शारीरिक रूप से तो परनिर्भरता रहेगी, लेकिन जब परनिर्भरता मानसिक बन जाती है, तो वह बहुत ख़तरनाक हो जाती है। अगर आप देह हैं, तो परनिर्भरता ठीक है, लेकिन आप देह भर नहीं हैं। जब हम स्वयं को देह ही समझ लेते हैं, तो देह का दर्द चेतना का दुख बन जाता है — यह बहुत बड़ी ग़ुलामी है। आपके भीतर कुछ ऐसा है जो आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है। जब आपका होना किसी भी विषय के होने से आज़ाद हो जाता है, तब आपका होना सार्थक हो जाता है, और आप सही तरीक़े से जीने के लिए मुक्त हो जाते हो।
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आचार्य प्रशांत: हमारी साधारण वृत्ति निर्भरता की रहती है और उस वृत्ति को समर्थन देने के लिए और सहारा देने के लिए हमारे पास लगातार अनुभवगत प्रमाण रहते हैं। अगर ये मेज़ न हो, तो मैं ऐसे झुककर नहीं बैठ सकता। मेरी कुहनियों को मेज़ की सतह का सहारा है, इसलिए मैं जैसे बैठा हूँ, वैसे बैठा हूँ। एक बहुत साधारण-सा, रोज़मर्रा का अनुभव है, लेकिन वो परनिर्भरता के सिद्धांत को पुष्ट कर रहा है।
जहाँ एक ओर ये निर्भरता हमें शारीरिक अस्तित्व देती है, दूसरी ओर ये कुछ और भी हमें दे जाती है। शरीर का अस्तित्व नहीं हो सकता बिना जगत पर आश्रित हुए। कुहनियों को मेज़ का सहारा है, शरीर के पूरे वज़न को इस सोफ़े का सहारा है। आप जो लिख भी रहे हो, उसमें भी कलम काग़ज़ पर और काग़ज़ कलम पर आश्रित है। दोनों के मध्य जो घर्षण है, परस्पर संघर्ष है और वही संघर्ष उनका संबंध है, सारे संबंध ऐसे ही होते हैं, आपस में घर्षण के। उस से आप पाते हो कि आपकी लिखाई सामने आ रही है। नहीं लिख पाओगे आप, सिर्फ़ यदि काग़ज़ हो और सिर्फ़ यदि क़लम हो। आप देखिए, आपने क़लम को भी कैसे पकड़ा है। एक तरफ़ को अँगूठा ज़ोर लगा रहा है, दूसरी तरफ़ को उँगली, और दोनों विपरीत दिशाओं में ज़ोर लगा रहे हैं। और चूँकि दोनों विपरीत दिशाओं में ज़ोर लगा रहे हैं, इसीलिए पकड़ बनी हुई है। कलम काग़ज़ को नीचे धकेल रही है। काग़ज़ अगर चला ही जाए नीचे, तो क्या होगा? कुछ लिख नहीं पाओगे। लिखाई इस बात पर आश्रित है कि काग़ज़ क़लम को ऊपर धकेल रहा है। इस धक्का-मुक्की में कुछ लिखा-लिखी हो जाती है।




