
निर्वाण षट्कम को स्वयं तक पहुँचने का आख़िरी सूत्र भी माना जाता है। निर्वाण षट्कम के सब के सब श्लोक मात्र नकार में हैं। सब बस ये बता रहे हैं कि किसको ज़िंदगी में अहमियत नहीं देनी है। वो सब, जो मैं नहीं हूँ, जो मुझे बाँध कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इनको बहुत महत्त्व नहीं देना है। इन सबका उपयोग कर लेना, उधर बढ़ने को, जिधर शुद्धता हो। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे। जहाँ कहीं भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है, शिवत्व वहीं है।


जब तक ये प्रश्न शेष है कि “कब तक उठते रहें?” तब तक उठते रहो। जब ये प्रश्न ही मौन हो जाए कि “कब तक उठते रहें?” तब उठना-गिरना, ये सब अप्रासंगिक हो जाएगा। जब तक उठने के लिए कोई बचा है, तब तक उठते रहो। यही पुनर्जन्म है। उठते रहो, उठते रहो।




प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, भारत अब कोरोना महामारी से संक्रमित लोगों की संख्या में चौथे स्थान पर आ चुका है। अमेरिका लंबे समय से सबसे ऊपर, पहले स्थान पर है ही। भारत और अमेरिका दोनों ही जनतंत्र की मिसाल माने जाते हैं। अमेरिका सबसे शक्तिशाली जनतंत्र, और भारत सबसे बड़ा जनतंत्र।…











पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

वैज्ञानिक का काम है — मलहम तैयार करना, तरह-तरह के रसायनों का इस्तेमाल करके। लेकिन विज्ञान अपने आप में ये नहीं कहेगा कि इस मलहम को अब ले जाओ और लोगों को लगाओ। विज्ञान कहेगा: “ये मलहम तैयार है।” अब इसके बाद कोई चाहिए — जिसको मुक्ति की या करुणा की क़द्र हो और वो उसको ले जाकर के लोगों को मलहम लगा दे।



सच्चा प्रेमी ज़िंदगी में चुनौती बनकर आता है। वो आपको बेहतर होते देखना चाहेगा—बढ़ते, बदलते। उससे असुविधा होगी, मन में आएगा कि ये ज़िंदगी में आया ही क्यों? ये परेशान करता है, मेहनत करवाता है, चुनौती देता है। पर हम तो उन प्रेमियों को ढूंढ़ते हैं, जो बस सुख दें, झूठी तसल्ली दें, तारीफ़ें करें। तो परखना है कि प्रेम सच्चा है या नहीं—तो देखो, वो तुम्हें दे क्या रहा है? सुख या होश?







आपको लगता है कि अब आपकी चीज आपसे छिन गई, वो छिनी नहीं है, वो कहीं और पहुँची है, बिखर गई है, हजार जगह पहुँच गई है, लेकिन वो जहाँ भी पहुँची है, वहाँ पर, तो आप भी मौजूद हो। तो आपसे भिन्न कहाँ हुआ वो आपसे अलग कहाँ हुआ आपसे बिछड़ा कहाँ, वो? जो आपको दिखाई देता है कि वो जहाँ भी जायेगा वो आपको ही पायेगा। तो फिर आपको दुख थोड़े ही होगा।








जो पुरुष प्रकृति में रस नहीं लेगा प्रकृति उसके सामने अपना पूरा नृत्य प्रदर्शित कर देगी और जो पुरुष प्रकृति का दीवाना होकर घूमेगा प्रकृति खुद उससे बच-बचकर घूमेगी। जब पुरुष जैसा स्वामी हो तो प्रकृति का चंचल हो जाना लाज़मी है न। वो है ही ऐसा जो किसी के हिलाए न हिले, तो आश्वस्ति है कि ये तो हिलेगा नहीं तो नाचो, गाओ, लुभाओ, मज़े करो। पक्का भरोसा है कि इस पर कोई विक्षेप आएगा नहीं।






Acharya Prashant: Man is both Prakriti and something else. Prakriti is y=sin(x). You are confined within duality- ups and downs, ups and downs, leading to nothing. The up will not remain up, forever; the down will not remain down, forever. Crests and troughs, crests and troughs; that is






शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।
यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।
ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।
आमतौर पर हमने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जीवन का लक्ष्य माना है। माना गया है कि धर्म, अर्थ और काम रहेगा, तो अन्ततः मोक्ष उतरेगा — यह भ्रम है। हमने यह बड़ी-से-बड़ी गलती की है कि धर्म को अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन बना लिया है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति का नाम धर्म नहीं हो सकता; वो तो कोई दुकान होगी। ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि यदि धर्म वो है जो अर्थ और काम की सेवा में लगा हुआ है, तो अर्थ और काम को ही नहीं, धर्म को भी त्याग दो — इनको त्यागना ही मोक्ष है।
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” पूर्ण से पूर्ण आया है, इसको ऐसे समझिए कि कुछ भी कहीं से नहीं आया है — जो है, सामने है। तुम उसकी उत्पत्ति जानने की चेष्टा मत करो, क्योंकि उसकी कोई उत्पत्ति हुई ही नहीं है। हम ऐसे लोग हैं जिन्हें कुछ पता नहीं, पर दावा लगातार यही है कि पता है। शांति मंत्र तुम्हें बता रहा है कि ज़रा विनय धरो — जब नहीं जानते, तो चुपचाप कहो कि नहीं जानते, और इस ‘न जानने’ में बड़ा जानना है।
कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।
पारमार्थिक तल पर — “सत्यमेव जयते” — सत्य ही जीता हुआ है। लेकिन हम जिस दुनिया में हैं, वहाँ सत्य को जिताने के लिए कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है; असत्य को हराने के लिए बहुत जान लगानी पड़ती है। “सत्यमेव जयते” हमें यह बताने के लिए है कि सच जीत नहीं रहा है, उसे जिताओ। सत्य हमारे लिए एक छोटे बच्चे और नन्हे पौधे जैसा है। उसको हम जिताएँगे या हरवाएँगे, वह हमारे ऊपर है।
दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती।
मन में नामों का पूरा एक भंडार है। पूरी एक भीड़ है मन में नामों की। तुम सर्वप्रथम तो अपने लिए एक ऐसा नाम तैयार करो जो उस भीड़ को भगाना जानता हो, जो उस भीड़ का हिस्सा नहीं हो। वो जो पूरी भीड़ है उससे तुम्हारा संबंध अहंकार का है। वो जो पूरी भीड़ है उससे हमने पोषण पाया है, अहंकार उसी के सहारे खड़ा रहता है। कोई ऐसा नाम लेकर के आओ जो उस भीड़ से किसी तरह का रिश्ता न रखता हो। और सिर्फ़ तभी उस नाम को जपने से लाभ है, नहीं तो आप जप-जप के बस अपने अहंकार को ही और दृढ़ कर रहे हो।
तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।
शारीरिक रूप से तो परनिर्भरता रहेगी, लेकिन जब परनिर्भरता मानसिक बन जाती है, तो वह बहुत ख़तरनाक हो जाती है। अगर आप देह हैं, तो परनिर्भरता ठीक है, लेकिन आप देह भर नहीं हैं। जब हम स्वयं को देह ही समझ लेते हैं, तो देह का दर्द चेतना का दुख बन जाता है — यह बहुत बड़ी ग़ुलामी है। आपके भीतर कुछ ऐसा है जो आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है। जब आपका होना किसी भी विषय के होने से आज़ाद हो जाता है, तब आपका होना सार्थक हो जाता है, और आप सही तरीक़े से जीने के लिए मुक्त हो जाते हो।
नेता, सेलिब्रिटीज, क्रिकेटर और इंडस्ट्रियलिस्ट, जो आबादी के शीर्ष 0.01% हैं, वही इस ग्रह को तबाह करने के ज़िम्मेदार हैं। इनके प्राइवेट जेट और लाइफस्टाइल से millions of tons कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है, जो इस कार्बन क्राइसिस का असली कारण है। पर आम आदमी को गुनहगार बताया जा रहा है—उसे कहा जा रहा है बल्ब कम जलाओ, रिसाइक्लिंग करो। असली समाधान यही है कि इन शीर्ष लोगों के consumption पर रोक लगे, नहीं तो आम आदमी 55–60 डिग्री तापमान में पागल होकर मरेंगे।
"अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे" का अर्थ है, कि जब ये सुन रहा है मुसाफिर, जब तू ये बात सुन रहा है, तभी जग जा। अब से अर्थ है, अभी। और अभी माने, जब जग रहे हो, जब सुन रहे हो, तभी। सुनने के लिये जगना आवश्यक है। सुनने के लिए जगना आवश्यक है। तो जब भी तुम इन वचनों को सुन रहे हो, बस तभी उठ के बैठ जाओ। जब भी सुन रहे हो, तभी उठ जाओ।
का जाति:। जातिरिति च। न चर्मणो न रक्तस्य न मांसस्य न चास्थिनः। न जातिरात्मनो जातिर्व्यवहारप्रकल्पिता॥१०॥
शरीर (त्वचा, रक्त, हड्डी आदि) की कोई जाति नहीं होती। आत्मा की भी कोई जाति नहीं होती। जाति तो व्यवहार में प्रयुक्त कल्पना मात्र है।
~ निरालंब उपनिषद (श्लोक क्रमांक १०)
आचार्य प्रशांत: आज जो…
तामसिकता का अर्थ आलस्य होना आवश्यक नहीं, हालांकि सतह पर यह आलस्य जैसा लग सकता है। असली तमस स्वयं को यह भरोसा दिलाने में निहित है कि "मैं ठीक हूँ," "मैं स्वस्थ हूँ," "मुझे सब पता है," जबकि वास्तव में न तो मैं ठीक हूँ, न स्वस्थ, न ही स्वयं का जानकार। ऐसे व्यक्ति या तो स्वयं जागें, या फिर ज़िंदगी शायद उन्हें झंझोड़कर जगा पाए — जिसकी संभावना बहुत कम होती है। सबसे अच्छा विकल्प है स्वयं जाग जाना, क्योंकि जब जीवन सिखाता है, तो फिर वह किसी भी तरह की रियायत नहीं देता।
जैन धर्म का अनेकांतवाद या स्यादवाद, अहिंसा की बुनियाद है। मैं दूसरे के विपरीत तभी खड़ा होऊंगा जब मुझे अपनी हस्ती में दृढ़ विश्वास होगा — और यही बड़ा विश्वास ही हिंसा है। अनेकांतवाद का अर्थ है: कुछ भी पूरी तरह पक्का या निश्चित नहीं। जब कुछ निश्चित नहीं, तो दूसरे को गलत कैसे ठहराएं? और जब दूसरे को गलत नहीं ठहरा सकते, तो उनके प्रति हिंसक कैसे हो सकते हैं? अनेकांतवाद अहंकार की जड़ पर चोट करता है। दूसरे के प्रति तुम हिंसक तभी हो सकते हो, जब कहोगे — मैं सही, दूसरा गलत।
ज़कात माने दान, और दान वह नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो। अहंकार तो व्यापारी होता है—वह कुछ देता भी है तो उसमें मुनाफ़ा देखकर देता है। सबसे निम्न कोटि का दान वह है जिसमें तुम देते हो और अपेक्षा करते हो कि बदले में कुछ मिले। उससे ऊपर वह दान है जिसमें यह उम्मीद नहीं बाँध रहे कि कुछ मिलेगा। ज़कात एक विधि है, जिससे ज़िंदगी में कुछ ऐसा करो जिसमें तुम्हें मुनाफ़ा नहीं चाहिए।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ||3. 9||
अन्वय: यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र (यज्ञ के लिए किए कर्म के अलावा अन्य कर्म में) लोकोऽयं (लगा हुआ) कर्मबन्धनः (कर्मों के बन्धन में फँसता है) कौन्तेय (हे अर्जुन) मुक्तसङ्गः (आसक्ति छोड़कर) तत्-अर्थ (यज्ञ के लिए) कर्म (कर्म) समाचर (करो)
काव्यात्मक अर्थ: बाँधते…
भगवान किसी और को सूली पर कहाँ चढ़ा रहे हैं? वो ही हैं, अपने आप को ही सूली दे रहे हैं। खुद ही जाते हैं सिपाही बनकर; खुद ही पकड़ लाते हैं किसी संत को, फिर खुद ही न्यायलय में न्यायाधीश बन बैठते हैं, खुद को ही झूठी सज़ा सुना देते हैं, फिर खुद ही जल्लाद हो जाते हैं; फिर खुद ही सूली हो जाते हैं, फिर खुद को ही सूली पर चढ़ा देते हैं। और किसको मार रहे हैं वो? दया इत्यादि तो दूसरों पर की जाती है। जहाँ द्वैत ही नहीं, वहाँ दया कैसी। किस पर दया करनी है?
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषः योऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अर्थ: सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मा ने कहा था कि यज्ञ के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त करोगे। यह यज्ञ ही तुम लोगों को अभीष्ट फल देगा और कामधेनुतुल्य सर्वाभीष्टप्रद होगा।
काव्यात्मक अर्थ:
सगुण हो बंधन चुना…
कह रहे हैं कि ये तुमने जो तमाम तरह की कहानियाँ गढ़ ली हैं, ये कहानियाँ तुम्हारे अंजन का ही विस्तार हैं, निरंजन की कोई कथा नहीं हो सकती। सारी समस्या तब होती है जब धर्म में कथाएँ घुस जाती हैं। जितनी तुमने किस्से बाज़ियाँ और कहानियाँ ये खड़ी की हैं, इन्होंने ही तुम्हारे धर्म को चौपट कर दिया है। श्रीराम को निरंजन ही रहने दो, श्रीकृष्ण को भी निरंजन ही रहने दो। जैसे ही तुमने गोपी संग गोविंद बना दिया, वैसे ही मामला अंजन का हो गया। गोविंद को गोविंद रहने दो, गोपियाँ मत लेकर के आओ।
मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्तधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
“मैं तो महानुभाव गुरुओं को न मारकर, इस लोक में भिक्षान्न भोजन करना कल्याणकर मानता हूँ, क्योंकि गुरुओं का वध करके मैं रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूँगा।“
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। एकलव्य की कहानी सुनकर बड़ा दुःख होता है कि द्रोणाचार्य जैसा स्वाभिमानी और श्रेष्ठ गुरु भी अपने स्वार्थ और पक्षपात के चलते श्रद्धावान एकलव्य से अन्याय करता है। एकलव्य इस अन्याय के प्रति आदर प्रकट करते हुए अपना अँगूठा देकर भी गुरु के प्रति श्रद्धा से…
ज़्यादा सोचने की समस्या ही तब होती है जब आप कर्म का स्थान विचार को दे देते हैं। जो कर्म में डूबा हुआ है, उसको सोचने का अवकाश कहाँ? जितनी ऊर्जा, जितना समय सोच को दे रहे हैं, यदि आप उस काम को दें, जो करणीय है, जो उचित है, तो आपको फ़ुरसत ही नहीं मिलेगी सोचने की! आप जीवन के जिस भी मुक़ाम पर खड़े हैं, जितनी भी रौशनी है, उस पर आगे बढ़िए। व्यर्थ सोचना-विचारना अपने आप ख़त्म हो जाएगा।
अहंकार है, कुछ नहीं भी करो तो भी तुम लगे ही हुए हो, रत हो, उद्यमी हो। और नहीं है अगर अहंकार तो जो करना है करो, तुमने तब भी कुछ नहीं किया।अहंकार रहित कर्तृत्व को ही कहते हैं अकर्तृत्व। अकर्ता और कोई नहीं है; अकर्ता और कर्ता में यही अंतर है कि करते दोनों हैं, एक इसलिए करता है कि कुछ मिल जाएगा और एक बस यूँही करता है।
जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वो दृश्य, जो उसको देखने वाला है, वो दृष्टा। तो देवता, मनुष्य, ऋषि आदि दिखाई दे रहे हैं अर्जुन को, तो ये सब क्या हो गए? दृश्य। और इनको देखने वाला कौन है? दृष्टा, अर्जुन स्वयं। और दृश्य और दृष्टा के आधार में कौन बैठा है? परमात्मा। दृश्य और दृष्टा, दोनों किससे आए हैं और किसमें लीन हो जाने हैं? ये इन तीनों का किस्सा है।
प्रश्नकर्ता: आज शिविर में वज्रसूचिकोपनिषद् का पाठ किया तो जाना कि सचमुच में ब्राह्मण कौन होता है। आज तक लगता था कि ब्राह्मण जन्म या जाति के आधार पर बनते हैं; आज वो धारणा टूट रही है। ब्राह्मण कौन होता है, आचार्य जी और स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: पहले तो…
अध्यात्म पैसे का विरोधी नहीं है। अध्यात्म कहता है कि पैसा न अच्छा है, न बुरा; मुक्ति अच्छी है। मुक्ति के लिए जितना पैसा चाहिए, उतना अर्जित करो, पर अतिरिक्त धन बंधन बनता है। पैसा बोझ नहीं बनना चाहिए। दुर्भाग्य की बात ये है कि निर्धन धन की कमी का बोझ उठाता है—कि पैसा नहीं है, कम है। धनवान अधिक धन का बोझ उठाता है—कि इसे सुरक्षित रखना है। पैसे की कमी या अधिकता अगर बेचैनी लाए, तो दोनों ही गड़बड़ हैं।
भारतीयों में आनंद की कमी अक्सर देखी जाती है। जो पैसा आनंद और विकास में खर्च होना चाहिए, वो कभी खर्च नहीं होता। बचत की आदत से भड़ास बिग इंडियन फैट वेडिंग में निकलती है। पच्चीस साल तक ज़िंदगी में कुछ नहीं रहता, तो सारी भड़ास एक रात में निकल जाती है। शादियों में जो पैसा खर्च करते हो, उसका आधा भी लड़की की ज़िंदगी, मन, व्यक्तित्व बनाने में लगा दो, तो लड़की भी तर जाएगी, आप भी तर जाओगे।
दुनिया की सारी समस्याएँ बस एक वजह से हैं—हम न सिर्फ़ अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं, बल्कि प्रति व्यक्ति उपभोग भी बढ़ाए जा रहे हैं। बच्चे यूँ ही नहीं पैदा हो रहे हैं; लोगों को एक झूठी संस्कृति का प्रसार करके बच्चे पैदा करने पर मजबूर किया जा रहा है। ज़्यादा नहीं, अगले बीस साल यदि बच्चे न पैदा हों, तो सब ठीक हो जाएगा क्योंकि आबादी बढ़ाने की इच्छा और ज़्यादा-से-ज़्यादा उपभोग की इच्छा, दोनों एक ही स्रोत (मन) से निकलती हैं।
भारतीय जैसे हैं, भारतीयों को वैसे नेता मिल जाते हैं। “People get the leaders they deserve.” जब मतों की गिनती होती है तो यह नहीं देखा जाता कि जिसने वोट डाला है वह बुद्ध है या बुद्धू, दोनों की बराबर हैसियत होती है जनतंत्र में। बेहतर नेता तभी मिल सकते हैं जब लोग बेहतर हों, और लोग तब बेहतर होंगे जब उन्हें एक बेहतर आध्यात्मिक नेता मिलेगा।
मन जिस आयाम को देख सकता है, वो द्वैत का ही आयाम है। वहाँ उसे वो नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश है। हमको तलाश तो सत्य की ही है, पर तरीके अनुचित हैं, क्योंकि हम होश में नहीं है। गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो सिर्फ़ इशारा करता है कि गलत जगह खोज रहे हो। तलाश तो तुम्हारी सपना टूटने पर ही बुझेगी।
छल को पहचानने के लिए बहुत निश्छल आँख चाहिए। एक कपटी व्यक्ति दूसरे कपटी व्यक्ति को पहचान तो सकता है, जान नहीं सकता; दोनों बातों में अंतर समझना। जानने का मतलब है मुक्त हो जाना, पहचानने का मतलब है पुरानी चीज़ से तालमेल बैठा लेना, पुरानी सूचना से तालमेल बैठा लेना।
आचार्य प्रशांत: जीवन का क्या अर्थ है? क्या जीवन का अर्थ यही है- उठना, बैठना, खाना, पीना, चलना, सोना और मर जाना? क्या यही जीवन है, या जीवन कुछ और भी है, इसके अलावा, इसके परे, इससे आगे? समझेंगे इसको।
यह तुम जो कुछ भी…
आचार्य प्रशांत: क्या करना है, क्या नहीं करना है। क्या होना है, क्या नहीं होना है। दिशा कौनसी लेनी है, नहीं लेनी है इसका निर्णय अहंकार ही करता है। और आप ये नहीं कह सकते कि अहंकार ने अपने लिए गलत निर्णय करा। कोई और देखें, तो कह देगा कि…
प्रश्नकर्ता: सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय। ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय।। ~गुरु कबीर साहब
आचार्य जी, मेरी समझ से इस दोहे का ये अर्थ है कि ज्ञानीजन कोई भेदभाव नहीं करते। उनके लिए सिर्फ़ गंगाजल ही पवित्र नहीं होता, बल्कि हर जगह का जल…
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२.६४।।
राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्याय, सांख्य योग, श्लोक क्रमांक चौंसठ। “राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त…
“ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्। विज्ञानमकामुरुधेव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्प:।।“
“यह जगत् मन का विलास है, दीखने पर भी नष्टप्राय है, अलातचक्र (लुकारियों की बनेठी)– के समान अत्यन्त चंचल है और भ्रम मात्र है— ऐसा समझे। ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित एक ज्ञानस्वरूप आत्मा…
अन्तरिक्षचयाणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि।।
दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरणे वाले बलवान पक्षियों के समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है। ~ आजगर गीता, श्लोक १६
दिवि सञ्चरमाणानि ह्नस्वानि च महन्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये।।
आकाश में जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय…