ज़कात माने दान, और दान वह नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो। अहंकार तो व्यापारी होता है—वह कुछ देता भी है तो उसमें मुनाफ़ा देखकर देता है। सबसे निम्न कोटि का दान वह है जिसमें तुम देते हो और अपेक्षा करते हो कि बदले में कुछ मिले। उससे ऊपर वह दान है जिसमें यह उम्मीद नहीं बाँध रहे कि कुछ मिलेगा। ज़कात एक विधि है, जिससे ज़िंदगी में कुछ ऐसा करो जिसमें तुम्हें मुनाफ़ा नहीं चाहिए।
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आचार्य प्रशांत: पैगम्बर हज़रत मोहम्मद का वक्तव्य है कि जो ज़कात छिपी होती है, वो अल्लाह के गुस्से को शांत करती है। तो माहे रमज़ान चल रहा है, अच्छा है, कि इस समय पर ये सवाल आया है। ज़कात का महत्त्व तो साल भर ही होता है। रमज़ान में और बढ़ जाता है। पैगम्बर हमसे कह रहे हैं कि जो ज़कात छिपी होती है, वो अल्लाह के गुस्से को शांत करती है।
जो ज़ोर है, वो छिपी शब्द पर है। ज़कात माने दान, ज़कात माने दान। जो ज़ोर है, वो छिपी शब्द पर है। दान को, ज़कात को थोड़ा सा समझेंगे। दान का अर्थ है देना और दान की महत्ता करीब-करीब सारे ही धर्मों में खूब है। इस्लाम में ही नहीं हर जगह। संतों ने, ऋषियों ने, गुरुओं ने, पैगम्बरों ने, दुनिया से लगातार यही कहा है कि बाँटो, दो। क्यों कहा है?
मूल से शुरू करते हैं। क्या है जो तुम संचित करते हो? तुम वही सब संचित करते हो जो तुम्हें दुनिया से मिला है। उसके अतिरिक्त तुम कुछ संचित कर नहीं सकते। तुम वही सब संचित करते हो जो तुम्हें दुनिया से मिला है। जो तुम्हें दुनिया से मिला है, तुम्हें ख़याल ये रहता है कि तुमने इकट्ठा किया है। तुम ये भूल जाते हो कि तुमने ये इकट्ठा नहीं किया है, वो तुम हो। क्या तुम कुछ और हो उस सब के अतिरिक्त जो तुमने दुनिया से इकट्ठा कर लिया है?सवाल को पलट के देखो, तो और खुल जाएगा। तुम अपने आप को जो कुछ भी समझते हो क्या उसमें ऐसा कुछ भी है, जो दुनिया से न आया हो?







