कह रहे हैं कि ये तुमने जो तमाम तरह की कहानियाँ गढ़ ली हैं, ये कहानियाँ तुम्हारे अंजन का ही विस्तार हैं, निरंजन की कोई कथा नहीं हो सकती। सारी समस्या तब होती है जब धर्म में कथाएँ घुस जाती हैं। जितनी तुमने किस्से बाज़ियाँ और कहानियाँ ये खड़ी की हैं, इन्होंने ही तुम्हारे धर्म को चौपट कर दिया है। श्रीराम को निरंजन ही रहने दो, श्रीकृष्ण को भी निरंजन ही रहने दो। जैसे ही तुमने गोपी संग गोविंद बना दिया, वैसे ही मामला अंजन का हो गया। गोविंद को गोविंद रहने दो, गोपियाँ मत लेकर के आओ।
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आचार्य प्रशांत: तो आगे कह रहे हैं,
अंजन ब्रह्मा, शंकर, इंद्र अंजन गोपी संग गोविंद
तुम अंजन को ही इतना श्रेष्ठ बना देते हो, अंजन कैसे टूटेगा? अंजन बस विस्तार लेता जाता है पूरे जीवन में, टूटता नहीं है।
क्या कहना चाह रहे हैं? जो बात वो कहना चाह रहे हैं, वो कमज़ोर दिल लोगों के लिए नहीं है। वो कह रहे हैं, ‘तुमने जिनको भी उच्च, श्रेष्ठ, दैवीय, पूजनीय, आराध्य बना दिया है, वो सब बस तुम्हारे अंजन की ही प्रतिकृति हैं।‘ “अंजन ब्रह्मा, शंकर, इंद्र, अंजन गोपी संग गोविंद।” अंजन ही हैं ये सब। तुम अपने ही अंजन को न जाने कितनी छवियाँ दे डालते हो इसीलिए तुम्हारा अंजन टूटता नहीं। जिस चीज़ को तुमने एक बहुत सुंदर, मधुर छवि दे दी और तुम खुद ही उस छवि से मोह में बँध गए, उस छवि को तुम स्वयं तोड़ोगे क्या कभी? तो बस हो गया। अंजन बस विस्तार लेता जाता है।







