दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मैं कृष्णमूर्ति जी को भी सुन रहा हूँ, गीता और अष्टावक्र गीता के साथ-साथ। तो एक मैं रिलेट करना चाह रहा था। जैसे गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहम् है, प्रकृति है, सत्य है। फिर एक श्लोक में श्रीकृष्ण अहम् को झूठा साबित कर देते हैं कि अहम् है नहीं। त्रिगुणात्मक प्रकृति का जो खेल चल रहा है, उसमें अहम् एक झूठी मान्यता के साथ जीता है। फिर अष्टावक्र भी कहते हैं कि बाहर और अंदर प्रकृति का खेल चल रहा है। अहम् की सत्ता नहीं है।
लेकिन फिर अभी जैसे माता जी का देहाँत हो गया करीब दो महीने पहले, तो पीड़ा पर सॉरो पर कृष्णमूर्ति जी के काफ़ी वीडियोज़ देख रहा था। वो शब्द यूज़ करते हैं कि जो सॉरो है या पेन है, तो अद्वैत वहाँ है, जब मैं सोचता हूँ कि मैं हूँ और मुझे पेन है। बट जब द्वैत में और जैसे ही हम मतलब ये बताते हैं, कि फिर हम सोचते हैं कि इस पीड़ा को कम कैसे करूँ, वहीं हम फँस जाते हैं। और जब अद्वैत में आते हैं तो फिर ये लगता है कि मैं ही वो पीड़ा हूँ, मतलब मेरी कोई अलग सत्ता नहीं। जिस समय मैं कष्ट में हूँ, उस समय उस कष्ट के अलावा मेरी कोई भी पहचान नहीं है। मैं सिर्फ़ वो कष्ट हूँ, तो मैं फिर कुछ भी नहीं कर सकता उस कष्ट को हटाने के लिए, क्योंकि उस कष्ट के अलावा मेरी कोई आइडेंटिटी ही नहीं है।




