अपनों की सहमति से बड़ा है सच

Acharya Prashant

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अपनों की सहमति से बड़ा है सच
कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका श्रम बस मोह और ममता की वजह से है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसा हमने कहा आप पत्थर को ही घिसे जा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उतना ही श्रम अगर आप ज़्यादा काबिल और तैयार लोगों पर करें, तो ज़्यादा अच्छा परिणाम आएगा। तो निसंदेह हमारे घर वाले हमारे साथ रहते हैं। समझाने की शुरुआत आप अपनों से, परिवार जनों से ही करोगे। उन्हें ही समझाने की कोशिश करोगे। और मैं कह रहा हूँ, पूरी कोशिश, भरपूर प्रयास करिए उन्हें समझाने का। पर अगर दिखाई दे कि नहीं ही समझ रहे हैं, तो अटक मत जाइए, आगे निकलिए। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, आप इस दुनिया में एक उम्मीद की किरण की तरह हमें दिखाई देते हो और मैं आपसे बहुत कुछ सीख भी रही हूँ और अपनी लाइफ़ में भी उसको फॉलो कर रही हूँ। लेकिन सर, कहीं न कहीं एक चीज़ मेरे दिमाग़ में आती है, कि जैसा हमारा समाज आज की डेट में चल रहा है, उसका इंपैक्ट हमारी फैमिलीज़ पर भी पड़ता है।

और जब जंग अपनों से ही होती है, तो उस समय समझ नहीं आता कि उस चीज़ को, क्या हमें उनसे फाइट करना चाहिए? या बस चुपचाप एक इग्नोर करके उस चीज़ को खत्म कर देना चाहिए? क्योंकि जब मैं आपको देखती हूँ, तो आप युध्यस्व और ये सब चीज़ें बोलते हैं कि हाँ, आपको फाइट करना चाहिए उन चीज़ों के लिए। लेकिन जब अपनों की बात आती है, तो समझ नहीं आता, क्योंकि अपने भी उन चीज़ों को समझ नहीं पाते।

सर, वहीं से वो चीज़ें कहीं न कहीं कनेक्ट करती हैं कि एक फीमेल फ्रीडम और वो सब चीज़ें, जैसा आपको जितना मैं सुनाती हूँ और जो चीज़ें मैं फेस करती हूँ अपनी लाइफ़ में, वो समझ ही नहीं पाते उन चीज़ों को। अपनों से कैसे डील करना चाहिए सर?

आचार्य प्रशांत: जो आपके बिल्कुल केंद्रीय काम हैं, एकदम ज़रूरी काम हैं, वो तो देखिए कोई समझे या न समझे, आप उन कामों पर आँच नहीं आने दे सकते। आप ये नहीं कह सकते कि जो सबसे ज़रूरी काम है, मैं वो भी तभी करूँगी जब उस पर एकमत, एक कंसेंसस पैदा हो जाएगा।

कोई काम है जो आप जानती हैं कि ज़िंदगी में सबसे महत्त्व का है, और आप कहेंगी कि मैं वो तभी करूँगी जब चार लोग उसमें सहमत हो जाएँगे, तो ये नहीं। सबसे पहले तो ये कि जो ज़रूरी है, वो तो होके रहेगा, चाहे उससे कोई सहमत हो और चाहे न हो।

अब बात आती है दूसरों को समझाने की। समझाने का तो भरपूर प्रयास करना ही चाहिए, और उसके लिए साम, दाम, दंड, भेद जो लगे, लगाना चाहिए। ये जो मैं कह रहा हूँ, भरपूर प्रयास इसका फायदा ये होता है कि आपको पता चल जाता है कि कहाँ अब मेहनत कम भी कर देनी है। क्योंकि आप सीमित हैं, आपकी ज़िंदगी सीमित है, आपकी ऊर्जा सीमित है। तो आपको अपनी मेहनत का आरओआई (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) भी तो देखना पड़ेगा न।

आप अपना समय जहाँ लगा रही हैं और जिस व्यक्ति पर लगा रही हैं, सारी ऊर्जा लगा रही हैं, उस पर कुछ रिटर्न मिल भी रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप पत्थर घिस रही हैं और सोच रही हैं कि इसमें जान आ जाएगी, तो वो भी देखना पड़ता है।

फाइट, जब मैं बोलता हूँ, तो फाइट का मतलब ये नहीं होता कि दूसरे को मारना है। मेरा भाई छोटा था, तो जब कभी पैरेंट्स घर से बाहर जाएँ, तो मैं घर में बड़ा सबसे, तो ये रहे कि इन लोगों की चौकीदारी मुझे करनी है। वो छत पर भागा करता था बार-बार, और छत पर जाना उसको तभी अनुमति थी जब कोई साथ में रहे। क्योंकि छत पर जो दीवार थी, मुंडेर वो इतनी ही थी (थोड़ी), तो मुझे कहा जाए कि इसको छत पर नहीं जाने देना है जब तक हम लोग नहीं आते।

अब वो बड़ा हो रहा था, वो ख़ुद ही कुंडी खोल भी लेता था। तो मैं क्या करता था जब वो छत की ओर भागता था तो, वो मुझसे कुश्ती करे, लड़ाई करे, ऊपर जाने के लिए। तो मैं उसको ऐसे पकड़ कर के, उसके दोनों हाथ पीछे करके उसको ऐसे अरेस्ट कर लेता एक तरीक़े से।

अब इसमें उसको रोक भी दिया है और उसको चोट भी नहीं लग रही थी। ऐसे समझिए कि आपने ऐसे कर दिया है सामने से (हाथ फोल्ड करते हुए), और उसके पीछे खड़े हो गए हैं और उसके दोनों हाथ पीछे से पकड़ लिए हैं। तो उसको रोक भी दिया है और चोट भी नहीं लग रही है। और ये भी कह रहे हैं, कि मैं ऐसे ही पकड़े खड़ा रहूँगा जब तक तुम कह नहीं देते कि छत पर नहीं भागूँगा। तो 1 मिनट, 2 मिनट और मैं और खींच दूँ जोर से, तो वो बोल ही दे कि नहीं, अब नहीं जाऊँगा। ठीक है, जाओ छोड़ दिया। फिर आधे घंटे बाद फिर भागे, तो फिर कुछ और करना है। तो

फाइट का मतलब चोट पहुँचाना ही नहीं होता। फाइट का मतलब यह भी होता है कि कोई आत्मघात की तरफ़ जा रहा है, उसको रोकना।

मैं जिस फाइट की बात करता हूँ, उसमें हिंसा नहीं है, उसमें प्रेम है। बात समझ में आ रही है? एक बार मैंने कहा था कि तुम्हें आग से बचाने के लिए मुझे आग से नहीं, तुमसे लड़ना पड़ता है। क्योंकि तुम ख़ुद आग में घुसने को तैयार हो। तो आग से क्या लड़ें? तुमसे लड़ना पड़ता है कि वहाँ मत घुस, मैं उस फाइट की बात कर रहा हूँ।

लेकिन एक बात समझ लीजिए कि जो ख़ुद तैयार नहीं हो रहा, उस पर आप श्रम ज़रूर करिए। पर ये देखते हुए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका श्रम बस मोह और ममता की वजह से है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसा हमने कहा आप पत्थर को ही घिसे जा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उतना ही श्रम अगर आप ज़्यादा काबिल और तैयार लोगों पर करें, तो ज़्यादा अच्छा परिणाम आएगा।

तो निसंदेह हमारे घर वाले हमारे साथ रहते हैं। समझाने की शुरुआत आप अपनों से, परिवार जनों से ही करोगे। उन्हें ही समझाने की कोशिश करोगे। और मैं कह रहा हूँ, पूरी कोशिश, भरपूर प्रयास करिए उन्हें समझाने का। पर अगर दिखाई दे कि नहीं ही समझ रहे हैं, तो अटक मत जाइए, आगे निकलिए।

जो सही काम है, उसको ज़रूर करिए और दूसरों को समझाएँ। घरवाले नहीं समझ रहे, तो कोई बात नहीं, बात को दूसरों तक पहुँचाइए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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