जैन धर्म का अनेकांतवाद या स्यादवाद, अहिंसा की बुनियाद है। मैं दूसरे के विपरीत तभी खड़ा होऊंगा जब मुझे अपनी हस्ती में दृढ़ विश्वास होगा — और यही बड़ा विश्वास ही हिंसा है। अनेकांतवाद का अर्थ है: कुछ भी पूरी तरह पक्का या निश्चित नहीं। जब कुछ निश्चित नहीं, तो दूसरे को गलत कैसे ठहराएं? और जब दूसरे को गलत नहीं ठहरा सकते, तो उनके प्रति हिंसक कैसे हो सकते हैं? अनेकांतवाद अहंकार की जड़ पर चोट करता है। दूसरे के प्रति तुम हिंसक तभी हो सकते हो, जब कहोगे — मैं सही, दूसरा गलत।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैनिज्म फिलॉसोफी में अनेकांतवाद सिद्धांत है — वो क्या है?
आचार्य प्रशांत: विनम्रता — निष्कर्ष मत निकाल लेना। अनेकांतवाद या स्यादवाद, अहिंसा की बुनियाद है। मैं दूसरे के विपरीत तो तब खड़ा होऊंगा ना जब पहले मुझे अपनी हस्ती में दृढ़ विश्वास होगा — और अपनी हस्ती में बड़ा विश्वास रखना ही हिंसा है।
ये कहना कि मैं ऐसा हूं या मैं जानता हूं, किसी भी बात को निष्कर्ष के साथ तय करके कहना हिंसा की शुरुआत है।
अनेकांतवाद का अर्थ होता है, कुछ पक्का नहीं, कुछ निश्चित नहीं। जब कुछ पक्का नहीं, कुछ निश्चित नहीं, तो दूसरे को गलत कैसे ठहराएं? जब दूसरे को गलत नहीं ठहरा सकते, तो दूसरे के प्रति हिंसक कैसे हो सकते हैं अनेकांतवाद अहंकार की जड़ पर चोट करता है। अहम निष्कर्ष मांगता है। अहम एक आखिरी वक्तव्य मांगता है, जिस पर वह टिक सके। अनेकांतवाद अहम के पांव के नीचे से ज़मीन खींच लेता है। दूसरे के प्रति तुम हिंसक तो तब होगे ना जब कहोगे, मैं सही, दूसरा गलत।






