदी को देखा, बोले, “हाँ, ठीक है। माँ की आज्ञा है बदतमीजों मना थोड़ी करते हैं।”
तो यही बोधकार्य है, महाभारत में खोज के निकालिए कि किस-किस पात्र ने कहाँ-कहाँ पर सत्य से ऊपर कुछ और रखा है। हमारे दुर्योधन भाई, उनको पहले बोला श्रीकृष्ण ने युद्ध से पहले ये दोनों इकट्ठे पहुँच गए थे। दुर्योधन थोड़ा पहले ही पहुँच गए थे, पर वो जाकर खड़े हो गए थे सर पर। आदमी सो के उठेगा तो पहले सामने देखेगा, पाँव की ओर। तो वहाँ अर्जुन खड़े हैं, जबकि अर्जुन बाद में आए थे।
दुर्योधन भाई बड़े प्रसन्न, हमें सेना मिल गई है श्रीकृष्ण की। अगर दुर्योधन ने हट के श्रीकृष्ण ही माँग लिए होते तो महाभारत होती? देखो, वहाँ भी उन्होंने श्रीकृष्ण से ऊपर किसको रख दिया? श्रीकृष्ण की सेना को। “प्रभुता को सब कोई भजे, प्रभु को भजे न कोय।” प्रभुता को भज लिया, प्रभु को नहीं भजा। कितने ही मौके थे जब महाभारत टल जाती, पर श्रीकृष्ण किसी को नहीं चाहिए थे, इसीलिए महाभारत होकर रही।