बाहर गति रहे, भीतर ठहराव

Acharya Prashant

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बाहर गति रहे, भीतर ठहराव
दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मैं कृष्णमूर्ति जी को भी सुन रहा हूँ, गीता और अष्टावक्र गीता के साथ-साथ। तो एक मैं रिलेट करना चाह रहा था। जैसे गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहम् है, प्रकृति है, सत्य है। फिर एक श्लोक में श्रीकृष्ण अहम् को झूठा साबित कर देते हैं कि अहम् है नहीं। त्रिगुणात्मक प्रकृति का जो खेल चल रहा है, उसमें अहम् एक झूठी मान्यता के साथ जीता है। फिर अष्टावक्र भी कहते हैं कि बाहर और अंदर प्रकृति का खेल चल रहा है। अहम् की सत्ता नहीं है।

लेकिन फिर अभी जैसे माता जी का देहाँत हो गया करीब दो महीने पहले, तो पीड़ा पर सॉरो पर कृष्णमूर्ति जी के काफ़ी वीडियोज़ देख रहा था। वो शब्द यूज़ करते हैं कि जो सॉरो है या पेन है, तो अद्वैत वहाँ है, जब मैं सोचता हूँ कि मैं हूँ और मुझे पेन है। बट जब द्वैत में और जैसे ही हम मतलब ये बताते हैं, कि फिर हम सोचते हैं कि इस पीड़ा को कम कैसे करूँ, वहीं हम फँस जाते हैं। और जब अद्वैत में आते हैं तो फिर ये लगता है कि मैं ही वो पीड़ा हूँ, मतलब मेरी कोई अलग सत्ता नहीं। जिस समय मैं कष्ट में हूँ, उस समय उस कष्ट के अलावा मेरी कोई भी पहचान नहीं है। मैं सिर्फ़ वो कष्ट हूँ, तो मैं फिर कुछ भी नहीं कर सकता उस कष्ट को हटाने के लिए, क्योंकि उस कष्ट के अलावा मेरी कोई आइडेंटिटी ही नहीं है।

सिर्फ़ अवेयरनेस के अलावा, मतलब कोई चॉइस नहीं रहती। तो जो चॉइसलेस अवेयरनेस, जो फिर बोलते हैं कि जब तुम ही कष्ट हो तो उसको कैसे कम करोगे या हटाओगे, उससे दूर कैसे जा पाओगे? तो ये दो चीज़ों में, मतलब एक ओर ये कहा जा रहा है कि प्रकृति का खेल अंदर-बाहर सब झूठ है, मतलब तुम झूठे हो। फिर कृष्णमूर्ति जी कह रहे हैं कि तुम ही कष्ट हो या जो तुम्हारी मनोदशा है, मन की तुम्हारी।

आचार्य प्रशांत: वो कह रहे हैं यदि तुम हो तो तुम कष्ट हो। आप ये जान लीजिए कि मैं हूँ ही नहीं, सब प्रकृति में प्रक्रियाएँ मात्र हैं। तो जो कुछ भी कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, उसको सुनने की, पढ़ने की फिर कोई ज़रूरत नहीं बचेगी। कृष्णमूर्ति अपनी सारी बातें अहम् से कर रहे हैं ना। बात उससे करी जाती है जो होता है। अभी मेरे सामने स्क्रीन पर कोई ना हो तो मैं किससे बात करूँगा? अहम् जब अपने आप को मानता है कि मैं हूँ, तब उससे बात करी जाती है और उसे कुछ सलाह दी जाती है। अगर अहम् पहले ही श्रीकृष्ण की बात सुन ले कि वो है ही नहीं, तो फिर उसे किसी सलाह की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी क्योंकि सलाह लेने के लिए वो बचेगा ही नहीं।

जब कह रहे हैं कृष्णमूर्ति कि अहम् ही दुख है या कि मैं ही दुख हूँ, तो कह रहे हैं कि यदि तुम हो तो तुम दुख हो। पर तुम हो कि नहीं हो, ये तो तुम्हारे हाथ की बात है। अज्ञान है तो तुम हो। और अगर तुम हो तो एक चीज़ पक्की है — तुम्हारा होना ही तुम्हारा दुख है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मतलब पृष्ठमाला ज़्यादा उपयोगी रहेगा, अगर मैं बराबर याद करने का निरंतर अगर अभ्यास करूँ, क्योंकि ये मन मान नहीं पाता आचार्य जी न। जब कष्ट होता है तो लगता है कि नहीं, मैं इससे अवलोकन करके, इसको देख के फिर इससे अलग हो जाऊँगा। हो नहीं पाता, फिर पीड़ा और बढ़ जाती है। तो वहाँ पर थोड़ा-सा कृष्णमूर्ति जी का लगा कि जब पीड़ा तुम ही हो तो कर क्या सकते हो?

आचार्य प्रशांत: आप ये देखते हो न कि सब कुछ एक प्रक्रिया मात्र है, तो ऐसा नहीं होता कि दुख हट जाता है। एक गहराई आ जाती है, एक गहराई आ जाती है बस।

आपकी माता जी की मृत्यु हुई। आप कृष्णमूर्ति जी को सॉरो पर सुनने लगे। मेरे पिताजी अभी गए, मैं उनको उसी गाड़ी में रखकर गंगा तक ले गया, जिस गाड़ी में मैंने उनको कई बार घुमाया था। और मैं जा रहा था, पता नहीं मैं जग रहा था कि सो रहा था। और मैंने देखा कि मेरा जन्म हुआ है और मुझे अस्पताल से लेकर आ रहे हैं। मैंने देखा, एक दिन वो मुझे अस्पताल से लेकर आए थे और एक दिन मैं उन्हें गंगा के पास लेकर जा रहा हूँ।

और ये देखने में शांति थी और मैं दोनों घटनाएँ एक साथ देख रहा था। मैं बस, मेरा अभी जन्म हुआ है और वो मुझे अस्पताल से ले आ रहे हैं। और मैंने देखा कि मैं उन्हें उसी गाड़ी में रख के ले जा रहा हूँ। तो मैं आधा शायद सोया हुआ था कुछ था। कुछ उससे ऐसा नहीं होता कि तथ्यों के तल पर बदल जाता है। लेकिन एक मैक्रो, जिसे बिग पिक्चर व्यू कहते हैं न, वो दिखाई देने लग जाता है। प्रक्रिया है, ये होता है।

और मैंने कहा, अगर प्रक्रिया ही है और ऐसे ही चलना है कि एक दिन गाड़ी पर आओगे, एक दिन गाड़ी पर जाओगे, तो फिर ये भी विचार आया कि अच्छा, इसी गाड़ी पर एक दिन मैं भी जाऊँगा। फिर विचार और आगे भी गया, सोचने लगा। लेकिन वो जो भी था, उसने उत्तेजना या उन्माद नहीं दिया। उसमें दिखाई दिया कि ऐसे ही तो होता है और ऐसे ही होना है। तो उसमें फिर आप कैसे बात को व्यक्तिगत ले सकते हो कि आपके साथ हुआ है या सिर्फ़ आपके ही साथ हो रहा है।

जिसको आप अपना पिता कहते हो, उसका काम है, एक दिन वो आपको अस्पताल से ले कर आता है। और जिसको आप बेटा कह रहे हो, वो एक दिन बाप को छोड़कर आता है, और ये घर-घर में हो रहा है, ये होना ही है। ऐसे भी कह सकते हो कि जिस दिन बेटा पैदा होता है, उस दिन बाप की मृत्यु पैदा होती है, ऐसे भी कह सकते हो। कहा गया है कि माँ-बाप बच्चे को सिर्फ़ जन्म नहीं देते, वो जन्म के साथ उसे मौत भी दे देते हैं। क्योंकि उन्होंने पैदा करा है, काहे के लिए उसको? मरने के लिए ही तो पैदा करा है। अब वो पैदा हुआ है तो मरेगा भी। तो जन्म ही नहीं दिया, साथ में मृत्यु भी दे दी है।

जो बुद्ध की और उस महिला की कहानी है, जिसका बेटा था वो मर गया था। बुद्ध ने उसको क्या दर्शाया था? जब वो बुद्ध के पास आ गई थी कि उसको लगा, चमत्कार वग़ैरह कुछ कर देंगे, बाबा जी हैं, बेटा लौटा देंगे। वो बुद्ध के पास आ गई, कि मेरा बेटा चला गया है, वो लेके आई थी अपने। “ये है, बच्चा है छोटा, ये वापस चाहिए, आप दिलाइए।” तो बुद्ध ने उसको यही तो दर्शाया — “ये होता है, ये होना ही था, तू अकेली नहीं है जिसके साथ ये हो रहा है। ना ये पहली बार हुआ है, ना आख़िरी बार हुआ है। यहाँ कोई अपवाद नहीं होते, कोई विशिष्ट नहीं है।”

अहंकार अपने आप को अपवाद मानता है, अहंकार को लगता है, मेरे ही साथ हो रहा है। वो मेरे साथ नहीं हो रहा, वो तो सबके साथ होता है, वो तो होना ही है। आपकी मूर्खता है अगर आप सोच रहे हो कि आप अलग हो। आप अलग नहीं हो, आप उस धारा का हिस्सा हो। और जो कुछ उस धारा का हिस्सा है, वो धारा के साथ ही तो बहेगा न। वो धारा से छिटक करके अपनी कोई अलग यात्रा या अपना अलग वजूद तो नहीं बना सकता।

तो जो चीज़ निश्चित है उसको निश्चित ना मानना, जो चीज़ प्रकृति की है उसको प्रकृति का ना मानकर आत्मिक मानना, यही तो भ्रम होता है ना।

तो गुणों में गुण ही बरत रहे हैं।

**उड़ जाएगा हंस अकेला। गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला।।

बहुत सुंदर है, कबीर साहब का। सोचते हैं इस बार के संत सरिता में कर ही लेंगे — "उड़ जाएगा हंस अकेला।" बस ये ना हो जाए कि बहुत लोगों को एक झटके में ही निर्वाण प्राप्त हो जाए उससे, वो नहीं होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, लगता है कि गीता और उतरेगी तो प्रक्रिया को प्रक्रिया की तरह देखना थोड़ा…। अभी तो उतना नहीं हो पाया है, वेदना जब उठती है तो प्रक्रिया को लिप्त हो जाते हैं उसमें।

आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि हम तथ्यों का अवलोकन नहीं करते न। बुद्ध ने उस स्त्री को यही तो बोला था, तुम जाओ और तथ्य देख के आओ इस संसार का। वो तथ्य ही देखने गई। बुद्ध ने उसको बोला था, “जाओ और किसी ऐसे घर से बस थोड़ा-सा कुछ ले आओ, दाल-चावल, कुछ बोला होगा।” बोले, “किसी ऐसे घर से कुछ ले आओ जहाँ आज तक कोई मौत न हुई हो।”

तो वो दौड़ी-दौड़ी, हड़बड़ा के गई, बोली, कहीं से ले आते हैं। जहाँ पूछ रही है, वहीं पर पता चल रहा है कि हाँ, मौत हुई थी। आज नहीं हुई तो 10 साल पहले। 10 साल पहले नहीं तो 50 साल पहले हुई थी, पर हुई तो थी। और वो ज़माना, जब जो मृत्यु-दर थी, वैसे ही तब बहुत ज़्यादा थी। तब तो इतना इंतजार भी नहीं करना पड़ता होगा कि 40 साल बीते, तब मौत हो गई। तब तो ज़्यादा तेजी से ही मृत्यु होती थी। वो कहते हैं, कि कई गाँव घूम आई वो बेचारी कि कोई तो घर मिले जहाँ कभी मौत न हुई हो। एक उसको ऐसी दहलीज़ नहीं मिली।

अपने आप को विशिष्ट मानना ही अहंकार है। अहम् माने, मैं हूँ। मैं माने, मैं अलग हूँ, मैं विशेष हूँ। ना आप अलग हो, ना आप विशेष हो। जैसे सब है वैसे ही आप हो, आपकी कोई अपनी अलग हस्ती है ही नहीं। बस, बात ख़त्म। और जब आपकी अलग हस्ती नहीं है ना, तो जानते हो एक राहत क्या होती है? हस्ती मिट भी तो नहीं सकती फिर। अलग हस्ती होती तो मिट गई होती, जब अलग हस्ती नहीं है तो मिटेगा क्या? हम मरेंगे ही नहीं, “हम न मरें, मरि है संसारा।”

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अंधी कामना की ओर भी मन नहीं भागता है। अंधी कामना की तरफ़ भी फिर मन नहीं भागता। लगता है, प्रकृति में कुछ भी मिल गया तो जब मैं हूँ ही नहीं, तो फिर उसका कोई फायदा ही नहीं है। भोग भी नहीं कर पाऊँगा क्योंकि भोगने वाला ही नहीं है तो। लालच भी थोड़ी कम हुई है पहले से, मतलब कम भागता हूँ।

आचार्य प्रशांत: ना आप पहली बार भोग रहे हो, ना आप पहले हो जो भोग रहा है। कुछ भी आपके साथ ऐसा नहीं हो रहा जो आपके साथ पहली बार हो रहा हो। आप किस तरीक़े से विशिष्ट हो? क्या आप में किसी से अलग है? क्या जब आप में कुछ अलग ही नहीं, तो मर जाएगा।

मरने के लिए किसी स्वतंत्र सत्ता का होना तो ज़रूरी है ना, कुछ हो तो मरेगा। एक बार कोई पूछने लग गया था किसी इंटरव्यू में। बोले, आप पुनर्जन्म को खारिज करते हैं। मैंने कहा, देखो, पुनर्जन्म हो, इसके लिए ज़रूरी है कि मौत हो। पुनर्जन्म बोला न, दूसरा जन्म तो तब होगा जब पहले क्या हो? मृत्यु हो। और मृत्यु हो, इसके लिए क्या ज़रूरी है? कि पहले कोई जीवित हो। जीवित होगा, तभी तो मरेगा। मैंने कहा, कोई जीवित ही नहीं होता। जब कोई मरता ही नहीं है तो दूसरा जन्म कैसे होगा?

बोले, माने क्या कह रहे हैं आप? मैं कह रहा हूँ कि वर्तमान में ही कोई जन्मा हुआ नहीं है। ये सब, जो अपने आप को जन्मा बोल के घूम रहे हैं, ये मिट्टी के पुतले हैं। इनमें कोई जीव नहीं है भीतर, जीव जैसा कुछ होता ही नहीं, ये मिट्टी के पुतले हैं, जो इधर-उधर घूम रहे हैं। और मिट्टी मरती नहीं है, मिट्टी सिर्फ़ गिरती है। मिट्टी का पुतला गिर गया, ढह गया, तो ये बोलते हो क्या कि मृत्यु हो गई? वो तो मिट्टी थी, चल रही थी मिट्टी थी, गिर गई। जब जन्म ही नहीं था तो पुनर्जन्म कहाँ से हो जाएगा? दूसरा जन्म छोड़ दो, वर्तमान जन्म भी झूठ है। जब वर्तमान जन्म ही झूठ है तो अगला जन्म सच कैसे हो सकता है और पिछला जन्म सच कैसे हो सकता है? समझ में आ रही है बात?

प्रश्नकर्ता: मैं बस भूल जाता हूँ कभी-कभार, हमेशा नहीं याद रहता।

आचार्य प्रशांत: “गुणा गुणेषु वर्तन्त,” गुणों में गुण ही बरत रहे हैं, पार्थ। जीव की हस्ती मिथ्या है, अहंकार जैसा कुछ होता नहीं। शरीर है, अहंकार कहीं नहीं है। अहम् जैसा कुछ नहीं होता। शरीर है, वो अपनी गतिविधियाँ कर रहा है। प्रकृति है, गतिविधि करा रही है। गतिविधि करने वाला कोई नहीं है।

इसीलिए महात्मा बुद्ध की एक बात बहुत प्यारी है। उन्होंने ये तो बोला ही बोला कि अहंकार झूठ है, उन्होंने ये भी बोला साथ में कि निर्वाण भी झूठ है। लेकिन निर्वाण तो तब हो न, जब कोई हो, जिसका निर्वाण हो सके। बोले, आजाद कर दिया, पिंजरे से पंछी को आजाद कर दिया। पिंजरे में तो पंछी था ही नहीं, तो निर्वाण किसका हुआ? तो वो बोलते कि ये सब जो जितने भी लौकिक पदार्थ हैं, ये तो सब स्वभाव से शून्य हैं ही। निर्वाण भी स्वभाव से शून्य है, क्योंकि निर्वाण के लिए कोई चाहिए जो पहले बंधन में था। कोई था ही नहीं।

लोगों को बड़ा बुरा लग जाता है जब बोलते, कोई है ही नहीं। “माने हम हैं ही नहीं।” नहीं, आप नहीं हो। आप अमर हो गए। आप अमर हो गए, ये जान के कि हम हैं ही नहीं। हम अमर हो गए, अब मरेंगे कैसे? बोले, “निकाल दिए जाओगे यहाँ से।” हमें तुम निकाल नहीं सकते, क्योंकि हम यहाँ हैं ही नहीं।

इस पूरी प्रक्रिया में बेचारे हमारे मित्र यमराज बेरोजगार हो गए। अब किसको लेने जाएँगे? जिसको ही लेने जाएँगे, वहाँ पता चलेगा, वहाँ तो कोई है ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: एक दिन आपको पता चलेगा, मैं भी हूँ नहीं। धन्यवाद किसको बोलोगे? ना धन्यवाद देने के लिए कोई है, ना लेने के लिए।

प्रश्नकर्ता: ये सोच के बहुत राहत मिलती है कभी-कभार।

आचार्य प्रशांत: सोचने वाला अभी है, इसका मतलब कोई बैठा है भीतर सोचने के लिए।

प्रश्नकर्ता: झूठी मान्यता सोच रही है अपने आप।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, जो आज बात की गई है, इंटरनल स्टेट ऑफ रेस्ट की। मतलब, जब आदमी बाहर से तो फुल एक्शन में लीन रहता है, लेकिन इंटरनली एकदम रेस्ट में रहता है या पीस में रहता है। जैसे कहते हैं, कबीर जी ने इसी बात को, "सहजे मिले अभिनाशी" ये बात से…।

आचार्य प्रशांत: बहुत जगहों पर, अब याद करना पड़ेगा, 10 मिनट दें तो याद करके एक-एक बता पाऊँगा। बहुत जगहों पर वो इसी बात को कहते हैं।

"तान पिछोरी सोए" कौन-सा, जहाँ कहते हैं — "अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोए"। निकालो ये सब गाना है। अब ये "रहा कबीरा सोए" से क्या आशय है? "अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोए।" सोना मतलब कुछ करने को ही नहीं है तो क्या कर रहा है? सो रहे हैं, कुछ नहीं। और ये जो अपनी दशा है, ये ज्ञानियों ने बहुत बार व्यक्त करी है। कभी वो कह देते हैं, हम भीतर से मर चुके हैं। कभी वो कहते हैं, हम भीतर हर वक़्त सोते रहते हैं। कभी वो कहते हैं, भीतर हम बस ऐसे ही बैठे रहते हैं, कुछ करने को नहीं है। पर कोई ये नहीं कहेगा कि हमारे भीतर लगातार युद्ध, संघर्ष या गति चल रही है। कभी नहीं कहेंगे।

हमारे भीतर की अचलता के लिए तो है ही कि, “पाछे-पाछे हरि फिरे, कहत, कबीर कबीर।।” हमें हरि के पीछे भी नहीं चलना, कामना के पीछे चलना तो दूर की बात है। कामना के लिए अपने आप को डिस्प्लेस, माने अपनी जगह से विस्थापित कर देना, वो तो दूर की बात है, हम अपनी जगह, अपना आसन अब हरि के लिए भी नहीं छोड़ते। हाँ, हरि हमारे पीछे-पीछे चले वो अलग बात है। हम तो अब ऐसे जम गए, एकदम रम गए हैं कि हमें नहीं हिलना।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी वो मीन के बारे में भी बात करते हैं, जैसे पानी के बीच में भी रह के वो प्यासी है और मतलब वो एक कंट्राडिक्शन। वैसे बोलते हैं कि जैसे, कस्तूरी।

आचार्य प्रशांत: “कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन माही।” ये सामान्य स्थिति है, साधारण स्थिति है, कि जहाँ कुछ नहीं मिल रहा, लेकिन फिर भी छटपटाहट, परेशानी, हाथ-पाँव फेंकना, ये सब चल रहा है। आम आदमी का ऐसा ही रहता है। अब जैसे, एक तो यही है,

*कबीरा यह गत अटपटी, चटपट लखी न जाए। ** जब मन की खटपट मिटै, अधर भया ठहराय।।**

मन की खटपट मिटनी ज़रूरी है, वो असली मौन है।

कल हमसे कोई मौन के विषय में बात कर रहा था। तो मौन ये नहीं होता कि अधर मूक हो गए। मौन ये होता है कि अधरों का काम है बोलना, तो वो तो बोलेंगे। बाहर तो गति रहेगी ही रहेगी, भीतर से मौन हो गए। बाहर भले ही बहुत आवाजें कर रहे हैं, भीतर से मौन हैं।

तो होना ये चाहिए कि मैं आपसे बोलने की दृष्टता करूँ, कि पिछले दो घंटे से मैं तो यहाँ मौन बैठा हूँ। आप सुन क्या रहे हो? और वास्तव में जो कुछ भी मैंने बोला है, वो सुनने लायक तभी होगा अगर मैं यहाँ दो घंटे से मौन ही बैठा हूँ। अगर बाहर मेरे होठ चल रहे हैं और भीतर मेरा मन चल रहा है, तो मैंने जो कुछ भी बोला है, वो एकदम कचरा होगा। भीतर मौन होना चाहिए, बाहर गति होनी चाहिए।

ये अच्छा तरीक़ा है। कोई पूछे कि क्या रहा आज सत्र में? बोले, कुछ नहीं, तीन घंटे का मौन था। वहाँ क्या सुनने जाते हो? सन्नाटे की अनुगूंज। अनुगूंज क्यों? कह रहे, उधर पहले सन्नाटा होता है। फिर वही सन्नाटा इधर आके गूँजने लग जाता है। सन्नाटा चलता है उधर से और सन्नाटा ये पहुँच जाता है इधर तक। बोल रहे हैं, सन्नाटे को उधर से इधर तक ले क्या आते हैं? शब्द।

इतना बोलते क्यों हैं आचार्य जी? सन्नाटे को इधर से उधर ले जाने के लिए इतना बोलना पड़ता है। शब्दों का पुल बनाते हैं, जिस पर मौन इस पार से उस पार जा सके। समझ में आ रही है बात? सब ने यही बोला। बोल रहे, भीतर तो अब ठहर ही गए। बाहर जब तक चल रहा है खेल चलता रहे, जिस दिन रुक भी जाए, हमें करना क्या।

अष्टावक्र मुनि एक जगह पर कहते हैं, ये शरीर है। ये आज गिर जाए, मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। और अगर ये अभी हज़ार साल तक और चल रहा हो, मुझे तो भी फ़र्क़ नहीं पड़ता। ना मैं ये कहूँगा ययाती की तरह कि मृत्यु ना आए, ना मैं ये कहूँगा कि मृत्यु आ क्यों नहीं रही है। हज़ार साल की अगर ज़िंदगी मिलेगी, मैं कहूँगा—ठीक है, अच्छी बात है, अभी ज़िंदा है तो चल रहे हैं। क्यों? क्योंकि भीतर से तो कब के मर चुके हैं। अब बाहर वाला जो है, अपने प्रारब्ध अनुसार गति करें। हमें उसको रोकना भी क्यों है? जब हमें उसको चलाना नहीं, तो हमें उसको रोकना भी नहीं।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मेरा प्रश्न ये था कि अहंकार सत्य की कामना कैसे करें? सब चीज़ की कामना करता है तो सत्य की कामना कैसे करें?

आचार्य प्रशांत: सत्य की कामना करने की तो आज बात ही नहीं करी ना। आज हमने बात करी निर्भ्रांत होने की। आपने जिनकी कामना कर ही रखी है, उनका परीक्षण करना है कि उससे आपको मिल क्या रहा है। मिल क्या रहा है, फिर बाद में आता है, पहले तो ये कि वो कामना कैसे आपने स्वीकार कर ली। सत्य की क्या कामना करेंगे? सत्य कोई कुर्सी-टेबल-फर्नीचर तो नहीं है न। कैसे करेंगे उसकी कामना? और आपके पास समय भी कहाँ है, स्थान कहाँ है, अवकाश कहाँ है सत्य की कामना करने को।

दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती।

या ऐसे कह दीजिए कि सत्य की कामना पूरी हो, इसकी विधि भी यही है कि झूठ का अवलोकन करो। अगर सत्य शब्द से बहुत प्रेम हो गया हो, नहीं छोड़ना चाहते उसको तो कोई बात नहीं। फिर ऐसे कह दीजिए, हाँ चाहिए तो सत्य, पर सत्य तक पहुंचने की विधि तो झूठ से होकर ही गुजरती है। झूठ को काट के ही सत्य मिलता है, ऐसे कह दीजिए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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