कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका श्रम बस मोह और ममता की वजह से है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसा हमने कहा आप पत्थर को ही घिसे जा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उतना ही श्रम अगर आप ज़्यादा काबिल और तैयार लोगों पर करें, तो ज़्यादा अच्छा परिणाम आएगा। तो निसंदेह हमारे घर वाले हमारे साथ रहते हैं। समझाने की शुरुआत आप अपनों से, परिवार जनों से ही करोगे। उन्हें ही समझाने की कोशिश करोगे। और मैं कह रहा हूँ, पूरी कोशिश, भरपूर प्रयास करिए उन्हें समझाने का। पर अगर दिखाई दे कि नहीं ही समझ रहे हैं, तो अटक मत जाइए, आगे निकलिए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, आप इस दुनिया में एक उम्मीद की किरण की तरह हमें दिखाई देते हो और मैं आपसे बहुत कुछ सीख भी रही हूँ और अपनी लाइफ़ में भी उसको फॉलो कर रही हूँ। लेकिन सर, कहीं न कहीं एक चीज़ मेरे दिमाग़ में आती है, कि जैसा हमारा समाज आज की डेट में चल रहा है, उसका इंपैक्ट हमारी फैमिलीज़ पर भी पड़ता है।
और जब जंग अपनों से ही होती है, तो उस समय समझ नहीं आता कि उस चीज़ को, क्या हमें उनसे फाइट करना चाहिए? या बस चुपचाप एक इग्नोर करके उस चीज़ को खत्म कर देना चाहिए? क्योंकि जब मैं आपको देखती हूँ, तो आप युध्यस्व और ये सब चीज़ें बोलते हैं कि हाँ, आपको फाइट करना चाहिए उन चीज़ों के लिए। लेकिन जब अपनों की बात आती है, तो समझ नहीं आता, क्योंकि अपने भी उन चीज़ों को समझ नहीं पाते।
सर, वहीं से वो चीज़ें कहीं न कहीं कनेक्ट करती हैं कि एक फीमेल फ्रीडम और वो सब चीज़ें, जैसा आपको जितना मैं सुनाती हूँ और जो चीज़ें मैं फेस करती हूँ अपनी लाइफ़




