मन में नामों का पूरा एक भंडार है। पूरी एक भीड़ है मन में नामों की। तुम सर्वप्रथम तो अपने लिए एक ऐसा नाम तैयार करो जो उस भीड़ को भगाना जानता हो, जो उस भीड़ का हिस्सा नहीं हो। वो जो पूरी भीड़ है उससे तुम्हारा संबंध अहंकार का है। वो जो पूरी भीड़ है उससे हमने पोषण पाया है, अहंकार उसी के सहारे खड़ा रहता है। कोई ऐसा नाम लेकर के आओ जो उस भीड़ से किसी तरह का रिश्ता न रखता हो। और सिर्फ़ तभी उस नाम को जपने से लाभ है, नहीं तो आप जप-जप के बस अपने अहंकार को ही और दृढ़ कर रहे हो।
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आचार्य प्रशांत: ताओवाद या दाओवाद चीन की और विश्व की सबसे पुरानी धार्मिक धाराओं में से है। दाओ से दो आशय निकलते हैं और अभी जब हम लाओत्सु की बात करेंगे, हम पाएँगे कि वो दोनों ही अर्थ लाओत्सु के वचनों पर कहीं एक साथ, तो कहीं अलग-अलग लागू होते प्रतीत होते हैं।
दाओ से पहला अर्थ है ‘ऋत।’ ऋत से आशय है प्रकृति की सारी गति, सारे विस्तार, सारी अभिव्यक्ति के पीछे का नियम। और दाओ से दूसरा अर्थ है सीधे-सीधे ‘ब्रह्म।’ मैं ऋत और ब्रह्म कह रहा हूँ क्योंकि इन शब्दों से आप में से अधिकांश लोग पहले से ही परिचित हैं। चाहे ऋत हो या ब्रह्म, दोनों में ही भाव प्रकृति के विस्तार और विविधता से आगे देखने का है। तो मन, व्यक्ति, आमतौर पर बड़ी आसानी से जगत की विविधताएँ हैं, उनमें ही खोया रहता है। दाओवाद कहता है, यदि शुभता लानी है जीवन में तो देखना पड़ेगा कि प्रकृति के पीछे क्या है, प्रकृति का आधार क्या है, ‘द ग्राउंड ऑफ ऑल बीइंग’ उसको समझना पड़ेगा।
ये दाओवाद है, इसके ठीक-ठीक कह पाना बड़ा मुश्किल है कि कितने अनुयायी हैं पूरे विश्व में, क्योंकि चीन आधिकारिक तौर पर धर्म को मान्यता देता नहीं है और दूसरी ओर दाओवाद कोई आयोजित धर्म नहीं है, एक तरह की जीवन-पद्धति है। तो ये भी संभव है कि कोई बौद्ध हो और साथ में दाओवादी भी हो। लेकिन फिर भी अनुमान ये है कि कम से कम 20 से 30 करोड़ लोग दुनिया में आज भी दाओवाद पर चलते हैं।




