भगवान किसी और को सूली पर कहाँ चढ़ा रहे हैं? वो ही हैं, अपने आप को ही सूली दे रहे हैं। खुद ही जाते हैं सिपाही बनकर; खुद ही पकड़ लाते हैं किसी संत को, फिर खुद ही न्यायलय में न्यायाधीश बन बैठते हैं, खुद को ही झूठी सज़ा सुना देते हैं, फिर खुद ही जल्लाद हो जाते हैं; फिर खुद ही सूली हो जाते हैं, फिर खुद को ही सूली पर चढ़ा देते हैं। और किसको मार रहे हैं वो? दया इत्यादि तो दूसरों पर की जाती है। जहाँ द्वैत ही नहीं, वहाँ दया कैसी। किस पर दया करनी है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बुल्लेशाह के भजन का अनुवाद कुछ ऐसा है —
किससे अब तू छिपता है? मंसूर भी तुझ पर आया है, सूली पर उसे चढ़ाया है। क्या साईं से नहीं डरता है?
~ संत बुल्लेशाह
भगवान किसी को सूली पर कैसे चढ़ा सकते हैं, निर्दयी कैसे हो सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: संत बुल्लेशाह के वचनों की दिशा थोड़ी भिन्न हैं। जो बात वो कह रहे हैं वो गहरी भी बहुत है। पर अभी मैं उसी को लिए लेता हूँ जो इस प्रश्न का संदर्भ है, जो इस प्रश्न का क्षेत्र है। पूछा है कि भगवान किसी को सूली पर कैसे चढ़ा सकते हैं, वो निर्दयी कैसे हो सकते हैं।







