जिसका कोई नाम है वह अंतिम सत्य नहीं

Acharya Prashant

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जिसका कोई नाम है वह अंतिम सत्य नहीं
मन में नामों का पूरा एक भंडार है। पूरी एक भीड़ है मन में नामों की। तुम सर्वप्रथम तो अपने लिए एक ऐसा नाम तैयार करो जो उस भीड़ को भगाना जानता हो, जो उस भीड़ का हिस्सा नहीं हो। वो जो पूरी भीड़ है उससे तुम्हारा संबंध अहंकार का है। वो जो पूरी भीड़ है उससे हमने पोषण पाया है, अहंकार उसी के सहारे खड़ा रहता है। कोई ऐसा नाम लेकर के आओ जो उस भीड़ से किसी तरह का रिश्ता न रखता हो। और सिर्फ़ तभी उस नाम को जपने से लाभ है, नहीं तो आप जप-जप के बस अपने अहंकार को ही और दृढ़ कर रहे हो। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: ताओवाद या दाओवाद चीन की और विश्व की सबसे पुरानी धार्मिक धाराओं में से है। दाओ से दो आशय निकलते हैं और अभी जब हम लाओत्सु की बात करेंगे, हम पाएँगे कि वो दोनों ही अर्थ लाओत्सु के वचनों पर कहीं एक साथ, तो कहीं अलग-अलग लागू होते प्रतीत होते हैं।

दाओ से पहला अर्थ है ‘ऋत।’ ऋत से आशय है प्रकृति की सारी गति, सारे विस्तार, सारी अभिव्यक्ति के पीछे का नियम। और दाओ से दूसरा अर्थ है सीधे-सीधे ‘ब्रह्म।’ मैं ऋत और ब्रह्म कह रहा हूँ क्योंकि इन शब्दों से आप में से अधिकांश लोग पहले से ही परिचित हैं। चाहे ऋत हो या ब्रह्म, दोनों में ही भाव प्रकृति के विस्तार और विविधता से आगे देखने का है। तो मन, व्यक्ति, आमतौर पर बड़ी आसानी से जगत की विविधताएँ हैं, उनमें ही खोया रहता है। दाओवाद कहता है, यदि शुभता लानी है जीवन में तो देखना पड़ेगा कि प्रकृति के पीछे क्या है, प्रकृति का आधार क्या है, ‘द ग्राउंड ऑफ ऑल बीइंग’ उसको समझना पड़ेगा।

ये दाओवाद है, इसके ठीक-ठीक कह पाना बड़ा मुश्किल है कि कितने अनुयायी हैं पूरे विश्व में, क्योंकि चीन आधिकारिक तौर पर धर्म को मान्यता देता नहीं है और दूसरी ओर दाओवाद कोई आयोजित धर्म नहीं है, एक तरह की जीवन-पद्धति है। तो ये भी संभव है कि कोई बौद्ध हो और साथ में दाओवादी भी हो। लेकिन फिर भी अनुमान ये है कि कम से कम 20 से 30 करोड़ लोग दुनिया में आज भी दाओवाद पर चलते हैं।

तो लाओत्सु के साथ, ताओ-ते-चिंग के साथ हमारी पूरी यात्रा होगी वो दाओवाद को समझने की होगी। और बोध प्रत्युषा में हम उपनिषद्, दाओवाद और शून्यतावाद — इन तीनों को एक साथ लेकर चल रहे हैं, और आप यही देख पाएँगे कि तीनों बातें एक ही दिशा में जाती हैं और एक बिंदु पर जाकर एक हो जाती हैं। लाओत्सु, कुछ पक्का नहीं है कि ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं कि नहीं हैं। ‘लाओत्सु’ का अर्थ होता है — बूढ़ा व्यक्ति या सम्मानित व्यक्ति, वरिष्ठ (द एल्डर)। दो आशय निकलते हैं, एक तो वरिष्ठ से ये कि ‘परिपक्व’ — चेतना के तल पर बढ़ा हुआ।

और जो दूसरा आशय है वो परंपरा से कहानी आती है रोचक है, वो कहते हैं कि लाओत्सु पैदा ही हुए थे 84 वर्ष के। जाहिर सी बात है ऐसा नहीं हो सकता, उसमें प्रतीकात्मक अर्थ है। रहा होगा कोई बालक, जो बचपन से ही बहुत प्रतिभासंपन्न था। फिर परंपरा तो ये भी कहती है कि लाओत्सु जी अभी 900 साल से ऊपर जिए। उससे भी आशय यही है कि अपने जीवनकाल में उनमें उतनी परिपक्वता या बोध दिखाई दिया था, जितना पाने के लिए एक आम आदमी को नौ या दस जन्म लेने पड़ जाते। तो उसको ऐसे ही कह दिया कि लाओत्सु 900 साल से ऊपर जिए।

अब पिछले 20–30 सालों में जो मत उभर के आ रहा है विद्वानों में और इतिहासकारों में वो ये है कि कुछ निश्चित नहीं है कि लाओत्सु वास्तव में कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं भी या नहीं। और ये भी हो सकता है कि अगर लाओत्सु सचमुच इतिहास में थे, तो वो कोई एक व्यक्ति नहीं थे। कई व्यक्तियों को लाओत्सु के नाम से पुकारा गया और उनका जो सम्मिलित कृतित्व था, वो ताओ-ते-चिंग कहलाया। उस पर अभी आएँगे, पुस्तक पर।

तो खैर, परंपरा से जो हमें लाओत्सु का वर्णन मिलता है, वो कई प्रकार का है और वो सारे प्रकार अगर हम गिनाने लग गए, तो आज का पूरा सत्र उसी में चला जाएगा। पर जो सबसे प्रचलित और सबसे स्वीकृत है, वो ये है कि वो एक साधारण जीवन ही जीते थे और राजा के दरबार में एक आम शासकीय नौकरी किया करते थे। और ऐसे ही उन्होंने अपना पूरा जीवन निकाल दिया और अपने जीवनकाल में उन्होंने कोई रचना नहीं की। हालाँकि उनके बोध से, उनकी विद्वत्ता से, उनकी गहराई से लोग प्रभावित होने लगे थे, और धीरे-धीरे ये होने लगा था कि दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आते। लोग मिलने आते, बातचीत होती।

भारत की तरह ही चीन में भी जो ज्ञान की परंपरा है, वो डायलेक्टिकल रही है मानें संवाद-आधारित। ठीक है, आप प्रश्न पूछिए हम जवाब देंगे, प्रश्न-उत्तर, प्रश्न-उत्तर, द्वंदात्मक। वही वहाँ चलता रहता था, बातचीत होती रहती थी इस कारण लाओत्सु को थोड़ी-बहुत प्रसिद्धि भी मिल गई थी, लेकिन फिर भी उनकी रुचि नहीं थी कि, या जो भी बात थी, उन्होंने कभी कुछ लिखा नहीं।

फिर लाओत्सु वृद्ध हो गए। बोले, अब नौकरी से छुट्टी चाहता हूँ और अब मैं जा रहा हूँ, तो वो चीन से चल दिए पश्चिम की ओर। और तब का चीन उतना बड़ा नहीं था जितना बड़ा आप आज का चीन देखते हैं। तब का चीन समझ लीजिए उतना ही था, जितना आज चीन का जो पूर्वी तट है, उससे लगे हुए इलाके। दक्षिणी मंगोलिया, मंचूरिया, या तिब्बत, ये सब चीन में सदा नहीं सम्मिलित थे।

तो वहाँ से चीन से पश्चिम की ओर चल पड़े। कहाँ को जाने के लिए? तिब्बत को जाने के लिए। तो सीमा पर जो प्रहरी खड़ा हुआ था, वो उनको पहचान गया। जो पासेस होते हैं न पहाड़ों में (दर्रे), जैसे हमारे यहाँ खैबर दर्रा है, वैसे ही वहाँ भी कोई दर्रा था वहाँ पर एक पहरेदार खड़ा हुआ था। तो ये जब वहाँ से निकलने गए तो पहचाने गए। बोला, मैं नहीं जाने दूँगा, मुझे पता है कि आप कुछ जानते हैं विशेष और आप निकल जाएँगे इधर तिब्बत की ओर, तो जो आपका सारा ज्ञान है उससे तो दुनिया वंचित ही रह जाएगी। तो कुछ बातें हमें आप बता के जाइए, तभी जाने देंगे।

वो बोले, अरे, कहाँ तुम पकड़ रहे हो, ये सब पंडितों के काम हैं। हम नहीं जानते। हम साधारण आदमी हैं, हमें कोई बहुत सूत्र-वाक्य वग़ैरह नहीं पता। बोले, नहीं, आपको जो पता है, वही बता दीजिए। तो कहते हैं, उन्होंने फिर एकदम साधारण भाषा में, जो उससे कहा जा सकता है एक पहरेदार से, वो बातें कही — 81 वो बातें कही उन्होंने, और वही जो 81 बातें हैं, उनका संकलन आज हमारे सामने ‘ताओ-ते-चिंग’ के नाम से है। पर ये परंपरा से आई कहानी, जनश्रुति है। इसका कोई बहुत ठोस ऐतिहासिक आधार हो, ये ज़रूरी नहीं है।

तो परंपरा ही आगे कहती है कि वहाँ से निकलकर के फिर वो तिब्बत भी गए थे और फिर वहाँ से भारत भी आ गए थे। उन्हीं से जुड़ी एक कहानी ये भी कहती है कि जो उनका पूरा दर्शन है, वो वास्तव में उपनिषदों का ही दर्शन है, और इसीलिए ‘दाओ’ की जो अवधारणा है, वो ‘ब्रह्म’ से इतनी मिलती-जुलती है।

दो बातें हम ताओ-ते-चिंग में पाएँगे बड़ी विशेष, एक — कुछ स्पष्ट उद्घोषणाएँ, कुछ विरोधाभास, जो जानबूझकर ही रखे गए हैं, जैसे हमारे मन को झंझोड़ने के लिए डिलिबरेट कॉन्ट्राडिक्शंस। और कुछ ऐसे वक्तव्य, जो मात्र द्विअर्थी ही नहीं, बल्कि अनेकार्थी हैं, जिनके कई तरीक़े के अर्थ निकल सकते हैं। ये हम पर निर्भर करता है कि हमारी समझ हमें किस अर्थ तक ले जाती है।

असल में, उसकी कुछ वजह चीनी भाषा भी है और कुछ वजह ये है कि जो इसकी मूल पांडुलिपियाँ थीं, उनमें आपस में भी कुछ भेद हैं और उनके कुछ हिस्से मिलते भी नहीं हैं। तो चीनी भाषा ऐसी है कि उसमें आपको अपनी समझ से कई बार तय करना होता है कि एक वाक्य का अर्थ क्या निकल रहा है। कई बार उसमें न कहीं पर पूर्णविराम होता है, न कहीं अर्धविराम होता है, तो आपको ये भी नहीं पता होता कि एक वाक्य ख़त्म कहाँ हो रहा है और दूसरा शुरू कहाँ पर हो रहा है। वो अब आपकी बुद्धि पर है कि आप ये बात पहचान जाएँ। और एक शब्द-समूह के बिल्कुल अलग-अलग अर्थ निकल सकते हैं, अगर आप अर्धविराम को यहाँ की जगह यहाँ लगा दें, तो वो चीज़ इसमें हमारे सामने आती है और वहाँ पर हम अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे समझने के लिए कि वास्तव में कहा क्या जा रहा है।

तो ठीक उस समय, जिस समय भारत में बुद्ध और महावीर थे ही, या आकर के बस अभी-अभी उन्होंने प्रस्थान किया था। ईसा-पूर्व चौथी, पाँचवीं या शायद छठी शताब्दी, ये काल माना जाता है लाओत्सु का चीन में। ठीक है। तो बहुत पुराने हैं लाओत्सु। वो काल बुद्ध और महावीर का ही नहीं है, वो काल बहुत सारे उपनिषदों का भी है। कुछ प्रमुख उपनिषद् तक ऐसे हैं जो उसी काल में लिखे गए थे या उसके बाद भी।

तो विद्वानों ने बार-बार इसीलिए कहा है कि ये जो तीनों धाराएँ हैं — उपनिषदिक, बौद्ध धारा और लाओत्सु, ये तीनों वास्तव में अलग-अलग नहीं हैं और इनमें बहुत कुछ ऐसा है जो साझा है। हालाँकि ये भी है कि बौद्ध धर्म लाओत्सु के बहुत बाद पहुँचता है चीन, और जब बौद्ध धर्म वहाँ पहुँचता है उसके बाद हम पाते हैं कि दाओवाद में और बौद्ध धर्म में कई प्रकार के परस्पर भेद भी होते हैं और झड़प भी होती है। अहिंसक झड़प, मतलब खून-खच्चर नहीं हुआ, लेकिन उनमें आपस में भेद रहा।

फिर जो चीनी बौद्ध धर्म की रूपरेखा बनी, उसने जो शक्ल पकड़ी, उसमें दाओवाद का बड़ा योगदान रहा। क्योंकि जब वहाँ बौद्ध वचन पहुँचे, उससे पहले ही जमीन तैयार कर रखी थी। तो लाओत्सु और चुआंगत्सु — वैसे तो दाओवाद के कई विद्वान, कई प्रवर्तक हुए हैं, लेकिन जो इनके दो प्रमुख ग्रंथ माने जाते हैं, वो यही हैं, एक तो लाओत्सू का दाओ-दे-चिंग और दूसरा चुआंगत्सु। असल में चीन में परंपरा है कि जो कृतिकार है, उसी का नाम कृति को भी दे दिया जाता है। तो चुआंगत्सु ने जो छोटी-छोटी कहानियाँ लिखी हैं, ‘पैराबल्स’ उनको चुआंगत्सु का ही नाम दे दिया जाता है। और चुआंगत्सु को चुआंगत्ज़ी भी बोला जाता है।

तो ये दोनों कृतियाँ, एक तो जो हमारे सामने ही है ये, और दूसरा जो चुआंगत्सु की छोटी कविताएँ या बोध-कथाएँ हैं ये दोनों दाओवाद के मूर्धन्य ग्रंथ मानी जाते हैं। और इसी में लीत्सू का भी नाम जुड़ जाता है, तो उनका भी कृतित्व पढ़ने लायक है।

ताओ, दाओवाद, लाओत्सू और दाओ-दे-चिंग, ताओ के हमने कर ही लिया। ‘दे’ या ‘टे’ या ‘द’ से आशय होता है शुभता। ये जो ग्रंथ है, ये वास्तव में दो हिस्सों में है — दाओ-चिंग और दे-चिंग — ताओ मीमांसा और शुभता मीमांसा — माने, ताओ क्या है और ताओ के गुण क्या हैं या दाओ को समझने से, दाओ पर चलने से शुभ लाभ क्या होता है। दाओ का एक अर्थ ‘रास्ता’ भी होता है। तो अभी मैंने कहा न “दाओ पर चलने से” तो दाओ का अर्थ ‘पथ’ भी होता है, पथ या व्यवस्था।

तो हमारे सामने जो अभी पुस्तक है, उसमें पहले हमारे सामने है, ताओ-चिंग, जहाँ हम ताओ को समझेंगे। उसके बाद आता है, टे-चिंग। तो ताओ-ते-चिंग से हमें ये समझना है कि ताओ और ताओ से शुभता, अंग्रेज़ी में इसको कहेंगे द वे एंड द वर्चू, द वे।

उद्देश्य क्या है ग्रंथ को लिखने का? कि हम समझ पाएँ कि क्या है इस जगत के पीछे, और उस समझ से हमारा कल्याण हो पाए। हम समझ पाएँ कि ये पूरी प्रकृति कैसे चलती है ताकि हम भी सही चल पाएँ।

हम ‘ऋत’ की बात कर रहे थे — ऋग्वेद ने अपना नाम ही ‘ऋत’ से लिया है। ‘ऋत’ का अर्थ ही होता है कायदा, व्यवस्था, नियम। और ‘ऋत’ शब्द ही आगे चलकर ‘धर्म’ बन गया। तो ऋत तो लागू होता था प्रकृति पर और धर्म लागू होने लग गया मनुष्यों पर। विचार ये था कि जैसे प्रकृति में हर चीज़ अपने एक कायदे पर चलती है, एक नियम, एक रास्ते पर चलती है और इस कारण संसार में शुभता व्याप्त है, अराजकता नहीं होती; उसी तरीक़े से क्या हम वो रास्ता खोज सकते हैं जिस पर मनुष्य चले, ताकि मनुष्य का जीवन भी प्रकृति समान ही संतुलित, शुभ और व्यवस्थित हो। ये विचार था।

तो फिर धर्म आगे आ गया, वेदों में भी ऋत पीछे छूट गया। लेकिन वो जो भाव है वो बना रहा, “क्या करें, कैसे जिएँ, कैसे चलें।” ताओ-ते-चिंग का उद्देश्य है वो रास्ता बताना, पथ, व्यवस्था बताना जिस पर चला जा सकता है। ठीक है।

जो पहला ही सूत्र हमारे सामने है, वही अपने आप में बहुत सारगर्भित है, और वो दाओ-दे-चिंग के सबसे ज़्यादा उद्धृत किए जाने वाले सूत्रों में से एक है। क्या कहता है सूत्र, “वो ताओ जिसे नाम दिया जा सकता है, वो शाश्वत या सनातन ताओ नहीं है।” मैं इसको पढ़ रहा हूँ और मुझे पहले ही वाक्य में “नेति-नेति” सुनाई दे रहा है। शुरुआत ही हो रही है मनुष्य के मन के साधारण ढर्रे को चुनौती देने से। हम चाहते हैं कि हर चीज़ को, वस्तु, विचार, व्यक्ति, घटना सबको नाम दें। हमारे मानसिक क्षेत्र में ऐसा कुछ होता ही नहीं जिसको नाम नहीं दिया गया हो। कुछ है आपके पास जिसका कोई नाम न हो? कुछ भी?

कर लीजिए विचार।

लाओत्सू हमसे कह रहे हैं आरंभ में ही कि “बेटा, सबसे पहले तो ये करो कि जो कुछ तुम्हारे मन में है, उसको पीछे रख दो। जो तुम्हारे मन में है, वो तत्व है ही नहीं। जिसकी हम बात करने जा रहे हैं, जिसकी बात करने से कोई लाभ है, जो इस लायक है कि उसकी बात की जा सके और जिससे ये सारी प्रकृति संचालित होती है।”

ये लगभग वैसा ही है जब कई उपनिषदों में, केन उपनिषद्, तैत्रिया, ईश — ऋषि हमसे कहते हैं कि “वाणी वहाँ नहीं जा सकती।” नाम वाणी से ही लोगे न? तो ऋषि ने हमसे क्या कहा है? “वाणी वहाँ जा ही नहीं सकती, तो कैसे नाम लोगे।” मन उसकी ओर चलता है, पर असफल होकर वापस लौट आता है। जो चीज़ यहाँ पर ज्ञानी समझ रहे हैं, वो ये है कि अगर नामों से भरी इस दुनिया का आधार जानना है, तो नामों से तुम्हें अपने आप को खाली करना पड़ेगा।

जिस भी चीज़ को तुम समझना चाहते हो, सबसे पहले उस चीज़ से अपने आप को खाली करो, नहीं तो उसको कभी समझ नहीं पाओगे।

ये सूत्र हो गया।

जिससे भी अपने आप को तुमने भर लिया…, बात पूरी करिए मेरी।

श्रोता: उसको तुम कभी समझ नहीं पाओगे।

आचार्य प्रशांत: उसको तुम कभी समझ नहीं पाओगे। और वही बात, हम थोड़ा आगे कूदेंगे और वही बात हमें जो छठी पंक्ति है उसमें बिल्कुल साफ़ दिखाई देती है। छठी पंक्ति पर हम कई बार आएँगे।

छठी पंक्ति क्या कहती है, कि जब तुम में कामना होती है तो तुम्हें जो दिखाई देता है वो बस उस कामना की अभिव्यक्ति मात्र है। सच नहीं दिखाई देगा तुम्हें। यहाँ पर सच के लिए क्या नाम है — दाओ। जिसके पास कामना है, उसे सच नहीं दिख सकता। उसको दिखेगा तो, पर क्या बस? अपनी ही कामना का विस्तार। और कामना तो हम सबके पास है। तो हमें जो कुछ दिखाई देता है, उसमें कोई तथ्य नहीं है, ये हमारी अपनी कामना ही है।

अगर आप ये सुन रहे हैं और फिर भी आपको अष्टावक्र मुनि का स्मरण नहीं आ रहा है, तो फिर अष्टावक्र संहिता आपने पढ़ी ही नहीं। बड़ा आनंद होता है ये देख पाने में कि सारा ज्ञान अंततः एक ही बिंदु पर आकर के मिल जाता है। “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्य्।” अलग-अलग तरीक़े से बोला है विप्र लोगों ने, माने ज्ञानी लोगों ने, पर वो बात एक ही है।

तो सबसे पहले हमसे कह रहे हैं लाओत्सू कि अपने आप को उन सब इकाइयों, वस्तुओं, विषयों से खाली करो जिनके पास नाम है। नाम माने परिभाषा, परिभाषा माने सिद्धांत, मन का ढर्रा, कंसेप्ट। तो अगर समझना चाहते हो कि ये दुनिया कैसे चलती है, तो सबसे पहले अपने आप को इस विश्वास से खाली करो, कि तुम्हें ज़रा भी पता है कि ये दुनिया कैसे चलती है। जो कुछ भी समझने के इच्छुक हों, वो सबसे पहले अपना ये आत्मविश्वास हटाएँ कि उनमें कुछ भी समझ है।

एक बात और स्पष्ट कर लीजिए, साफ़ कह दिया लाओत्सू ने यहाँ पर कि जिसकी वो बात करना चाहते हैं, उसका नाम नहीं हो सकता। अब कहीं-कहीं पर कहा गया है कि दाओ जो है उससे आशय प्रकृति के नियम हैं। पर प्रकृति के नियमों को तो नाम दिया जा सकता है और समझा भी जा सकता है न। तो निश्चित रूप से लाओत्सू प्रकृति के नियमों की बात नहीं कर रहे हैं। लाओत्सू उस तत्व की बात करना चाहते हैं अपनी कृति में जो प्रकृति के पीछे है, जो प्रकृति का आधार है।

और जैसे ही हम ये कह देते हैं, वैसे ही फिर ताओ का अर्थ सीधे-सीधे ब्रह्म ही हो जाता है — वो जो प्रकृति से परे है। नाम पर दाओ-दे-चिंग में बार-बार चर्चा होगी, लाओत्सू हमसे बार-बार कहेंगे कि “मैं जिसकी बात कर रहा हूँ, उसकी बात सुनकर अगर तुम्हारे मन में कोई नाम उठ आया, तो फिर तुम मुझे नहीं, अपने आप को ही सुन रहे हो। क्योंकि वो नाम कहाँ से आया? वो नाम तुम्हारे ही अपने मन, मानें तुम्हारे अतीत से आया। तुमने बात सुनी मेरी और मेरी बात के आगे खड़ा कर दिया नाम अपना। तो मानें तुमने मेरी बात के आगे खड़ी कर दी बात अपनी। मैं तुमसे कुछ कह रहा हूँ और जो बात मैं तुमसे कह रहा हूँ, तुमने कहा — “अच्छा, अच्छा, ये बात तो उस बात जैसी है या इस बात का ऐसा नाम हो सकता है।” तो लाओत्सु की बात के आगे फिर तुमने खड़ी कर दी है, अपनी बात। तो फिर तुम अपने आप को ही सुन रहे हो, तुम्हें मुझसे कोई लाभ नहीं हो पाएगा।” ठीक है?

खाली करो अगर समझना चाहते हो कि सच्चाई क्या है। विचारों के साथ, पूर्वाग्रहों के साथ, मान्यताओं के साथ सत्य तक नहीं पहुँचा जाता।

नाम का अर्थ ही होता है स्मृतियों का पूरा एक पिंड, एक बंडल, जिसकी परिभाषा पहले से ही तय है। ठोस हैं जिसकी दीवारें, अतीत ने जिसको बड़े पक्के तरीक़े से परिसीमित कर दिया है। वो जो है सो है, उसके पास कोई गुंजाइश नहीं है कुछ नया हो जाने की, बदल जाने की। उसमें सत्य तक के लिए स्थान नहीं है, क्योंकि वो बदल नहीं सकता न। तो जो परिभाषित है, वो अपनी दृष्टि में सत्य से भी बड़ा हो जाता है। इसलिए लाओत्सु कहते हैं, सत्य के आगे खाली होना बहुत ज़रूरी है, नाम लेकर के मत आ जाना।

“द ताओ दैट कैन बी नेम्ड इज़ नॉट द ईटर्नल ताओ।”

फिर, “वो नाम जिसका कोई नाम है, वो नाम सनातन नहीं है।” काव्यात्मक तरीक़ा बात को कहने का। “वो नाम जिसका कोई नाम है, वो सनातन नाम नहीं है।” तो सनातन क्या हुआ फिर? जिसका कोई नाम नहीं है।

आज के समय में अब सनातन बोलो और आजकल जो चर्चा चल रही है सनातन पर, का कैसे नहीं उल्लेख करोगे? सनातन बस सनातन होता है। सनातन के साथ अगर कुछ जुड़ गया तो फिर वो सनातन नहीं है। समझ में आ रही है बात? सनातन के साथ आपने कुछ भी जोड़ दिया, अपनी कोई मान्यता, कोई नाम, कुछ भी, तो बस अपना नाम पकड़े रहिए सनातन को भूल जाइए। जो सनातन है, वो किसी शर्त को स्वीकार नहीं करता।

सनातन का अर्थ है वो जो प्रकृति का है ही नहीं न, प्रकृति के प्रवाह के बाहर है, सो सनातन। और शर्तें सारी कहाँ होती हैं? प्रकृति के अंदर होती हैं न। शर्त का अर्थ होता है सीमा, बंदिश। सारी सीमाएँ, सारी बंदिशें कहाँ होती हैं? प्रकृति के अंदर ही होंगी न। आपने कहीं एक वृत्त बना दिया, कहीं आपने एक लक्ष्मण रेखा खींच दी, ये सब काम प्रकृति के अंदर ही तो कर सकते हो, बाहर तो नहीं कर सकते। जहाँ किसी चीज़ की सख्त वर्जना है या जहाँ किसी चीज़ की अनिवार्य अनुशंसा है, वहाँ सनातन नहीं हो सकता।

तो एक तो सनातन और दूसरा नाम। नाम लेना, नाम जपना, नाम का स्मरण करना, ये भी विश्व के बहुत धर्मों में बड़ा महत्त्वपूर्ण रहा है, विशेषकर भारतीय धर्मों में। तो यहाँ से भी स्पष्ट हो जाता है कि जब आप बात करते हैं नाम को जपने की, तो उसमें आपको धोखा क्या हो सकता है, उसमें आप गलती क्या कर सकते हैं। लाओत्सु आज से ढाई हज़ार साल पहले हमको बता गए, कि “वो नाम जिसका कोई नाम है, वो असली नाम नहीं है। द नेम दैट हैज़ अ नेम इज़ नॉट द टाइमलेस नेम।” जिसका कोई नाम है, वो नाम शाश्वत नाम नहीं है — शाश्वत बोलो, सनातन बोलो, अकाल बोलो, समयतीत जो भी बोलना है।

तो अगर किसी नाम को याद ही रखना है तो उसके नाम को याद रखो जिसका कोई नाम नहीं हो सकता। अगर उसका कोई नाम है, तो उसका नाम जप के तुम्हें कुछ मिलेगा नहीं। साथ ही में ये भी कहा गया है कि जपो ज़रूर, तो वो बात खांडे की धार जैसी ही है कि नाम जपना भी है, पर ये भी पूरी उसमें सावधानी रखनी है कि आप जिसका नाम ले रहे हो, उसका नाम बाक़ी सब नामों का विस्मरण कराने वाला हो। वो नाम बहुत विशेष होना चाहिए, उसका नाम बाक़ी सब नामों का विस्मरण कराने वाला कैसा हो? ये हम अभी समझते हैं। आमतौर पर हमारे सारे नाम ऐसे होते हैं कि एक नाम लो तो उससे एक श्रृंखला की शुरुआत होती है और दस-हज़ार नाम खड़े हो जाते हैं।

अच्छा, ये जो कहने का तरीक़ा है, हज़ार या दस-हज़ार — ये भी लाओत्सु, चुआंगत्सु को बहुत प्रिय है। “द टेन थाउज़ंड थिंग्स” — ऐसे करके बात करते हैं। उससे उनका आशय है संपूर्ण जगत की विविधता, तो उसको बोल दिया करते हैं, द टेन थाउज़ंड थिंग्स।

क्या ये संभव है कि आपके सामने पहिया कहा जाए और आपको गाड़ी याद न आ जाए? आपसे कहा गया पहिया तो गाड़ी याद आ जाएगी, एक नाम से दूसरा नाम आ गया। गाड़ी याद आते ही गाड़ी का रंग याद आएगा। गाड़ी का रंग याद आएगा, याद आएगा कि गाड़ी में अभी ईंधन डला है कि नहीं। याद आएगा कि गाड़ी की मरम्मत करानी थी। फिर याद आएगा, गाड़ी की मरम्मत इसलिए करानी थी क्योंकि भिड़ा आए थे। फिर याद आएगा कि जब भिड़ंत हुई थी तो उसमें गलती आपकी नहीं थी, क्योंकि आपकी कभी गलती होती ही नहीं। फिर, आपके अनुसार जिसकी गलती थी वो याद आएगा। जब वो याद आएगा जिसने आपके साथ इस मामले में अन्याय किया था, आपकी गाड़ी उसने ठोक दी थी तो फिर पाँच-सात और याद आएँगे जिन्होंने अतीत में भी आपके साथ अत्याचार किया है।

जब वो सब याद आएँगे तो पीछे एक मुकदमा लड़ा था, वो याद आएगा। फिर वो वकील याद आएगा, जो इतना नाकाबिल था कि आप मुकदमा हार गए थे। तो हमारी ज़िंदगी में नाम ऐसे होते हैं कि हर नाम अनंत नामों के केंद्र में होता है।

गणित की भाषा में कहते हैं, अनंतता में हर बिंदु केंद्र बिंदु होता है (इन ऐन इन्फिनिट स्पेस, एवरी पॉइंट इज़ द सेंटर)। इसी तरह हमारी ज़िंदगी में हर नाम वास्तव में नामों की पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है। एक नाम आप याद करो और हो नहीं सकता कि आपको अनंत नाम न याद आ जाए। और अगर अनंत नामों की ये श्रंखला, मानसिक, टूटेगी भी तो इसलिए टूटेगी क्योंकि कोई दूसरी श्रंखला शुरू हो गई। वो दूसरी श्रंखला भी किसकी होगी?

श्रोता: नामों की।

आचार्य प्रशांत: नामों की ही होगी। तो हम हर समय नामों के एक महासमुद्र में जी रहे होते हैं। तो हमसे जब कहा जाता है भारतीय पद्धति में कि नाम को जपो, तो हमसे कहा जाता है, कि “क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा नाम हो सकता है जिसके बाद तुम बाकी सारे नाम भूल जाओ?” वो है नाम।

और अगर आप जिस नाम को जप रहे हो, उसको जपने से आपको बाक़ी सारे नाम भूल नहीं रहे, बल्कि वो नाम बाक़ी सब नामों की ही श्रेणी में आ गया है, आपने कर लिया है ऐसा। किसी भी शब्द को अर्थ तो हम ही देते हैं न। आप जिस नाम को जप रहे हो, वो जीवन के बाकी सब नामों की श्रेणी में आ गया है, तो आप जो जप रहे हो उससे कोई फायदा नहीं। आप जगत को ही जप रहे हो।

उदाहरण के लिए, आपने मन ऐसा बना लिया, मान लीजिए आप जप रहे हो “शिव, शिव, शिव” या “विष्णु, विष्णु, विष्णु” और शिव आपके भांजे का भी नाम है, और आप शिव बोल रहे हो और भांजा याद आ रहा है। भांजा याद आ रहा है तो कुछ और याद आ रहा है, पचास चीज़ें याद आ रही हैं। तो ये कोई नाम-जप नहीं हो गया।

जो नाम जपो, वो जपते ही ये स्मरण आ जाना चाहिए कि सारे नाम व्यर्थ हैं।

और वो सिर्फ़ तभी हो सकता है जब आप नाम जो जप रहे हो, उसके साथ कोई कहानी न जुड़ी हुई हो। क्योंकि कहानी का क्या अर्थ होता है? बहुत सारे नामों का विस्तार। कोई ऐसा नाम चाहिए जो विस्तार ले ही न सकता हो। कोई ऐसा नाम चाहिए जिसके साथ ये कहानी जुड़ी है कि इसके साथ कोई कहानी मत जोड़ देना। कोई ऐसा नाम चाहिए जो मन को नामों से खाली कर दे, सिर्फ़ ऐसा नाम जपने से लाभ है।

मन में नामों का पूरा एक भंडार है। पूरी एक भीड़ है मन में नामों की। तुम सर्वप्रथम तो अपने लिए एक ऐसा नाम तैयार करो जो उस भीड़ को भगाना जानता हो, जो उस भीड़ का हिस्सा नहीं हो। वो जो पूरी भीड़ है उससे तुम्हारा संबंध अहंकार का है। वो जो पूरी भीड़ है उससे हमने पोषण पाया है, अहंकार उसी के सहारे खड़ा रहता है। कोई ऐसा नाम लेकर के आओ जो उस भीड़ से किसी तरह का रिश्ता न रखता हो। और सिर्फ़ तभी उस नाम को जपने से लाभ है, नहीं तो आप जप-जप के बस अपने अहंकार को ही और दृढ़ कर रहे हो। भीड़ तो पहले ही विराजी हुई थी मन में, उसी भीड़ को और जप डाला। तो क्या पा लिया?

वास्तव में जपने लायक तो सिर्फ़ मौन होता है, पर मन आसानी से मौन में मानता नहीं। मन कहता है नाम दो। तो विधि ये है कि मन को वो नाम दे दो जो मन को मौन में ले जाए, जो मन के सारे अनुभवों को शिथिल कर दे। कोई ऐसा नाम नहीं उठाना है जिसके साथ मन को सुखद अनुभव होते हो। और सुखद अनुभव किसी भी नाम से आपको तभी हो सकता है जब उस नाम के साथ एक कहानी जुड़ी हो।

मैंने कहा, मिठाई, कुछ अनुभव हुआ न? क्योंकि मिठाई के साथ अतीत में आपकी एक कहानी जुड़ी हुई है। मैं कहूँ, चोट, कुछ अनुभव हुआ न? क्योंकि चोट के साथ भी अतीत में आपकी एक कहानी है। कुछ ऐसा चाहिए जिसकी परिभाषा ही यही हो कि उसकी कोई कहानी हो ही नहीं सकती। जिसकी कोई कहानी हो ही नहीं सकती। सिर्फ़ वही नाम उपयोगी है। लाओत्सु कह रहे हैं, बाक़ी सारे नाम क्षणभंगुर हैं, सब नाम क्षणभंगुर हैं। और प्रकृति में जो कुछ है उसका एक नाम तो है ही। नाम का अर्थ होता है — विशिष्टता। और सूत्र पकड़िएगा अब, विशिष्टता का अर्थ होता है — भ्रम छूट। नाम का अर्थ होता है विशिष्टता, माने अलगाव, पृथकता।

जब मैं कहता हूँ, वो कुर्सी है और ये वैभव है, तो मैं कह रहा हूँ कुर्सी से वैभव अलग है, विशिष्ट है, पृथक है। ठीक। वरना दो नाम नहीं हो सकते थे। आप कुर्सी को और वैभव को अलग-अलग नाम दे रहे हैं, माने आप दोनों को अलग-अलग देख रहे हैं। ठीक है न? यही झूठ है।

नामकरण में झूठ क्या है? समझ रहे हो? क्या? वो वहाँ पर भेद खड़ा कर रहा है जहाँ भेद है नहीं। इसीलिए जहाँ भेद है वहाँ वो भेद देख नहीं पाएगा। अगर ये जगत पूरा बना पंचभूत से ही है, अगर जड़ और चेतन का भी भेद मिथ्या है तो बताओ किस तार्किक आधार पर हम अलग-अलग वस्तुओं को अलग-अलग नाम दे देते हैं? बताओ न, तार्किक आधार क्या है?

बिल्कुल वैसा ही है कि दो बच्चे एक-एक मुट्ठी मिट्टी लेकर आ गए। और एक बच्चा कह रहा है, मेरी मिट्टी का नाम है टिक्की, और दूसरा कह रहा है, मेरी का नाम है पिक्की। एक के हाथ में लाल रंग लगा हुआ था, एक के हाथ में काला। एक ने मिट्टी वाली मुट्ठी जोर से भीची थी, एक ने उतनी जोर से नहीं। तो दोनों की मिट्टी का रंग और आकार अलग-अलग हो गया था। और दोनों ने कहा कि हमारी मिट्टी का नाम भी अलग है। दोनों को अलग नाम देकर दोनों ने स्वयं को समझा दिया, यहाँ कोई भेद है जबकि भेद है नहीं।

ले देकर अणु-परमाणु कुर्सी के ऊपर भी बैठे हैं, कुर्सी के अंदर भी बैठे हैं। और जो बड़ा अंतर हम हमेशा करना चाहते हैं कि ये जो कुर्सी के ऊपर अणुओं का पिंड बैठा हुआ है, ये तो चैतन्य है न, कॉन्शियस है। और कुर्सी क्या है? काट है, मरी हुई लकड़ी है। इसमें तो जान नहीं है, इसमें तो चेतना नहीं है।

और जो जानने समझने लगते हैं, वो कहते हैं कि ये भी तुम जो भेद बता रहे हो, ये कोई दमदार नहीं है। जड़ और चेतन में ऐसा भी कोई भेद नहीं है। जिसको तुम चेतना बोल रहे हो वो तीन गुणों की ही परस्पर गति है। अहंकार बस खड़ा हो जाता है ये बोलने के लिए कि “नहीं नहीं, हम तो चेतन हैं, हम सारा कामधाम कर रहे हैं।” कर, तुम कुछ नहीं रहे हो। हो वही रहा है जो प्रकृति तुमसे करा रही है।

तो बताओ तुम में और प्रकृति में अंतर क्या है?

लेकिन हम भेद मानना चाहते हैं। हम भेद नहीं मानेंगे तो हम कहाँ से आएँगे? फिर अगर मैं और ये कुर्सी एक ही है तो मैं तो मर गया न, मैं तो बचा ही नहीं। तो नाम झूठ है क्योंकि नाम पृथकता का हमें एक झांसा दे देता है, जैसे अलग है सब कुछ, सब कुछ अलग है।

और फिर से अब हम जो छठी पंक्ति उस पर आते हैं, “नाम आवश्यक होते हैं ताकि कामना बची रहे।” जब कुछ पृथक होगा तभी तो कुछ छोटा होगा न, अगर कुछ बटा ही नहीं है तो सब अनंत हो गया। अनंत को ही तो हम इतने सारे हिस्सों में बांट कर छोटा-छोटा करके नाम दे पाते हैं न।

जो पूर्ण है उसको क्या नाम दोगे? नाम तो तभी होते हैं जब दस-पचास फाके बन जाती हैं, तो उनके नाम होते हैं। नहीं तो कैसे नाम दोगे, उसका कामना से क्या संबंध है। जब छोटे हिस्से बन जाते हैं तब उनकी कामना की जा सकती है, अनंत की कामना नहीं की जा सकती। अनंत के आगे तो बस ढेर हुआ जा सकता है कि ख़त्म हो गए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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