वैज्ञानिक का काम है — मलहम तैयार करना, तरह-तरह के रसायनों का इस्तेमाल करके। लेकिन विज्ञान अपने आप में ये नहीं कहेगा कि इस मलहम को अब ले जाओ और लोगों को लगाओ। विज्ञान कहेगा: “ये मलहम तैयार है।” अब इसके बाद कोई चाहिए — जिसको मुक्ति की या करुणा की क़द्र हो और वो उसको ले जाकर के लोगों को मलहम लगा दे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आज आपने बताया और समझाया कि अध्यात्म जो है, आत्मज्ञान है, सरल चीज़ है, ऑब्वियस है। ऐसा कुछ नहीं है जो बहुत हमारे दूर है। तो उसी से मुझे याद आया कि बहुत समय से मेरे साथ ये चलता आया है कि मैं मानता आया हूँ कि जो साधना होती है, वो बहुत अलग चीज़ है साइंटिफिक एनालिसिस से।
जैसे कि मैं अपने आप को जो जान रहा हूँ, और जो साइकोलॉजिस्ट किताबों में लिख रहा है, उसमें बहुत अंतर होना पड़ेगा। नहीं तो फिर कृष्णमूर्ति और फ्रॉयड एक ही चीज़ हो जाएँगे। तो मुझे उसी में सवाल अभी उठ रहा था बार-बार, जब आपने इनसाइट की बात की — कि कैसे कबीर साहब ने पत्ता गिरता हुआ देखा और उसमें पुनर्जन्म का उनको तथ्य समझ में आ गया।
तो उसी तरह से न्यूटन को भी ऐसा कहते हैं — जो गलत बात है — कि गिरा सेब और उन्होंने ग्रेविटी समझ लिया वहाँ से। दोनों अलग-अलग जगह से आ रहे हैं। पर क्या ये दोनों प्रोसेस — इनसाइट और ग्रेडेशन सेम हैं? या फिर इनमें अंतर है?
आचार्य प्रशांत: बहुत क़रीब के हैं। और अच्छा सवाल पूछा है बहुत उपयोगी सवाल है, बहुतों के लिए। बहुत निकट की चीज़ है। एक बस वो ‘मैं’ वाला अवरोध रह जाता है — अन्यथा, निकट के भी नहीं हैं, दोनों की प्रक्रिया बिल्कुल एक है। बस एक की प्रक्रिया बाहर जो है, उसको निष्पक्षता से देखने तक में पूरी हो जाती है, और दूसरे की प्रक्रिया में ‘मैं’ को भी एक तरफ रखना पड़ता है।




