बुरे लोग साहसी और सफल क्यों होते हैं?

Acharya Prashant

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बुरे लोग साहसी और सफल क्यों होते हैं?
आप तो किसी को समर्पित नहीं हो, न सच को, न झूठ को। आप दोनों को आधे-आधे हो, झूठा आदमी आपसे हमेशा जीतेगा। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: दुनिया के जितने बुरे लोग हैं, वो तो इतनी हिम्मत से, निडर होकर के और ग़लत स्वार्थों पर ही बहुत ज़ोर से अड़े हुए हैं और मस्त लड़ रहे हैं। लेकिन मैं अपने आप को देखती हूँ, तो मुझे डर दिखाई देता है और बेईमानी दिखाई देती है। तो ये दुनिया-भर के जो ग़लत लोग हैं, अहंकारी हैं, उनमें इतनी हिम्मत और ताक़त कहाँ से आ जाती है? और मैं ऐसी क्यों हूँ कि सच्चाई के लिए भी लड़ने से मैं एकदम रुक जाती हूँ, सत्य के प्रति समर्पित नहीं हो पाती हूँ, निडर नहीं हो पाती हूँ?

वो भी स्वार्थी हैं, पर वो अपने स्वार्थ के लिए जम के लड़ रहे हैं। स्वार्थी मैं भी हूँ, पर मैं इतनी रुकी हुई हूँ। व्हाट इज़ दैट ड्राइविंग फ़ोर्स इन देम ऐंड व्हाट इज़ दैट व्हिच इज़ कीपिंग मी बिहाइंड ऐंड पुलिंग मी बैक।

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं है, उनके सच के साथ कोई तार नहीं जुड़े हुए हैं। तो उनके स्वार्थों की दिशा में बढ़ने से रोकने वाला उन्हें कोई नहीं है न। वो एक ही नाव पर सवार हैं। उन्हें सच्चाई से कुछ लेना ही-देना नहीं है। एक नाव है उनके पास, झूठ की, स्वार्थ की, फ़रेब की, हिंसा की—किसी भी तरीक़े से अपनी मौज। एक ही नाव है। जो एक नाव पर होगा, भले ही ग़लत दिशा में जा रहा हो, बड़ी गति से जाएगा। है न?

आप सब लोगों की पूरी कम्युनिटी की समस्या ये है कि आप दो नाव पर सवार हो। स्वार्थ की भी नाव और सच की भी नाव। तो आप हमेशा हारोगे। आपका मुक़ाबला जब भी होगा किसी झूठे आदमी से, आप हमेशा हारोगे। क्योंकि झूठा आदमी कम से कम झूठ को पूरी तरह समर्पित है।

आप तो किसी को समर्पित नहीं हो, न सच को, न झूठ को। आप दोनों को आधे-आधे हो, झूठा आदमी आपसे हमेशा जीतेगा।

यूँही थोड़ी कहता हूँ, आप पर भरोसा नहीं है। आप जिस भी दिन झूठों के सामने पड़ोगे, बिल्कुल दुम दबाकर भागोगे और भागते हो। रोज़ भागते हो। और झूठा आदमी हमेशा आप पर चढ़ता है, आक्रामक होता है और रोज़ जीतता है, क्योंकि वो समर्पित है। झूठ को ही सही, लेकिन समर्पित है। ये समर्पण की ताक़त है। वो झूठ को ही सही, लेकिन समर्पित है।

और आप चालू हो। आप कहते हो, “डोंट कीप ऑल योर एग्स इन वन बास्केट।” कुछ-कुछ तो हेज़िंग करके रखो न। हेज़िंग माने इधर भी मीठा-मीठा, उधर भी मीठा-मीठा, सबके साथ थोड़ी-थोड़ी बनाकर रखो।

मैं आपसे जो बात कर पाता हूँ न, इसीलिए कर पाता हूँ क्योंकि मैंने किसी से बनाकर नहीं रखी है। मैं अगर आपको आज कुछ बता पा रहा हूँ, आपको लगता है कि मैं आपको सहारा दे पा रहा हूँ, तो इसलिए है क्योंकि मैंने अपना कोई सहारा नहीं रखा है। पर आपको बहुत सहारे चाहिए। तो आप सबसे मीठी-मीठी बनाकर रखते हो। “जी मम्मी जी, जी ताऊ जी।” यही मैंने किया होता, तो मैं भी आपकी तरह ही अपनी चार लोगों की गृहस्थी चला रहा होता, ये कम्युनिटी नहीं चला रहा होता।

आप सब बहुत चालाक लोग हो। सच पूछो तो मैं जैसा भी लगता हूँ न आक्रामक या जो भी, मैं ही हूँ भोलू एकदम। मैं नन्हा-मुन्ना शिशु हूँ, बता रहा हूँ। आप असली चालू लोग।

अब देखो, लेकिन आभासों का खेल, अपीयरेंस का धोखा। मैं कैसा लगता हूँ? चढ़ा आ रहा है जानवर, भारी पहलवान, खा लेगा, आक्रामक। कुछ नहीं। मैं आप सबसे ज़्यादा वल्नरेबल हूँ, क्योंकि मैंने अपने लिए कोई डिफ़ेन्स मैकेनिज़्म तैयार ही नहीं कर रखा। कोई नहीं है मेरे पीछे, न कोई फ़ॉलबैक ऑप्शन है, न कोई सिक्योरिटी है।

आप चालू हो, आप सब अपना दुनियादारी का बन्दोबस्त करके रखते हो। प्लान ए नहीं तो प्लान बी, नहीं तो प्लान सी, नहीं तो प्लान डी। बस यही है और कोई बात नहीं है।

मेरे पास किसी को आना होता है, तो मैं बोलता हूँ, मेरी शर्तों पर आ जाओ, स्वागत है। आप ये बोल पाए क्या? आप तो घुसे चले जाते हो।

राखी के दिन सत्र था। इसी महीने तो था। इस महीने की जो मिनिमम अटेंडेंस थी, वो राखी के दिन थी। जबकि सत्र तो रात में होता है, राखी तो दिन में बाँध लेते हैं। लोगों ने नहीं देखा, क्योंकि बहनें आई हुई थीं और बहनें गई हुई थीं और भाभियों के साथ पूड़ी भी तो तलनी होती है न।

किस मुँह से तुम बोलते हो कि तुम्हें आज़ाद जीना है और सच जीना है? और किस मुँह से पूछते हो कि ताक़त नहीं है? पुड़ियाँ तल लो भाभियों के साथ। और जितने बजे सत्र होता है, उतने बजे तो तुम्हारे लोक-धार्मिक परिवारों में बत्तियाँ बुझाई जाती हैं। पर डर इतना कि आज सब लोग इकट्ठा हुए हैं, आज सत्र कैसे सुन लूँ? और ऊपर से,

तुम पूछ लेते हो, कि “ताक़त क्यों नहीं है ज़िंदगी में?” न निष्ठा, न समर्पण, ताक़त कहाँ से आएगी।

कहना नहीं चाहता, क्योंकि कहूँ फिर आप आहत होते हो। लेकिन ये जो आपको दे रहा हूँ न, ये दिया गया नहीं है। और आप इतिहास के बहुत बड़े गुनहगार हो, जो आपको मिल रहा है और आप क़द्र नहीं कर पाए। इतने लोगों तक, इतने कुपात्र लोगों तक भी, निरे अयोग्य लोगों तक भी, कौन पहुँचा है इतिहास में? किसने जान लगा दी है? और आप में से ज़्यादातर वही लोग हो, जिनको मैं बहुत जान लगाकर घसीट-घसीटकर यहाँ कम्युनिटी पर लाया हूँ। उसके बाद भी आपको मूल्य नहीं समझ में आ रहा।

आप पूड़ियाँ तल लो, आपको पता भी नहीं है कि आप कितना बड़ा अपराध कर रहे हो। मैं अधिक से अधिक बस अफ़सोस कर पाऊँगा। लेकिन उससे ज़्यादा मेरा कुछ जाएगा नहीं। और आपका क्या जा रहा है, ये आप समझ नहीं रहे हो। मेरा मन करता है मैं बोल दूँ, न समझो मेरी बला से। और मैं चाहता हूँ मैं बोल दूँ, न समझो मेरी बला से। पर पता नहीं क्यों रुक-सा जाता हूँ, नहीं बोला जाता। यही मेरी कमज़ोरी है। धीरे-धीरे इस कमज़ोरी को दूर कर रहा हूँ। एक दिन खुलकर बोल दूँगा, जाओ, मरो मेरी बला से।

मैं आपके सामने रोज़ आहत हो रहा हूँ, घायल हो रहा हूँ। मैदान में खड़ा हूँ और आप मेरे सामने आकर कह रहे हो, “वो न मैं आपके पक्ष में कुछ कर नहीं पाती। बताइए, मैं क्या करूँ?” मैं ख़ून बहाता खड़ा हूँ और मेरे सामने आकर के झूठी लाचारी का रोना रो रहे हो। मैं जवाब क्या दूँ? कोई जवाब नहीं दूँगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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