बाज़ार में हूँ, पर खरीददार नहीं

Acharya Prashant

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बाज़ार में हूँ, पर खरीददार नहीं
मुक्ति का मतलब ये नहीं है कि किसी को छूना नहीं है; नदी से कहना है, दूर हट, मैं पुरुष हूँ, तू प्रकृति है। आ गई भ्रष्ट करने बार-बार चली आती है। तू भी आ जाती है। न जाने कितनी सारी तो तुम हो; कोई इधर से घुस रही, कोई उधर से घुस रही। छोटी, बड़ी, लंबी, चौड़ी, हरी, काली, नीली, पीली, हर रंग की होती हैं, आ जाती हैं। किसी को मना नहीं कर रहा, वो सबको आलिंगन में ले रहा है और कह रहा है, तुम सब भी आ जाओ, तो भी मैं तो रहूँगा सागर ही। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: हैलो सर। एक मुक्त पुरुष है या फिर एक ऐसा इंसान जिसकी चेतना बहुत ऊपर उठ चुकी है, उसके बीच में और संसार के बीच में वैसा ही रिलेशन होता है जैसा सागर और नदी का होता है। नदी कुछ भी डाल सकती है उसके अंदर और अगर चाहे तो कुछ भी निकाल भी सकती है, लेकिन सागर में कोई रिऐक्शन नहीं देखने को मिलता। उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उसके अंदर क्या आ रहा है और क्या जा रहा है।

तो जब रिऐक्शन की बात होती है, तो अगर कोई मुक्त हो भी चुका है, तो भी उसका शरीर तो संसार में ही होता है। तो वो कैसे डिसाइड कर सकते हैं कि रिऐक्शन किन बातों पर करना है या नहीं करना है? क्योंकि असल मायने में तो एलिजिबल भी वही हैं रिऐक्ट करने के लिए जो भी संसार में हो रहा है।

तो एक जो मॉरल कम्पस होता है, या फिर सही और गलत के बीच में क्या सही है, क्या गलत है। जब मैं कबीर साहब को सुनता हूँ, तो बाक़ी सब में और उनमें एक डिफ़रेंस ये दिखता है कि उन्होंने रिऐक्ट बहुत ज़्यादा किया है और हर चीज़ पर किया है।

वो जब समय के बारे में, काल के बारे में पढ़ रहा था तो उन्होंने रिडेम्प्शन के एक पॉइंट ऑफ़ व्यू से सारे दोहे कहे हैं, कि अब तो इतनी उम्र हो चुकी है, अब तो पढ़ लो; या फिर अब तो संसार से जाने वाले हो, अब तो हरी का नाम ले लो। इस तरीके की बातें कही हैं कि रिडीम कर लो, अब आख़िरी समय में तो रिडीम कर लो। जब ऐनिमल क्रूएल्टी की बात होती है तो वो बिल्कुल क्या सही है, क्या गलत है बिल्कुल साफ़-साफ़ कर देते हैं। वो वेदों को भी बोलते हैं कि अगर उसमें भी ऐसा लिखा है तो वो गलत है।

तो अगर मुक्त होना या फिर ऊँची चेतना होने में जब कहते हैं कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता उस इंसान को, तो वो कौन-से फ़र्क़ की बात हो रही है वहाँ पर? कि किन चीज़ों पर उसको फ़र्क़ नहीं पड़ता है? या कोई भी चीज़ होगी जिस पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा उन्हें?

अचर्या प्रशांत: ये बात हमने काफ़ी ज़ोर देकर स्पष्ट करी थी पिछले ही सत्र में। फ़र्क़ इस अर्थ में नहीं पड़ता कि जो कुछ उसके ऊपर आ रहा है, वो उसको अपनी पहचान नहीं बनने देता। नदी सागर में कुछ भी ला रही हो सागर सागर ही रहता है। न सागर की हस्ती बदल जाती है नदी से, न सागर की प्रकृति, सागर का लहराना, निर्धारित होता है नदी से।

हमने आईने और फ़ोटोग्राफ़िक प्लेट का उदाहरण लिया था न, कि जो कुछ आ रहा है वो आपको बदल नहीं देता, आप, आप रहते हो। आप आप रहते हो और आप रहते हुए, अपनी मुक्ति से, अपनी स्वच्छंदता में आप जो करो, वो आप करते रहते हो। ये थोड़ी कहा जा रहा है कि आप कुछ भी नहीं करते हो, आप जो भी करते हो वो प्रभावित होकर नहीं करते हो, करने को कौन रोक रहा है।

आपने कहा कि कोई मुक्त भी हो जाए तो भी उसका शरीर तो यहीं रहेगा। अरे, शरीर थोड़ी ही चलता है! शरीर, तन चलता है मन से और मन चलता है अहम् से। जब अहम् आत्मा हो गया तो मन भी आत्मा से चलेगा, और मन आत्मा से चलेगा तो तन भी आत्मा से चलेगा।

देखिए, संसार से अप्रभावित, अछूते होने का अर्थ निष्क्रियता या अकर्मण्यता नहीं होता है। उसका मतलब बस ये होता है कि करूँगा, खूब करूँगा। आज के श्लोक में भी श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि वो चलता रहता है, ये थोड़ी कहा है कि वो रुक जाता है। चरति; चलता तो है ही। काम तो करता ही है, मुक्त होकर काम करता है। लेकिन हमें बंधनों की इतनी आदत है कि अगर कोई कहता है कि बंधनों में काम मत करो, तो हमें सुनाई देता है कि काम मत करो।

श्रीकृष्ण कह रहे हैं, भाई, बंधनों में काम मत करो। तो हमें सुनाई क्या दे रहा है? श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि कामना, वासना, हंता-ममता में मत जियो। तो हमें सुनाई क्या दे रहा है? “मत जियो।” ये तो हमारी आदत का तकाज़ा है, इसमें श्रीकृष्ण बेचारे क्या करें?

अरे, सागर को नदियों को आगोश में लेना है, सबका स्वागत करना है, सबको ठिकाना देना है। नहीं वो विरोध कर रहा किसी का भी, लेकिन वो नदियों को ये अधिकार भी थोड़ी दे रहा है कि आओ और सिर पर चढ़ जाओ, सागर ही बन जाओ। वो कह रहा है, मैं महासागर, नदियाँ सब हैं छोटे-छोटे बच्चे हैं, खिलौने हैं। आ जाओ, आओ तुम भी आओ; ले लो, हमारा कुछ नहीं जाता। लेकिन हम करेंगे तो वही न जो हम हैं। सागर का कृत्य सागर-समान होना है, नदी-समान नहीं होना है। बस ये मुक्ति का मतलब है।

मुक्ति का मतलब ये नहीं है कि किसी को छूना नहीं है; नदी से कहना है, दूर हट, मैं पुरुष हूँ, तू प्रकृति है। आ गई भ्रष्ट करने बार-बार चली आती है। तू भी आ जाती है। न जाने कितनी सारी तो तुम हो; कोई इधर से घुस रही, कोई उधर से घुस रही। छोटी, बड़ी, लंबी, चौड़ी, हरी, काली, नीली, पीली, हर रंग की होती हैं, आ जाती हैं। किसी को मना नहीं कर रहा, वो सबको आलिंगन में ले रहा है और कह रहा है, तुम सब भी आ जाओ, तो भी मैं तो रहूँगा सागर ही।

हाँ, तुम मुझसे रिश्ता बना सकती हो। तुम कह दो, मैं सरिता हूँ, मैं सागर के लिए हूँ। तुमको जो रिश्ता मुझसे बनाना है बना लो, लेकिन मैं सागर हूँ, मैं असंबंधित रहता हूँ; ये आत्मा की पहचान है। असंबद्ध है वो, असंग है वो, अद्वैत है वो। वो नहीं किसी से रिश्ता बनाती। ये विचित्र बात है। ये तो हेकड़ी चला रखी है एक तरफ़ा मामला है। माने नदियाँ बेचारी जा-जाकर उसे कहें, कि परमेश्वर हो हमारे, तुम ही सब कुछ हो, हम तुम में समर्पित हुए जा रहे हैं, आकर मिल गए तुमसे, अपनी हस्ती खो दी।

कभी सुना है कि सागर नदी हो गया? अरे, नदी का सौभाग्य है, नदी की गति का अंत है कि नदी सागर हो जाए।

नदी का धर्म है; सागर हो जाना। और सागर का इतना ही धर्म है कि जब नदी आए तो उसको स्वीकार कर लेना, कोई विरोध न करना। यहाँ बराबरी का खेल नहीं चलता, कि नदी सागर हो गई, सागर नदी हो गया, और उल्टा बहने लग गया। सोचो, सागर नदियों में उल्टा बहने लग जाए तो हमारा क्या होगा? नदियों में बाढ़ आ जाएगी, गड़बड़ हो जाएगी। नदी संभाल ही नहीं सकती न सागर को। दोनों में अगर कोई पारस्परिक संबंध है भी, कोई बराबरी की बात करो भी कि दोनों तरफ़ से धर्म क्या है? तो नदी का क्या धर्म है? कि वो जाएगी, सागर में मिलेगी, ये सब करेगी अपना।

सागर का क्या है? कह रहा है, मैं अनंत हूँ। मैं अनंत हूँ और मैं अधिक से अधिक इतना ही कर सकता हूँ कि अनंत होते हुए भी अपने द्वार जो सान्त है, जो सीमित है, मैं उनके लिए भी अपने द्वार निर्बाध खुले रखूँ। सब नदियाँ आओ। आओ, बारिशों, तुम भी आओ। लोगों को आना है। इतनी सब प्रजातियाँ, क्या-क्या नहीं सागर में, सबके लिए मैं उपलब्ध हूँ। ये उपलब्धता ही धर्म है अनंत का। अनंत का धर्म है, वो उपलब्ध है और वो पूरी तरह उपलब्ध है, वो बेशर्त उपलब्ध है।

नदी का धर्म है कि जो उपलब्ध है, उसको तुम अपने लिए उपलब्ध कराओ। वो उसकी ओर से उपलब्ध है। सागर तो सागर है। कितनी नदियाँ होती हैं, वो खो जाती हैं रेगिस्तानों में, सागर तक कभी पहुँचती नहीं।

नदी का क्या धर्म है? जो उपलब्ध है, उस तक तुम्हें पहुँचना भी पड़ेगा। नहीं तो उसकी उपलब्धता तुम्हारे काम नहीं आएगी।

बात समझ में आ रही है?

मुक्ति का अर्थ ये थोड़ी है कि ख़ुद मृत हो गए, अब जो कर रहे हैं वो नदियाँ कर रही हैं। और तमाम तरह के नाले भी हैं दुनिया के जो कचरा लाकर डाल रहे हैं। आप कह रहे हैं, अब तो मैं कुछ हूँ ही नहीं, मैं मुक्त हूँ। नहीं, सागर के अपने काम भी होते हैं, वो कर रहा है। उन कामों का नदियों को कुछ पता ही नहीं चलेगा। प्रकृति को क्या पता आत्मा के रस का? आत्मा करती है क्रीड़ा, प्रकृति को क्या पता? लेकिन हम ये सब नहीं जानते। हम आत्मा नहीं हैं; हम अहम् हैं। तो हम वही गतिविधि जानते हैं जो हम में प्रतिक्रिया-स्वरूप होती है प्रकृति के। तो आप “रिएक्शन” शब्द का इसलिए बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्योंकि आज तक हमने ज़िंदगी जी ही वही है, एक प्रतिक्रिया में हमने ज़िंदगी जी है। कुछ हुआ तो हमने भी पलट करके कुछ किया। और जो हो रहा है, वो कहाँ हो रहा है? वो प्रकृति में हो रहा है।

अब सच्चाई तो ये है कि हम महान आत्मा हैं, जिसके सामने प्रकृति बड़ी छोटी बात है। कोई बहुत विवशता नहीं है, कि कुछ हो रहा है तो तुम पलट के कुछ करो ही। इसका मतलब ये नहीं कि तुम कुछ नहीं करो। इसका मतलब ये है कि तुम जो करो, उसमें प्रतिक्रिया की कोई विवशता न रहे। उसमें ये न रहे, कि उधर कुछ हुआ है तो मुझे उससे संबंधित ही कुछ करना है। तुम कुछ ऐसा भी कर सकते हो जिसका बाहर चल रही हरकत से, गतिविधि से कोई लेना-देना ही नहीं है। इसमें होती है फिर शान। ये मौज की बात है, कि अब मैं विवश नहीं हूँ, कि सामने से गोली आई तो इधर से भी गोली ही चलेगी; सामने से गाली आई तो इधर से भी गाली ही चलेगी।

भीतर से भूख उठी है तो बुद्धि भोजन ही तलाशेगी, मैं मजबूर नहीं हूँ। प्रकृति अपना काम करती है। मैं स्वागत कर रहा हूँ प्रकृति का। मुझे उसमें बंधन डालने की, बाधा डालने की कोई अब मजबूरी नहीं है। प्रकृति, नदियाँ, सब अपना काम कर रही हैं। हम अपना काम कर रहे हैं। हमें उनको अड़चन नहीं देनी है लेकिन साथ ही हमें उनको ये अधिकार भी नहीं देना है कि वो…। और जब ऐसा रिश्ता बनता है नदी और सागर का, तो फिर होता है; सौन्दर्य।

हम बहुत कुछ करेंगे लेकिन अपनी स्वाधीनता में करेंगे, हम प्रकृति के आधीन होकर नहीं करेंगे। हम स्व के माने आत्मा के आधीन होकर अपनी स्वाधीनता में करते हैं। स्वाधीनता में करने का मतलब “न करना” नहीं होता। स्वाधीनता में करने के लिए ही तो इतनी बड़ी गीता है न, इतना घोर युद्ध करा दिया। अर्जुन को मुक्त कर रहे थे वो। जब मुक्त कर दिया तो देखो कितना उसने घोर कर्म कर डाला।

जब मुक्त नहीं था तो रिएक्शन दे रहा था। किसको दे रहा था? अपने भाव को कर रहा था। अब उसके भीतर से मोह, भय, आसक्ति; ये सब भाव उठ रहे थे। और जो संस्कार थे, वो भी सब प्राकृतिक ही न बाहर से आए हैं वो सब संस्कार उठ रहे थे भीतर से: कि ये हो जाएगा, वो हो जाएगा, स्वर्ग-नरक के तमाम लफड़े हो जाएँगे, समाज में दोष, अराजकता आ जाएगा। ये सब सोच रहा था, ये सब प्रतिक्रियाएँ थीं।

श्रीकृष्ण ने उसको प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दिया, प्रकृति से मुक्त कर दिया। अच्छे से समझ लीजिएगा, जब आप प्रकृति से मुक्त हो जाते हो, तो फिर आप घोर कर्म करते हो, जिसको रोकना बहुत मुश्किल होता है। और प्रकृति से निर्देशित होकर, या प्रकृति को प्रतिक्रिया देकर जब आप कोई काम करते हो, तो काम लुंजपुंज ही होता है, हल्का-फुल्का। थोड़ा-बहुत ही करते हो, ज़्यादा थोड़ी कुछ करते हो।

भाई, किसी ने आपको थप्पड़ मारा तो आप पलट के दो थप्पड़ मार दोगे, छह-सौ थप्पड़ थोड़ी मारते हो! किसी ने आपका ₹10 लूटा, आप उसके 20 लूट लेते हो। यही तो करते हो। तो प्रतिक्रिया में आप जो भी करते हो, सीमित ही होता है। आप कहते हो, जितना प्रकृति ने करा, उसी अनुपात में मैं भी कुछ कर दूँगा। कोई मेरे लिए बहुत भला है तो मैं भी उसके लिए, वो जितना भला था उससे 20% कम नहीं तो 20% ज़्यादा भला हो जाऊँगा। तो उसमें एक अनुपात निर्धारित होता है और सीमा होती है।

और जब आप बिना किसी विवशता के, बिना किसी प्रतिक्रिया के कुछ करते हो, तो वो अनंत आत्मा से निकलती है चीज़, वो अनंत ही होती है। उसको रोका नहीं जा सकता। अनंत है न, तो उसका कोई अंत नहीं कर पाएगा आसानी से। ऐसे आदमी को रोकना बहुत मुश्किल है, जो मजबूर होकर या किसी प्रतिक्रिया के कारण न लड़ रहा हो, न चल रहा हो। ऐसे को नहीं रोक पाओगे, क्योंकि आप उसकी गति का कारण नहीं तलाश पाओगे न।

किसी चीज़ को रोकने के लिए उसका कारण तलाशना पड़ता है और कारण हटा देना पड़ता है, तो फिर वो रुक जाता है। उसके पास कारण नहीं है, उसके पास आत्मा है। आत्मा कारण नहीं होती, आत्मा अकारण होती है। जो व्यक्ति किसी लालच पर चल रहा है, किसी वजह पर चल रहा है, बहुत दूर तक नहीं चल पाएगा। उसके चलने की वजह प्राकृतिक है, सीमित है। वो वजह कभी न कभी चूक जाएगी, वो व्यक्ति रुक जाएगा। और जो बोध पर चल रहा है उसका चलना अनंत होगा।

उदाहरण देता हूँ: अँग्रेज़ भारत पर छाए हुए हैं, और आपको पसंद नहीं आता कि कोई आप पर चढ़ा हुआ है, तो आपने कहा; आज़ादी। अगर आज़ादी की आपकी माँग सिर्फ़ एक प्रतिक्रिया है अँग्रेज़ों के आधिपत्य की। अँग्रेज़ों ने आप पर अधिकार कर लिया, और जब कोई आप पर अधिकार करता है तो प्रतिक्रिया तो उठती है न, गुस्सा उठता है, विरोध आता है। तो आपने प्रतिक्रिया करी, तो आप बहुत जल्दी सन्तुष्ट हो जाएँगे। आपका जो विद्रोह है वो बहुत आगे तक नहीं जाएगा। देश को आज़ादी मिलेगी, आपका विद्रोह समाप्त हो जाएगा। ज़्यादातर क्रान्तिकारी 1947 के बाद कहीं नज़र नहीं आते। समझ में आ रही है बात?

लेकिन जिनको मुक्ति चाहिए थी, वो नहीं रुके 47 के बाद भी। क्योंकि एक चीज़ होती है, कि वो मेरे घर में घुस आया, मैं उसे अपने घर से निकाल दूँ। वो मेरे घर में घुसा, मैंने उसे अपने घर से निकाल दिया, मेरा विद्रोह समाप्त हो गया। लेकिन जो मुक्ति के पिपासु हैं, उनका थोड़ी समाप्त हो गया! उनका तो फिर चलता रहता है, लगातार चलता है। वो कहते हैं, राजनैतिक आज़ादी तो बस एक मील का पत्थर है, हमें तो बहुत दूर तक जाना है। हमें तो पूर्ण मुक्ति चाहिए। छोटी आज़ादी से काम नहीं चलेगा, पूरी आज़ादी चाहिए। और पूरी आज़ादी में फिर पता नहीं और क्या–क्या आ जाता है। वो एक अनंत प्रयोजन, अभियान है बहुत बड़ा।

और इसी लिए जो बड़े से बड़े क्रांतिकारी हुए हैं उनका लक्ष्य मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता नहीं था, वो मनुष्य-मात्र की मुक्ति के प्रार्थी थे। उन्होंने ये नहीं कहा था कि अँग्रेज़ बस यहीं से चले जाएँ, यूनियन-जैक हट गया, तिरंगा आ गया, तो काम ख़त्म हो गया। उन्होंने कहा, नहीं, बहुत लम्बा काम है, बहुत दूर तक जाना है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न ये था कि जैसे बच्चा पैदा हुआ तो उसकी एक कल्पना, मतलब चेतना के निम्नतम स्तर पर वो पैदा हुआ। फिर जीव प्रकृति में रहा है, और फिर उसको आत्मज्ञान चाहिए। तो वो भी उसको प्रकृति में ही मिल रहा है गुरु के माध्यम से। तो ये सब जैसे हम कहते हैं, कि ‘कल्पना-मात्र’ है। तो कहीं ये गुरु भी एक कल्पना-मात्र नहीं है? ये विरोधाभास नहीं हो रहा? एक तरह से कि हम मुक्ति की कल्पना या आत्मज्ञान चाहते भी हैं, वो भी प्रकृति में ही मिल रहा है।

आचार्य प्रशांत: कल्पना की प्रकृति, पहचान ये होती है कि वो कल्पनाकार को कभी परेशान नहीं करती। वो कल्पनाकार की हस्ती पर ही कभी सवाल नहीं खड़ा करती। आपका सपना कितना भी भयानक हो, सपने में आपको ये दिखाया जा रहा है कि पूरी दुनिया आपको ठग रही है, आपको सब बुद्धू बना रहे हैं, ठीक है?

आपको एक सपना आया है जिसमें ये है कि आपको जो कुछ लग रहा है सब गलत है। सपने में आपको लग रहा है कि मैं एक भ्रम के देश में आ गया हूँ जहाँ जिस चीज़ को छू रहा हूँ वही नकली है, चीज़ को छू रहा हूँ वही एक मायाजाल जैसा है बस। लेकिन उस सपने में, हर चीज़ को कितना भी कितना भी भ्रम आप देख लें, आप ये कभी भी नहीं देख पाएँगे सपने में कि ये सपना ही भ्रम है। कल्पना ऐसी होती है।

कल्पना आपको अगर बहुत डरा भी देती है, तो भी ये कहकर कभी नहीं डराती है, कि ये डर ही झूठा है; ‘डरो, सब कुछ झूठ है!’ सब कुछ कल्पित है, और जो कुछ कल्पित है हम कह रहे हैं, उसकी पहचान ये है कि वो कल्पना करने वाले को और कुछ भी बोल दे, ये कभी नहीं बोलता कि तुम सिर्फ़ कल्पना कर रहे हो।

कोई सपना आपसे ये नहीं कहता, ‘उठ जाओ।’ हुआ कभी कि सपना कह रहा हो, ‘अरे, तुम सपना देख रहे हो, चलो उठो!’ सपने में और कुछ भी हो सकता है, ये कभी नहीं होता, ‘ये तो सिर्फ़ सपना है।’ सपना कायम ही तब तक रहेगा जब तक वो आपको एहसास दिलाए रहेगा कि वो सच है। सपना कभी आकर नहीं बोलेगा कि ‘मैं तो सपना हूँ, झूठ हूँ।’

तो वो कल्पना की इस दुनिया में, बिल्कुल ठीक है कि ये दुनिया पूरी कल्पित है। कल्पना की इस दुनिया में अगर कोई ऐसा मिल जाता है जो ये बता देता है कि ये सब कुछ कल्पना है, उसको आप देख लीजिए कि उसको आप ‘कल्पना के अन्दर का’ मानना चाहते हैं या ‘बाहर का’।

लोग फँसते रहे इस सवाल पर, उसको कल्पना के अंदर का मानें या बाहर का मानें? तो होशियार लोगों ने समाधान दिया, बोले, ऐसा करो उसको आधा अंदर का, आधा बाहर का मान लो। कहो कि हैं तो वो दोनों ही। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि वो इसी कल्पित दुनिया का है, इसी मायावी प्रकृति का है वो, इंकार तो कर ही नहीं सकता। लेकिन ये भी इंकार नहीं कर सकते कि वो इससे बाहर भी ले जाता है। तो उसको दोनों मान लो। उसको तुम पुल की तरह मान लो, जिसका एक सिरा इधर है, एक सिरा उधर है; वो दोनों तरफ़ का है। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम उसके किस सिरे से नाता बनाते हो।

गुरु बिल्कुल मायावी होता है, भ्रामक होता है, इसी नकली दुनिया में वो भी एक नकली शख़्स होता है। अगर तुम्हें उसके नकली छोर से ही नाता रखना है, तो वो नकली ही है भाई। पुल का एक छोर हमेशा उस तरफ़ होता है जिधर आप खड़े हैं, कि नहीं? आपको अगर उसके उसी छोर से नाता रखना है जिधर आप खड़े हैं, तो पुल निश्चित रूप से व्यर्थ है, बेकार है, किसी काम का नहीं है।

अब तो ये आपके ऊपर है कि गुरु के किस छोर से आपने रिश्ता बनाया है। गुरु का एक छोर है, वो बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप हो। आप उसी से रिश्ता बनाए रहो, तो आगे आपको ये दुहाई देने की और शिकायत करने की पूरी आज़ादी मिलेगी, कि ‘गुरु धोखा दे गया।’ अब पता नहीं गुरु धोखा दे गया या आपने रिश्ता ही गुरु के गलत छोर से बनाया।

किसी ने कह दिया, पुल है। किसी ने कह दिया, सीढ़ी है। अब सीढ़ी तो है, लेकिन सीढ़ी का जो सिरा ज़मीन पर ही पड़ा हुआ है, तुम वहीं पर जाकर बैठ जाओ, फिर बोलो, ‘सीढ़ी ने ऊपर नहीं पहुँचाया।’ सीढ़ी ने मना करा था? लेकिन तुम्हें सीढ़ी के उसी पायदान से नाता रखना था जो बिल्कुल ज़मीन पर है, सीढ़ी का वही सोपान तुम्हारा मन भा गया जो बिल्कुल पार्थिव है, एकदम ज़मीन से टिका हुआ है। तो इसमें सीढ़ी का दोष है या तुम्हारा, पता नहीं।

समझ में आ रही है बात?

तो ये भूल-भुलैया है और बाहर निकलने का दरवाज़ा भी इसी के अंदर ही है। जिन्होंने गुरु की बात करी है उन्होंने कहा है, कि गुरु है तो भूल-भुलैया के अंदर ही, पर वो ऐसा दरवाज़ा है जो खुलता बाहर की तरफ़ है। इस बात के लिए आप उसको दोष दे सकते हो, या यही कहकर आप उसका एहसान मान सकते हो।

एक बड़ा भारी दरवाज़ा हो जो आज़ादी में खुलता हो, वो आपके किस काम का, अगर वो दरवाज़ा भूल-भुलैया में नहीं है। आप तो भूल–भुलैया में हो न। आप जहाँ फँसे हुए हो, आपको दरवाज़ा वहीं चाहिए न, या कहीं और चाहिए? फँसे आप भूल-भुलैया में हो और आप तारीफ़ें कर रहे हो इंडिया-गेट की! लखनऊ के भूल-भुलैया में फँसे हो और तारीफ़ें कर रहे हो दिल्ली के इंडिया-गेट की! तुम्हारे कोई काम आएगा वो? है बड़ा भारी विशाल, क्या दर्शनीय है। तुम्हारे कौन-सा आएगा दरवाज़ा काम? जो भूल-भुलैया के अंदर ही हो।

गुरु भूल-भुलैया के अंदर ही होता है, तो बिल्कुल कह सकते हो कि वो भी माया का ही हिस्सा है, बिल्कुल माया का हिस्सा है। लेकिन वो माया का एक विशिष्ट हिस्सा है, जिसका यदि तुमने सदुपयोग कर लिया तो वो तुम्हें माया के बाहर भी ले जाएगा। सदुपयोग नहीं किया तो वो बिल्कुल माया के अंदर का ही है। भूल-भुलैया में पता नहीं कितने दरवाज़े होते हैं न, न जाने कितने दरवाज़े हैं! तुम उस ख़ास, विशिष्ट दरवाज़े की उपेक्षा कर सकते हो बिल्कुल, जो बाहर को खुलता है। बाक़ी दरवाज़ों को तुम आज़माते रहो।

तो गुरु की उपेक्षा करी जा सकती है, या नकली गुरु पकड़ा जा सकता है, या कुछ भी और किया जा सकता है। या गुरु को दोष दिया जा सकता है, कि ये तो हमारे जैसा ही है। या इसी नाते गुरु का अनुग्रह माना जा सकता है, कि बिल्कुल हमारे ही जैसा है। हमारे जैसा नहीं होता तो हमारा हाथ कैसे पकड़ता? हमारे जैसा नहीं होता तो हमारी बात कैसे समझता? हमारे जैसा नहीं होता तो हम उससे रिश्ता कैसे बनाते?

सीढ़ी का एक सिरा अगर ज़मीन पर नहीं होता तो हम सीढ़ी पर चढ़ने की शुरुआत भी कैसे कर पाते? तो एहसान मानते हैं कि गुरु कुछ अर्थों में बिल्कुल हमारे जैसा है। उसमें बिल्कुल वही सारे गुण-दोष हैं जो हममें हैं। हमारे जैसा नहीं होता तो हमारे काम कैसे आता? ये तो हमारे ऊपर है कि हम रिश्ता क्या बनाना चाहते हैं। सही रिश्ता बनाओगे तो काम आ जाएगा, फ़ालतू रिश्ता बनाओगे तो तुम्हें शिकायत का सामान मिल जाएगा। समझ में आ रही है बात?

प्रश्नकर्ता: इसका मतलब ये कह सकते हैं हम, कि प्रकृति अपने माध्यम से ख़ुद को, जो ये बात आपने कही थी पहले, ख़ुद के माध्यम से प्रकृति एक मुक्ति को पाना चाहती है। तो ये उसी दिशा में जा रहा है?

आचार्य प्रशांत: अहम् मुक्त होना चाहता है, और प्रकृति अहम् की ही छाया है। तो ठीक जैसे तुम्हारे भीतर मुक्ति के दरवाज़े हैं, वैसे ही दुनिया में भी मुक्ति के तमाम दरवाज़े हैं।

प्रश्नकर्ता: हम कह सकते हैं कि जो कबीरदास जी का श्लोक है, ‘गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागू पाए।’ यहाँ बैठता है, कि गुरु इस ओर है, प्रकृति में ही है वो गोविंद तक ले के जा रहा है?

आचार्य प्रशांत: अब जिनको उद्धृत कर रहे हो, उन्होंने कहा है तो ठीक ही कहा होगा न। मैं कौन होता हूँ कहने वाला कि हम कह सकते हैं कि नहीं कह सकते हैं। साहब बोल गए हैं तो ठीक ही बोल गए होंगे, मैं उसमें अपनी राय क्या दूँ?

प्रश्नकर्ता: नहीं, बस ये बात थोड़ा-सा मतलब कॉन्ट्राडिक्टिंग लगती है, कि कल्पना में ही हम एक ऐसी चीज़ पा रहे हैं जो हमें आत्मज्ञान की ओर ले जा रही।

आचार्य प्रशांत: अरे, तुम कुछ नहीं कर पा रहे हो! वो होता है। तुममें अगर ललक होती है ऊपर उठने की तो तुम पुल का उपयोग कर लेते हो या सीढ़ी का उपयोग कर लेते हो, वो तुम्हारे ऊपर है। पुल भी उपलब्ध है, सीढ़ी भी उपलब्ध है। न करो उपयोग, तो सीढ़ी ज़मीन पर ही सजावट की एक चीज़ बन जाएगी, है न?

आपके कमरे से एक सीढ़ी ऊपर को जा रही है, और आपने उसके जो नीचे के तीन सोपान थे, उस पर कड़ाई, चिमटा और ढोल रख दिया है और एक सूटकेस सजा दिया है। कह रहे हो, ‘इसको तो मैं इस्तेमाल कर रहा हूँ अलमारी की तरह। शेल्फ़्स हैं ये। सीढ़ियाँ नहीं हैं। ये क्या है? ये सामान रखने की शेल्फ़्स हैं।’ उसको आप रख दीजिए। तो गुरु का ये इस्तेमाल भी हो सकता है कि आप उससे कुछ इस तरह का रिश्ता बना लो कि अब उसके माध्यम से ऊपर जाना संभव ही न रहे। आपने उसे सामान रखने की वस्तु बना लिया। ये सब भी कर सकते हो।

ये तो आपके ऊपर है कि आप में ललक कितनी है मुक्त होने की। आपमें अगर ललक है, तो सीढ़ियाँ आपको उपलब्ध हो जाएँगी। कहते हैं न, व्हेन द स्टूडेंट इज़ रेडी, द टीचर अपीयर्स। वो तो आपकी ललक पर है। नहीं तो फिर कुछ भी करो।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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