जो पुरुष प्रकृति में रस नहीं लेगा प्रकृति उसके सामने अपना पूरा नृत्य प्रदर्शित कर देगी और जो पुरुष प्रकृति का दीवाना होकर घूमेगा प्रकृति खुद उससे बच-बचकर घूमेगी। जब पुरुष जैसा स्वामी हो तो प्रकृति का चंचल हो जाना लाज़मी है न। वो है ही ऐसा जो किसी के हिलाए न हिले, तो आश्वस्ति है कि ये तो हिलेगा नहीं तो नाचो, गाओ, लुभाओ, मज़े करो। पक्का भरोसा है कि इस पर कोई विक्षेप आएगा नहीं।
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आचार्य प्रशांत: संत रहीम का दोहा है:
कैसे निबहै निबल जन करि सबलन सों गैर। रहिमन, बसि सागर विष करत मगर सों बैर।।
निर्बल जनों की कैसे नैया पार लगेगी अगर उन्होंने सबल से बैर कर रखा है। ठीक वैसे, जैसे कोई सागर बीच बसकर के मगर से बैर कैसे कर सकता है। प्रतीक है, किधर को इशारा समझ लीजिए। सबल से दूरी रखने का, सबल को गैर कर देने का अर्थ क्या है।
निर्बल तो सब जन हैं, सब जीव हैं। बल मात्र सत्य का होता है, आत्मा का होता है उसके अतिरिक्त बल कहीं से नहीं आता। किस सागर की बात हो रही है, संसार सागर की बात हो रही है, भवसागर की बात हो रही है। और भवसागर में चारों तरफ़ सब मगर ही मगर हैं। सब तुम्हें खा जाने को अर्थात कष्ट दे देने को उतारु हैं।
ऐसे में एक ही है, जो तुमको बचा सकता है, वो जो सबल है, उसको गैर मत बना लेना, उसको गैर मत बना लेना। सच्चाई से दोस्ती रखो सच्चाई तुम्हें बचाएगी।



