तामसिकता का अर्थ आलस्य होना आवश्यक नहीं, हालांकि सतह पर यह आलस्य जैसा लग सकता है। असली तमस स्वयं को यह भरोसा दिलाने में निहित है कि "मैं ठीक हूँ," "मैं स्वस्थ हूँ," "मुझे सब पता है," जबकि वास्तव में न तो मैं ठीक हूँ, न स्वस्थ, न ही स्वयं का जानकार। ऐसे व्यक्ति या तो स्वयं जागें, या फिर ज़िंदगी शायद उन्हें झंझोड़कर जगा पाए — जिसकी संभावना बहुत कम होती है। सबसे अच्छा विकल्प है स्वयं जाग जाना, क्योंकि जब जीवन सिखाता है, तो फिर वह किसी भी तरह की रियायत नहीं देता।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दिन भर तमस हावी रहा है। मैं देख रहा था कि उस पर मेरा वश ज़्यादा नहीं चल पा रहा था। कभी देख पा रहा था, कभी लुढ़क रहा था, और कभी ख़ुद को उठा रहा था। ये लगातार चलने वाली प्रक्रिया है या कुछ और है?
आचार्य प्रशांत: देखो बेटा, शरीर तो होता है जड़। ठीक है? तमसा शरीर की तो होती नहीं। कोई कुछ भी बोले कि लोग तीन तरह के होते हैं, या लोगों ने जो भोजन कर लिया होता है, वो तीन तरह का होता है, इसीलिए वो भोजन कर-करके लोगों के शरीर तीन तरह के बन गए होते हैं। कई लोग होते हैं, कहते हैं, "मेरा शरीर बड़ा आलसी है।" बेकार की बात है!
तुम आलस करने में आलस करते हो क्या?
एक बार तो बड़ा मज़ा लगा था। तब रविवार को सुबह-सुबह सत्र हुआ करते थे, कई साल पहले की बात है। तो नौ बजे लोगों को आना होता था। मैं कहूँ, "नौ बजे आ ही जाना, नहीं तो दरवाज़े बंद कर दूँगा, फिर सत्र में नहीं बैठ पाओगे।" गर्मी में तो फिर भी ठीक था, जाड़ों में जो लोग दूर से आएँ — कोई गुड़गांव से आ रहा, कोई कहीं से आ रहा — वो नौ बजे पहुँचे ही नहीं। जाड़ों में आने वालों की संख्या भी कम हो जाए। पूछो तो कहें, "जाड़ा बहुत है, आलस आता है। सात बजे तक तो अंधेरा ही रहता है, कैसे उठा करें?" ये... वो...




