मुक्ति का मतलब ये नहीं है कि किसी को छूना नहीं है; नदी से कहना है, दूर हट, मैं पुरुष हूँ, तू प्रकृति है। आ गई भ्रष्ट करने बार-बार चली आती है। तू भी आ जाती है। न जाने कितनी सारी तो तुम हो; कोई इधर से घुस रही, कोई उधर से घुस रही। छोटी, बड़ी, लंबी, चौड़ी, हरी, काली, नीली, पीली, हर रंग की होती हैं, आ जाती हैं। किसी को मना नहीं कर रहा, वो सबको आलिंगन में ले रहा है और कह रहा है, तुम सब भी आ जाओ, तो भी मैं तो रहूँगा सागर ही।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: हैलो सर। एक मुक्त पुरुष है या फिर एक ऐसा इंसान जिसकी चेतना बहुत ऊपर उठ चुकी है, उसके बीच में और संसार के बीच में वैसा ही रिलेशन होता है जैसा सागर और नदी का होता है। नदी कुछ भी डाल सकती है उसके अंदर और अगर चाहे तो कुछ भी निकाल भी सकती है, लेकिन सागर में कोई रिऐक्शन नहीं देखने को मिलता। उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उसके अंदर क्या आ रहा है और क्या जा रहा है।
तो जब रिऐक्शन की बात होती है, तो अगर कोई मुक्त हो भी चुका है, तो भी उसका शरीर तो संसार में ही होता है। तो वो कैसे डिसाइड कर सकते हैं कि रिऐक्शन किन बातों पर करना है या नहीं करना है? क्योंकि असल मायने में तो एलिजिबल भी वही हैं रिऐक्ट करने के लिए जो भी संसार में हो रहा है।
तो एक जो मॉरल कम्पस होता है, या फिर सही और गलत के बीच में क्या सही है, क्या गलत है। जब मैं कबीर साहब को सुनता हूँ, तो बाक़ी सब में और उनमें एक डिफ़रेंस ये दिखता है कि उन्होंने रिऐक्ट बहुत ज़्यादा किया है और हर चीज़ पर किया है।




