
आचार्य प्रशांत: हमारी साधारण वृत्ति निर्भरता की रहती है और उस वृत्ति को समर्थन देने के लिए और सहारा देने के लिए हमारे पास लगातार अनुभवगत प्रमाण रहते हैं। अगर ये मेज़ न हो, तो मैं ऐसे झुककर नहीं बैठ सकता। मेरी कुहनियों को मेज़ की सतह का सहारा है, इसलिए मैं जैसे बैठा हूँ, वैसे बैठा हूँ। एक बहुत साधारण-सा, रोज़मर्रा का अनुभव है, लेकिन वो परनिर्भरता के सिद्धांत को पुष्ट कर रहा है।
जहाँ एक ओर ये निर्भरता हमें शारीरिक अस्तित्व देती है, दूसरी ओर ये कुछ और भी हमें दे जाती है। शरीर का अस्तित्व नहीं हो सकता बिना जगत पर आश्रित हुए। कुहनियों को मेज़ का सहारा है, शरीर के पूरे वज़न को इस सोफ़े का सहारा है। आप जो लिख भी रहे हो, उसमें भी कलम काग़ज़ पर और काग़ज़ कलम पर आश्रित है। दोनों के मध्य जो घर्षण है, परस्पर संघर्ष है और वही संघर्ष उनका संबंध है, सारे संबंध ऐसे ही होते हैं, आपस में घर्षण के। उस से आप पाते हो कि आपकी लिखाई सामने आ रही है। नहीं लिख पाओगे आप, सिर्फ़ यदि काग़ज़ हो और सिर्फ़ यदि क़लम हो। आप देखिए, आपने क़लम को भी कैसे पकड़ा है। एक तरफ़ को अँगूठा ज़ोर लगा रहा है, दूसरी तरफ़ को उँगली, और दोनों विपरीत दिशाओं में ज़ोर लगा रहे हैं। और चूँकि दोनों विपरीत दिशाओं में ज़ोर लगा रहे हैं, इसीलिए पकड़ बनी हुई है। कलम काग़ज़ को नीचे धकेल रही है। काग़ज़ अगर चला ही जाए नीचे, तो क्या होगा? कुछ लिख नहीं पाओगे। लिखाई इस बात पर आश्रित है कि काग़ज़ क़लम को ऊपर धकेल रहा है। इस धक्का-मुक्की में कुछ लिखा-लिखी हो जाती है।
तो जो पूरा भौतिक अस्तित्व है वो लगातार प्रमाणित करता रहता है, कि 'दूसरा' ज़रूरी है। दूसरे के बिना कुछ नहीं चल सकता। है ना? दर्शन का आपने कुछ अध्ययन करा हो, नहीं करा हो, कोई शिक्षा ली हो, नहीं ली हो तो रोज़मर्रा के अनुभव ही शिक्षक बनकर हमें द्वैत दर्शन में दीक्षित कर जाते हैं। है ना? आपकी आँखें खुली हों और सामने कोई भी विषय हो ही नहीं, कुछ नहीं है तो आप विक्षिप्त होने लगेंगे। आपको लगेगा, आपके पास आँखें हैं ही नहीं। आँखों की हस्ती को भी प्रमाण किसी दूसरे से मिलता है। दूसरे न हों, तो आँख नहीं होगी।
एक बार को आप कल्पना कर लीजिए कि आप देख रहे हैं, पर सामने कोई विषय-वस्तु नहीं है देखने के लिए बस खाली स्थान है आपको लगेगा, आपके पास आँखें नहीं हैं। आँखों को भी प्रमाण वो वस्तु दे रही है जिससे रोशनी टकराकर आँख में आ रही है। कुछ न हो जिससे टकराकर रोशनी आपकी आँख में न आए, तो आँख भी जैसे विलुप्त हो जाएगी।
शरीर तो पूरे तरीक़े से संसार पर निर्भर है और मन में भी सांसारिक सामग्री ही भरी रहती है। तो ये जो लगातार हमें प्रमाण मिलते रहते हैं, ये चुपचाप हमारा जीवन-दर्शन बन जाते हैं।
बहुत कम लोग होते हैं जिन्होंने दर्शन पढ़ा होता है — चाहे व्यक्तिगत रुचि के कारण और चाहे शैक्षणिक विषय के रूप में, बहुत कम लोग। आप में से कितने लोग फ़िलॉसफ़ी में मास्टर्स वग़ैरह हैं? यहाँ तो एक भी नहीं है भाई। आप में से कितने लोग हैं जिन्होंने व्यक्तिगत रुचि के कारण थोड़ा बहुत दर्शन पढ़ा है? चलो, कुछ हाथ अब खड़े हुए।लेकिन दर्शन में पारंगत हम सब हैं। हम सबके पास एक जीवन-दर्शन होता ज़रूर है, फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ लाइफ़, ऐसा कोई नहीं जिसके पास नहीं होती, सबके पास है। बस उनको पता नहीं होता कि वो चीज़ जो उनके पास है, उसको ही जीवन-दर्शन बोलते हैं। वो जिस चीज़ को यूँ ही मज़ाक में व्यक्त कर देते हैं, वो वास्तव में उनकी तत्व-मीमांसा है। लेकिन तत्व-मीमांसा; ऐसा उन्होंने सुना नहीं होता पहले कभी, तो वो कहेंगे नहीं कि ये तो मेरी तत्व-मीमांसा है, बोलेंगे नहीं ये तो, कुछ भी बोल देंगे साधारण तौर पर, “लाइफ़ का फंडा है मेरी।”
आमतौर पर जितने भी वाक्य “देख भाई” से शुरू होते हैं, वो लोगों का व्यक्तिगत जीवन-दर्शन ही होते हैं बस उनको पता नहीं होता कि वो अपने दर्शन को अभिव्यक्त कर रहे हैं। भले वो दर्शन दो कौड़ी का हो, पर है वो दर्शन ही। कोई अगर लिख दे, “दो और दो आठ,” तो वो बहुत बुरा गणितज्ञ है। पर जो उसने लिखा, वो आता तो गणित के ही क्षेत्र में है ना। “दो और दो आठ” और किस क्षेत्र में आएगा? कला है? साहित्य है? क्या है?
श्रोता: गणित है।
आचार्य प्रशांत: गणित ही है। ग़लत गणित है, पर गणित है। वैसे ही हम सब ग़लत दार्शनिक हैं, पर दार्शनिक तो हैं। बस हमारा जो पूरा जीवन-दर्शन है, वो परनिर्भरता का है।
द्वैत दुनिया का सबसे प्रचलित सिद्धांत है, क्योंकि द्वैत सबसे प्राकृतिक सिद्धांत है। जो प्राकृतिक होगा जितना ज़्यादा, वो प्रचलित होगा उतना ज़्यादा।
आपको अगर किसी व्यापार आदि में सफलता पानी हो या आपको समाज में कोई स्थान बनाना हो, आप कुछ ऐसा पकड़िए जो जंगल के बहुत क़रीब का हो, प्रकृति के बहुत निकट का हो वो लोगों को खींच लेगा, वहाँ आपको सफलता मिल जाएगी। और अगर आपको अपनी ज़िंदगी संघर्ष, चुनौतियों से भर लेनी हो तो कुछ ऐसा करिए जो लोगों को प्रकृति से दूर, आत्मा की ओर ले जाता हो। आप पाओगे खड़ी चढ़ाई है, अतिशय मुश्किल है। जो प्राकृतिक होगा, वो प्रचलित होगा वो बहुत आसानी से जीतेगा। उसका प्रचलन करने में आपको प्रचार भी नहीं चाहिए होगा। उसका प्रचलन स्वयं ही हो जाएगा, आपको प्रचार काहे के लिए करना है?
प्रकृति के साथ होना माने ढलान पर पानी छोड़ना और शर्त लगाना कि ये नीचे की ओर जाएगा। प्रकृति के साथ होने का अर्थ है, आप ढलान पर पानी छोड़ें और फिर किसी से सौ-सौ की लगा लें कि ये तो नीचे ही जाएगा। और आप जिससे सौ-सौ की लगा रहे हैं, वो कोई हमारे जैसा है जो कह रहा है, "नहीं, हम धार को उलट के दिखाएँगे।" गिर तो सभी जाते हैं, हम किसी को उठाकर दिखाएँगे। क्या संभावना है? कौन जीतेगा? आपको जीतना हो, आप प्रकृति के पक्ष में खड़े हो जाइए बहुत आसानी से जीतेंगे। समझ में आ रही है बात? क्योंकि पानी का नीचे जाना पानी पर निर्भर करता ही नहीं है। पानी का नीचे जाना पानी से बाहर की किसी ताक़त पर निर्भर करता है। यही परनिर्भरता है, यही द्वैत है, यही प्रकृति है। तीनों को एक जानिए।
एक ताक़त है हमसे बाहर की जो हमारे जीवन का और हमारी नियति का निर्धारण करती है ये द्वैत है। और पानी से बाहर वो ताक़त निःसंदेह हमें दिखाई देती है उस ताक़त का क्या नाम है? उस ताक़त का नाम है ढलान उस ताक़त का नाम है गुरुत्वाकर्षण। जहाँ गुरुत्वाकर्षण है और जहाँ ढलान है, वहाँ पानी मजबूर है पानी को हारना पड़ेगा। पानी की क़िस्मत पहले से तय हो गई है। पानी एकदम आश्रित है — किस पर? ढलान पर, गुरुत्वाकर्षण पर। गुरुत्वाकर्षण ना हो, ढलान पर छोड़ दीजिए, कुछ नहीं होगा। जहाँ पड़ा है, वहीं पड़ा रह जाएगा। गुरुत्वाकर्षण हो भी, ढलान ना हो — तो भी कुछ नहीं होगा। जहाँ पड़ा है, वहीं पड़ा रह जाएगा। पर बाहर से ये दोनों आपको सहयोगी उपाय मिल गए हैं, तो आप शर्त लगाइए निश्चित है आप जीतेंगे।
जो आपके ख़िलाफ़ शर्त लगा रहा है, उसको पानी के भीतर चेतना जगानी पड़ेगी। और उस चेतना को आश्वस्त करना पड़ेगा, "मेहनत कर, ऊपर चढ़, शिखर से प्रेम जगा।" बड़ा मुश्किल है। और जो परनिर्भरता के पक्ष में शर्त लगा रहा है, उसे कुछ नहीं करना। वो कह रहा है — पानी माने जड़ पदार्थ, सोया पड़ा है, तमसा है, सोया रह। इसके सोने में भी जीत है, सोया पड़ा रह, जीत मिल जाएगी। समझ में आ रही है बात? लेकिन जानने वालों ने कहा है कि इस जीत में बड़ी भारी हार है। बहुत हार है।
जब तुम परनिर्भरता के पक्ष में खेलते हो, तो तुमको बड़े सहारे मिल जाते हैं। तुम्हारी अपनी कोई ज़िम्मेदारी नहीं रह जाती। पानी की कोई ज़िम्मेदारी है ढलान से नीचे बहने की? मस्त बेहोश पड़ा है, तो भी क्या हो रहा है? बह रहा है। मिट्टी का ढेरा छोड़ दीजिए, नीचे गिर रहा है। अरे, आप बेहोश आदमी छोड़ दो ढलान पर। बेहोश है, तो क्या होगा?
श्रोता: लुढ़क जाएगा।
आचार्य प्रशांत: वो लुढ़कता जाएगा। उसे क्या करना है? कोई ज़िम्मेदारी है? कुछ नहीं। लेकिन जानने वालों ने कहा ये जीत नहीं हुई, ये हार हो गई। तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा है जो पूरी आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है। तुम दूसरों को अपना सहारा समझ रहे हो, वो दूसरों से ही घबराता है।
आप कहते हो, "लेकिन आप मेरी सुविधा ही नहीं, जीवन के नियम के ख़िलाफ़ बात कर रहे हो। जीवन का नियम है कि बनाकर चलना पड़ता है, दूसरों का आश्रय तो लेना ही पड़ता है" वो प्रकृति के नियम गिनाएगा। ठीक वैसे जैसे किसी को बोलो कि "भाई, शुद्ध शाकाहारी हो जाओ," तो वो आपको फ़ूड चेन का नियम बताने लग जाए। वो कहे, "देखो जीवन का नियम ये है कि मक्खी को मेंढक ने खाया, मेंढक को साँप ने खाया, हम साँप को खाएँगे। ये नियम है।" उसने बिल्कुल ठीक बोला है। प्रकृति में तो ऐसे ही चलता है। पर तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा है जो बहुत बुरा मानता है जब ऐसा चलता है।
और अगर तुम्हें यही सब करना था तो तुम वैसे ही रह जाते न जैसे मक्खी, मेंढक और साँप रहते हैं। कैसे रहते हैं? जंगल में, निर्वस्त्र। न समाज, न सभ्यता, न संस्कृति, न विद्या, न ज्ञान, ऐसे रहते हैं। ये सब तो चेतना के लक्षण होते हैं न — सभ्यता, संस्कृति, विद्या, ज्ञान, चेतना। तुम चेतना हो इसीलिए तुम वैसे नहीं रहते हो जैसे मच्छर-मक्खी रहते हैं। तुम जंगल से बाहर निकल के आए, क्योंकि जंगल में तुम्हारी चेतना को चैन नहीं मिल रहा था।
साँप कभी नहीं चाहता वो जंगल से बाहर निकल कर आए। इतने ही प्राणियों की प्रजातियाँ सिर्फ़ इसलिए विलुप्त हो गईं क्योंकि उन्हें जंगल से बाहर निकाल दिया गया। उन्हें जंगल से बाहर निकाल दो, वो ख़त्म हो जाते हैं। वो चाहते ही नहीं कि जंगल से बाहर आएँ। उन्हें आपको मारने की ज़रूरत नहीं है, आप बस उनका जंगल काट दीजिए वो अपने आप समाप्त हो जाएँगे। मनुष्य अकेला है जो जंगल से बाहर निकल के आया और फलता-फूलता गया, फैलता गया।
बाक़ी आप बता दीजिए कौन है जो जंगल से निकला? कुत्ता है अकेला, पर वो इसलिए फैल पाया क्योंकि इंसान उसको अपने पीछे-पीछे बाँधे हुए था। बिल्ली, ये सब वो हैं जो मनुष्य पर ही आश्रित हैं। गाय, भैंस, जब आप इतने आश्रित हो जाते हो तो फिर मनुष्य ने उनका तो कृत्रिम गर्भाधान भी करना शुरू कर दिया, उनकी आबादियाँ बढ़ा दीं। तो वो एक अलग कहानी है, वो कृत्रिम कहानी है कि ज़बरदस्ती आप किसी जानवर को पैदा कर दें वरना कोई जानवर प्रकृति से बाहर आना नहीं चाहता। वो अपना उसी व्यवस्था में ही चल सकता है और प्रसन्न रह सकता है।
मनुष्य बाहर आया क्योंकि मनुष्य इस परनिर्भरता के सिद्धांत से सहमत नहीं हो सकता। मनुष्य बाहर आया क्योंकि मनुष्य के भीतर कोई है जो अस्तित्वगत सवाल पूछता है, जो पूछता है, “हू(Who) — कौन?” जब वो सवाल पूछा जाता है, तो उत्तर ये आता है कि यदि मैं देह हूँ, तब तो मुझे दूसरों पर आश्रित रहना पड़ेगा। देह को ऑक्सीजन भी कहाँ से मिलती है? बाहर से ही मिलती है, भाई। अन्न, जल — सब कहाँ से मिलता है? बाहर से। जन्म भी कहाँ से मिलता है? बाहर से मिलता है, देह कोई अपनी जननी स्वयं थोड़ी है। बाहर के दो मनुष्य, उनसे जन्म मिल जाता है।
जहाँ तक देह की बात है, अगर मैं सिर्फ़ देह हूँ तो फिर बात बिल्कुल ठीक है कि परनिर्भर होकर जियो। अगर मैं देह हूँ, तो पर-निर्भर होकर जीने में कोई दिक्कत नहीं। फिर तो जैसे मक्खी और मच्छर और मेंढक और साँप और तेंदुआ, वैसे ही हम। वो देह हैं। आप उनको चेतना की तरह संबोधित करो तो उन्हें कुछ समझ में नहीं आएगा। वो देह है बस, देह के चलाए चलते हैं और वैसा ही उनका पूरा तंत्र है। उन्हें उस तंत्र से आप डिगा भी नहीं सकते। उन्हें उस तंत्र से डिगाओगे तो वो बहुत परेशान हो जाएँगे।
आप मेंढक को स्कूल भेज दो, उसकी मौत आ गई बिल्कुल। टर्रा-टर्रा के मर जाएगा। कहेगा, "क्या कर रहे हो मेरे साथ तुम ये? इससे बड़ा अत्याचार हो सकता है?" बिल्ली को बैठा दिया है कि सीख लैपटॉप के सामने — और इधर से ऊपर से कर रही है, पंजा मार रही है जो-जो कर सकती है सब करेगी, कुछ भी कर लो ये मत कराओ। क्योंकि मैं देह हूँ, मैं चेतना नहीं हूँ। मुझे सिखाने की कोशिश मत करो।
इसीलिए जब जानवरों को सिखाया जाता है तो उसको भी अत्याचारी माना जाता है। जानते हो? जैसे सर्कस होते हैं। सर्कस में जानवरों को प्रशिक्षण देते हैं या पुलिस वाले अपने कुत्तों को प्रशिक्षण देते हैं या जैसे ओलंपिक्स में एक प्रतिस्पर्धा होती है — इक्वेस्ट्रियन बोल के जिसमें घोड़े, घुड़सवारी, आप जानते ही हो। उसको भी अत्याचारी माना जाता है। वहाँ कहते हो कि पदक तो घुड़सवार को मिला, और सारी दौड़ किसने लगाई थी?
श्रोता: घोड़े ने।
आचार्य प्रशांत: और घोड़े ने कहा था क्या कि "मुझे मेडल जीतना है?" तो घोड़े को इतना परेशान क्यों किया? तुम्हें मेडल जीतना था तुम दौड़ जाते घोड़े की तरह। तुम काहे घोड़े पर चढ़ गए और कह रहे हो पदक मुझको मिल गया, और घोड़ा कह रहा है, "इस सब में मेरा क्या?" आ रही है बात समझ में? उसे नहीं चाहिए, आपको चाहिए। आपको आपके सवालों के जवाब नहीं मिले, आप परेशान हो जाते हो। जानवरों के पास सवाल नहीं होते। उनके पास अधिक से अधिक बहुत शारीरिक स्तर की उत्सुकता होती है, वो उनमें भी होती है। कुछ हो रहा होगा झाँकेंगे, क्या चल रहा है? पर उस झाँकने में इतना ही होगा कि कहीं पे कुछ खाने-पीने का चल रहा है क्या? इससे ज़्यादा कुछ नहीं।
समझ में आ रही है बात?
अगर मैं देह हूँ, तो परनिर्भरता ठीक है। जैसे पशु पर-निर्भर होता है, उसके लिए सब ठीक है उसे कोई समस्या नहीं होती। मैं देह भर नहीं हूँ। अगर मैं देह भर नहीं हूँ, तो परनिर्भरता फिर मेरे लिए ठीक नहीं है। सिर्फ़ इतना नहीं कि ठीक नहीं है, वो नर्क है मेरा।
तो अब हम बात कर रहे हैं, "साइकोलॉजिकल अस्तित्व बनाम फिज़िकल अस्तित्व। जहाँ तक इस शारीरिक, जैविक अस्तित्व की बात है परनिर्भरता तो रहेगी। पर वही चीज़ जब मानसिक परनिर्भरता बन जाती है, तो बहुत ख़तरनाक हो जाती है। लेकिन शारीरिक के मानसिक बनने के बड़े कारण होते हैं, क्योंकि मन भी बन किससे रहा है? तमाम तरह के भौतिक अनुभवों से। तो जो नियम, जो सिद्धांत वो भौतिक जगत में लागू होते देखता है उसको वो अनुमान के तौर पर मान लेता है कि वो भीतरी जगत पर भी लगेगा। तो वो ये अनुमान लगा लेता है कि जैसे शरीर संसार पर निर्भर है, वैसे ही मन को भी संसार पर निर्भर रहना पड़ेगा। मन भी फिर संसार की चीज़ों से भर जाता है।
इसके पीछे तर्क जो है, समझ रहे हो न?
क्या शरीर चल सकता है अगर आपको कपड़ों की दुकान से कपड़े न मिले होते? कहे, नहीं चल सकता ठंड में मर जाएँगे। क्या आँखें देख पातीं अगर चश्मे की दुकान से चश्मे न मिले होते? कहे, कुछ नहीं दिखाई देता। क्या लिख पाते अगर क़लम की दुकान से क़लम न मिली होती? नहीं, कुछ नहीं लिख पाते। बोल पाते? ये माइक क्या घर में उगाया है? या आपके शरीर से निकला है? संसार से लेकर के आए हो न? ये शरीर की दुनिया में चलता है।
तो मन यहीं से उदाहरण उठा लेता है। शरीर के तर्क को मन अपना तर्क बना लेता है। और जब हम "मन" कह रहे हैं तो उससे क्या आशय है? "अहम्।" अहम् कहता है कि, मैं देह हूँ जैसे देह सब पर आश्रित है, तो मैं भी सब पर आश्रित हूँ। अहम् जब संसार पर आश्रित होने लग जाता है, तो मन संसार से भरने लग जाता है। अगर आपका मन बहुत भरा-भरा रहता है, दुनिया भर की सौ चीज़ें आपके ख़्यालों में घूमती हैं तो इसका मतलब ये है कि आपने देह को अपना आदर्श बना लिया है।
आप कह रहे हो, जो चीज़ें देह पर लागू होती हैं वही मुझ पर लागू होती हैं। आपने अपने और देह के बीच में आइडेंटिटी बना दी है। आप कह रहे हो, "मैं देह हूँ।" तो जो नियम देह पर लगेगा, वो नियम फिर मुझ पर भी लगेगा। देह पर क्या नियम लग रहा है? परनिर्भरता का। तो मैं भी फिर क्या हूँ?, परनिर्भर हूँ। और आपने जैसे ही कहा "आप पर-निर्भर हो," वैसे ही आपका जो पूरा ये क्षेत्र (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) है, ये अहम् का अड्डा है। सांकेतिक तौर पर, ये अहम् का अड्डा है। इसके केंद्र में एकदम एक बिंदु है उसका क्या नाम है? — अहम्। तो इसको फिर किससे भर लेगा? वो संसार से भर लेता है।
समस्या बस ये होती है कि संसार से भरने के बाद भी उसको वो नहीं मिलता जो उसका स्वभाव है। अब वो बड़ा बौखलाया रहता है। कहता है, देह को तो चैन मिल गया। उदाहरण के लिए: गला प्यासा था, तो बाहर से मँगाया गया पानी और प्यासे गले को एक घूँट पानी दिया, तो गला क्या बोला? मौज। बोले, बाहर की चीज़ आई तो गले की तो मौज हो गई। पर बाहर की चीज़ आई, इसकी (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) मौज क्यों नहीं हुई? क्योंकि हम क्या हैं? हम तो देह हैं। अहम् क्या बोल रहा है? हम तो देह हैं। तो जो चीज़ देह पर चलती है, वही हम पर भी चलनी चाहिए। तो बाहर की चीज़ आई, उसने देह की तो — शीतल, सुगंधित जल, गला तर हो गया। अब वो कुछ नहीं बोलेगा, कम से कम घंटे भर तो वो चुप रहेगा। लेकिन इसको (मस्तिष्क) तुम कितना भी पानी पिला दो, कुछ भी पिला दो ये तो टर्राता ही रहता है या हुआ कि कुछ दे दिया तो एकदम मौन हो गया हो? हुआ ऐसा? ऐसा तो होता नहीं।
नींद में भी नहीं होता। जितने सपने मनुष्य लेते हैं, उतने जानवर नहीं लेते आप जानते हो, जानवर भी सपने लेते हैं। पर कोई तुलना ही नहीं है। मनुष्य इतने सपने लेता है, अगर आप नींद की अवधि लें, सपनों की अवधि लें, तो मनुष्य और जानवर के सपनों में कोई तुलना ही नहीं है। क्योंकि मनुष्य का मन बहुत अशांत रहता है। जानवर को उतनी समस्या है नहीं। और मैं खोजूँगा, पढ़ूँगा, कोई ऐसा शोध हुआ हो जहाँ ये पता चल सके कि जो जानवर अपनी प्राकृतिक स्थिति में वनों में रहते हैं, वो कितने सपने लेते हैं? और उनकी तुलना में जो जानवर क़ैद में रहते हैं, वो कितने सपने लेते हैं? तो इसमें मेरा हाइपोथेसिस ये है कि जो क़ैद वाला जानवर है, वो ज़्यादा सपने लेता होगा।
अब ऐसा कोई शोध हुआ है कि नहीं हुआ, ये मैं नहीं जानता, होना चाहिए। बड़ा रोचक निष्कर्ष आएगा। अनुमान से कह रहा हूँ, कुछ और भी आ सकता है। कि जंगल का जानवर तो शायद सपने एकदम ही कम लेता है, शून्य बराबर। पर जो ये घरों वाले जानवर हैं या क़त्लख़ानों वाले जानवर हैं या जो ऐनिमल फार्म्स के जानवर हैं, ये बहुत सपने लेते हैं। बात समझ में आ रही है?
हमें चैन नहीं है, क्योंकि हमने देह को ही अपना आदर्श बना लिया है, तो हम परनिर्भर हो जाते हैं। तो ये बड़ी भारी समस्या खड़ी हो गई मानवता के सामने। किसकी समस्या? चैन की। तो क्या करें? तो कुछ लोगों ने, कुछ ज़िम्मेदार लोगों ने कहा कि हम इस समस्या को ज़रा देखना, समझना चाहते हैं। उनमें से एक हैं हमारे महाराज लाओत्सु। तो इन्होंने अपने तरीक़े से उस समस्या को संबोधित किया है और उस समस्या के बारे में हमें कुछ बातें बताई हैं। जहाँ से समाधान आता है। ठीक है?
एक बहुत रोचक बात आज कह रहे हैं। कह रहे हैं, "ताओ खालीपन से भरा हुआ है, पर कभी समाप्त नहीं हो सकता।” ताओ स्वयं खाली है, पर समाप्त नहीं हो सकता, अनंत है। खाली है, पर अनंत है। इनएक्ज़ॉस्टिबल! अनंत! ताओ खाली है, पर अनंत है। ये आज का सूत्र है लाओत्सु का।
ये सूत्र देना क्यों पड़ा, पहले ये समझ लो अच्छे से। किसी भी विचारक के सामने समस्या बस एक होती है, क्या? आदमी बेचैन है। इसके अलावा कोई समस्या नहीं है। पूरा जो अस्तित्व-शास्त्र है, जिसको हम दर्शन-शास्त्र बोल देते हैं, और अगर हम शुद्ध तरीक़े से बोलना चाहें तो बोल देते हैं फिर — अध्यात्म। वो है क्या? अस्तित्व-शास्त्र, हमारे होने को जानना। अध्यात्म उसे बोलते हो तो गड़बड़ और हो जाती है क्योंकि "अध्यात्म" बोलते ही ऐसा लगता है कि वो जो परंपरागत धर्म है, उसके किसी हिस्से की बात हो रही है। इसका उससे कोई ताल्लुक नहीं है।
एक समस्या पूरी मानवता के सामने खड़ी रहती है, कि जिसको देखो वही कैसा है? कोई इधर उछल रहा है, कोई उधर गिर रहा है, कोई इधर गर्मा रहा है, कोई उधर ठंडा आ रहा है। ले-दे कर के सहज कोई भी नहीं है। और ये बड़ी भारी समस्या है, ये समस्याओं के मूल की समस्या है। क्योंकि आदमी अगर अपने एकांत में तृप्त और संतुष्ट रहे, तो वो समाज में और विश्व में उतना उपद्रव करेगा ही नहीं, जो देखने को मिलता है।
हम निकल पड़ते हैं वैश्विक समस्याओं को सुलझाने, बिना मूल व्यक्तिगत समस्या को सुलझाए। कभी सफलता नहीं मिलेगी। क्योंकि विश्व में जो उपद्रव है, वो व्यक्ति के भीतर का उपद्रव है सबसे पहले। जब तक व्यक्ति के भीतर की समस्या नहीं सुलझाओगे, विश्व की समस्या कोई नहीं हल होने वाली।
आपको क्या लगता है कि जितने बड़े-बड़े भयंकर उपद्रवी लोग हुए हैं इतिहास में, ये सचमुच दुनिया पर कहर ढा रहे थे या दुनिया से इन्हें कोई समस्या थी? ये समाज से लड़ रहे थे? दूसरे देशों से लड़ रहे थे? दूसरी जातियों से लड़ रहे थे? ये बाहर कुछ जीत लेना चाहते थे? ना-ना। ये स्वयं से लड़ रहे थे। ये स्वयं को नहीं जीत पा रहे थे। इन्हें स्वयं से समस्या थी और चूँकि ये भीतर के युद्ध में बिल्कुल हारे हुए लोग थे, इसीलिए दुनिया जीतने निकल पड़े।
अब दुनिया जीतने के उस अभियान में लाखों लाशें गिरती हों तो गिरें। करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बर्बाद होती हो तो हो। क्योंकि हमारी आँखें भी बस ऐसे ही बाहर को ही देखती हैं, दुनिया को। तो एक आदमी जब करोड़ों लोगों को जीतने निकल पड़ा होता है या करोड़ों लोगों पर राज कर रहा होता है, तो हमें लगता है कि उसका उद्देश्य ही यही है कि वो संसार को जीते और करोड़ों पर राज करे। आप बिल्कुल ग़लत समझ रहे हो। हर आदमी दुनिया के साथ नहीं, सर्वप्रथम अपने साथ जीता है। देह संसार के साथ जीती है। चेतना, अपने साथ जीती है।
आप चेतना हो। देह संसार के साथ जीती है, चेतना अपने साथ जीती है। दोनों के स्वभाव में बड़ा अंतर है। देह के स्वभाव को प्रकृति कहते हैं, चेतना के स्वभाव को आत्मा कहते हैं।
देह संसार के साथ जीती है, तो संसार की ओर से एक पत्थर आए तो देह को अनिवार्यत: दर्द झेलना होगा। देह का अधिकार नहीं है ये कहने का, कि उसे पत्थर लगा और दर्द ना हो। अधिकार नहीं है देह के पास। देह अगर ये कहे, कि पत्थर लगे और दर्द ना हो, तो देह अनधिकार चेष्टा कर रही है। देह का नियम प्रकृति से है, और प्रकृति का नियम निर्भरता का है। भाई, तुम बाहर वाले के अभी मूड पर, मिज़ाज पर निर्भर हो। और अचानक उसका मन आ गया कि वो तुम्हें पत्थर मार दे, तो तुम्हें दर्द झेलना पड़ेगा। ये देह का नियम है।
चेतना का ये नियम नहीं है। चेतना का नियम है किसी को दर्द हो रहा हो तो हो, तुम्हें दुख होगा या नहीं होगा, ये तुम तय करोगे। बाहर वाला तुम्हारी देह को पत्थर मार के तुम्हें दर्द दे सकता है, पर बाहर वाला तुम्हें दुख नहीं दे सकता। लेकिन जब हम स्वयं को देह ही समझ लेते हैं, तो देह का दर्द चेतना का दुख बन जाता है। कोई बीच में विभाजन शेष नहीं रह जाता, कोई बीच में द्वार नहीं रह जाता। जो चीज़ देह तक आती है, वो सीधा चेतना तक पहुँच जाती है। समझ में आ रही है बात? और ये बहुत बड़ी फिर ग़ुलामी हो गई।
देह तो ग़ुलाम थी ही, और देह की ग़ुलामी के साथ तो पैदा हुए ही थे — स्वयं को देह के साथ जोड़ करके, स्वयं को भी ग़ुलाम बना लिया। ये क्या करा? आधा भाग लेके पैदा हुए थे, पूरा भाग चुन लिया। समझ में आ रही है बात ये? ये मूल समस्या है। लाओत्सु ने जो समाधान दिया है, वो तो आप तत्क्षण समझ जाओगे, वो क्या बोलना चाह रहे हैं। लेकिन कोई समाधान किस काम का अगर समस्या ही नहीं पता तो? हम सारी बात इसके लिए समस्या की कर रहे हैं।
समस्या क्या है? अहम् का जगत पर आश्रित हो जाना।
और अहम् जगत पर क्या कहकर आश्रित होता है? तर्क क्या बताता है? प्रमाण क्या देता है? कहता है, देखो साहब! मैं कौन हूँ? मैं देह हूँ। नाक साँस नहीं ले सकती संसार के बिना। आँख देख नहीं सकती संसार के बिना। कान सुन नहीं सकते संसार के बिना। कदम कहाँ रखोगे यदि जगत ना हो? मैं देह हूँ, और देह पूरे तरीक़े से क्या है? जगत पर आश्रित। तो मैं भी क्या हूँ? जगत पर आश्रित। और मैं जगत पर आश्रित हूँ, तो जगत आकर के मुझे पूरे तरीक़े से भर देगा। और जब जगत आपको भर देता है, तो आप रो पड़ते हो। रो पड़ते हो बिना ये जाने कि आप क्यों रो रहे हो।
किस-किसके साथ ये होता है? मूड बहुत ख़राब है। कोई पूछता है, क्यों? बता नहीं पाते हो। और इस तरह से ऐसे ही पता नहीं, नहीं थोड़ी देर की बात है, होता रहता है, अ बिट अंडर द वेदर। इस तरह के जुमले। कोई पूछे, "क्या हो गया?" बोलते कुछ नहीं, "बस ऐसे ही थोड़ा लग रहा है, सर्दी-जुकाम है। अ बिट अंडर द वेदर।
कुछ भी नहीं, सो के उठे और पा रहे हैं कि ऐसे ही मन उदास है। होता है न? ऐसा नहीं होता कि वो यूँ ही उदास है। उसके पीछे कारण होता है सदा, और कारण होता है — बैड फ़िलॉसफ़ी। सब दार्शनिक हैं और सबका जीवन-दर्शन एकदम ग़लत है। प्रकृति के पीछे-पीछे चल रहे हैं, एकदम द्वैत को पकड़ रखा है। द्वैत का मतलब होता है — बाहर कोई है जो महान है, श्रेष्ठ है और मैं उस पर निर्भर हूँ।
तो फिर बाहर कुछ होता है, वो आकर के आपके मन को पूरे तरीक़े से झिंझोड़ जाता है। क्योंकि ये फैसला आप ही ने कर रखा है न कि बाहर कोई है, जिसका आप पर बड़ा अधिकार है। यही द्वैत है। बाहर कोई है, मैं उस पर निर्भर हूँ। उसका मुझ पर बड़ा अधिकार है। तो फिर वो बाहर वाला अपने अधिकार का इस्तेमाल भी कर जाता है। आप ही ने दिया है उसे अधिकार। आपसे बिना पूछे वो अपने अधिकार का इस्तेमाल कर लेगा। वो कहेगा, "चलो, उदास हो जाओ।" आप उदास हो गए। ऐसे ही कई बार होता है, बिना बात के खुश भी हो जाते हो। बिना बात के। ये कम होता है। जब भी कुछ बिना बात के होगा, तो 10 में से 9 दफ़े तो यही होगा कि मुँह लटकाए घूम रहे हैं। कोई पूछेगा, "क्यों मुँह लटका रखा है?" तो थप्पड़ मार दिया, बोला, "इसलिए।" समझ में आ रही है बात?
लाओत्सु कह रहे हैं, जब भी किसी पर आश्रित रहोगे तो जिस पर आश्रित हो क्योंकि वो स्वयं समाप्त होगा ही होगा, तुम भी समाप्त हो जाओगे। पर जो आश्रयों से खाली हो गया, वो अमर हो गया। कभी समाप्त नहीं हो सकता, तो अनंत हो गया। लाओत्सु कह रहे हैं, 'जो खाली है, वो कभी समाप्त नहीं हो सकता।' समाप्त वही सब कुछ होता है जिससे तुमने अपने आप को भर रखा है, इस आशा में कि उसको भर करके अब तुम समाप्त नहीं होगे।
काम चल उल्टा रहा है। तुम समाप्त अब ज़रूर होओगे और इसीलिए होओगे, क्योंकि तुमने अपने आप को उससे भर लिया। अन्यथा समाप्त नहीं होते। जो खाली है, जिसने अपना बंधन किसी से जोड़ा ही नहीं उसकी समाप्ति भी नहीं हो सकती क्योंकि समाप्ति तो सदा संसार की होती है। संसार में कुछ नहीं है जो समाप्त नहीं होता।
डर लगे कभी, चिंता हो, बेचैनी हो, मन खिन्न हो — यूँ ही बहाने मत बनाइए कि यूँ ही, नथिंग, ये सब नहीं। देखिए कि किस पर आश्रित हो। बस इतना पकड़ लीजिए, आश्रित किस पर हो? जिस पर आश्रित हो, वो आपकी देह जैसा ही होगा — चाहे वो व्यक्ति हो कोई, चाहे वस्तु हो कोई। आपको अपनी देह का तो दिन-रात पता है न कि समाप्त हो रही है। तो आप स्वयं से कितना भी झूठ बोलें, भीतर ही भीतर आपको ये भी पता है कि आप जिस पर आश्रित हो वो भी समाप्त हो रहा है। काँपोगे कैसे नहीं, डरोगे कैसे नहीं। आ रही है बात समझ?
जिसके पास कोई सांसारिक लक्ष्य है, वो पाएगा — लक्ष्य के मिलने की आशा नहीं रही, तो भी ये व्यक्ति चूक गया। लक्ष्य मिल गया, तो भी ये व्यक्ति चूक गया।
समाप्त तो बस वो नहीं होगा, जिसका कर्म निष्काम है। उच्चतम अवस्था उस व्यक्ति की है, जिसका मन खाली है।
आप कितने पानी में हो, ये नापना है तो बस ये देख लो कि आपका मन भरा कितना रहता है। आपके जीवन में पर-निर्भरता कितनी है। पर होशियारी तो, बहुत बताइएगा नहीं कि "नहीं-नहीं, मेरा मन भरा तो रहता है, पर मेरा मन जिनसे भरा रहता है मैं उन पर आश्रित नहीं हूँ, वो मुझ पर आश्रित हैं। इसलिए मेरा मन उनसे भरा रहता है।" अच्छा! ये खेल ईमानदारी का है। बेईमानी से खेलना है तो खेल शुरू ही नहीं होगा क्योंकि खेल शुरू ही इस ईमानदार वक्तव्य से होता है कि "हाँ, मैं दुखी हूँ।" आपको बेईमानी ही करनी है तो शुरू में ही बेईमानी कर जाइए। कह दीजिए, "मैं तो दुखी हूँ ही नहीं।" तो खेल शुरू ही नहीं होगा, छोड़िए फिर। और बेईमानी आप इस खेल के किसी भी चरण में कर सकते हैं। क्योंकि स्वीकार तो आप ही को करना है आपकी हालत क्या? आप अपनी हालत को लेकर कुछ भ्रामक बयानबाजी कर लीजिए, खेल समाप्त।
बंधन काटने की यात्रा चल रही है। कह दीजिए बीच में, "मैं हो गया, मैं मुक्त हो गया, मेरा ठीक हो गया।" यात्रा समाप्त। सब कुछ आपके ही समर्थन से चलना है, और कुछ भी आगे तभी बढ़ना है जब आप उसकी कीमत चुकाएँ। जिस क्षण पर आप कह दें कि "मुझे अब और कीमत नहीं चुकानी," खेल समाप्त। बिजली के तार की तरह, जिस दिन आप कह देंगे कि "साहब बिल और नहीं भरना," प्रकाश अंधकार में बदल जाएगा। घर रोशन उसी दिन तक है, जिस दिन तक आप बिल चुकाने को तैयार हो। मन भी रोशन उसी दिन तक है, जिस दिन तक बिल चुकाने को। जिस दिन कह दोगे, "अब और नहीं चुकाना बिल," मन का भी तार (कट जाएगा), समझ रहे हैं?
बिल्कुल आप कह सकते हो कि लाओत्सु को वहम हो गया है, "मैं पूरी तरह भरा हुआ हूँ, लेकिन फिर भी मैं कभी चुकता नहीं” मैं भी हूँ मिस्टर इनएक्ज़ॉस्टिबल। आप बिलकुल कह सकते हो। और कोई प्रमाण तो दिया नहीं जा सकता। ये तो आपकी ईमानदारी की बात है कि आपको दिखाई दे कि "नहीं, मैं तो चूक जाता हूँ।" कुछ भी जो अच्छा है, ऊँचा है, वो समाप्त सिर्फ़ तभी नहीं होता जब वो किसी भी विषय पर आश्रित न हो। प्रेडिकेटेड न हो तो समाप्त नहीं होगा।
सत्य की लड़ाई में, उदाहरण के लिए, अनंत धैर्य चाहिए। धैर्य का अगर आपने कोई अंतिम बिंदु निर्धारित कर रखा है तो धैर्य समाप्त हो जाएगा। धैर्य के ऊपर आपने कोई शर्त बाँध रखी है, तो एक दिन वो शर्त टूटेगी और धैर्य समाप्त हो जाएगा। अगर आपने कह रखा है कि, "देखो, अगर 5 साल में कम से कम इतनी सफलता मिल गई तो ठीक है, काम आगे बढ़ाएँगे, नहीं तो काम रोक देंगे," तो काम रुकेगा। जीवन में जो कुछ भी ऊँचा है, अच्छा है, वो फिर अनंत होना चाहिए न?
अगर कुछ अच्छा है और समाप्त हो रहा है, तो ये तो बुरी बात हो गई न? है न? प्रेम अच्छी बात है। प्रेम भी समाप्त हो जाएगा अगर प्रेम पर शर्तें बाँध दीं। और हमारा प्रेम तो पूरी तरह शर्तों का ग़ुलाम होता है। वो एग्ज़ॉस्टिबल होता है, क्षरणीय होता है, मिट जाएगा।
जो साधारण प्रेम होता है उसी को ले लो, स्त्री-पुरुष का। स्त्री को एक बस सूचना मिलनी चाहिए कहीं से, छोटे-मोटे प्रमाणों के साथ कि उसका पुरुष किसी और स्त्री से भी मिलता-जुलता है। प्रेम समाप्त, एकदम समाप्त; एग्ज़ॉस्टेड, फिनिश्ड। पुरुष को भी ऐसे ही कुछ सूचना मिल जाए कि, "स्त्री की देखो तस्वीरें देख लो या कुछ और रिकॉर्डिंग देख लो," प्रेम समाप्त। क्योंकि ये प्रेम आश्रित था। ये प्रेम कह रहा था कि, "मैं तभी तक हूँ जब तक फलानी शर्त का पालन हो रहा है।" जिस दिन उस शर्त का पालन नहीं होगा, प्रेम मिट जाएगा। ये मिटेगा इसमें कोई दम नहीं है।
अनंत बस वो हो सकता है जो अपने ही कारण हो, जैसे चेतना का स्वभाव है। किसी पर आश्रित नहीं है।
हम हैं, स्वयं से हैं, और स्वयं के लिए हैं। जो कुछ भी किसी सीमा से बँधा हुआ है, उसको समाप्त होना पड़ेगा। धैर्य चूकेगा, प्रेम चूकेगा, साहस चूकेगा। और बताओ क्या है जो आप जीवन में कीमती मानते हो? सब समाप्त हो जाएगा, अगर वो आश्रित है।
युध्यस्व, आप बोलते हो न? आपका युद्ध भी समाप्त हो जाएगा, अगर वो किसी शर्त से बंधा हुआ है। शर्त क्या है?, "अब कम से कम इतनी जीत तो मिलनी चाहिए," या "इससे ज़्यादा चोट नहीं मिलनी चाहिए।" ये शर्त आपने बाँध दी। जहाँ आपको उससे ज़्यादा चोट मिली, आपका युद्ध समाप्त। जहाँ आपने पाया कि 10 वर्ष बीत गए कोई जीत नहीं मिली, आपका युद्ध समाप्त। चलेगा नहीं। आश्रित है। किस पर आश्रित कर दिया? प्रकृति पर। क्योंकि जीत मिलेगी कि नहीं मिलेगी, ये बात तो समय-संयोग की होती है। आपके श्रम की भी होती है, निःसंदेह। पर उसमें समय और संयोग भी हैं। और समय और संयोग क्या होते हैं? — प्रकृति। जो कुछ प्रकृति पर आश्रित हो गया, अब वो बहुत ऊँचा नहीं जा सकता। तो आपका साहस, आपका धैर्य भी बहुत अब ऊँचा नहीं जाएगा क्योंकि वो प्रकृति-बद्ध हो गया। प्रकृति से संबंधित आपने उस पर शर्त थोप दी है। वो बहुत आगे नहीं जाएगा।
मन खाली रहे। ये एक विचित्र तरह का जीना होता है, जिसमें युद्ध जीतने के लिए नहीं लड़ने के लिए लड़ा जाता है। और जब युद्ध जीतने के लिए नहीं लड़ने के लिए लड़ा जाता है, तब उसमें लड़ाई की शुरुआत में ही जीत हो जाती है। जिसको जितना है ही नहीं, वो युद्ध से पहले ही जीत गया। जीत गया तो लड़े काहे को जा रहा है? मौज है, हमें क्या पता। कुछ मिल नहीं जाएगा जीतने से? कुछ मिलने की आस में अगर लड़ रहे हो तो जिस दिन आस टूटेगी, उस दिन लड़ाई भी टूट जाएगी।
अच्छा जीत गए हो, तो काहे को लड़ रहे हो? क्योंकि जीत गए हैं। जीतने के बाद पार्टी होती है कि नहीं? ये लड़ाई क्या है हमारी? जीत के बाद का जश्न है ये। जीत के बाद के जश्न को हम संग्राम बोलते हैं। तुम्हारा संग्राम जीतने के लिए है। हमारा संग्राम जीतने के बाद है। तो तुम्हारा सारा संग्राम एक बेचैनी है, प्यास है क्योंकि तुम जीतने के लिए लड़ रहे हो। और हमारे संग्राम में उत्सव है, उल्लास है क्योंकि हम जीतने के बाद लड़ रहे हैं।
जीत तो हम उसी दिन गए थे, जिस दिन हमने लड़ना चुना था। जीत गए। उसके बाद आफ्टर पार्टी भी तो होती है कि नहीं, कोई बढ़िया चीज़ हो जाए? ये क्या चल रहा है? आफ्टर पार्टी। पूरी ज़िंदगी क्या है? आफ्टर पार्टी। काम तो पूरा हो गया। ये थोड़ी कि काम अधूरा वग़ैरह-वग़ैरह, वो सब व्यवहारिक बातें हैं। वैसे कभी-कभी बोल दिया जाता है, काम तो कब का पूरा हो गया। आ रही बात?
इनएक्ज़ॉस्टिबल। इससे ज़्यादा गरिमा का शब्द नहीं हो सकता किसी इंसान के लिए। इनएक्ज़ॉस्टिबल। कोई अंत ही नहीं है। कोई आपको बोले कि "आत्मा हो तुम, तत्वमसि" वो बात थोड़े पुराने ढंग की हो जाती है। आप बोलिए, "आई एम मिस्टर और मिस इनएक्ज़ॉस्टिबल।" तो बात वही है, इनएक्ज़ॉस्टिबल माने अनंत, आत्मा।
जैसे गाते हो न आजकल "आई एम इनविंसिबल।” बड़ा सुंदर लगता है हमें, "आई एम इनविंसिबल।" इनविंसिबल नहीं, बात अब इसकी है ही नहीं कि हम हार सकते हैं कि नहीं हार सकते हैं। आई एम इनएक्ज़ॉस्टिबल। इनएक्ज़ॉस्टिबल, इनविंसिबल से बहुत आगे की बात है। समझ में आ रही है बात? कभी थकते ही नहीं, कभी चूकते ही नहीं। साँस की तरह चलते रहते हैं। बाक़ी सब समाप्त हो जाएगा।
वो आस की तरह चलते हैं, हम साँस की तरह चलते हैं। वो चूक जाएँगे, हम नहीं। कुछ भी इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता कि वो न हो तो आप ही नहीं रहोगे, तो फिर आप होते हो। जब आपका होना किसी भी विषय के होने से आज़ाद हो जाता है, जब एक डिकप्लिंग हो जाती है — तब आपका होना सार्थक हो जाता है। तब पहली बार आप बस होते हो और जो है, अब वो मुक्त है सही जीने के लिए। ग़लत जीवन और क्या होता है? अमुक्त जीवन ही ग़लत जीवन है, और अमुक्ति माने — आश्रयता।
जो मुक्त हो गया अब वो मुक्त है सही जीने के लिए। अब वो सही जिएगा। कौन रोक सकता है उसे? क्यों, रोक सकेगा? नहीं रुकेगा। जब भी किसी से सवाल भी करो कि "क्यों ग़लत जीवन जी रहे हो?" लोग जवाब में क्या बताते हैं? अपने बंधन, मजबूरियाँ ही तो गिनाते हैं। और सारी मजबूरियाँ, सारे बंधन — आश्रयताएँ। "मैं इस पर निर्भर हूँ। मेरा ये चल रहा है, वो है, वो है, वो है।" वो सब कुछ नहीं है तो अब सही काम से तुम्हें कौन रोकेगा? क्यों रुकोगे? जो सही काम है, वही तो करोगे।
आप सही काम करने के लिए ही बने हो। ग़लत कामों में इसलिए उलझ जाते हो क्योंकि दर्शन ग़लत है। ग़लत कामों में भ्रमवश उलझ जाते हो, स्वभाववश नहीं। आपका स्वभाव नहीं है कि उल्टे-पुलटे कर्मों में लगे रहो। आपका भ्रम है, जो आपकी जंजीर बन जाता है, ऐसे हथकड़ी और कहता है, "नहीं-नहीं, सही काम में मत जाना, बड़ा नुकसान हो जाएगा। अभी तो ग़लत कामों की जो ज़िम्मेदारियाँ हैं, वो निपटानी हैं।" समझ रहे हो?
जो कुछ भी जीवन में प्यारा हो, पूज्य हो — उससे शर्तें मत बाँधना। बाँध रखी हों, तो आज हटा दो।
ऋषिकेश में पहली बार जब पश्चिमी बंधुओं से मुलाक़ात हुई, तो पता चला उनके लिए मेडिटेशन बहुत प्रेम का बड़े सम्मान का शब्द है। वो कह रहे थे, मेडिटेशन ही सब कुछ है।" एक बार मैंने उनसे बड़ा एक मासूम-सा सवाल किया। मैंने कहा, "इतना प्यार है अगर ध्यान से तो ध्यान तोड़कर उठ क्यों जाते हो?" अगर तुम कह रहे हो, "मेडिटेशन इज़ बिगर देन लाइफ़।" मैंने कहा, तो तुम जो मेडिटेशन करते हो, वो तो बैठ के आसन लगाकर, आँख बंद करने वाला है, और उसमें कई बार तुम साथ में कुछ संगीत वग़ैरह भी लगा लेते हो या गुरुजी वग़ैरह की आवाज़ लगा लेते हो। ये है तुम्हारा मेडिटेशन। ये तो समाप्त हो जाता है।
संगीत सीडी (कम्पैक्ट डिस्क) में होता है, वो तो समाप्त हो जाएगा। और एक ही मुद्रा में कब तक बैठे रहोगे? वो भी समाप्त हो जाना है, समय। तुम तय करके बैठते हो कि इतने से इतने बजे तक बैठेंगे, वो भी समाप्त हो जाना है। अगर ये सचमुच इतनी प्यारी चीज़ है ध्यान तुम्हारे लिए, तो अपने ध्यान को समाप्त क्यों हो जाने देते हो?
जो प्यारा है, उसे कभी समाप्त नहीं होना चाहिए न। जो प्यारा है, उस पर शर्तें मत लादना। मत कह देना कि, "संगीत मिलेगा तभी ध्यान जमेगा।" मत कह देना कि, "जब सुबह 6:00 बजेंगे तभी ध्यान जमेगा।" मत कह देना कि, "7:00 बज गए हैं तो अब ध्यान से उठना पड़ेगा।" मत कह देना कि, "ज़मीन पर ऐसे करके आसन लगाएँगे और कुछ बिछाएँगे तभी ध्यान लगेगा।" कुछ नहीं। अगर प्यारा है, तो उस पर शर्तें क्यों? अगर प्यारा है, तो उसकी समाप्ति क्यों? इनएक्ज़ॉस्टिबल होना चाहिए न।
एक बार मैंने सवाल पूछा, ऐसे ही आप जैसे ज्ञानी लोगों की सभा थी। मैंने पूछा, "आपकी ज़िंदगी में कुछ भी ऐसा है जो कभी समाप्त नहीं होगा बेशर्त है बिल्कुल अनकंडीशनल, समाप्त हो ही नहीं सकता?" तो ज़्यादातर लोग चुप रहे। एक देवी जी बोलीं, "मेरी ज़िंदगी में है कुछ ऐसा जो कभी समाप्त नहीं हो सकता।" मैंने कहा, "क्या?" बोलीं, "मेरे बच्चे के लिए मेरा प्यार।" कहा, "बड़ी सुंदर बात है।"
मैंने कहा, "थोड़ा हम इसमें कुछ जाँच-परख सकते हैं?" बोलीं, "बेशक।" मैंने कहा, "आपको पता चले आपका बच्चा हत्यारा है तो?" बोलीं "नहीं, प्यार तो समाप्त नहीं होगा। मैं उसे सुधारने की कोशिश करूँगी।" मैंने कहा, "ठीक है। आपका बच्चा बलात्कारी है?" "नहीं, मैं सुधारने की कोशिश करूँगी।" मैंने कहा, "आपका बच्चा आपके ही दूसरे बच्चे पर हमला कर दे, उसको चोट पहुँचा दे?" "नहीं, सुधारने की कोशिश करूँगी।"
तो जितनी भी बातें कही गई, ये तक कहा गया, "आपका बच्चा आपको ही घाव दे दे?" बोली "नहीं ये शर्त भी नहीं है, कोई शर्त नहीं है।" मैंने कहा, "ठीक है। तो सारी बातें मैंने कहा, "आपको ये पता चले, आपको ये पता चले।” वो हर बात में कहती गई, “नहीं-नहीं सब स्वीकार है कोई शर्त नहीं।” तो मैंने कहा, आपको ये पता चले कि ये आपका बच्चा ही नहीं है तो?" तो वो दो पल को ठिठक गई।
मैंने कहा, "अब कुछ बोलिएगा नहीं। ये जो दो पल की ठिठकन है न, यही जवाब है।" लगा दी न बड़ी भारी शर्त? ये तो बहुत बड़ी शर्त हो गई कि मैं इससे तभी तक प्यार करूँगी जब तक ये मेरा बच्चा है। और कल कोई सबूत सामने आ जाए कि ये आपका है ही नहीं बच्चा, आप क्या करोगे? वो थोड़ा उसमें बोलीं "नहीं सबूत आ भी जाए, तो भी अब इतने दिनों तक पाला है, तो मेरी..." मैंने कहा, अच्छा मैं सबूत को ज़रा बढ़ा देता हूँ। सबूत ये आ गया कि आपका वाला जो बच्चा है, वो पड़ोस के घर में है और पड़ोस वाला ये बच्चा है। और पड़ोस वाला जो है, जिससे आप नफ़रत करते हो पड़ोसी से अपने, वही आपके अपने बच्चे को पाल रहा है, तो आप क्या करोगे? एकदम ही रुक गई। ये जवाब है।
शर्त तो रहती ही है। जहाँ शर्त है, वहाँ शूद्रता है। जहाँ शर्त है, वहाँ नर्क है। बोली, “पर ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी से बिल्कुल बेशर्त प्रेम करें?” मैंने कहा, “नहीं हो सकता। जब तक हम वैसे हैं जैसे हम हैं, हमारे जीवन में कोई आएगा ही नहीं जिससे बेशर्त प्रेम किया जा सके।”
आप प्रश्न पूछ रही हैं कि ऐसा कोई कैसे मिलेगा जिससे बेशर्त प्रेम करें? मैंने कहा, “ऐसा कोई आपको कैसे मिलेगा जिससे बेशर्त प्रेम करें? क्योंकि आपको आप बने रहना है इसीलिए आपके जीवन में कभी कोई ऐसा आएगा भी नहीं जिससे बेशर्त प्रेम किया जा सकता हो।” आपके जीवन में कोई ऐसा ही आएगा जिससे सौदा किया जा सकता हो। और सौदे में तो शर्तें होती हैं, 'तुम इतना मुझे दोगे और इतना मैं तुम्हें दूँगा।' जब हम व्यापारी हैं, तो हम बाजार में प्रेम करने निकले हैं या व्यापार?
तो हमारे जीवन में सब व्यापारी ही आते हैं दूसरे, क्योंकि हम व्यापारी हैं, सर्वप्रथम। तो कैसे बेशर्त आप फिर संबंध बनाओगे? कैसे बेशर्त बनाओगे? तो ये मत पूछो कि ऐसा कोई कैसे हो सकता है जिससे बेशर्त प्रेम किया जाए। पूछो — मैं ऐसा कब बनूँगा जब कोई ऐसा प्रवेश करे जीवन में, मैं अनुमति दूँ उसे प्रवेश करने की जीवन में, जो बेशर्त प्रेम का हक़दार हो। वरना तो हो सकता है वैसा कोई आपके जीवन में हो भी, आपके सामने भी हो, लेकिन उस पर भी आपने शर्तें थोप रखी हों।
याद नहीं आ रहा है वो, साहब का श्लोक है कि — “अहम अगनि हिरदै जरै, गुरु सो चाहै मान।” आगे क्या है आधी साखी, कुछ यही है कि ऐसों का बड़ा बुरा हाल होता है —
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरु सो चाहै मान। तिनको जम न्यौता दिया, हो हमरे मेहमान।।
~ कबीर साहब
ऐसों को यमराज बोलते हैं — “आओ-आओ, तुमको ही न्योता दे रहे, हमारे मेहमान बनो।” जिसने गुरु पर शर्त लगा दी, उसके लिए कोई गुरु है ही नहीं। गुरु और शिष्य का रिश्ता तभी हो सकता है जब शिष्य की ओर से कोई शर्त हो ही नहीं। अगर अभी ये शर्त है कि हमसे इतनी ही सीमाओं में रहकर व्यवहार करना, तो समझ लो तुम्हारे पास कोई गुरु नहीं है निगुरे हो तुम।
कबीर साहब के यहाँ जो सबसे बड़ी गाली होती है, वो और नहीं होती कोई — निगुरा। जो इस लायक नहीं हो पाया कि उसका कोई गुरु हो पाए, उसको निगुरा कहते हैं। ये सबसे बड़ी गाली है — निगुरा। निगुरा वो जिसने गुरु पर भी शर्त लगा दी है, कि अगर इतना-इतना तुम अपनी सीमा के भीतर चल रहे हो तो ठीक है, हमारा-तुम्हारा व्यवहार चलेगा। ना तुम अपनी सीमाएँ छोड़ोगे, ना हम अपनी सीमाएँ छोड़ेंगे ये निगुरा है। इसका कुछ नहीं हो सकता।